मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

मेरी श्रद्धा के सागर में बसने वाले श्री हरि


मेरी श्रद्धा के सागर में बसने वाले ,
मेरे श्री हरि ,
मेरे राम ,
मेरी श्रद्धा इन आँखों से बहती,
इन शांत अश्रु धाराओं से 
मैं करती तुम्हे प्रणाम .

मेरी श्रद्धा के जल को स्वीकार कर ,
अपने चरणों में हो जाने दो  इस तुच्छ आत्मा को भी पावन ,
ओ मेरे श्री हरि , 
ओ मेरे राम ,
मेरे स्वामी ,मेरे गिरधर गोपाल 

तन - मन का रोम - रोम तेरी भक्ति को पाकर है अभिभूत .
इतना सुन्दर होगा कभी मेरे जीवन का स्वरुप ,
ये स्वप्न से भी परे था |

कृतार्थ कर दिया प्रभु तुमने मुझे ,
इस तुच्छ को अपने श्री चरणों में कर स्वीकार |

ओ मेरे राम ,
श्री हरि ,

अपना सर्वस्व समर्पित कर ,
 करती हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों में 
कोटि- कोटि प्रणाम 

-- अनुभूति 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

ओ मेरे राम !





मेरे प्रभु ! 

वेदनाओ के महासागर में , 
एक नया तूफ़ान कँहा से घिर आया हैं 
विचलित मन ,
थाह पाए भी तो कैसे ..

इस जीवन में ,
बड़ी सरलता से अपनी ही तरह मान कर, 


बिना तुम्हारा अस्तित्व जाने ही ,
मेरे प्रभु ! 
मैंने  समर्पित कर दिया ,
श्रद्धा ,विशवास और समर्पण ,

कितना अलौकिक था |
ये सरल रूप तुम्हारा .
एक सरल मित्र रूप में ,
भयभीत हूँ , तुम्हे साक्षात पाकर 

मेरे प्रभु ! 

मैं  एक साधारण इंसान हूँ 
तुम्हरा ये तेजस्वी प्रकाश ,
और अलौकिक  प्रत्यक्ष दर्शन 
मैं सह नहीं पा रही ,

क्या मुझे ऐसा भी कुछ जीवन में 
मिलेगा ?

तुम्हारा दर्शन इस जीवन में 
मुझे होगा ,कभी ये तो स्वप्न से भी परे था |

वेदनाओं के महासागर में 
ये कोन सा यथार्थ  सत्य मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया हैं |

मेरे प्रभु !
विचलित हूँ , भयभीत हूँ ,
मेरा ईश्वर मेरे सामने हैं ,
 शायद सालो की मेरी भक्ति का ये परिणाम हैं क्या ?

मेरे प्रभु !
तुम्हारा वह  साधारण रूप ही अच्छा था |
मेरे लिए |
अज्ञानता में बड़ा सुख है
 इसका आज बोध कर पाई हूँ मैं .

तब मैं  बड़ी सहज और सरल थी 
अब ठंडी पड़ी हूँ ,
सोच रही हूँ -
 स्वीकार करू ये सत्य!
क्या कर पाउंगी तुम्हारे विराट रूप का दर्शन ?
सह सकूंगी  तुम्हारा वह  तेज !

नहीं शायद
मैं  एक साधरण इंसान हूँ
अपने ही अंतस से लड़ता हुआ

क्या होगा ये मेरे भाग्य में ऐसा कभी ?
 कि तुम्हरा अलौकिक साथ , स्नेह ,विश्वास 
और श्रद्धा होंगे मेरे साथ भी |

होगा मेरे मस्तक पे तुम्हारे
स्नेह और आशीष का हाथ भी
ये सोच कर ही विचलित हूँ..

प्रभु मेरे !

आज मुझे यकीन  है तुम मेरे साथ खड़े हो

मेरे राम !
मेरे जीवन का सम्पूर्ण समर्पण होगा तुम्हारे ही नाम ,
बस अब मुख से लेते -लेते तुम्हारा नाम ,
निकल जाए मेरे प्राण, 
ओ मेरे राम !

-- अनुभूति 

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

नव सृजन ,


जीवन पथ -पथ
कभी फूल  ,
कभी कांटे ,
कभी हँसते दो नयन ,
आज  है  ये नव सृजन 
तुम्हरा, मेरी प्रियतम 
निखर गया , मन दर्पण ,
कहता तो समझती ही नहीं ,
इसलिए करके दिखला दिया 
तुम्हारा ये नव सृजन |

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अजीब सा इत्तफाक

अजीब सा इत्तफाक ,
ये मेरे साथ क्यों हुआ जिंदगी ?
बहुत दूर रहने वाला,
एक पल में साँस क्यों हुआ जिंदगी?

