रविवार, 31 जुलाई 2011

स्नेह की चांदनी

मेरे चाँद !
यूँ न लुटा मुझपे अपने स्नेह की चांदनी

मुझे भी जिन्दगी से जीने की हसरत होने लगती हैं ,
में तो तेरे अक्स से ही किया करती हूँ स्नेह

और घंटों बाते हजार
मेरा आंचल छोटा हैं

तेरी इस धवल स्नेह चांदनी के आगे
केसे स्म्हालुंगी में इतना स्नेह सागर ,
इसीलिए में इतनी दूर से ही

तेरे कदमो में बैठ कर लेती हूँ

पांच वक्त की नमाज अदा

तेरे स्नेह की ये चांदनी ही क्या कम हैं

एक जनम के लिए

मुझे डर हैं अपनी किस्मत से

सोचती हूँ कभी क्या तुम उतर आओगें
मेरे लिए इस पगली के लिए इस जमीन पे भी

बस इसी आस में दिन ढलते हैं और रात होती हें
जिदगी यूँ ही दिन रात

उस दिन के इन्तजार में पूरी
होती हैं
के काश तुम एक दिन इस जमीन पे उतर आओ

अनुभूति




गुरुवार, 28 जुलाई 2011

रसात्मिका

एक जिन्दगी ,एक सच ,

एक एहसास खिलते मन का ,

एक खुशबु ,एक अधूरा ,स्वप्न

एक कठोर सत्य

एक यथार्थ सत्य से परे का एहसास

एक जिन्दगी जीने को मजबूर

एक खुला आकाश स्नेह का

एक अनसुलझी पहेली

एक कठपुतली

अनुभूति

मिथ्या आभास

जीवन और जगत के आधार ,
तुम बिन सुने हैं मेरे प्राण
सब स्वीकार जो तुम दो श्याम !
फिर भी में ये  ही मागु इस तुच्छ संसार
तेरे कदमो में ही इस पगली के छूटे प्राण

जीवन एक सरल सरिता मेरा
समझ न आया तेरा संसार
में तो अपने ही अंतस से दूर जाना चाहूँ
इसीलिए भयभीत तेरे कदमो में चली आऊं


इस संसार की कथनी करनी में  भेद ,
हर मन ,आत्मा में तुम ही बसे ,
 फिर भी अलग अलग हैं भेद
में तो जानू तुझको ही कृष्णा
इसीलिए समझ  ना पाऊं ये भेद
तुमको अपने सा ही पाया
मेरे कृष्णा !

पर भूल ही गयी तुझमे अपने को खोके
तेरा तुझको अर्पण आज किया प्रभु मेने
आज जाना अपना ही अंतस तो पहचाना
अपने को मेरे साथ तुम हो पग -पग
बाकी सब मिथ्या आभास शब्दों सहानुभूतियों का
इस आकाश से परे मुक्त हूँ में अपने ही मन
की दिव्य भक्ति अनुभूतियों में
तुम्हारे चरणों में

श्री चरणों में अनुभूति


शनिवार, 23 जुलाई 2011

तेरे विशवास के सहारे


मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
न जाने कितने तूफ़ान उठते हैं और
में उसकी तूफानी लहरों में ,
बेबस सी कभी किनारे से टकराती और
कभी उसकी मझधार
में झूलती यूँ ही तेरे विशवास के सहार लडती ही रहती हूँ हर सास
अपने ही अंतस से
मात्र एक स्वप्न को हकीकत समझती में
जी रही हूँ एक तूफ़ान में
बड़ी जाती हूँ में तुम्हारे आदेश के पथ पे
तुम्हे नहीं पाती जब कृष्णा तो विदीर्ण हो जाता हैं मेरा रुदय
क्या चाहते हो मुझसे मेरे कृष्णा ?
नहीं जानती में तुम्हारे लेख
मानती हूँ तुम्हारा आदेश
बाकी सब शून्य हैं जीवन ,
अपनत्व खोजती हैं मेरी रूह
लेकिन सब मिथ्या हैं इस जीवन
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

