शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ममता

ओ कान्हा !
सुनी  पड़ी हैं ममता मेरी ,सूना पडा वात्सल्य ,
सुन लो अपनी पगली की, अब तो कोई करुण  पुकार |

तरस -तरस अब तो तृष्णा ,भी शांत हो गयी हैं ,
ये सोच के सपनो में ही ,खुश हो लेती हूँ
के मेरे आंचल में भी हैं 
तुमसा कोई रूप सलोना ,नन्हा
कृष्णा  !
इस नारी की प्यास कब बुझाओगे ,
मुझे माँ कहने वाला ,कब मेरे आंचल में लाओगे |
देख किसी का  नन्हा रो पड़ती हूँ हर बार 
हर बार छिप के रो लेती हूँ |
इस बार सामने तुम्हारे फट पड़ी  हैं ,
ये विदीर्ण आत्मा मेरी|
ओ कान्हा !अब मत तरसाओ ,
अब मत तड़पाओ 
न लो इस पगली से अब कोई अग्नि परीक्षा 
क्यों हर परीक्षा को मेरी ही नियति तुमने बना डाला ?
मेरे जीवन से तुमने नारी होने का ये सुख भी मिटा डाला 
प्रभु अब तो मुझपे तरस खाओ 
बन के वात्सल्य की घटा अब तो मेरे आँगन  भी बरस जाओ
अब नहीं होती मुझसे कोई परीक्षा सहन 
मुझमे सामर्थ्य  नहीं रहा अब तुझसे लड़ने का 
हारी बेठी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों में
प्रभु !
इस तन्हाई में मुझे भी ,कोई अपना दे जाओ 
एक बार ,बस एक बार ,मेरे आंचल को भी अपने स्नेह से भर जाओ |

न माँगा तुमसे कभी कुछ आज मांगती हूँ इन हाथो  को जोड़ तुमसे करू करुण पुकार .........
ओ कान्हा !चले आओ चले आओ इस पगली के द्वार |

कोई नहीं अपना मेरा 
दे दो अपनी ही खून की बूंदों से मुझे मेरा अस्त्तिव ,
जिसे मुझसे कोई न छीन सके  सके मुझे वो मेरा अपना
हां मेरा अपना |

कँहा कमी हैं मेरी भक्ति में ये बतलादो
या तो मुझे मेरा अपना कान्हा मिलवा दो
और नहीं ये मेरे लिए तो मुझे अपने चरणों में बुला लो |

मेरे कान्हा !तुम्हारी पगली अनुभूति




तेरी इबादत

गुनगुनाती हवा थमी पड़ी हैं ,
सब कुछ होकर भी जिन्दगी बेनूर सी पड़ी हैं|

खवाब  जो दिखा दिए तुमने इन सुनी आँखों को 
हर पल बेताब पड़ी हैं जिन्दगी उन्हें पूरा करने को|

अपने आप से ही ये कशमकश क्यूँ हैं ?
मुझे तुझसे इतनी मुहब्बत क्यों हैं ?

सोच- सोच के ही मिटी जा रही हूँ में 
अब केसे कहू तुझसे की हँस के जिए जा रही हूँ में |

दूर रह के भी तुझसे बाबस्ता हूँ में ,
ये महज इतिफ्फाक हैं
या कोई नया नासूर  हैं |

जिदगी क्यों हर पल नया इम्तिहान लिए जाती हैं ,
सामने खड़ी  हूँ तेरे, फिर भी क्यों तिल-तिल  मुझे ये मारी जाती हैं |

केसे कह दूँ की महोब्बत नहीं तुझसे मेरे मसीहा ,
ये आग हैं तो भी में मर के जिए जाती हूँ कुछ इस तरह |


तुझसे दूर रहकर ही तेरी इबादत करना मेरा नसीब हैं ,
ये सोच कर ही तेरी बंदगी हँस के किये जाती हूँ |


मिलेगा सुकून उन बाहों का मेरे हमदम 
ये यकी  नहीं मुझको मेरे सनम |
तुम पे यकीं हैं पर किस्मत से डरती हूँ 
कही कोई शिकन ना आ जाए तेरे चेहरे पे ,

मेरी मुहब्बत से ये सोच के ही
खामोश रह के दूर से इबादत करती हूँ |



अनुभूति 

लहर

स्नेह अद्भुत अनुपम तुम्हारा 
रोते -रोते भी छोड़ जाए जो
मुस्कुराहट इन लबो पे 

एक पल में घटा बन के छा जाएँ 
इस प्यासी जिन्दगी पे ,
भीग जाऊ में अपने अंतस से 
कर तुम्हारी आत्मआनंद अनुभूति 
लहर बन के हवा के साथ  बिखर जाऊ 
और छू लू तुम्हारे सपनो का आकाश
बस ये ही अनुभूति हैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई |

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बावरी अनुभूति

मेरे कान्हा
मात ,पिता, बहन ,भाई
पति सगे सम्बन्धी , समाज,
सबके कलुषित शबदो से विदीर्ण,
मन आ पडा तुम्हारे श्री चरणोंके द्वार
खोजता रहा माँ के आंचल में ममता की छावं ,
पिता से स्नेह और अपनत्व ,अधिकार 
भाई और बहन से दुलार ,प्यार 
पति से पत्नी होने का सम्मान 
घर से बहु होने की मरियादा 
जब कुछ न पा सका तो  ये मन 
 पा गया तेरे श्री चरणों की छावं 
सब  झूठे भ्रम हैं मोह माया के 
एक तुझे ही सच्चा पाया मेने इस संसार
अब तक भी आस बंधी थी की पा जाउंगी कही 
कोई स्नेह कोई वात्सल्य कोई अधिकार
आस भी छुट गयी हैं आज
और निकल पड़ी हूँ में तेरे श्री चरणों की छाव
बावरी हूँ कन्हियाँ तेरे स्नेह की 
कँहा से आन पडा तू ले इतना स्नेह दुलार 
मोहित हूँ तेरी सरलता ,सादगी पे 
कुछ नहीं कह के भी कर ले तू मुझे इतना दुलार 
और में निर्मोही भटक रही 
पाने अपनों का लाड दुलार
सोचती  हूँ क्या करू ऐसा की बिच्छ जाऊं 
तेरे चरणों के द्वार |
शबरी के झूठे बेर खाने वाले 
मीरा को विष प्याले से बचाने वाले 
पाकर तुझे धन्य हूँ 
जग न पाया पा लिया तेरा अद्भुत स्नेह संसार |
ये वचन देती हूँ 
कभी न दूंगी अब कोई पीड़ा तुझे मेरे कान्हा
बहाके इन आँखों से  अश्रु धार
में जियूंगी अब अपने लिए 
अपने प्रभु के चरणों की सेवा के लिए
कर समर्पित जीवन  और ये तुच्छ संसार |
थामे रखना ओ कान्हा मुझे भी 
समझ मुरली की झंकार 
तेरी मुस्कुराहट की चांदनी में खिल जाती हूँ में 
तुझे हँसता देख जी जाती हूँ में 
ओ कान्हा बस तारना मुझे यूँ ही तुम 
थामे स्नेह , अधिकार और 
वात्सल्य का दे सर पर हाथ|
तेरे श्री चरणों में तेरी बावरी अनुभूति



मोक्ष

मेरे प्रभु!
जीवन सत्य , नि:श्छल रूप 
बिलकुल प्रकृति  स्वरुप
सरल ,सुदर ,आलोकिक 
क्या कहू ? तुमसे मन की मन की पीर 
सब कुछ तो तुम्हे पता हैं ,क्यों बहे हैं इन आँखों से ये नीर !

तुम्हरा स्नेह ही सहारा हैं जीवन का ,
आज शब्द नहीं ,दर्द फुट पडा हैं जीवन का 

सब कुछ बेजान पडा हैं , जीवन श्मशान बना हैं |
ख़ाक हूँ में ख़ाक में मिल जाने दो बस ये ही कहना बन पडा हैं|

प्रभु!
  क्यों मेरे साथ खड़े हो जीवन जीने की आस जगाए 
  श्मशान में कही फुल खिला करता हैं चाहे कितनी आस लगाये |

  में तो सुखी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों की सेवा में निस दिन .
  पल -पल , तिल -तिल इस सेवा में ,
जो अपने को मिटाने का सुख हैं वो मिटा देगा ,
सारे दुःख  मेरे साथ सब एक दिन |

प्रभु! 
 बस उस अंतिम दिनमेरे सामने ही खड़े रहना
ताकि मेरे तड़प का वो दिन भी देख लो अपनी आँखों से
और मुक्त कर दो मुझे, दे देना मोक्ष मुझे|
क्यों अब नहीं रहना ,कुछ नहीं कहना , सहना |

तुम्हारे श्री चरणों में 
अनुभूति

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

जीवन सत्य मेरे आराध्य ,मेरे राम

बेबस पड़ी जिन्दगी में,
न जगाओं तुम प्यार भरे सपने .
आदत नहीं हैं सपनो की इन आँखों को ,
क्योकि कोई नहीं अपना 

तो क्योकर तुम पराएँ होकर भी ,
इन आँखों को सपने देखना सिखाते हों |
आंसू , दर्द और तड़प ये ही मेरी नियति हैं 
और ये ही मेरे सच्चे  साथी हैं 
जिन्होंने नहीं छोड़ा मुझे तन्हा 
हमेशा पूरी इमानदारी से मेरा साथ निभाया हैं
जब- जब भी में मुस्कुरायी हूँ 
कुछ पल बाद इन  आसुओ ने इन आँखों से 
अपने साथ होने का एहसास कराया हैं |


मेरे पास सिर्फ मेरे राम मेरे अपने हैं 
जिन से लड़ भी लू तो मुझे सदा मुस्कुराते हुए ही देखते हैं 
शायद  वो भी मुझे नादाँ समझके यूँ देखते हो ,
उनके होठो की मुस्कुराहटें 
मुझे कहती हैं अरे पगली 
अब तो रोते - रोते सिख ले 
ये सब भ्रम हैं ,
में तेरा हूँ , 
तेरे साथ हूँ
और सदा तेरे साथ रहूंगा |
छोड़ चली आ|
जितना रो सकती हैं रो ले मेरी बाहों में
सुखा दे समन्दर अपनी आँखों का 
और थोड़ी देर मेरी गोद में चेन से सो जा 
और भूल जा इस संसार को |
क्योकि तू मेरे लिए बनी हैं बस 
और तेरे  राम तेरे साथ हैं
पग- पग इस जीवन से
उस जीवन के पार भी
तो चल थाम ले मेरी भक्ति का हाथ ,
में संग रहूंगा सदा ,
मीरा  को दुनिया ने जहर दिया,
तो मेने पहले उसे भोग लगाया 
तुझे नहीं पीने दूंगा 
अब कोई विष प्याला मीरा की तरह
और नहीं देने दूंगा कोई अग्नि परीक्षा |
हां असीम स्नेह से निभाता चलूँगा तेरा साथ 
भूखा हूँ में क्योकि तू भूखी हैं
सोचा हैं कभी इस दुनिया की परवाह में 
नहीं न ,छोड़ कविता , रस ,छंद  ,अलंकार 
पगली ये सब नहीं तेरे बस का,
तू तो  जेसी भी हैं मुझको हैं स्वीकार |
मेरे राम
इसीलिए तो दीवानी हूँ
तुम्हारे नाम की |