जब जिंदगी बन छाया वो मुझपे ,
तो जिंदगी भी  बहार बन गयी ,
और आज में मौत की सजा में क्यों हूँ जिंदगी ?

ईमानदारी और वफ़ा की क्या सजा यही है ?
सोचती हूँ मैं  भी,
दूसरों की तरह क्यों नहीं बन सकी बेईमान ,
इस जिंदगी में?
अजीब सा इत्तफाक ,
ये मेरे साथ क्यों हुआ जिंदगी ?

बहुत  दूर रहने वाला एक आस क्यों हुआ जिंदगी मैं ?


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अनुभूतियों का अपना ही आकाश




अनुभूतियों का अपना ही आकाश होता हैं और अपनी ही दुनिया ..इस दुनिया में बुरा कोई होता ही नहीं सिर्फ प्यार और ख़ुशी का एहसास होता हैं .लेकिन जीवन में कभी ऐसे भी मोड़ आजाते हैं जो मुस्कुराहटों   के साथ इन आँखों को नमी दे कर जाते हैं |

एक  लम्हा जिन्दगी ,
कितनी  खुबसूरत थी ,
तुम्हारे साथ ,
आँखे अब सपने देखती लगी थी |
मुस्करा गया था ,
तुम्हे देखकर फिर सोल्व्हा वसंत 
और में शर्म से लाल थी ,
अपने आप से भी न मिला सकी नजर में .

पहली बार अपने आप से लजाई थी ,
एक सोलह साल की लड़की ,
तुम्हारी इन आँखों की मदहोशी से ,
जी उठी थी|

खिल गयी थी मन की हर कली 
और मन के आँगन में बौरा गया था गुलाबी बसंत |
हां  वो लम्हा जिन्दगी 

हर पल याद आती हैं अब भी
कितनी मासूम सी पाक चाहत थी
हां ,वो लम्हा जिन्दगी |


तेरा इन्साफ



शमा जलती रही ,
और
बूंद -बूंद अश्क 
ढलता ही रहा .
मैं  तेरे इन्साफ की ,
दुहाई देती रही ,
सोचती थी ,
सबका इन्साफ,
करने वाला
मेरे लिए
क्या सजा मुक़र्रर करता  है ?

उसकी सजा का
कोई अंत ही नहीं था ,
क्योकि में हँस के,
ये सजा सहती रही ,
वो मुस्कुराता रहा ,
और में खामोश शमा सी,
जलती ही रही |
शमा जलती ही रही ,

और बूंद - बूंद अश्क,
ढलता ही रहा,
और वो यूँ ही हँसता रहा |

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

छोटी सी चिड़ियाँ रानी


ओ मेरे राम जी !
ये छोटी सी चिड़ियाँ रानी ,
दीवानी ,
तुम्हारे नाम की |

कभी तुम्हारे स्नेह से,
अभिभूत ,
नैनों से नीर बहाई  ,

तो कभी तुम्हे साथ पाकर 
घंटो इस डाली से उस डाली ,
फुदक -फुदक चहचहाई  ,

कैसी अजब प्रीत तुहारी ,
ओ मेरे राम जी !

कभी फुदक के तुहारे ,
इस काँधे बैठी  ,
तो कभी उस काँधे बैठी 

मेरे राम जी,
समझाओ इस पगली ,
दीवानी को ,

तुम्हारी इस छोटी सी,
राम नाम की दीवानी को ,
इस छोटी सी,
चिड़ियाँ रानी को ,

दिन भर बस चहके  
ले तुम्हारा  नाम ,
बस ,

राम -राम-राम |

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

दर्द उठता हैं मेरे राम !

हर पल एक तीखा सा
दर्द उठता हैं .
लगता हैं कही कुछ चीर रहा हैं |


हां
ये तो मेरे ही दिल के टुकड़े हो रहे हैं ,
बट रहा हैं कुछ दो टुकडो में ,
ये केसी पीर हैं ?

