सोमवार, 2 मई 2011

ओ कान्हा की मैया ,

      ओ कान्हा की मैया ,
     तेरे आँचल  में हैं कितनी प्यारी छइयां,
कितना आलौकिक स्नेह तुम्हारा माँ |
देख तुम्हारा लाड बरसे मोरी अँखियाँ
जितना  चाहूँ मैं अपने अधूरे स्वप्न को ,
उतना तुम चाहो अपने कान्हा को
एक बार में भी अपने आंचल में लेना चाहूँ ,
तुम्हरे कान्हा को,
इतनी सी बिनती मेरी भी सुन लो मैयां
मेरा तो सूना पड़ा वात्सल्य संसार 
तुम ही दे दो जीवन के कुछ ममता भरे पल उधार
 मेरे स्वप्न कभी न होंगेपुरे  मेरी तरह 
मुझे दे दो कुछ पल कान्हा का लाड दुलार
मेरा जीवन भी करो ममता से सरोबार 
ये ही विनती हैं तुमसे ओ कान्हा की मैयां 
ओ माँ तुम तो माँ हो समझ सकोगी ,
मेरा लाड, मेरी वेदना
तुमसे तो कह भी सकू हूँ मन की अधूरी तड़प 
किसको कहूँगी नहीं तो अपना वात्सल्य संसार
मुझको कुछ पल के लिए ही सही,
दे दो  कान्हा को मेरे आंचल में,
मुझे भी माँ बना दो 
हाँ माँ,हाँ अधूरी स्त्री होने का ये कलंक मिटा दो 
मुझे भी कुछ पल के लिए अपने कान्हा की माँ बना दो |

अनुभूति


तेरा आदेश

राम ,राम ,राम लेते लेते ही निकले प्राण 
प्रभु तुम्हारी ये ही तो इच्छा हैं |
तेरी इच्छा , 
तेरे आदेश के साथ ,तेरा आदेश
सदा सब स्वीकार |
इसमें कभी मुझको नहीं इनकार ,
राम तो साथ खड़े मेरे जीवन की हर झंकार 
तेरा तुझको अर्पण प्रभु मेरे 
के कर अब स्वीकार 
कर दो इस आत्मा का उद्धार 
तिल - तिल तुझको पाना ही मेरा जीवन 
सब कुछ कर दिया न जाने कब से समर्पण
पाने की नहीं तेरे चरणों में मिट जाने की इच्छा हैं 
बस मिट जाने दो , इस देह को भी अब ख़ाक हो जाने दो |
तुमसे मेरे राम ये ही आशीष ये ही तम्मना हैं |
करो स्वीकार मेरा भक्ति संसार 
मेरे राम !
मेरे राम !

"तुम्हारे श्री चरणों में अनुभूति को कर लो स्वीकार मेरे राम !"

श्री कृष्णं शरणं ममः |

श्री कृष्णं शरणं ममः |
अब सौप दिया जीवन सुख,
हर बार नया कोई आक्षेप ,
सब तुम्हारे इन चरणों में |
हर बार लेते आये हो नित नयी परीक्षा ,
एक बार जो जीना चाहा पल भर अपने ,
को भूल ये संसार,
तो  स्वार्थी होने का ये आक्षेप तुमने मुझेपे मड डाला
आत्मग्लानि से मन छलनी हैं 
क्या मेरी आत्मा में परभी तेरा ऐसा वास !
जो सहना पड़े मुझे आज स्वार्थी होने का आक्षेप 
क्या  कमी हैं मेरे प्रभु मेरी भक्ति में ,
मेरे समर्पण में 
सब कुछ तो हाथ बड़ा छीन लिया,
तुमने बनवारी ,
तेरी मुस्कराहट में,
खोयी में भी तो ,करती गयी 
अपना स्नेह ,समर्पण ,
पल -पल न्योछावर  