अनुभूति

सुनहरी परी

यादों के आकाश  से,
एक सुनहरी परी उतर आई हैं ,
और छु गयी हैं मेरे  उड़ते आंचल को ,
छु गयी हैं मेरे अंतस को , 

मेरे कानों  के चारों और गूंज रही हैं 
एक मीठी सी मुस्कराहट 
उसने अपनी जादू की छड़ी से ,
मेरे उदास चेहरे पे छेड़ दी हैं,
बड़ी सी मुस्कराहट 
और में खिलखिला उठी हूँ |

जीवन की इस उहापोह में 
भूल गयी थी अपने ही अंतस को
की सुनहरी परी तुमने मुझे कर दिया जिवंत
और एक बार फिर भर  दिया खाली पडा सपनों  का जाम 

हां ,सुनहरी परी ,जीवन भर,
तुम यूँही मेरे साथ रह कर,
भरती रहना खाली पडा ये सपनो का जाम|

क्योकि सपने पुरे हो न हो 
सपनों का जाम  भरने का हक़ 
ईश्वर ने सबके नाम लिखा हैं |

हां ,सुनहरी परी ,
आती ही रहना ,
औरभरती ही रहना ये 
सपनों का जाम |
"तुम्हारी अनुभूति "

काहे रूठ गए हो ,

ओ सावले सलोने कृष्णा मेरे ,
काहे रूठ गए हो ,
तुम बिना सूना पडा हैं गोकुल ,
सुनी पड़ी हैं मुरलिया मन की, 
तुब बिन रूठ गए शब्द मेरे
कहां से गाउ गीत और
केसे मनाऊ  तुम्हे 
अनुभूति

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

सरिता

जिसे कभी तुमने समझा ही नहीं 
वो नारी कर चुकी हैं जीवन से विद्रोह ,
जिसे समझते ही रहे एक बेजान गुडिया
एक छोटी सी धारा ,
न जाने कितने जीवन संघर्षों 
के बाद ले चली हैं  विशाल रूप
मन की सरिता का
अल्हड सरिता को बह जाने दो ,
तोड़ चुकी हैं वो ,
सारे बंधन  रिश्तो के 
भावनाओं के , 
त्याग के ,
अब वो बह चली हैं अपने पुरेवेग से 
अपने अंतिम बिंदु की और 
अपने ईश्वर के मिलन को 
अपने सागर के महामिलन को |
इन रास्तो में ना जाने ,
कितने तूफ़ान और आयंगे ,
इतना आसान  नहीं अभी उस ईश्वर को पाना ,
लेकिन अंतिम शास्वत सत्य हैं
सरिता से सागर का महामिलन
 मेरे प्रभु तुमको आना ही होगा 
दिखाना ही होगा मुझको अपना साकार रूप
करना ही होगा मेरी इस अतृप्त आत्मा से 
महामिलन |
अनुभूति

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

प्रणय गीत

लिखती हूँ प्रणय गीत तुम्हे प्रिय कान्हा ,
 ये स्नेह समन्दर मेरे नाम कर
करदिया कृतार्थ तुमने इस पगली को 
बिंदिया ,चूड़ी, पायल और कंगन से,
खनका दिया दीवानी को ,
कभी लजाऊ अपने को ही देखके ,
तो कभी बहक जाऊ तुम्हे सोच के ,
ये मंद- मंद प्रीत तुम्हारी ,
कर देगी  जीवन का मेरे नव सृजन |

अमलतास

 दूर से आकर,
कभी कोई छोटी ,
 कभी कोई बड़ी लहर
जेसे किनारे को टकरा जाती हैं 
और भीग जाता हैं 
किनारे का रोम -रोम 
कुछ ऐसे ही
बहुत दूर होकर भी,
मुझे भिगो जाती हैं 
  तुम्हारी मुस्कुराहट,,
उसकी गुनगुनाहटे 
 में किनारे की तरह खामोश भीग जाती हूँ 
उस असीम  स्नेह में अपने अंतस तक ,
तुम्हारा वो मुझसे इजाजत मांगना 
मेरे मन की श्रद्धा को ,
स्नेह को और अधिक 
मीठा कर देता हैं , बड़ा देता हैं |
स्नेह का ये घडा,
अब भर के बहने लगा हैं 
और मेरे इन सजल नैनों 
में जाग उठा हैं जीवन एक बार 
लगता हैं जीवन में,
एक बार फिर बसंत लौट आया हैं
और सज गया हैं जीवन ,
अमलतास कीतरह
पीले फूलों से
हाँ  वही अमलतास जँहा
दुष्यंत ने किया था,
शकुन्तला से प्रणय निवेदन
हां भीग जाती हूँ मैं
तुम्हारी खनकती मुस्कुराहटों  से
अपने अंतस तक |
अनुभूति






"राधे - कृष्ण "

न पूजा में खोजू ,
न किसी वन में 
न किसी गीता में ,
न रामायण में 
तुम तो मेरेरोम - रोम में बसे हो भगवान
तुमसा निश्छल कोई नहीं ,
ग्वालिन राधा जप्ती रही तो 
तुमने कर दी उस पगली की प्रीत अमर 
सोलह हजार एक सो आठ रानियों के,
स्नेह में नहीं साहस के कर सके वो तुलना 
उस पगली की निस्वार्थ  प्रीत से ,
इसी स्नेह केसम्मान  के लिए ,
संसार को तुमने दी  अपनी प्रीत 
अपना नाम
"राधे - कृष्ण "
और तुझसे बड़ा क्या
कोई निश्चल होगा मेरे भगवान 
जिस दिन मिल जाएगा 
उस दिन दुनिया से  से पहले में मिट जाउंगी 
लेते -लेते तुम्हरा नाम 
मेरे राधे -कृष्ण
मेरे घनश्याम !
{तुम्हारे श्री चरणों में तुम्हारी दासी अनुभूति }


सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मेरे ठाकुर ,

मेरे ठाकुर ,
मेरे गिरिधर गोपाल ,
तुमसे इस पगली को हैं 
स्नेह अनंत ,अपार
दासीसमझ स्वीकार करो
मेरा ये भक्ति संसार 
तुम्हारे पग धो सकू 
,इन नेनो के अश्रु जल से
 ये मिले मुझे संसार  
तुम्हरा स्नेह इस मीरा की निधि हैं 
न दूसरी कोई जीवन की गति हैं |
तुम्हारी आत्मा के काबिल कँहा ये मेरा स्नेह 
ये तो चरणों की धूलि का अधिकारी हैं 
मुझे नहीं पता तेरी भक्ति में कभी,
मुझे भी विष प्याला पीना होगा
विष प्याला ,हो या कोई अग्नि परीक्षा 
में मर के भी जी जाउंगी 
जो चरण धूलि तुहारी
जो जीवन में एक बार तुम्हारी पा जाउंगी .
ये इस क्षत्राणी को मिला सोभाग्य हैं 
ठाकुरजी ,
 आप की सेवा कर ,
तन ,मन आत्मा से हर वचन निभाउंगी
अपनी दासी मान
अपने हर आदेश से ,
जीवन मेरा धन्य करो |
मेरे ठाकुर जी आप की क्षत्राणी
        अनुभूति

मीरा

इन नैनों में बसे तुम्हरा रूप सलोना .
देखा नहीं ,जाना नहीं .
पर पल - पल अपने साथ महसूस किया हैं 
प्रभु , राजीव लोचन ये संग तुम्हारा |
सजीव प्रीत हैं मेरी,
तुम्हारे श्री चरणों में अर्पित ,
तुमसे ही ये प्रीत भी 
तुमसे ही हैं भक्ति मेरी 
सीता नहीं राधा नहीं 
विष प्याला हँस  के जो पी जाएँ 
मुझे वो मीरा की भक्ति दे दो प्रभु ,
बस अंतिम पल -पल तक 
ये सांस तुम्हारे श्री चरणों मेंनिकले
ये अर्ज कर लो  स्वीकार .
स्वीकार करो अपने 
श्री चरणों में मेरा ये अद्भुत भक्ति संसार |
 अनुभूति 


रविवार, 24 अप्रैल 2011

आत्म विद्रोह

ना भूख हैं इस तन को ,
ना नींद ,न मुस्कुराहट ,न गम
ना प्यास हाँ इस तन को 
 कोई अभिलाषा नहीं ,
अपने को यूँ तिल -तिल जलाना ही  नव- सृजन  हैं 
 सबको माफ़ करदिया हैं मेने 
 कोई अच्छा ,नहीं कोई बुरा नहीं 
न कोई अपना हैं , न पराया 
न स्नेह , न अलगाव 
अब तो बस जो कुछ हैं वो हैं 
मेरा मौन समर्पण 
प्रभु तुम और में आमने सामने हैं 
अपने भाग्य के  सत्य को   स्वीकार 
आत्मा ने कर दिया हैं ये आत्म विदोह ,
पल - पल अपने को जलाना 
और खुश रहना 
असीम ख़ुशी देता हैं मुझे 
 मेरे राम,
मेरी आत्मा
तुम्हारी आँखों का  बड़े साहस 
के साथ करके सामना ,
अश्रु पूरित मुस्कुराहटो से कहती हैं 
प्रभु ,
अब करो सामना मेरे विद्रोह का 
 देखती हूँ कब तक यूँ ही मुस्कुराते 
देख सकोगे मेरी और |
में चाहती हूँ तुम्हारी पत्थर की मूरत,
भी रो पड़े देख ये आत्मा विद्रोह
नहीं करुँगी आत्म ह्त्या 
स्वीकार नहीं प्रभु तेरे कष्टों से 
एक पल में भागने का ये सुख भी मुझे
में इतना सहूंगी इतना सहूंगी 
की तुमको खुद आना होगा 
मुझे अपने चरणों मे
स्वीकार कर कहना होगा
खत्म करो ये आत्मविद्रोह
हाँ तुम्हे खुद आना ही होगा 
और तुम्हे थामना होगा ,
मुझे भी अपने "धुव " की तरह 
देना होगा वो अपने श्री चरणों में अटल स्थान |
नहीं तो जारी रहेगा 
आत्मविद्रोह 
देखना हैं तुम मुझे और कितना दुःख दे सकते हो 
और में कितना सह सकती हूँ 
हार जाओगे तुम मुझे दुःख देते - देते 
इतना कठिन हैं मेरा आत्म विद्रोह
हां , ये आत्म विद्रोह 
मागुंगी नहीं कभी इन होठो से 
सहती ही रहूंगी
बस सहती ही रहूंगी |
मुझे भी देखना हैं 
कितना सुखी हो ,
खुश हो ,
मुझे यूँ करते देख,
महीनो से आत्म विद्रोह |

"तुम्हारी अनुभूति "


शनिवार, 23 अप्रैल 2011

तेरे श्री चरणों में समर्पित

ओ कृष्णा ,
   मेरी आँखों से टिप -टिप करके बहे ,
    ये केसा अनन्य स्नेह तेरा 
   में रोती जाऊ ख़ुशी से नीर बहाती जाऊ 
   बस ये ही तम्मना हैं ,
    तेरी प्रीत धन्य हैं कान्हा 
                 धन्य हैं कान्हा ,
     तुमने जो इस पगली के नाम लिखी हैं 
     वो अनमोल प्रीत ,
     मेरा नाम लिखी तुने  विधाता
ये  सोच ,पाकर ही धन्य हूँ ,में 
विधाता! दो आशीष जो कृष्ण - स्नेह दिया तुमने 
 वो सम्हालने के बन सकू सदा लायक |

