एक सवाल हूँ में तुम्हारे लिए
सिर्फ एक दर्द का एहसास ही तो हूँ में
जो छुजाता हैं तुम्हे अंतस तक
में एक इंसान हूँ
जो बेरंग हैं तेरे बिना
दुआ हैं ये जिंदगी या कोई सजा मुझे नहीं पता
इतना पता हर लम्हा तेरे नाम हैं जिंदगी
काश कभी कायनात मुझपे मेहरबान हो
और अपनी बाहों को खोले तुम मुझेसे
एक बार अपने लबो से एक बार
कहो चली आओ !
चली आउंगी में सारी दुनिया की रस्मो को छोड़े
मेरा पास कुछ नहीं खोने को
और सच कहू तो पाने को भी नहीं
फिर भी ये मासूम मन बच्चो सी बाते किया करता हैं
अपने ही सपनो का जहां बसाया करता हैं
सत्य के धरातल पे में एक खाब ही हूँ
केसे कहू तुमसे की हर पल तिल -तिल
तुम्हारी चाह में ,विशवास पे जीता एक इंसान हूँ में
हां एक इंसान हूँ में
कोई शब्द ,कविता या गजल नहीं
धड़कते दिल का एक पैगाम हूँ में तुम्हारे लिए
पुकारते -पुकारते
तुमने तो अपने होठो को न खोलने की कसम
अपने आप से ही खा रखी हैं
पता नहीं कोनसे जनम की बाकी सजा मेरे नाम की हैं
जिंदगी कब तक यूँ ही चलती रहेगी
नहीं मालुम पर ये भी मेरी ही तरह झपकती -बुझती रहेगी
ऐ खुदा ऐसी तो कोई सुबह अब कर दे
जब इन साँसों की महरबानी इस जिस्म के नाम न हो
ऐ खुदा कभी तो कोई मेरी दुआ
कबूल कर ले ।
आमीन !आमीन! आमीन!
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
गुरुवार, 4 अगस्त 2011
मेरा तो सब कुछ गिरवी तेरे नाम मेरे गिरिधारी !

मेरे स्वामी ,
मेरे कृष्णा !
तेरी दीवानी तुझसे लड़ते -लड़ते हारी
मेरे स्नेह सागर तेरे चरण पकड़ में रोती जाऊं
तेरा असीम स्नेह अमृत इन आँखों से बहाती जाऊं
में पगली तुझसे अब मांगू क्या ?
में मिट जाऊं
बलि हारी जाऊं
मेरे कृष्णा !
तेरी हर एक मुस्कान पे
तेरे अधरों की उस मीठी मुरली के नाम पे
मेरा तो सब कुछ गिरवी तेरे नाम मेरे गिरिधारी !
मेरे श्याम !
तेरी मुस्कान मुझे प्राणों से प्यारी
तू जो हँस दे में जीवन का हर संग्राम लडती जाऊं
तू ही तो हैं कान्हा जिसके नाम में जीती जाऊं
मेरे श्याम !
तेरे असीम स्नेह का ये वरदान
मुझ पे घटा बन के बरसे
मेरे कृष्णा !
मेरा वचन हैं ये जीवन ,ये प्राण तेरे ही कदमो की सेवा में निकले
जीवन की की सारी अभिलाषा की तुने पूरी
मेरे श्याम !
जब -जब में रोई तुने इन अखियन के पोछे आंसू
दिया अपनी स्नेहिल आत्मा का सहारा
क्या नहीं दिया तुने मुझे मेरे कान्हा !
सब कुछ तो तुमने इस पगली के आंचल में भर डाला
मुझसा कोई कहा कोई धनवान
जिसने पाया तेरे स्नेह का वरदान
में बावरी चाह के भी कुछ न कर पाऊं तेरे लिए मेरे श्याम
इसीलिए हर स्वप्न प्रणय को भी मेने किया
मेरे कोस्तुभ स्वामी तेरे नाम
इस जीवन का अब क्या बचा हैं कोई काम
आज दो मुझे आदेश की में करू ये काम
मिट जाऊं बन जाऊं तेरी जोगन
लेते -लेते तेरा नाम
ओ मेरे कोस्तुभ धारी
मेरे भगवान !
