शनिवार, 30 अप्रैल 2011

तेरी इबादत

गुनगुनाती हवा थमी पड़ी हैं ,
सब कुछ होकर भी जिन्दगी बेनूर सी पड़ी हैं|

खवाब  जो दिखा दिए तुमने इन सुनी आँखों को 
हर पल बेताब पड़ी हैं जिन्दगी उन्हें पूरा करने को|

अपने आप से ही ये कशमकश क्यूँ हैं ?
मुझे तुझसे इतनी मुहब्बत क्यों हैं ?

सोच- सोच के ही मिटी जा रही हूँ में 
अब केसे कहू तुझसे की हँस के जिए जा रही हूँ में |

दूर रह के भी तुझसे बाबस्ता हूँ में ,
ये महज इतिफ्फाक हैं
या कोई नया नासूर  हैं |

जिदगी क्यों हर पल नया इम्तिहान लिए जाती हैं ,
सामने खड़ी  हूँ तेरे, फिर भी क्यों तिल-तिल  मुझे ये मारी जाती हैं |

केसे कह दूँ की महोब्बत नहीं तुझसे मेरे मसीहा ,
ये आग हैं तो भी में मर के जिए जाती हूँ कुछ इस तरह |


तुझसे दूर रहकर ही तेरी इबादत करना मेरा नसीब हैं ,
ये सोच कर ही तेरी बंदगी हँस के किये जाती हूँ |


मिलेगा सुकून उन बाहों का मेरे हमदम 
ये यकी  नहीं मुझको मेरे सनम |
तुम पे यकीं हैं पर किस्मत से डरती हूँ 
कही कोई शिकन ना आ जाए तेरे चेहरे पे ,

मेरी मुहब्बत से ये सोच के ही
खामोश रह के दूर से इबादत करती हूँ |



अनुभूति 

लहर

स्नेह अद्भुत अनुपम तुम्हारा 
रोते -रोते भी छोड़ जाए जो
मुस्कुराहट इन लबो पे 

एक पल में घटा बन के छा जाएँ 
इस प्यासी जिन्दगी पे ,
भीग जाऊ में अपने अंतस से 
कर तुम्हारी आत्मआनंद अनुभूति 
लहर बन के हवा के साथ  बिखर जाऊ 
और छू लू तुम्हारे सपनो का आकाश
बस ये ही अनुभूति हैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई |

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बावरी अनुभूति

मेरे कान्हा
मात ,पिता, बहन ,भाई
पति सगे सम्बन्धी , समाज,
सबके कलुषित शबदो से विदीर्ण,
मन आ पडा तुम्हारे श्री चरणोंके द्वार
खोजता रहा माँ के आंचल में ममता की छावं ,
पिता से स्नेह और अपनत्व ,अधिकार 
भाई और बहन से दुलार ,प्यार 
पति से पत्नी होने का सम्मान 
घर से बहु होने की मरियादा 
जब कुछ न पा सका तो  ये मन 
 पा गया तेरे श्री चरणों की छावं 
सब  झूठे भ्रम हैं मोह माया के 
एक तुझे ही सच्चा पाया मेने इस संसार
अब तक भी आस बंधी थी की पा जाउंगी कही 
कोई स्नेह कोई वात्सल्य कोई अधिकार
आस भी छुट गयी हैं आज
और निकल पड़ी हूँ में तेरे श्री चरणों की छाव
बावरी हूँ कन्हियाँ तेरे स्नेह की 
कँहा से आन पडा तू ले इतना स्नेह दुलार 
मोहित हूँ तेरी सरलता ,सादगी पे 
कुछ नहीं कह के भी कर ले तू मुझे इतना दुलार 
और में निर्मोही भटक रही 
पाने अपनों का लाड दुलार
सोचती  हूँ क्या करू ऐसा की बिच्छ जाऊं 
तेरे चरणों के द्वार |
शबरी के झूठे बेर खाने वाले 
मीरा को विष प्याले से बचाने वाले 
पाकर तुझे धन्य हूँ 
जग न पाया पा लिया तेरा अद्भुत स्नेह संसार |
ये वचन देती हूँ 
कभी न दूंगी अब कोई पीड़ा तुझे मेरे कान्हा
बहाके इन आँखों से  अश्रु धार
में जियूंगी अब अपने लिए 
अपने प्रभु के चरणों की सेवा के लिए
कर समर्पित जीवन  और ये तुच्छ संसार |
थामे रखना ओ कान्हा मुझे भी 
समझ मुरली की झंकार 
तेरी मुस्कुराहट की चांदनी में खिल जाती हूँ में 
तुझे हँसता देख जी जाती हूँ में 
ओ कान्हा बस तारना मुझे यूँ ही तुम 
थामे स्नेह , अधिकार और 
वात्सल्य का दे सर पर हाथ|
तेरे श्री चरणों में तेरी बावरी अनुभूति



मोक्ष

मेरे प्रभु!
जीवन सत्य , नि:श्छल रूप 
बिलकुल प्रकृति  स्वरुप
सरल ,सुदर ,आलोकिक 
क्या कहू ? तुमसे मन की मन की पीर 
सब कुछ तो तुम्हे पता हैं ,क्यों बहे हैं इन आँखों से ये नीर !