तुमने दुनिया के लिए बनायी सारी खुशियाँ 
और मुझसे एक पल में ,
छीन लिया मातृत्व के स्वप्न का भी अधिकार
संसार मांगे तुझसे कान्हा!
वात्सल्य ,प्रणय अनुराग 
में मागु तुझसे अपने तिल -तिल ,
मिटने का अधिकार 
आज त्यजति हूँ,
भोजन ,बिछोना 
तेरे सपनों का संसार 
अब तुझे ही आना होगा ,
सुनकर मेरी करुण पुकार 
सुदामा को दे  त्रास ,
तुमने खुद ही अपना आरोप हटाया था 
अब तुम्हे आना होगा
और मुझे खुद मुक्त करना होगा 
जीवन के इस आक्षेप से 
,कहूँगी नहीं सिर्फ पुकारू
हर सांस लेकर तेरा नाम |
दूंगी प्राण तुम्हारे ही चरणों  में ,
करते करते तुम्हारा स्मरण,
श्री कृष्णं शरणं ममः |
श्री कृष्णं शरणं ममः |
श्री कृष्णं शरणं ममः |
"तुम्हारी अनुभूति "

रविवार, 1 मई 2011

रूठी जो राधा

ओ कान्हा !
हर बार रूठ जाओ तो मनाये राधा ,
इस बार रूठी जो राधा मना न सकोगे ,
हर बार तुमने गिराई हैं पगली की आँखों से 
अश्रु धार , अबके माने नहीं राधा 
तू बजाये मुरली कितनी ही,
न माने अब  तो राधा 
न माने  अब तो राधा 
तुम्हे श्याम अब तो साकार 
रूप दिखाना ही होगा अपनी,
पगली राधा को मनाना ही होगा ,
न आये श्याम ,बनवारी तो इन ही चरणों में 
पड़ी पड़ी दम तोड़ देगी तुम्हरी राधा रानी |

अनुभूति

तूफ़ान के बाद की ख़ामोशी

तूफ़ान के बाद की ख़ामोशी 
ज्यादा तबाही दिखाती हैं 
एक खामोश ,सरल सी,
दिखने वाली लहर भी तूफ़ान उठाती हैं |
शांत दरिया की वो खुबसूरत मौज 
जो कभी साहिलों के गीत  गाती थी 
आज तबाही का ये आलम दिखाती हैं 
तबाही के बाद अब कुछ नहीं बचा ,
खंडहर हो गए बुत और इंसान 
सब कुछ खाली हैं दिलो की तरह 
क्यों आते हैं तूफ़ान ,
कभी शांत  दरिया किनारे बैठ के सोचना
कही ये किसी लहर की बगावत तो नहीं |

अनुभूति

जीवन पथ

बड़ी कठिन हैं इस जीवन पथ पे आराधना तुम्हारी 
कुछ पल सपने , कुछ पग काटे ,कुछ पग  फुल 

हर पल नया पाठ -नयी सिख दे मुझको 
बतलाएं  अंतिम सत्य मेरा
हर बार कहे राम मुझे पग -पग थाम 
बिन सोचे चली आ मेरे चरण धाम

भ्रम टूटे मन के एक पीड़ा मन में उठ जाए 
एक बार कहू कुछ नहीं बस अब मर जाए 

मेरे प्रभु ,
पर हर बार सामने खड़े साक्षात मुझे कहो क्यों ?
पगली साथ खड़ा हूँ में तेरे  तेरा राम |

क्यों विचलित हैं क्यों परेशान ?
विशवास रख नियति ने लिखा हैं तुझसे कोई बड़ा काम |

वो कर्ज अभी जीवन का चुकाना हैं फिर आना मेरे धाम |
मेरे राम , मेरे राम
बड़ा आलौकिक अहसास हैं पास कुछ नहीं फिर भी जीवन का एहसास हैं |
ह्रदय के तीक्ष्ण दर्द के साथ , सब कुछ साफ़ हैं |

":अनुभूति "


शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ममता

ओ कान्हा !
सुनी  पड़ी हैं ममता मेरी ,सूना पडा वात्सल्य ,
सुन लो अपनी पगली की, अब तो कोई करुण  पुकार |