मेरे राम , मेरे तो गुरु भी आप ,,


मेरे राम ,
कोटि -कोटि इन चरण में
आप को प्रणाम
मेरे तो गुरु भी आप ,,
जीवन के सत्य और अक्ष्णु विशवास के साथी भी आप
कठिन हैं मेरा पल -पल जीवन भी आप के बिना
केसे लेलूं हर पर सांस भी राम के नाम के बिना |
कभी लगे समझ नहीं पाऊँ आप में आप का मार्ग
कभी लगे संसार से ज्यादा जानू में राम
नहीं जानू आप की लीला में जगदीश्वर !
मेरे जीवन के स्वामी
इस पावन दिन दीजो मुझे स्नेह आशीष
करू में तुम्हरे इस अश्रुं जल से इन चरण धोकर आप को प्रणाम
भयभीत हूँ में ,विचलित हूँ में
केसे समझाऊ इस दुनिया को मेरे राम
संसार रूठा हो तो बात थी
रूठे हैं राम
दया करो
दयानिधे
दया करो
मेरे नाथ मेरे राम !

बुधवार, 13 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा !न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
तुझसे मेरा मन प्रीत करे ,
के झुक जाए इन कदमो में
में बलिहारी इन कदमो पे
मेरे कृष्णा !
जो साकार रूप में पाऊं
तो में चूम लू ये चरण तोरे कान्हा !
मेरे प्राण !
न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण
दीजो पग -पग मुझे अपने अंनत ज्ञान का वरदान
मेरे रास्तो में मुश्किलें हैं कितनी पर जो राह 'चुनी
तुमने कान्हा जी
वो अद्भुत हैं ,
मेरा मार्ग देने वाले मुझे यूँ ही राह दिखाए चलना
तेरे स्नेह आशीष से शुरू करू में
ये नव जीवन संग्राम
बस ये ही कामना हैं मेरी तुझसे आज .
"श्री चरणों में अनुभूति "

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

इस स्वार्थी की विनिती


मेरे कृष्णा !
मेरे विदीर्ण मन की वेदना तुम ही जानो ,
छुट रहा हैं मुझसे कुछ ,
कुछ जुड़ता ही जा रहा हैं .
नहीं मालुम कान्हा लेकिन लगता हैं
एक पन्ना पलट जीवन का
नया पन्ना लिखा जा रहा हैं |
में नहीं कर सकुंगी
तेरे चरणों में नित
अपनी शब्द अनुभूतियों से प्रणाम
हां लेकिन तेरा आदेश आत्मा में बसा हैं जँहा रहूँ
लिखती ही रहूंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे राम !
और करती ही रहूंगी मेरी आत्मा में बसी तुम्हारी
मनमोहक श्वेत पीताम्बर धारी ,
गले में बसी उस कोस्तुभ ,
और अधरों पे सजी मुरली को प्रणाम
मेरे वासुदेव !
जिसके ह्रदय में वास हैं
माँ लक्ष्मी जिन चरणों की दासी
में भी बस कर जाऊं उन चरणों की सेवा
मुझ पे कृपा करना इतनी आप
मेरे कृष्णा !
आज इस विदीर्ण मन की पीड़ा जानो तुम
केसे कहू पल -पल खीच रहा मुझे कोई
तुमसे दूर मेरे कान्हा !
में छोड़ जाऊं तेरी सेवा ,पूजा
फिर भी तुम मुझे मत छोड़ना कान्हा !
कभी मत छोड़ना !
सदा अपने कदमो में जगह देना
इस स्वार्थी की विनिती
सुनना आज |
"श्री चरणों में अनुभूति "

सोमवार, 11 जुलाई 2011

कान्हा जी ! तेरी भक्ति का रंग


न रूप , न रंग,
न संसार
में तो रंगी हूँ
कान्हा जी !
आप के ही रंग में सौ बार
तेरी भक्ति का रंग मुझपे ऐसा चड़ा
कोई और रंग अब न चद पाए
अनुभूति

मेरे कृष्णा !धन्य हूँ में !