मेरे राम !
ये आत्मा यूँ ही करती रहे
तुम्हारी धवल छबी को नित अपनी आत्मा का वंदन
और तेरे चरणों में प्रणाम
श्री चरणों में अनुभूति
मेरे कृष्णा !
तेरी दीवानी तुझसे लड़ते -लड़ते हारी
मेरे स्नेह सागर तेरे चरण पकड़ में रोती जाऊं
तेरा असीम स्नेह अमृत इन आँखों से बहाती जाऊं
में पगली तुझसे अब मांगू क्या ?
में मिट जाऊं
बलि हारी जाऊं
मेरे कृष्णा !
तेरी हर एक मुस्कान पे
तेरे अधरों की उस मीठी मुरली के नाम पे
मेरा तो सब कुछ गिरवी तेरे नाम मेरे गिरिधारी !
मेरे श्याम !
तेरी मुस्कान मुझे प्राणों से प्यारी
तू जो हँस दे में जीवन का हर संग्राम लडती जाऊं
तू ही तो हैं कान्हा जिसके नाम में जीती जाऊं
मेरे श्याम !
तेरे असीम स्नेह का ये वरदान
मुझ पे घटा बन के बरसे
मेरे कृष्णा !
मेरा वचन हैं ये जीवन ,ये प्राण तेरे ही कदमो की सेवा में निकले
जीवन की की सारी अभिलाषा की तुने पूरी
मेरे श्याम !
जब -जब में रोई तुने इन अखियन के पोछे आंसू
दिया अपनी स्नेहिल आत्मा का सहारा
क्या नहीं दिया तुने मुझे मेरे कान्हा !
सब कुछ तो तुमने इस पगली के आंचल में भर डाला
मुझसा कोई कहा कोई धनवान
जिसने पाया तेरे स्नेह का वरदान
में बावरी चाह के भी कुछ न कर पाऊं तेरे लिए मेरे श्याम
इसीलिए हर स्वप्न प्रणय को भी मेने किया
मेरे कोस्तुभ स्वामी तेरे नाम
इस जीवन का अब क्या बचा हैं कोई काम
आज दो मुझे आदेश की में करू ये काम
मिट जाऊं बन जाऊं तेरी जोगन
लेते -लेते तेरा नाम
ओ मेरे कोस्तुभ धारी
मेरे भगवान !
मेरे राम !
ये आत्मा यूँ ही करती रहे
तुम्हारी धवल छबी को नित अपनी आत्मा का वंदन
और तेरे चरणों में प्रणाम
श्री चरणों में अनुभूति
बुधवार, 3 अगस्त 2011
में बन जाऊं जोगन तेरे नाम की मेरे कृष्णा !

स्वर्ग से भी खुबसूरत इन फिजाओं में ।
रिम-झिम बरसती इन घटाओ में
बिखरी हूँ ,
मेरे कृष्णा !तेरी बाहों में ,
भीगी हूँ अपने अंतस से इन रिम -झिम करती
प्यार की फुहारों में
लगता हैं बसंत एक बार फिर लौट आया हैं
मेरी जिन्दगी में अमलतास सजाने को
पहन के तेरे स्नेह की पायल
में बन जाऊं जोगन
तेरे नाम की
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
कितने सरल हो तुम कृष्णा

में बावरी तेरी कृष्णा
देखू जब अखियन भर में तेरी वो धवल छबी
खो जाऊं में
सवप्न प्रणय में तोरे संग
कितने सरल हो तुम कृष्णा
संसार के लिए जितने जटिल मेरे लिए उतने ही सरल
सोचती हूँ तुम्हारा स्नेह सागर तो पगला जाती हूँ
मुझको भी मुझ जेसा मेरा कृष्णा मिला हैं
कितने रूप तुम्हरे गिरधर गोविन्द
में बावरी तुहारी कृष्णा
तेरे ही स्नेह रंग रंगी हूँ में
सदा रंगी रहू यूँ ही