तेरे श्री चरणों में समर्पित

"अनुभूति "



राजीव लोचन प्रतिमा प्यारी

       प्रभु श्री राम के चरणों में समर्पित एक कविता 
    जब भीपुजती हूँ 
   राजीव लोचन,तुम्हारी  प्रतिमा प्यारी 
       उसकी  मीठी मुस्कुराहट को देख कर , 
इन ढलते अश्रुओं मेंख़ुशी छा जाती हैं
 सामने बैठ लगता हैं ,
  मेरा रोम तुम ही जानो हो ,
             बिन कहे भी इस पगली की सारी बाते जाने  हो ,
             प्रभु , तुम्हारे ह्रदय से ये अनन्य एकाकार 
        बड़ा आलौकिक लगता हैं ,
    सोचती हूँ तुमको कितना दर्द  दे देती हूँ ,
       और पगली फिर बेठी खुद ही रोती हूँ 

    और कहते नहीं मुझे कभी 
  खामोशपत्थर की मूरत बनकर 
  कभी कोई शिकायत नहीं ,
     हँस के मेरा सारा दर्द सह लेते हो

               मैं अब ना  दूंगी , कोई दुःख तुम्हे मेरे राम 
        भले ही अपने ही अंतर मन से,
           करती ही रहूँ कितने संग्राम
               तुम सा कोई इस संसार में कोई नहीं,
            जो हर बार मेरी आँखों से अश्रु ले
              मुझे अपनी इस मुस्कराहट से 
          मेरा आंचल भर देता हैं |

"अनु तुम्हारे लिए "
कहके सारे संसार की खुशियाँ,
 मेरे नाम लिख देता हैं |
इस पत्थर की मूरत से ही मुस्का के 
   कितनी सारी  अनुभूतियाँ दे  देते हो,
मेरे राम !
 तो साकार रूप कितना देगा , 
ये सोच के ही अभीभुत हूँ |

मेरी श्रद्धा, और भक्ति में साहस होगा ,
तो तुम्हे आना ही होगा अपने साक्षात् रूप में

 और करना होगा , 
अपनी चरण धूलि से 
एक उद्धार इस अहिल्या का |
 स्वीकार करना होगा ,
अपने चरणों में मेरी इस अगाध प्रीति को 
अब ये प्रार्थना नहीं ,
मेरा विद्रोह हैं , मेरी कठिन तपस्या हैं |
कहूँगी नहीं , 
सामने बैठ मुस्कुरा उंगी सदा  ,
शक्ति बन सदा खड़ी हो जाउंगी सामने तुम्हारे ,
अब कही न असह्य कहलाउंगी ,
क्योकि में नहीं दे सकुंगी,
अब कोई दर्द तुम्हे 
मेरेश्री राम

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

विदीर्ण मन ,

विदीर्ण मन , 
अपने लिए ढूंढ़ता हैं ,
उम्मीदों का आकाश ,
नहीं !
ढूंढ़ता  हैं अपने लिए स्नेह की छाँव |
कतरा -कतरा,
जुड़ -जुड़ के बन सका हैं विदीर्ण मन
निसंकोच कहती चली गयी  में,
तुमसे जीवन सत्य संगीन .
सोचा न भाला बस कह डाला ,
आगे सोच भी न पाई 
तुम्हारे मन की वेदना .
जब सोचा तो तार -तार हो गयी  हूँ में ,
अपने ही दिल के कोने से दागदार हो गयी  हूँ में 
क्या कहू ?
केसे करू ,शिकायत भी अपने आप से ,
उलटा कह के भी ,
दर्द का खंजर मेरे सीने में चुभ रहा होता हैं |
विदीर्ण मन सिने के लिए,
में तुम्हारे स्नेह का सुई धागा ढूंड रही  होती  हूँ |
अनुभूति

सीता -राम के अनन्य प्रेम, समर्पणसंवाद

               भागवत का एक सीता -राम के अनन्य  प्रेम, समर्पण  का संवाद
 
  राम ने बड़े दुखी होते हुए सीता से कहा
                               प्रिये ,
                        तुम संग सीते ,
                  प्रीत जन्मो की मेरी ,
                     पर मिथला नंदिनी ,
            ये दुनिया हैं निष्टुर ,कठोर ,कोरी 
              कहती मुझसे सीता अपवित्र हैं 
               ,इसे निष्कासन दो 
                    केसे कहू प्रिये तुमसे 
                 ,ये घोर वेदना मन की 
सीता जी ने अपने प्रभु राम जी के मुख मंडल पे चिंता और आत्मा को दुखी देख कहा 

               प्रभु
में तो जन्म -जनम की बंधिनी तुहारी 
फिर क्यों कहे हैं आप  ,इस दुनिया को निष्टुर सारी
प्राणनाथ मेरे , 
आप इस जगत के भी तो हैं नाथ 
मुझे ज्यादा अबला तो ये प्रजा तुहारी 
ये क्या समझ सकेगी नियति हमारी ?
आप वो निभाइए जो धर्म - रीती हैं राजा की न्यारी |

में नहीं देख सकुंगी अपकीर्ति तुहारी नाथ
दुःख - सुख सदा साथ रही ,रहूंगी सदा 

केसे अलग हो सकेंगी आत्मा नाथ 
ये केसे समझाउंगी इस दुनिया को रघुनाथ
सहर्ष स्वीकार कर अपने प्राणनाथ की आज्ञा 
सीता चली वनवास चुपचाप
अपने प्राणनाथ की आज्ञा कर शिरोधार्य  |