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
कोटि -कोटि हर भोर में अपनी अखियन के जल से ,
धोती में तुहारे चरणों को करू प्रणाम |
  मेरी आत्मा
मेरे अंतस के स्वामी
आप का स्नेह सागर न होता तो ,
ये अद्भुत भक्ति न होती ,
ये अनोखी आत्मीय आत्म आनंद अनुभूति नहीं होती
ये शब्द न होते,
ये भाव न होते ,

न ही में इस झूठे
भवसागर को पार कर
तेरी आरधना और तपस्या की दुनिया में खो पाती
ये असीम स्नेह आनंद बरसता हैं मुझपे
प्रभु तेरा |
क्या मांगू में तुझसे और कुछ कृष्णा
बिन मांगे तो
ये स्नेह शीर सागर मेरे नाम किये बेठा हैं
में अज्ञानी फिर भी
मुझको तुच्छ जान ,
मेरी अनजानी भूल क्षमा करते रहना
मेरे नीलकंठ!
देना मुझे स्नेह आशीष
तेरे रस्ते की धुल न बन सकू ,
तो कम से कम जिस पथ तुम जाओ कृष्णा
उस पथ तुम्हारे चरणों से जो कुम्हला जाएँ में ऐसा फुल बन जाऊं
में धन्य हूँ! धन्य हूँ! कोटि-कोटि धन्य हूँ!
तुम्हे अपनी आत्मा में पाके |
तुमसा कोई आलौकिक स्नेह
नहीं कृष्णा ,धन्य हूँ में !
श्री चरणों में अनुभूति

रविवार, 10 जुलाई 2011

अपने कृष्णा के चरणों में


 
एक बहुत सुन्दर गीत जिसकी हर रिदम मुझे बचपन से बेहद पसंद हैं
और जब आत्मा अपने कृष्णा के चरणों में डूबी होती हें
 तो इस गीत के सुरों पे नाच उठने का मन करता हैं |
अपने कृष्णा के चरणों में
अर्पित ये गीत
अनुभूति

नयी नवेली दुल्हन

मेरे कृष्णा ! 
 मेरे कोस्तुभ धारी !
 ना कोई सन्देश
 ना कोई उम्मीद ,
 फिर भी सत्य के विशवास के साथ ,
  ये गोरी तोरी  ,
नयी नवेली दुल्हन ,
  आस लगाएं बेठी हैं ,  
काहे छोड़ गए हो तुम ,
उसे तन्हा पल-पल तडपे ,  
अखियन से नीर बहायें ,
  बेसुध सी ये गोरी,
प्रियतम की अपने  आस लगाये बेठी हैं  
करती हैं नयी नवेली प्रियतम का इन्तजार  
 मेरे कन्हियाँ ! केसे समजाऊं उसे

हाथो की मेहँदी का सूर्ख रंग

खनकती चूडिया ,
  पेरो की पायल करती हैं 
तेरा इन्तजार कान्हा !
कहती हैं मुझसे लजाते मेरे कान्हा जी आयंगे ,

अपने असीम स्नेह की खनकती पायल
मुझे पहनाएंगे बना 
चरण की दासी
सदा के लिए करंगे चरणों में ,

ये जीवन अर्पण स्वीकार,
सुनी हैं आँखे तुम बिन उसकी
, सिमटी -सिमटी हैं कान्हा ! 
अपने ही घर में 
  मेरे प्रियतम मोहे लेने आयंगे 
  ये आस लगाये बेठी हैं ये नयी नवेली
हां करती वो अपने कृष्णा का इन्तजार  
ले आत्मा  में सत्य का अक्ष्णु विशवास |  
"श्री चरणों में अनुभूति"

शनिवार, 9 जुलाई 2011

मेरी पहली कविता तुम्हारे लिए

मेरी पहली कविता
तुम्हारे लिए हां सिर्फ तुम्हारे लिए
निगाहें खोजती हैं वो अनजाना सा अपना साया ,
धडकनों को तलाश हैं अपनी सी धडकन की
मेरे करीब तुम यंहा कही नहीं ,
मेरे करीब  तो हैं ये बनावटी लोग बनावटी दुनिया
तुम क्यों दूर चले गए इस अपनत्व और प्यार से ?
अनुभूति

संसार के न्यायाधीश !मेरे कृष्णा !




