सोमवार, 5 दिसंबर 2011

पुकार


मेरे राम !
काहे टूटता नहीं,
मेरी आत्मा का विश्वास ,
क्यों मेरी आत्मा में
सत्य का अलख जगाएं हो !
देख चुकी इस
संसार में सत्य का मान 
सिवा अपमान और तिरस्कार के कुछ भी नहीं 
जानते हो !
इस कलयुग में इस सत्य का मोल 
तो फिर क्यों मेरी आत्मा में
ये अलख जगाए हो !
मैं इस संसार की नहीं ,
या ये मेरा ये नहीं 
फिर मुझे काहे इस भ्रम में फसायें हो 
अगर कही ,
मेरे राम .इस संसार के साक्षी हैं
तो कँहा हैं !
में नहीं जानती ,
इतना सिखा हैं माँ से अपनी 
पिता के अडिग सत्य से ,
तुम सत्य में बसा करते हो
निश्चलता में ,बस  रहा करते हो 
मेरी आत्मा की ये जिद हैं 
तुम आना होगा ,
तुम आये थे 
अहिल्या के उद्धार को भी .
करने स्वीकार शबरी के स्नेह को भी
मुझे मेरे यथार्थ सत्य का भान करना होगा ,
तुम्हे आना होगा
में जानती हूँ 
तेरे ही कदमो की सेवा की प्यास ले आई हैं 
मुझे इस दुनिया में दोबारा 
संसार के स्वार्थ से परे में हूँ ! तुम्हारी
तुम्हे साक्षी मान छोड़ चुकी हूँ
मिथ्या भ्रमों का ये संसार
मैं जानती हूँ ,
मेरी तपस्या में कमी है 
अभी कुछ बाकी ,
लेकिन तुम्हे ,
मेरी आत्मा में बसे 
अक्ष्णु विशवास के लिए
अपनी धरती छोड ,
मेरे स्वर्ग में आना होगा
ना ये विनती हैं,
ना ये कोई जिद
ना स्नेह ,ना कोई समर्पण
ना स्वार्थ
ये मेरी आत्मा की अपने राम को 
पुकार मात्र हैं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इस  भोर का 
ये अश्रु प्रणाम करो स्वीकार 
अपने चरणों में .

अनुभूति


शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की





मेरे माधव ! 
कभी मैं खिलखिला के मुस्कुरा उठूँ 
तेरी बतियों पे ,
तो कभो कही तेरी खामोश 
अहसासों  की जुबा पे 
लड़ती जाऊं 
रोती जाऊं और
नीर भरी इन अखियन से
तुझे प्रेम -पाती  लिखती जाऊं 
जितने मेरे शब्द नहीं ,
उतने ही अंखियन में 
सागर भरे 
तेरा ही स्नेह सागर को इन अखियन 
से बहाती ही जाऊं  
तेरी  ही तरह विशाल हैं 
तेरा  ये स्नेह सागर 
पल-पल में जितना नीर बहाऊं
उतना  ही ये उमडा जाएँ 
ह्रदय की पीड को, दे विष प्याला 
मैं  तेरे क्षणिक स्नेह का 
अमृत पाकर में जी जाऊं
तेरे हाथो में हैं
इस छोटी सी माटी कीगुडिया  डोर 
जो तू खीच ले तो में रो लूँ 
और जो तू छोड दें ,मैं हंसती जाऊं ,
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की 
जेसे तू चाहेँ ,
मैं जीती जाऊं 
मैं तो तुझ संग बंधी हूँ प्रियतम 
तुमसे अपने निस्वार्थ प्रीत 
निभाती जाऊं
तुम ही कहो सारा संसार 
 सिर्फ स्वार्थ के लिए साथ करे मेरा 
मैं निस्वार्थ ,मिट जाउंगी 
मीरा  की तरह हर 
विष प्याला पी  जाउंगी 
.दे प्राण में ये प्रीत निभाऊँगी
तुम्हे भी ये अहसास जगा दूंगी 
कोई मुझसा भी नहीं मिलेगा 
तुझे इस संसार 
मेरे माधव !
मेरे कान्हा !
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति





शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी

 
एक खुबसूरत अल्फाजों  से सजा गीत 
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी 
कितना  खुबसूरत हैं ........
जो स्वर्गमें होने की अनुभूति देता हैं
अनुभूति
                                                           

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

तेरे कदमो पे जीवन हारी

मेरे राम ! 
जिस रूप में तुम आओ 
मेरी इन अखियन के सामने 
मैं मन्त्र मुग्ध सी  देखती ही जाऊं 
केवल तुम्हारे चरण के धाम को 
सारा संसार होगा मुग्ध
तुम्हारे रूप .
रंग नाम
पे बलि हारी 
मैं  दीवानी,
एक पगली सी 
तेरे कदमो पे जीवन हारी 
कोई भोर न ऐसी जीवन की 
जब न में, न पहनाऊं तोहे 
चरण पादुका 
अपने स्नेह नाम की 
तुझसे ही सिखा हैं 
सिखा "उसके सुख में सुखी रहना "
तुझसे ही पायी हैं 
अपने राम के असीम स्नेह की कृपा अपार 
मेरा जीवन महके पाके 
तेरा ये स्नेह दुलार
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति







मंगलवार, 29 नवंबर 2011

काहे इतना स्नेह बरसाते हो

मेरे राम !
काहे इतना स्नेह बरसाते हो 
इस अभागी पे 
जो ना जाने इसका मोल
उसे काहे दिए जाते हो 
में पगली जीवन दे भी न चुका सकूँ 
तेरी प्रीत की कीमत अनमोल
ले चल मुझे संग अपने 
बना ले मुझे भी अपने संग अपने सा 
या मिटा दे इस जीवन 
को ,दे अपना क्षणिक दे आवेश 
तू ना जाने ,
मेरे मन की थाह 
 तेरे कदमो के सिवा कोई अब न रही चाह
श्री चरणों में तुम्हारी अनु



में हूँ दासी अपने राम की !

मोहे शपथ
करुणा निधान की 
में हूँ दासी अपने राम की ,
में सदा  ही पाऊं
इन अखियन में  
 सदा निश्छल धवल छबी 
अपने राम की
रोक सके न संसार का कोई मोह 
मेरी आत्मा का स्नेह बंधन 
जो मिले मेरी आत्मा  
अपने राम के चरणों से 
तो मे पाऊं आत्मा का सुख अपार 
मेरे राम !
करुणा निधान 
मोहे शपथ अपने राम 
में सदा करू हर भोर चरण प्रणाम 
तोरे नाम 
मेरे राम ! 
श्री चरणों में अनुभूति  



 
 

रविवार, 27 नवंबर 2011

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

नीर भरे नयन करूँ,
क्या में तुमसे क्या कहूँ सजन

मेरा मासूम मन कभी न समझ सका,
दुनिया की रीत 
ओ सजन !
वो तो पत्थर की मूरत को भी मानअपना 
करता रहा सदा ,
इन अश्रुओं से चरण  वंदन 
खोट कही मेरे साधना मे ही 
भक्ति में ,तपस्या मैं ही 
जो पा न सकी अपना प्रियतम 
सब कुछ हैं ,पर कुछ भी नहीं 
न पायल ,चूड़ी ,सिंदूर सजन 
खनकती चूड़ियों ही में उसके पास
भटकती रही ले मन की प्यास 
वो मुझे ठुकराता रहा ,
मासूम मन जान न सका ये बात 
जान नहीं सकी अपने और उसके बीच के 
बड़े  धरती -आकाश के अंतर की बात 
मेरा मासूम मन बस इन नीर भरे नैनों से उसे 
 पूजता ही रहा ,दुआए देता ही रहा 
पर वो मुझे खोजता ही रहा 
खोफ ,डर और मुसीबत और 
न जाने किन -किन
लोगो के साथ होने की बात
न में इस दुनिया में थी, प्रियतम 
न तेरी दुनिया, मुझे समझ आई
इसीलिए तो कहती हूँ कृष्णा !
मुझे भी दे इन सांसों से छुटकारा 
ले चल अपने साथ !
ले चल अपने साथ ,हां अब तो ले चल, 
सुन तो ले एक बार बस एक बार ,कुछ नहीं मांगूंगी  में दोबार
अब तो सुन ले या कुछ और बचा हैं 
तेरा मुझको देना इन आँखों के नाम
सुन  ले न ,अब तो सुन ले हां अब  तो सुन ले सुन तो ले एक बार



