तरस -तरस अब तो तृष्णा ,भी शांत हो गयी हैं ,
ये सोच के सपनो में ही ,खुश हो लेती हूँ
के मेरे आंचल में भी हैं 
तुमसा कोई रूप सलोना ,नन्हा
कृष्णा  !
इस नारी की प्यास कब बुझाओगे ,
मुझे माँ कहने वाला ,कब मेरे आंचल में लाओगे |
देख किसी का  नन्हा रो पड़ती हूँ हर बार 
हर बार छिप के रो लेती हूँ |
इस बार सामने तुम्हारे फट पड़ी  हैं ,
ये विदीर्ण आत्मा मेरी|
ओ कान्हा !अब मत तरसाओ ,
अब मत तड़पाओ 
न लो इस पगली से अब कोई अग्नि परीक्षा 
क्यों हर परीक्षा को मेरी ही नियति तुमने बना डाला ?
मेरे जीवन से तुमने नारी होने का ये सुख भी मिटा डाला 
प्रभु अब तो मुझपे तरस खाओ 
बन के वात्सल्य की घटा अब तो मेरे आँगन  भी बरस जाओ
अब नहीं होती मुझसे कोई परीक्षा सहन 
मुझमे सामर्थ्य  नहीं रहा अब तुझसे लड़ने का 
हारी बेठी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों में
प्रभु !
इस तन्हाई में मुझे भी ,कोई अपना दे जाओ 
एक बार ,बस एक बार ,मेरे आंचल को भी अपने स्नेह से भर जाओ |

न माँगा तुमसे कभी कुछ आज मांगती हूँ इन हाथो  को जोड़ तुमसे करू करुण पुकार .........
ओ कान्हा !चले आओ चले आओ इस पगली के द्वार |

कोई नहीं अपना मेरा 
दे दो अपनी ही खून की बूंदों से मुझे मेरा अस्त्तिव ,
जिसे मुझसे कोई न छीन सके  सके मुझे वो मेरा अपना
हां मेरा अपना |

कँहा कमी हैं मेरी भक्ति में ये बतलादो
या तो मुझे मेरा अपना कान्हा मिलवा दो
और नहीं ये मेरे लिए तो मुझे अपने चरणों में बुला लो |

मेरे कान्हा !तुम्हारी पगली अनुभूति




तेरी इबादत

गुनगुनाती हवा थमी पड़ी हैं ,
सब कुछ होकर भी जिन्दगी बेनूर सी पड़ी हैं|

खवाब  जो दिखा दिए तुमने इन सुनी आँखों को 
हर पल बेताब पड़ी हैं जिन्दगी उन्हें पूरा करने को|

अपने आप से ही ये कशमकश क्यूँ हैं ?
मुझे तुझसे इतनी मुहब्बत क्यों हैं ?

सोच- सोच के ही मिटी जा रही हूँ में 
अब केसे कहू तुझसे की हँस के जिए जा रही हूँ में |

दूर रह के भी तुझसे बाबस्ता हूँ में ,
ये महज इतिफ्फाक हैं
या कोई नया नासूर  हैं |

जिदगी क्यों हर पल नया इम्तिहान लिए जाती हैं ,
सामने खड़ी  हूँ तेरे, फिर भी क्यों तिल-तिल  मुझे ये मारी जाती हैं |

केसे कह दूँ की महोब्बत नहीं तुझसे मेरे मसीहा ,
ये आग हैं तो भी में मर के जिए जाती हूँ कुछ इस तरह |


तुझसे दूर रहकर ही तेरी इबादत करना मेरा नसीब हैं ,
ये सोच कर ही तेरी बंदगी हँस के किये जाती हूँ |


मिलेगा सुकून उन बाहों का मेरे हमदम 
ये यकी  नहीं मुझको मेरे सनम |
तुम पे यकीं हैं पर किस्मत से डरती हूँ 
कही कोई शिकन ना आ जाए तेरे चेहरे पे ,

मेरी मुहब्बत से ये सोच के ही
खामोश रह के दूर से इबादत करती हूँ |



अनुभूति 

लहर

स्नेह अद्भुत अनुपम तुम्हारा 
रोते -रोते भी छोड़ जाए जो
मुस्कुराहट इन लबो पे 

एक पल में घटा बन के छा जाएँ 
इस प्यासी जिन्दगी पे ,
भीग जाऊ में अपने अंतस से 
कर तुम्हारी आत्मआनंद अनुभूति 
लहर बन के हवा के साथ  बिखर जाऊ 
और छू लू तुम्हारे सपनो का आकाश
बस ये ही अनुभूति हैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई |

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बावरी अनुभूति

मेरे कान्हा
मात ,पिता, बहन ,भाई
पति सगे सम्बन्धी , समाज,
सबके कलुषित शबदो से विदीर्ण,
मन आ पडा तुम्हारे श्री चरणोंके द्वार
खोजता रहा माँ के आंचल में ममता की छावं ,
पिता से स्नेह और अपनत्व ,अधिकार 
भाई और बहन से दुलार ,प्यार 
पति से पत्नी होने का सम्मान 
घर से बहु होने की मरियादा 
जब कुछ न पा सका तो  ये मन 
 पा गया तेरे श्री चरणों की छावं 
सब  झूठे भ्रम हैं मोह माया के 
एक तुझे ही सच्चा पाया मेने इस संसार
अब तक भी आस बंधी थी की पा जाउंगी कही 
कोई स्नेह कोई वात्सल्य कोई अधिकार
आस भी छुट गयी हैं आज
और निकल पड़ी हूँ में तेरे श्री चरणों की छाव
बावरी हूँ कन्हियाँ तेरे स्नेह की 
कँहा से आन पडा तू ले इतना स्नेह दुलार 
मोहित हूँ तेरी सरलता ,सादगी पे 
कुछ नहीं कह के भी कर ले तू मुझे इतना दुलार 
और में निर्मोही भटक रही 
पाने अपनों का लाड दुलार
सोचती  हूँ क्या करू ऐसा की बिच्छ जाऊं 
तेरे चरणों के द्वार |
शबरी के झूठे बेर खाने वाले 
मीरा को विष प्याले से बचाने वाले 
पाकर तुझे धन्य हूँ 
जग न पाया पा लिया तेरा अद्भुत स्नेह संसार |
ये वचन देती हूँ 
कभी न दूंगी अब कोई पीड़ा तुझे मेरे कान्हा
बहाके इन आँखों से  अश्रु धार
में जियूंगी अब अपने लिए 
अपने प्रभु के चरणों की सेवा के लिए
कर समर्पित जीवन  और ये तुच्छ संसार |
थामे रखना ओ कान्हा मुझे भी 
समझ मुरली की झंकार 
तेरी मुस्कुराहट की चांदनी में खिल जाती हूँ में 
तुझे हँसता देख जी जाती हूँ में 
ओ कान्हा बस तारना मुझे यूँ ही तुम 
थामे स्नेह , अधिकार और 
वात्सल्य का दे सर पर हाथ|
तेरे श्री चरणों में तेरी बावरी अनुभूति



मोक्ष

मेरे प्रभु!
जीवन सत्य , नि:श्छल रूप 
बिलकुल प्रकृति  स्वरुप
सरल ,सुदर ,आलोकिक 
क्या कहू ? तुमसे मन की मन की पीर 
सब कुछ तो तुम्हे पता हैं ,क्यों बहे हैं इन आँखों से ये नीर !

तुम्हरा स्नेह ही सहारा हैं जीवन का ,
आज शब्द नहीं ,दर्द फुट पडा हैं जीवन का 

सब कुछ बेजान पडा हैं , जीवन श्मशान बना हैं |
ख़ाक हूँ में ख़ाक में मिल जाने दो बस ये ही कहना बन पडा हैं|

प्रभु!
  क्यों मेरे साथ खड़े हो जीवन जीने की आस जगाए 
  श्मशान में कही फुल खिला करता हैं चाहे कितनी आस लगाये |

  में तो सुखी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों की सेवा में निस दिन .
  पल -पल , तिल -तिल इस सेवा में ,
जो अपने को मिटाने का सुख हैं वो मिटा देगा ,
सारे दुःख  मेरे साथ सब एक दिन |

प्रभु! 
 बस उस अंतिम दिनमेरे सामने ही खड़े रहना
ताकि मेरे तड़प का वो दिन भी देख लो अपनी आँखों से
और मुक्त कर दो मुझे, दे देना मोक्ष मुझे|
क्यों अब नहीं रहना ,कुछ नहीं कहना , सहना |

तुम्हारे श्री चरणों में 
अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................