भगवान राम अपनी पत्नी सीता से बहुत स्नेह करते थे ,और सीता जी अपने राम के प्रति जो समर्पण रखती थी उसे समझ पाना आसान नहीं और इस दुनिया के साधारण  इंसानों के संभव भी नहीं |उनका स्नेह बड़ा आलौकिक था |भगवान राम का जीवन प्रेम की इस सुन्दर पराकाष्ठा को समझने का सुन्दर उदाहरण हैं |
और जो लोग कहते हैं की सीता को राम ने निष्काशन दिया उनका लिखना दोष पूर्ण हैं यानी स्नेह में समर्पण के उच्च भाव को वो समझ ही नहीं सके |

 अनुभूति






हे देवादि देव !सूर्य देव

कभी - कभी ऐसा समय भी होता हैं की जब हम हमारे गुरु के दर्शन करना चाहे ,कोई मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहे तो किसी भोतिक स्थ्ती के कारन नहीं कर पाते ,मेरे साथ ये हमेशा होता आया था | एक दिन इश्वर के सामने बेठे - बेठे न जाने केसी दिव्यानुभूति हुयी मेरे मन में एक वाणी का अविर्भाव हुआ की मेरे राम का आदेश हुआ मुझे की तुम प्रत्यश देव भगवान सूर्य देव को अपना गुरु बनाने के लिए प्रार्थना करो |इसके बाद मेने जीवन की हर मुश्किल में अपनी आत्मा में जब भी उनका स्मरण किया उन्होंने सारे अंधरे हटा कर मुझे जीवन का ये नव सृजन दिया |
आज की ये कविता या यूँ कहे प्रार्थना मेने अपनेआराध्य  श्री राम के चरणों में प्रणाम करते हुए अपने गुरु सूर्य देव को अर्पित की हैं |
हे देवादि देव !सूर्य देव      
जग के पालन हार
राम ,कृष्ण और रहीम के कर्मो के साक्षी 
स्वयम नारायण , सवयम भू ,रूद्र 
भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप का तेज
तेरे श्री चरणों में नमन .

कितने ही अंत कालो से तुमने इन अंधेरो को मिटाया हैं
हर इंसान को समानता से अपना स्नेह दिखाया हैं ,
कितने  ही कर्मो के साक्षी बने हो तुम
प्रभु श्री राम जेसे महाज्ञानी को भी 
असह्य हो जाने पर ,
लंका विजय का मार्ग बताया हैं |
तुम ही तो हो प्रत्यक्ष ब्रहम 
साक्षात् ईश्वर ,
इस संसार के हर जीव  में तुम्हरा ही तो अंश पल्व्वित हैं |

संसार में तुमसे बड़ा ह्रदय किसी के पास नहीं गुरु देव ,
और तुमसे ज्यादा कोई दे नहीं सकता ,
तुम तो बूंद बूंद जल सोख कर 
हजार गुना करके उसे धरती की प्यास बुझादेते हो |
मेरे जीवन में भी असीम  ज्ञान ,
आध्यात्म  और ईश्वर की सत्ता का 
मार्ग दिखाओ , 
इस नव - सृजन के मार्ग पे आगे बदने का 
आशीष दो |
और पल्लवित करो मेरे अंतस की शिराओं को  ,
मेरे ज्ञान को भी पोषित करो सम्रद्ध करो
और मुझे ले चलो अंत प्रकाश की दुनिया में ,
जन्हा तुमने ही ,
अपने विराट रूप का दर्शन दिया था अर्जुन को

हां में देखना चाहती हूँ अपने 
हर अंश में रोम रोम में तुम्हारे तेज का ये विराट रूप |
अशिशो मुझे की साधना के मार्ग का में अडीग पत्थर बनू ,
सूर्य न सही तुम्हरा एक अंश बनू 
हां एक अंश बनू ,
सार्थक हो जाएगी साधना मेरे जीवन की 
जो तुम अशिशो ,
हमेशा की तरह मेरा मार्ग प्रशस्त करो ,
और दो इस नव -सृजन की सार्थकता .|
"अनुभूति "



गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

दिव्यानंद अनुभूति

मेरे मालिक क्या मांगू तुझसे अब ,
जो दे दिया
एक पल में तीनो लोको का संसार 

आँखे फुट पड़ी हैं ,थमती नहीं मेरी 
इससे बड़ा सुख संसार में क्या होगा ?
मेरे प्रभु 
किस बंदगी से चूका सकुंगी ये उपकार तेरा |
मेरे लिए इतना कुछ लिख रखा था विधाता |
किस मुख  को तेरी और रख देखू 
मेरे मालिक !
ये केसी दिव्यानंद अनुभूति हैं जीवन की ?
जिसने एक ही पल में बदल दिया मेरा संसार |
तुम्हारी सरलता और सादगी पे मुग्ध हूँ मेरे कृष्ण - कन्हियाँ .
बिना मेरे शबदो से ही,
पड़ लिया संसार  अनुभूति का |
अभिभूत हूँ बस 
आज शब्द भी बहुत छोटे पड़े हैं तेरे मन की विशालता को समझने के लिए |

आज देखा हैं तेरा ये विराट और भव्य रूप मेने मेरे श्री हरी 
धन्य कर दिया तुने ये जीवन |
सजा दी सदा के लिए मुस्कुराहठे 
मेरे इन लबो पे |


"तुम्हारी अनुभूति मेरे श्री हरी !"