मेरे कोस्तुभ धारी
सोचता होगा तेरे कदमो में बैठ ,
रोती -रोती में
सदा ही तुझसे कुछ माँगना चाहूँ
ना कृष्णा ! ना
इतनी ओछी नई प्रीत मेरी
तोरी कसम
में दीवानी तुझे अपना जान
भुला बेठी ये झुटा संसार
भक्ति का रस ,ज्ञान का सागर बन
अपनत्व का अमृत बरसाने
वाले तुम हो तो हो मेरे श्याम !
चाहे में पुकार लू तुम्हे अपना मान
मेरे राम !
मेरे श्यामं !
तुने तो इस जीवन में ,
स्नेह का अर्थ बतलाया
नर्क से स्वर्ग का मार्ग दिखाने वाले तुम ही
मेरे राम !
मेरे अंतस के स्वामी बन फुट पड़े हो मेरे रोम-रोम से
जिसने अपने स्वप्नों में ही पा लिया हो
 पिया तेरे स्नेह पाश का मधु
बहती देखि हो अपने लिए
उन अखियन से अश्रु धार
वो क्या मांगे इस संसार की तुच्छ सोगात
मेरे कृष्णा !
तेरी बावरी !
झुकती हैं मिटती हैं एक नहीं लाखो बार
 स्नेह का अंदाजा भी नहीं होगा कभी तुझे
जितना उतना तो में एक पल में कर जाऊं
तुझे नहीं पता कृष्णा !
तेरे अधरों की मुरली सुन में कितनी मुस्काऊं
जी जाऊं ,
जब मेरे निकले प्राण
तो भी मेरी अखियन के सामने हो
तुहारी ये अप्रितम निश्छल धवल छबी तुहारी
जब में खोलूं अखियन सदा देखू
तुहे संसार के सामने हाथ दिखाते
सुदर्शन घुमाते ही पाऊं
मेरे बैकुंठ के स्वामी
संसार के न्यायाधीश !
तेरे आगे संसार झुके
में भी उन्ही चरण में बन धुल तुहारे चरण से लिपट जाऊं
हो सके इस जीवन का उद्धार
बस वो कर इस संसार के मुक्ति में पा जाऊं
अनुभूति

मत छल मोहे कान्हा !


मेरे कृष्णा !
कोनसा रूप मोहे दिखाएँ
तू मुझे छल जाएँ ,
मुझे समझ नहीं आये तेरी लीला
ओ कन्हाई !
क्या कहे मुझे कानो में आके !
तू रो मत में चला तो आया तेरे पास माई
क्यों पुकारे तू मुझे हर बार आंचल को ओट,
क्यों मुझे मेरे आंचल से झाँक -झाँक
तू तरसाए
में बावरी कृष्णा !
मुझे न अब ये अपना मोह दिखा
मत छल मुझे अपने इस आलोकिक स्नेह की माया से
मेने त्यागे सारे ये सुख
काहे तू मुझे इस निर्मोही संसार का मोह जगाये |
नहीं मालुम क्या लिखा लेख तुने कान्हा !
फिर भी अगर विधाता का लेख ,
तो इसे कोंन रोक पायेगा
जिस दिन तू आया इस माँ के आंचल की छाव
सारे संसार से में लड़कर  तुझे नाम अपना दूंगी ,
 हां इस संसार में तू मेरे नाम से पहचाना जाएगा
हां ,कान्हा में वात्सल्य का सागर
में तेरे नाम उंदेल दूंगी
मेरे पास सिर्फ ये ही असीम हें
तू जब आयेगा
जानेगा तेरी माँ सी बावरी दूजी कोई नहीं |
मत छल मोहे कान्हा !
मत छल