तुम्हरा स्नेह ही सहारा हैं जीवन का ,
आज शब्द नहीं ,दर्द फुट पडा हैं जीवन का 

सब कुछ बेजान पडा हैं , जीवन श्मशान बना हैं |
ख़ाक हूँ में ख़ाक में मिल जाने दो बस ये ही कहना बन पडा हैं|

प्रभु!
  क्यों मेरे साथ खड़े हो जीवन जीने की आस जगाए 
  श्मशान में कही फुल खिला करता हैं चाहे कितनी आस लगाये |

  में तो सुखी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों की सेवा में निस दिन .
  पल -पल , तिल -तिल इस सेवा में ,
जो अपने को मिटाने का सुख हैं वो मिटा देगा ,
सारे दुःख  मेरे साथ सब एक दिन |

प्रभु! 
 बस उस अंतिम दिनमेरे सामने ही खड़े रहना
ताकि मेरे तड़प का वो दिन भी देख लो अपनी आँखों से
और मुक्त कर दो मुझे, दे देना मोक्ष मुझे|
क्यों अब नहीं रहना ,कुछ नहीं कहना , सहना |

तुम्हारे श्री चरणों में 
अनुभूति

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

जीवन सत्य मेरे आराध्य ,मेरे राम

बेबस पड़ी जिन्दगी में,
न जगाओं तुम प्यार भरे सपने .
आदत नहीं हैं सपनो की इन आँखों को ,
क्योकि कोई नहीं अपना 

तो क्योकर तुम पराएँ होकर भी ,
इन आँखों को सपने देखना सिखाते हों |
आंसू , दर्द और तड़प ये ही मेरी नियति हैं 
और ये ही मेरे सच्चे  साथी हैं 
जिन्होंने नहीं छोड़ा मुझे तन्हा 
हमेशा पूरी इमानदारी से मेरा साथ निभाया हैं
जब- जब भी में मुस्कुरायी हूँ 
कुछ पल बाद इन  आसुओ ने इन आँखों से 
अपने साथ होने का एहसास कराया हैं |


मेरे पास सिर्फ मेरे राम मेरे अपने हैं 
जिन से लड़ भी लू तो मुझे सदा मुस्कुराते हुए ही देखते हैं 
शायद  वो भी मुझे नादाँ समझके यूँ देखते हो ,
उनके होठो की मुस्कुराहटें 
मुझे कहती हैं अरे पगली 
अब तो रोते - रोते सिख ले 
ये सब भ्रम हैं ,
में तेरा हूँ , 
तेरे साथ हूँ
और सदा तेरे साथ रहूंगा |
छोड़ चली आ|
जितना रो सकती हैं रो ले मेरी बाहों में
सुखा दे समन्दर अपनी आँखों का 
और थोड़ी देर मेरी गोद में चेन से सो जा 
और भूल जा इस संसार को |
क्योकि तू मेरे लिए बनी हैं बस 
और तेरे  राम तेरे साथ हैं
पग- पग इस जीवन से
उस जीवन के पार भी
तो चल थाम ले मेरी भक्ति का हाथ ,
में संग रहूंगा सदा ,
मीरा  को दुनिया ने जहर दिया,
तो मेने पहले उसे भोग लगाया 
तुझे नहीं पीने दूंगा 
अब कोई विष प्याला मीरा की तरह
और नहीं देने दूंगा कोई अग्नि परीक्षा |
हां असीम स्नेह से निभाता चलूँगा तेरा साथ 
भूखा हूँ में क्योकि तू भूखी हैं
सोचा हैं कभी इस दुनिया की परवाह में 
नहीं न ,छोड़ कविता , रस ,छंद  ,अलंकार 
पगली ये सब नहीं तेरे बस का,
तू तो  जेसी भी हैं मुझको हैं स्वीकार |
मेरे राम
इसीलिए तो दीवानी हूँ
तुम्हारे नाम की |

अनुभूति

सुनहरी परी

यादों के आकाश  से,
एक सुनहरी परी उतर आई हैं ,
और छु गयी हैं मेरे  उड़ते आंचल को ,
छु गयी हैं मेरे अंतस को , 

मेरे कानों  के चारों और गूंज रही हैं 
एक मीठी सी मुस्कराहट 
उसने अपनी जादू की छड़ी से ,
मेरे उदास चेहरे पे छेड़ दी हैं,
बड़ी सी मुस्कराहट 
और में खिलखिला उठी हूँ |

जीवन की इस उहापोह में 
भूल गयी थी अपने ही अंतस को
की सुनहरी परी तुमने मुझे कर दिया जिवंत
और एक बार फिर भर  दिया खाली पडा सपनों  का जाम 

हां ,सुनहरी परी ,जीवन भर,
तुम यूँही मेरे साथ रह कर,
भरती रहना खाली पडा ये सपनो का जाम|