में ज़िंदा हूँ
और कुछ चीर रहा हैं
ये तो मेरे ही दिल के टुकड़े हो रहे हैं

इतनी ख़ामोशी से ,
अन्दर ही अन्दर
तक तुमने मुझे चीर दिया
और में मुस्कुराती ही रही |

शायद इसी का नाम जिन्दगी हैं ,
ख़ामोशी से तुमने मुझे चीर दिया
और फिर भी में तुम्हे ही मुस्कुराते हुए देख कर खुश हूँ |


इतनी तकलीफ में भी में खुश हूँ
शायद इसीलिए ,
क्योकि इस दर्द की आह में भी तुम्हारा नाम हैं |
मेरे राम !

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

खुद तुम्हे नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए


कई बार ऐसा मोड जीवन में आता हैं की जिसके लिए हम जी रहे होते हैं उसे भी कोई अंदाजा नहीं होता की उसकी हमारी जिंदगी में क्या अनमोल जगह हैं ,इसीलिए कई बार ये लिख कर भी जताना पद जाता हैं
की पति देव आप की क्या जगह हैं जीवन में सिर्फ महसूस कर लीजिए बस ..............................................

एक कविता सिर्फ उनके लिए ..
खुद तुम्हे नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
खुद तुम्हे नहीं पता,
क्या हो तुम मेरे लिए ?
मेरी आँखों से तुम्हारे स्नेह की मदहोशी ,
और बैचेनी में आँखों से टपकती ,
पवित्र आंसू की बूंद हो तुम |
क्या हो तुम मेरे लिए ?
ये बताने के लिए मेरे पास ,
तुम्हारी तरह कठीन शब्दों का महसागर नहीं ,
मेरे पास हैं ,
सिर्फ नैनो की खामोश भाषा 
मेरा मौन समर्पण ,
और मेरी श्रद्धा ही हैं |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
तुम्हारी किसी बात पे शर्म से झुक जाती हैं
वो शर्म से झुकती नजर हो तुम 
क्या हो तुम मेरे लिए खुद तुम्हे भी नहीं पता ?
कभी प्यार से एक बार जो" पागल "कह देते हो ,
कई दिनों तक ,
उसका छाया रहने वाला नशा हो तुम |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
तुम्हारी ख़ामोशी कत्ल करती हैं ,
और तुम्हारी निगाहें फिर धडकने दे देती हैं |
एक बार मर कर फिर जी उठने वाली जिंदगी हो तुम |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
मुझे नहीं पता क्यों करते हो इतना प्यार इस पागल से ?
जी करता हैं तुम्हे झकोर -झकोर के पूछ ही लू 
और तुम्हारे कदमो से लिपट के रो ही लू ,
क्यों इतना प्यार हैं इस पागल से ?
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?
मन ,तन ,आत्मा और अपना सर्वस्व
न्योछावर करने के बाद भी लगता हैं ,
कही कोई कमी तो नहीं मेरे स्नेह और समर्पण में 
इसीलिए पल -पल सोचती हूँ,
कही मेरी श्रद्धा और समर्पण में कोई कमी न रह जाए |
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?
ये सोच कर ही कॉप उठती हूँ ,
की कभी अपने को माफ नहीं कर सकुंगी ,
जो कर न पायी कोई वचन पूरा |
इसीलिए जिसके प्रति मेरी आत्मा समर्पित हैं 
ऐसा भगवान के प्रति विशवास हो तुम ,
हां ऐसा अगाध "अनुराग " हो तुम ,
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?


गुरुवार, 31 मार्च 2011

प्रभु मेरे


प्रभु मेरे ,
कैसा एहसास है ,
की इन खामोशियों में भी ,
आप साथ हो मेरे ,
न भूख ,
न प्यास हैं,
मेरे मन को ,

क्यों हमेशा आप का ही विशवास 
जीवन का कोन सा नया मोड हैं ,
अन्तर्यामी तू ही बता दे ,
मुक्ति का ये कोनसा मार्ग हैं,
मेरी अराधना का कोनसा विशवास हैं ,

प्रभु !

बुधवार, 30 मार्च 2011

इतना तो रहम करो


सपने 
देखने की
आदी नहीं 
ये आँखे 

तुम इन्हें 
आसुओ से ही
भीगा रहने दो ,

क्या करोगे?
इस खाली दामन
में खुशियाँ भरकर ,
ये खुशियाँ भी 
मेरी ही तरह
तिल -तिल
जलकर ख़ाक
हो जायंगी |

क्यों
मेरे साथ 
अपने दिल के
गुलशन को 
ख़ाक किये 
जाते हो ,

जाओ
खुश रहो ,
आबाद रहो ,
इस दर्द को ,
मेरे नाम
ही रहने दो,

इतना तो 
रहम करो |

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................