श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

मेरे कोस्तुभ धारी ! श्री चरणों में करो स्वीकार अनुभूति का ये चरण वंदन

मेरे माधव !
मेरे गोविन्द !
मेरे कोस्तुभ धारी !
 मेरे मुरली मनोहर !
मेरे राघव !
ये केसी हैं अद्भुत माया !
में नहीं समझ पाऊं ये ,
भोर का कोई स्वप्न या भ्रम !
यूँ बरसे स्नेह सागर तेरा ,
जेसे स्नेह का अमृत
इतना मीठा ,इतना सुखद ,इतना अद्भुत
रूप तुहारा कृष्णा !
रूठो तो जिस्म से जान ले जाओ
और बरसों स्नेह से एक पल में इस निर्धन को
अपने असीम स्नेह का अद्भुत सागर दे जाओ

कृष्णा !
अगर ये स्वप्न कोई सुनहरा तो कभी टूटे ना
यूँ ही बिखरी रहे मोगरे और गुलाबो की भीनी खुशबु
और में तुहारे इन कदमो से

चरणों से लिपटी बहाती रहूँ
ये स्नेह नीर
मेरी आँखों में बसता रहे ,
तेरे चरणों की सेवा का स्नेह नीर 
में मर कर भी मिटा कर अपने को रख सकू
तेर्री इस अनुपम स्नेह आशीष के
वरदान का सम्मान .
जीवित हूँ जब तक तेरी बावरी बन ,
दुनिया यूँ ही भूली रहूँ
तेरी चरण धुली बना के अपने मस्तक का रक्त कुमकुम में

सजती रहूँ ,
हां कृष्णा !
में भी मीरा की तरह लुटा दूँ अपना संसार
तेरे असीम स्नेह में
इतनी अर्चना करना चरणों में स्वीकार
खुले आकाश सा बंधन मुक्त निराकार स्नेह मेरा
में एक सरिता स्नेह की
बह जाने ,
दे अपना अनुराग
जीने का इरादा नहीं
यूँ ही तेरी ही असीम भक्ति में डूब
मिट जाने दे .
हां खो जाने दे कृष्णा ,कोस्तुभ धारी मुझे
उस असीम स्नेह भक्ति सागर में
उन मीठी अनुभूतियों में |
श्री चरणों में करो स्वीकार
अनुभूति का ये चरण वंदन 



 

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

सुख का ये अमृत

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे गोविन्द !
मेरे रोम -रोम में बसे माधव !
ये बावरी तुहारी हैं भाव विभोर
नतमस्तक हूँ तुहारे चरणों में
जो सुख पाए मेरी आत्मा वो क्या कहू !
इतना जानू सदा
 में पाऊं अपने को रोते तेरे कदमो में
रोऊ नहीं में दुःख से
हे कृपा निधान !
जगदीश्वर !
ये तो मेरी आत्मा से गिरती मन की गंगा हैं
जो बूंद -बूंद गिरती जाए तुहारे चरणों पे ,
सुख का ये अमृत
कान्हा !
केसे कहूँ ?
जेसे पायस हो
तेरे अनन्य स्नेह का
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

बुधवार, 6 जुलाई 2011

कृष्णा बावरी अनुभूति

 भगवान श्री कृष्ण के साथ आत्मा से जोड़ी गयी प्रीत का सुख अनन्य हैं इसे समझना भोतिक लोगो के लिए थोड़ा मुश्किल |जिसने इस भक्ति और स्नेह की इस आलोकिक के संसार को समझा हें वो इस संसार से परे हो जाता हैं कृष्णा की इस बावरी अनुभूति की तरह !