एक कविता भागवत के एक सवांद से /बनवारी काहे रूठे हो ,

एक कविता भागवत के एक सवांद से 
 हे गिरधारी ,
बनवारी 
काहे रूठे हो ,
पल -पल मनाये राधा रानी .
राधा कहे श्याम से ,
ओ मेरे मन मोहना 
,रूठो मत  मुझसे श्याम मेरे 
में तो तुमरी दासी ,
अज्ञानी 
में क्या जानू सुसंस्कृत वाणी?
ना वेद पड़े मेने
ना पड़ी कोई ज्ञान की वाणी |
में मुर्ख,
आज्ञानी ,कुछ नहीं जानू
मुझे नहीं आई,
कभी तुम्हरी संस्कृत निष्ट वेद वाणी 
में तो दीवानी कान्हा 
तेरी बंसी की धुन की 
तेरी श्याम सूरत के सामने,
याद मुझे नहीं कोई 
शर्म ,मरियादा 
इसीलिए तो कभी याद नहीं,
रह जाता ढलका आंचल आधा ,
सारी सुध -बुध खोयी मेने तो कर तुमको ,
अपना तन -मन ,सब कुछ कर अर्पण ,
ओ गिरधारी मेरे 
अब इस प्रीत में काहे का ये झगड़ा 
अब तो मुस्का दो श्याम मेरे,
ये सुन्दर मुस्कान देखे बिना ,
क्या जी पायेंगे प्राण मेरे ?
ओ कान्हा अब तो दो मुसकाय ,
नहीं तो ये दीवानी,
खड़ी -खड़ी तुम्हरी प्रीत में अश्रु बहायें
के मुस्का दो कान्हाअब तो 
थोड़ी तो दया दिखला दो
के अब तो मुस्का दो ,मुस्का दो कान्हा |
"अनुभूति "


बुधवार, 20 अप्रैल 2011

में लिखना चाहती हूँ कवितायेँ तुम्हें

मेरे प्रभु!
में लिखना चाहती हूँ कवितायेँ तुम्हें ,
तुम्हारे श्री चरणों में 
अर्पित कर देना चाहती हूँ ,
मेरे सारे शब्द ,
मेरी सारी भावनाएं ,
मेरी मुस्कुराहटें   
मेरा स्नेह ,
मेरी खुशियाँ ,
मेरा प्रेम तुम्हारी ही भक्ति हैं ,
 पल -पल जो इन होठो को जो मुस्कुराहट देते हो ,
वो भी तुम्हारी ही शक्ति हैं ,
कितना आलोकिक स्नेह हैं तुम्हारा
मेरे प्रभु ,
में मुग्ध हूँ तुम्हारे 
असीम स्नेह पे ,
अटल साथ पे ,
तुम्हारी सरलता पे ,
तुम्हारे इन नैनों की सजलता पे ,
तुम्हारी इस अनंत स्नेहमयी मुस्कुराहट पे ,
आलोकिक वाणी पे ,
जो तुम्हारे ध्यान में आते ही ,
आदेश बन कर गूंज उठती हैं ,
और में दुनिया से बेखोफ होकर निकल पड़ती हूँ ,
 इस असीम ,ध्यान और आध्यात्म के महासागर में ,
बस मुझे अपने श्री चरणों से  यूँ ही लगायें रखना ,
और मेरी आत्मा में बसकर ,
मेरे तन - मन को 
मेरे शब्दों  को 
मेरे एहसासों को ,
यूँ ही सीचतें रहना , 
और मुझे देना अपनी पूर्णता ,
अपने नारी होने का अस्तित्व 
माँ होने की शक्ति ,
क्योकि में बहुत कमजोर हूँ 
तुम्हारे इस आगाध स्नेह के बिना ,
मेरी भक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं 
इसीलिए इतनी ही सरलता से बसे रहना
मेरी आत्मा में ,
मुझमे ,
और खिलखिलाती मेरी इन मुस्कुराहटों में
क्योकि मुझे ज्ञान नहीं दुनिया की तरह तुम्हारे विराट रूप का |
में तो तुम्हे बस अपना मान,
जीवनसे  हार चुकी हूँ प्रभु !
स्वीकार करो मेरी ये प्रार्थना और अब मुझे
मेरी वेदनाओ से मुक्त कर,
इस सरिता को दो अपने सागर में मिलने की समर्थता ,
मेरा मार्ग भी तुम ही हो ,
और अंत भी तुम ही प्रभु!
अर्पण कर चुकी हूँ अपना सर्वस्व 
प्रभु !
तुम्हारे इन श्री चरणों में |
तुम्हारी अनुभूति

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

मेरी श्रद्धा के सागर में बसने वाले श्री हरि


मेरी श्रद्धा के सागर में बसने वाले ,
मेरे श्री हरि ,
मेरे राम ,
मेरी श्रद्धा इन आँखों से बहती,
इन शांत अश्रु धाराओं से 
मैं करती तुम्हे प्रणाम .

मेरी श्रद्धा के जल को स्वीकार कर ,
अपने चरणों में हो जाने दो  इस तुच्छ आत्मा को भी पावन ,
ओ मेरे श्री हरि , 
ओ मेरे राम ,
मेरे स्वामी ,मेरे गिरधर गोपाल 

तन - मन का रोम - रोम तेरी भक्ति को पाकर है अभिभूत .
इतना सुन्दर होगा कभी मेरे जीवन का स्वरुप ,
ये स्वप्न से भी परे था |

कृतार्थ कर दिया प्रभु तुमने मुझे ,
इस तुच्छ को अपने श्री चरणों में कर स्वीकार |

ओ मेरे राम ,
श्री हरि ,

अपना सर्वस्व समर्पित कर ,
 करती हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों में 
कोटि- कोटि प्रणाम 

-- अनुभूति 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

ओ मेरे राम !





मेरे प्रभु ! 

वेदनाओ के महासागर में , 
एक नया तूफ़ान कँहा से घिर आया हैं 
विचलित मन ,
थाह पाए भी तो कैसे ..