गुरुवार, 24 नवंबर 2011

पुकारती हैं तुझे मेरी आहें


पुकारती हैं तुझे मेरी आहें 
तो बहते हैं अश्क, इन आँखों से 
तेरे बिना नहीं हैं जीवन का कोई साथ 
जिन्दगी काश बया हो पाती तो 
में अश्को से बया कर देती अपनी आहो का दर्द 
जो मुस्कुराहट बन के सजा करता था मेरे लबो पे 
वो आज जखम बन के इन आखो से बहा करता हैं 
मुस्कुराहट न सही वो ज़िंदा हैं इन आसुओं में 
 मेरे रब तेरी ये मेहर ही मुझपे क्या कम हैं ......
अनुभूति



मेरे पालनहार !

मेरे कृष्णा ! 
तुने तोड़ दी ,
बिखेर दी हैं मेरी तपस्या के मोतियन की माला 
मेने जोड़ा एक -एक मनका 
अपनी आत्मा के असीम स्नेह विशवास से 
.और तुमने एक ही पल मे अपने आवेश मे बिखेर डाला |
सारा संसार एक तरफ तू मेरा कृष्णा एक तरफ 
दुनिया मुझपे तोहमत लगाये मेने सह ली 
तेरी तोहमत मुझे असीम वेदना दे जाएँ
ये क्या हैं मेरे माधव !
मुझे ना समझ आये ,
तेरी बाते तू ही जाने 
मेने कुछ नहीं कह पाऊं 
मेने सिर्फ मागी हैं तेरे चरणों की सेवा 
और कुछ मे नहीं चाहूँ 
मे जानू मेरी अखिया कभी ना तोहे भाये 
इसीलिए तू मोहे ये पीड दे जाएँ 
जो तू पड़े सके मेरे असुअन को बोली 
तो मेरी पीड समझ जाए 
धन्य हूँ मैं 
जीने को तुने कुछ तो मेरे नाम किया हैं
ऐसा कोन दूजा होगा 
जिसके क्षण-क्षण पे तुमने ये वेदना का सागर दान  किया हैं 
हां , मे अब इसी मे डूब जाउंगी 
हां अब तो करले दे म्रत्यु 
अपने श्री चरणों मे स्वीकार 
तेरी बड़ी कृपा होगी .!
मेरे पालनहार !

तेरे पगली अनुभूति




बुधवार, 23 नवंबर 2011

मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..




मेरे माधव ! 
मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..
मेरी आंहो मे दर्द 
और आँखों मे देके रात भर का ये नीर 
देके मुझे मुस्काओ ,
तो हंस के स्वीकार हैं 
जीवन के सारे दर्द 
मेरे कृष्णा !
सदा मेरे अंतस को चीर तुम मुस्काओं 
ये प्रीत की रीत अनोखी तुम ही निभाओं 
जो तुम संग बाधी आत्मा की ये डोर 
तो केसे तुम्हारी बन्धनी तुम कुछ कह जाएँ 
मेरे माधव ! 
मुझे तेरी एक मुस्कुराहट को ये सब स्वीकार 
ये नीर भरे ,सजल नयन करते हैं 
सदा की तरह ही तुम्हारे चरणों मे 
आत्मीय प्रणाम
श्री चरणों मे तुम्हारी अनुभूति







तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................