 बरसती फिजा के साथ ,
बरस रहे हैं फुल मेरी राहों में 
में हूँ खोयी हूँ 
इन खुबसूरत पन्हाओ में 
खिली हैं  जिन्दगी जेसे  खिल गया हो 
ग्रहण के बाद का चाँद 
हां आज वो चाँद मेरे  चेहरे पे खिला हैं 
और उसकी असीम चांदनी ,
मेरी मुस्कुराहट बन सजी हैं दुल्हन की तरह
बसंती रंगों में झूल रहा हैं ये सावन 
इतना खुबसूरत नहीं था कभी ,
ये मतवाला योवन भी 
लगता हैं आज जेसे सारी परीक्षाओं
का अंत कर दिया हो तुमने,
मेरे कोस्तुभ धारी !
केसा अद्भुत आनंद हैं!
ये केसे शब्दों से में कह दू !
मेरे कान्हा ! 
तुम तो जानो  आत्मा का हर भाव 
,हर भाव में लिपटे पड़े हो ,
अंतस में छुते हुए हो
मेरे कृष्णा !
इन अखियन से देखे कोई तो समझे ,
आत्मा से महसूस करे तो जाने
तेरे चरणों का स्पर्श केसा अद्भुत होगा | 
जो सुख पाया मेरे राम !
के चरण धोकर
"केवट राज "
ने वो ही सुख में भी पा जाऊं !
डरती हूँ अपने ही कृष्णा और राम
की असीम प्रीत को में 
नजर न लगा दूँ में 
इसलिए कान्हा !
बन राधिका में 
आज तुम्हे अपनी  ही अखियन,
के काजल से ये काला टिका


लगा दूँ |
श्री चरणों में अनुभूति

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

प्रीत

क्या हैं तुहारी  प्रीत कोस्तुभ स्वामी !
पूजा ,साधना या तपस्या 
मिलो के फासले पे एक अनजान से 
अनजानी आत्मा का मिलन ,
आत्मा से निकले शब्दों की धडकन ,
आत्मा की पुकार 
स्नेह का सागर ,
ह्रदय की मुरली की सरगम की मिठास !
आत्मा के छत्ते से टपकता स्नेह मधु !
या 
कानो के करीब आके,
अपनी मिठास से सब कुछ कह जाने की अदा !
मेरा अमर स्वप्न !
प्रेम का पावस!
निश्छल सत्य!
आत्मा की कठोरता !
मिट जाने की चाह !
पल-पल तड़पने की हसरत !
अपनी प्यास को अपनी आत्मा को  
में छुपा जाने अद्भुत की शक्ति!
या 
 कोई मीठी दिव्य आनंद अनुभूति 
स्वयं संसार बनाने वाले के चरणों को नमन 
तुम्हारी ही तरह अद्भुत हैं 
आलोकिक हैं 
प्रियतम तुहारी प्रीत 
समर्पित हूँ में इसी अप्रितम प्रीत के प्रति 
प्रतीक्षा रत में हूँ में अपने
प्रियतम 
अपने कोस्तुभ स्वामी !
तुम्हारे लिए

"श्री चरणों में अनुभूति  "

सोमवार, 4 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा ! तेरे असीम स्नेह का मधु

मेरे राम !
मेरे कृष्णा !
मेरी आँखों से अब टपकता हैं
तेरे असीम स्नेह का मधु ,
कितना अद्भुत और आलोकिक सुख हैं कृष्णा !
कभी नहीं जाना था तेरे स्नेह भक्ति सागर में डूबे बिना
आज जाना हैं तो रोम -रोम में बह उठता हैं
तेरा असीम स्नेह विशवास ,
कितने मीठे हैं ये आंसू भी मेरे कृष्णा !
ये जाने सिर्फ मेरी आत्मा  और तुम
में तुच्छ कर भी सकी कोई चाकरी
तेरी कृष्णा !
सामने एक बार ही आता हैं ईश्वर
अब जाना
मेरे कान्हा!
  में तो तुम्हे बसाए बेठी हूँ जाने कब से
कभी राम में बसे हो मेरे कभी मेरे कोस्तुभ स्वामी में
सदा तेरी दासी थी में तो कृष्णा !
संसार की लीला में भूले हो तुम
में भूली बेठी हूँ संसार
फर्क इतना हैं ही कन्हाई ,
पर इस संसार को ज्यादा जरुरत हैं
तुम्हारी कृष्णा !
जब दुनिया हो जाए पूरी तो एक क्षण मुझे भी दे
अपना स्नेह मुझे स्वीकार करना अपने चरणों में
मेरी भक्ति को
अनुभूति