क्योकि सपने पुरे हो न हो 
सपनों का जाम  भरने का हक़ 
ईश्वर ने सबके नाम लिखा हैं |

हां ,सुनहरी परी ,
आती ही रहना ,
औरभरती ही रहना ये 
सपनों का जाम |
"तुम्हारी अनुभूति "

काहे रूठ गए हो ,

ओ सावले सलोने कृष्णा मेरे ,
काहे रूठ गए हो ,
तुम बिना सूना पडा हैं गोकुल ,
सुनी पड़ी हैं मुरलिया मन की, 
तुब बिन रूठ गए शब्द मेरे
कहां से गाउ गीत और
केसे मनाऊ  तुम्हे 
अनुभूति

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

सरिता

जिसे कभी तुमने समझा ही नहीं 
वो नारी कर चुकी हैं जीवन से विद्रोह ,
जिसे समझते ही रहे एक बेजान गुडिया
एक छोटी सी धारा ,
न जाने कितने जीवन संघर्षों 
के बाद ले चली हैं  विशाल रूप
मन की सरिता का
अल्हड सरिता को बह जाने दो ,
तोड़ चुकी हैं वो ,
सारे बंधन  रिश्तो के 
भावनाओं के , 
त्याग के ,
अब वो बह चली हैं अपने पुरेवेग से 
अपने अंतिम बिंदु की और 
अपने ईश्वर के मिलन को 
अपने सागर के महामिलन को |
इन रास्तो में ना जाने ,
कितने तूफ़ान और आयंगे ,
इतना आसान  नहीं अभी उस ईश्वर को पाना ,
लेकिन अंतिम शास्वत सत्य हैं
सरिता से सागर का महामिलन
 मेरे प्रभु तुमको आना ही होगा 
दिखाना ही होगा मुझको अपना साकार रूप
करना ही होगा मेरी इस अतृप्त आत्मा से 
महामिलन |
अनुभूति

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

प्रणय गीत

लिखती हूँ प्रणय गीत तुम्हे प्रिय कान्हा ,
 ये स्नेह समन्दर मेरे नाम कर
करदिया कृतार्थ तुमने इस पगली को 
बिंदिया ,चूड़ी, पायल और कंगन से,
खनका दिया दीवानी को ,
कभी लजाऊ अपने को ही देखके ,
तो कभी बहक जाऊ तुम्हे सोच के ,
ये मंद- मंद प्रीत तुम्हारी ,
कर देगी  जीवन का मेरे नव सृजन |

अमलतास

 दूर से आकर,
कभी कोई छोटी ,
 कभी कोई बड़ी लहर
जेसे किनारे को टकरा जाती हैं 
और भीग जाता हैं 
किनारे का रोम -रोम 
कुछ ऐसे ही
बहुत दूर होकर भी,
मुझे भिगो जाती हैं 
  तुम्हारी मुस्कुराहट,,
उसकी गुनगुनाहटे 
 में किनारे की तरह खामोश भीग जाती हूँ 
उस असीम  स्नेह में अपने अंतस तक ,
तुम्हारा वो मुझसे इजाजत मांगना 
मेरे मन की श्रद्धा को ,
स्नेह को और अधिक 
मीठा कर देता हैं , बड़ा देता हैं |
स्नेह का ये घडा,
अब भर के बहने लगा हैं 
और मेरे इन सजल नैनों 
में जाग उठा हैं जीवन एक बार 
लगता हैं जीवन में,
एक बार फिर बसंत लौट आया हैं
और सज गया हैं जीवन ,
अमलतास कीतरह
पीले फूलों से
हाँ  वही अमलतास जँहा
दुष्यंत ने किया था,
शकुन्तला से प्रणय निवेदन
हां भीग जाती हूँ मैं
तुम्हारी खनकती मुस्कुराहटों  से
अपने अंतस तक |
अनुभूति






"राधे - कृष्ण "

न पूजा में खोजू ,
न किसी वन में 
न किसी गीता में ,
न रामायण में 
तुम तो मेरेरोम - रोम में बसे हो भगवान
तुमसा निश्छल कोई नहीं ,
ग्वालिन राधा जप्ती रही तो 
तुमने कर दी उस पगली की प्रीत अमर 
सोलह हजार एक सो आठ रानियों के,
स्नेह में नहीं साहस के कर सके वो तुलना 
उस पगली की निस्वार्थ  प्रीत से ,
इसी स्नेह केसम्मान  के लिए ,
संसार को तुमने दी  अपनी प्रीत 
अपना नाम
"राधे - कृष्ण "
और तुझसे बड़ा क्या
कोई निश्चल होगा मेरे भगवान 
जिस दिन मिल जाएगा 
उस दिन दुनिया से  से पहले में मिट जाउंगी 
लेते -लेते तुम्हरा नाम 
मेरे राधे -कृष्ण
मेरे घनश्याम !
{तुम्हारे श्री चरणों में तुम्हारी दासी अनुभूति }


तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................