इस जीवन में ,
बड़ी सरलता से अपनी ही तरह मान कर, 


बिना तुम्हारा अस्तित्व जाने ही ,
मेरे प्रभु ! 
मैंने  समर्पित कर दिया ,
श्रद्धा ,विशवास और समर्पण ,

कितना अलौकिक था |
ये सरल रूप तुम्हारा .
एक सरल मित्र रूप में ,
भयभीत हूँ , तुम्हे साक्षात पाकर 

मेरे प्रभु ! 

मैं  एक साधारण इंसान हूँ 
तुम्हरा ये तेजस्वी प्रकाश ,
और अलौकिक  प्रत्यक्ष दर्शन 
मैं सह नहीं पा रही ,

क्या मुझे ऐसा भी कुछ जीवन में 
मिलेगा ?

तुम्हारा दर्शन इस जीवन में 
मुझे होगा ,कभी ये तो स्वप्न से भी परे था |

वेदनाओं के महासागर में 
ये कोन सा यथार्थ  सत्य मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया हैं |

मेरे प्रभु !
विचलित हूँ , भयभीत हूँ ,
मेरा ईश्वर मेरे सामने हैं ,
 शायद सालो की मेरी भक्ति का ये परिणाम हैं क्या ?

मेरे प्रभु !
तुम्हारा वह  साधारण रूप ही अच्छा था |
मेरे लिए |
अज्ञानता में बड़ा सुख है
 इसका आज बोध कर पाई हूँ मैं .

तब मैं  बड़ी सहज और सरल थी 
अब ठंडी पड़ी हूँ ,
सोच रही हूँ -
 स्वीकार करू ये सत्य!
क्या कर पाउंगी तुम्हारे विराट रूप का दर्शन ?
सह सकूंगी  तुम्हारा वह  तेज !

नहीं शायद
मैं  एक साधरण इंसान हूँ
अपने ही अंतस से लड़ता हुआ

क्या होगा ये मेरे भाग्य में ऐसा कभी ?
 कि तुम्हरा अलौकिक साथ , स्नेह ,विश्वास 
और श्रद्धा होंगे मेरे साथ भी |

होगा मेरे मस्तक पे तुम्हारे
स्नेह और आशीष का हाथ भी
ये सोच कर ही विचलित हूँ..

प्रभु मेरे !

आज मुझे यकीन  है तुम मेरे साथ खड़े हो

मेरे राम !
मेरे जीवन का सम्पूर्ण समर्पण होगा तुम्हारे ही नाम ,
बस अब मुख से लेते -लेते तुम्हारा नाम ,
निकल जाए मेरे प्राण, 
ओ मेरे राम !

-- अनुभूति 

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

नव सृजन ,


जीवन पथ -पथ
कभी फूल  ,
कभी कांटे ,
कभी हँसते दो नयन ,
आज  है  ये नव सृजन 
तुम्हरा, मेरी प्रियतम 
निखर गया , मन दर्पण ,
कहता तो समझती ही नहीं ,
इसलिए करके दिखला दिया 
तुम्हारा ये नव सृजन |

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अजीब सा इत्तफाक

अजीब सा इत्तफाक ,
ये मेरे साथ क्यों हुआ जिंदगी ?
बहुत दूर रहने वाला,
एक पल में साँस क्यों हुआ जिंदगी?

जब जिंदगी बन छाया वो मुझपे ,
तो जिंदगी भी  बहार बन गयी ,
और आज में मौत की सजा में क्यों हूँ जिंदगी ?

ईमानदारी और वफ़ा की क्या सजा यही है ?
सोचती हूँ मैं  भी,
दूसरों की तरह क्यों नहीं बन सकी बेईमान ,
इस जिंदगी में?
अजीब सा इत्तफाक ,
ये मेरे साथ क्यों हुआ जिंदगी ?

बहुत  दूर रहने वाला एक आस क्यों हुआ जिंदगी मैं ?


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अनुभूतियों का अपना ही आकाश




अनुभूतियों का अपना ही आकाश होता हैं और अपनी ही दुनिया ..इस दुनिया में बुरा कोई होता ही नहीं सिर्फ प्यार और ख़ुशी का एहसास होता हैं .लेकिन जीवन में कभी ऐसे भी मोड़ आजाते हैं जो मुस्कुराहटों   के साथ इन आँखों को नमी दे कर जाते हैं |

एक  लम्हा जिन्दगी ,
कितनी  खुबसूरत थी ,
तुम्हारे साथ ,
आँखे अब सपने देखती लगी थी |
मुस्करा गया था ,
तुम्हे देखकर फिर सोल्व्हा वसंत 
और में शर्म से लाल थी ,
अपने आप से भी न मिला सकी नजर में .

पहली बार अपने आप से लजाई थी ,
एक सोलह साल की लड़की ,
तुम्हारी इन आँखों की मदहोशी से ,
जी उठी थी|

खिल गयी थी मन की हर कली 
और मन के आँगन में बौरा गया था गुलाबी बसंत |
हां  वो लम्हा जिन्दगी 

हर पल याद आती हैं अब भी
कितनी मासूम सी पाक चाहत थी
हां ,वो लम्हा जिन्दगी |


तेरा इन्साफ



शमा जलती रही ,
और
बूंद -बूंद अश्क 
ढलता ही रहा .
मैं  तेरे इन्साफ की ,
दुहाई देती रही ,
सोचती थी ,
सबका इन्साफ,
करने वाला
मेरे लिए
क्या सजा मुक़र्रर करता  है ?

उसकी सजा का
कोई अंत ही नहीं था ,
क्योकि में हँस के,
ये सजा सहती रही ,
वो मुस्कुराता रहा ,
और में खामोश शमा सी,
जलती ही रही |
शमा जलती ही रही ,

और बूंद - बूंद अश्क,
ढलता ही रहा,
और वो यूँ ही हँसता रहा |