रविवार, 3 जुलाई 2011

एक सुहानी भोर

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी ! 
ये मनमोहक छबी तुम्हारी और
एक सुहानी भोर 
सजी हैं फूलो की महक से 
और में भीगी हूँ अपने अंतस तक 
उन मीठी आत्म अनुभूतियों में 
कभी नहीं लगता तुम नहीं हो ,
ऐसा लगता हैं यही सिमटे हो मुझमे 
ये सुकून से भरी भोर ,
मेरे कृष्णा !
ऐसी को भोर न हो ,
जिसमे तेरी मुरली की धुन 
और अनुभूति न हो  
तुम्हरा असीम स्नेह भी मुझे ,
आनन्दित करता हैं
और क्रोध भी कृष्णा ,
मुझमे नहीं लगता कोई भेद ,
तुझमे और मुझमे 
दोनों एक हैं अपने अंतस तक
बावरी हूँ में 
कान्हा तुहारी 
मेरे कृष्णा !
मेरी दुनिया सिमटी हैं तुझमे बस 
जेसे तेरी मुरली में बसी हो सरगम
मेरी भोर का सूरज भी तुम  और
शाम की रोती अखियन को पनाह ,
देता सुकून भी तुम
दिन का हर ख्याल ,हर शब्द 
हर बात भी तुम 
हां तुम ही तो बसे हो, 
इस माथे के सुर्ख  कुमकुम में के सूरज में
 मुझमे मेरे अंतस में ,
मेरे अगाध विशवास में ,
मेरे अडिग सत्य में 
मेरा स्वपन भी तुम ,
मेरा यथार्थ भी तुम,
इन लबो पे खेलती मीठी मुस्कुराहट भी तुम ,
इन अखियन से गिरता नीर भी तुम
मेरी दुनिया के चारों और
और में इस दुनिया में होकर भी नहीं हूँ 
में तो बस सोच के मुस्कुरा देती हूँ ,
अपनी राधा को कही
तुम्हारी मासूम सी बतिया 
वो अपना हक़ जताना , 
वो गुस्सा ,वो अपनत्व ,
वो असीम लाड वो आदेश की हुकूमत
मेरी दुनिया सिमटी हैं बस कुछ ही शब्दों में

कुछ ही खुबसूरत लम्हों में 
में हां सिर्फ एक शब्द में 
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे नील कंठ !
मेरे कृष्णा ! 
मेरे राम ! 

श्री चरणों में नमन 
अनुभूति


शनिवार, 2 जुलाई 2011

मेरे जीवन का सबसे ज्यादा पसंदीदा गीत ,

मेरे जीवन का सबसे ज्यादा पसंदीदा गीत ,
इस गीत की मिठास और एक -एक शब्द कानो में गूंजता हैं 
और बैचेन सी जिन्दगी को 
चेन की पनाहों में नीद आती हैं |
अनुभूति

मेरे कोस्तुभ धारी ! तुम्हारी लीला तुम ही जानो


मेरे लिए भागवत जी एक किताब या पुराण नहीं हैं
जीवन के रोम-रोम में बसने वाले कान्हा का ज्ञान और स्नेह सागर हैं ,
मेरे शब्द मेरी आत्मा से फूटती अपने श्री हरी ! को पुकार हैं बस |

मेरे कोस्तुभ धारी !
जगदीश्वर ,श्री हरी !
अदिति को वरदान देने वाले ,
बलि को अपने वरुण पाश से मुक्त कर,
 सुतल का अधिपति बनाने वाले
मेरे कृष्णा !मेरी भी सुन
मुझे नही मांगना देवी अदिति की तरह कोई पुत्र
मुझे देना हैं तो दो अपने आशीष और भक्ति का वरदान
ज्ञान का वरदान ,
अपने वचनों को निभाने की क्षमता ,
हे कृष्णा !
तुम तो अनंत हो कण-कण में समाये हो
तुमसा देने वाला कोन
तुम ही जो छीन धन जीवन के सत्य की राह दो
अपना अनुरागी भी तुम ही बनाओ और बेर करने वाला भी तुम बनाओ
तुम्हारी लीला तुम ही जानो , 
मेरे तो तुम ही कृष्णा!
तुम ही राम
तुम ही नीलकंठ हो
कभी एक पल में अंत स्नेह सागर नाम कर दो
और कभी आँखों के जगाए सारे सपने अपने ही साथ ले जाओ
तुम्हारी माया अनंत हैं
तुम्हारे बिना जीवन के सारे सुख निराधार
में परछाई नहीं ,सत्य रूप हूँ
एक भोतिक देह इंसान
क्यों चाहू कृष्णा !
में तुम्हे अपनी साँसों में जीवन में हर कर्म में
मुझे खुद भी नहीं पता
देखि हैं मेने निर्जीव मूरत ही तेरी अब तक
हो मेरे आत्मा को तेरा प्रत्यक्ष दर्शन
दो मुझे बस ये वरदान
तेरी चरण धुली में अपने मस्तक पे लगाऊं
तो ये जीवन ये सालो की तपस्या
अपना तिल -तिल जलना सब एक क्षण में भूल जाऊं
मेरे कृष्णा !
मुझसे ही क्यों रूठे पड़े हो !
क्या जाने हो मेरी  लोगे परीक्षा कठिन तो ,
में छोड़ दू तेरी भक्ति का मार्ग कठिन
ये कभी ना होगा मुझे
भले ही तेरी भक्ति में यूँ ही में मिट जाऊं
जीवन मिला हैं जितना
बस तेरी अनुरागी बन ही बिताऊ |
श्री चरणों में अनुभूति

सारे संसार से अलग हैं मेरा सजना



मेरी वफाओं की खुशबु घटी नही,
और सयम के सांचे और
विश्वास की आग में पकती और
महकती ही जा रही हैं
और में मदहोश हूँ
हां में मदहोश हूँ !
तेरे नाम से
ओ मेरे प्रियतम !
सारे संसार से अलग हैं मेरा सजना
मेरा कोस्तुभ धारी !
हां मेरा मुरलीधर !
मेरा कृष्णा !
मेरा कान्हा !
हर रोज झाके रूप सुहाना दिखाकर मुझे
भागवत के पन्नो से ,
कहे कान्हा !
काहे तू रोये !काहे तू मिटे इतना !
ज़रा देख पलट में तो कब से संग साथ खड़ा इतना
समय हैं अभी ये साधना का
सयम का
एक दिन जरुर आउंगा
तुने जो पुकारा मुझे अपनी आत्मा से
हां थाम ले ज़रा अभी मुझे भी थम जाने दे
हां रुक जरा वो फूलो से महकी फिजा
तो आने दे |
होगा तेरा मेरा अद्भुत मिलन
ये अक्ष्णु विशवास रख
इस साधना और विशवास की
परीक्षा अभी हो जाने दे |
अनुभूति |
मेरे कोस्तुभ धारी!
इस भोर भी में बहाते -बहाते इन अखियन से स्नेह नीर
मांगू बस तेरा आशीष 
संसार के हर इंसान के लिए तेरा मन खुला पडा हैं कृष्णा !
मुझसे हो तू क्यों रूठा पडा हैं 
सबको मागा वर दिया हैं 
मुझे एक बूंद को भी तरसा दिया हैं |
तेरा इन्साफ हैं या किस्मत का कन्हाई 
में जानू तो तेरा आदेश और मुझे कुछ नहीं आया
और कुछ जान सकती
 तो में शायद पा जाती दुसरो की तरह 
तेरा स्नेह अपार 
मुझे सिखा दो दुनिया की तरह बनना
मिटा दो जीवन से ये बेचेनी 
दे दो मुझे भी मोक्ष
इतन ही अरज हैं मेरी मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
अनुभूति


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

पयो व्रत संकल्प


मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
आत्मा को तेरा दर्शन आज हुआ हैं
आज हुआ हैं आदेश मुझे पयो व्रत का ,
दे प्रभु !मुझे आशीष
में कर सकू ले माँ भगवती का स्नेह ले सानिध्य
तेरे स्नेह आशीश के साथ
ये संकल्प पूरा
मेरे जगदीश्वर !
आज ही प्रार्थना हैं
आज आप के श्री चरणों में
अनुभूति