श्री चरणों में अनुभूति
देखू जब अखियन भर में तेरी वो धवल छबी
खो जाऊं में
सवप्न प्रणय में तोरे संग
कितने सरल हो तुम कृष्णा
संसार के लिए जितने जटिल मेरे लिए उतने ही सरल
सोचती हूँ तुम्हारा स्नेह सागर तो पगला जाती हूँ
मुझको भी मुझ जेसा मेरा कृष्णा मिला हैं
कितने रूप तुम्हरे गिरधर गोविन्द
में बावरी तुहारी कृष्णा
तेरे ही स्नेह रंग रंगी हूँ में
सदा रंगी रहू यूँ ही
श्री चरणों में अनुभूति
में तो मान चुकी गिरधर तुझको अपने प्राण
मेरे कोस्तुभ स्वामी
तुम मेरी इन उलझी सांसों की धडकन ।
मेरे जीवन का रास्ता
मेरे जीवन का चिराग
जब तुम ही नहीं रहोगे तो
में क्या करुँगी इस तन का ,इस मन का
तुम बिन जीना सोचा ही नहीं एक पल मेने
कभी जो तुमने तय किया वो आंसू वो मुस्कान
मेने तुम्हारा आदेश मान अपने होठो पे सजा ली
में नहीं जानती मेरे कृष्णा तुम कभो आओगे या नहीं
हां तुम साथ हो इसी आस और अक्ष्णु विशवास के साथ
ही तो जिन्दा हूँ में अपने प्रणय स्वप्नों में
तुम्हारे एह्साओ से ही आज भी खनकती हैं मेरी रूह
कभी हँसती हैं पागलो की तरह
तो कभी दूजे ही पल तुम्हारी कठोरता पे बहाती हैं नीर
मेर पास मेरा कुछ भी नहीं
सब कुछ तेरा दिया हैं सासों में
में तो मान चुकी गिरधर तुझको अपने प्राण
जिसदिन रूठी मुझसे तेरी मुरली ,
उस दिन बिन विधाता के तय किये ही निकलंगे मेरे प्राण
कोई वचन विशवास की रेखा नहीं होगी
कृष्णा
तब तेरे मेरे इस आत्मीय सम्वाद के बीच
मेरी आत्मा का रोम रोम तुम जानो मुरलीधर
फिर काहे मुझसे ही इतना
कठोर तप करवाओ
तुम न कहो तो में जानू
तुम्हरे अंतस का हर स्वप्न
में ज़िंदा हूँ
जन्मी हूँ
इसलिए की मेरे कृष्णा कर सकू तेरी विचलित आत्मा
के अंतस का हर स्वप्न
श्री चरण में अनुभूति
तुम्हारी मेरे गिरिधर
सोमवार, 1 अगस्त 2011
अनुराग

ओ मेरे कृष्णा !
तेरी मेरी प्रीत अनोखी
न देखा तुने मुझे मन भर
न मेरा ही मन भरे तुझे निहारे- निहारे
मन की प्यास बुझे न मेरी
जितना देखू ये मन तुझे ही खोजे चारो और
तेरे होठो पे धरी मुरली की सरगम मेरे कानो में जीवन का अमृत घोले ,
तेरे कदमो में मिटने की चाह
जीवन से लड़ने का रास्ता खोले
क्या मेरे कन्हाई तुम कभी इस पगली की पुकार पर चले अओगे बैकुंठ से
सोचती हूँ कृष्णा जितना में तुझे पल -पल चाहूँ
कभी सोचो भी तुम मुझको भी,
इतना ही चाहों इतना ही
समझो भी जानो भी
मेरे गिरिधारी
तुझे चाहे संसार ,
तुम तो अनंत ज्ञान के स्वामी
सोचती हूँ में भी एक घुट
उस ज्ञान का तुम्हारे चरणों से पा जाऊं
तो नव जीवन का अनुराग
में भी पा जाऊं
तेरी मेरी प्रीत अनोखी
न देखा तुने मुझे मन भर
न मेरा ही मन भरे तुझे निहारे- निहारे
मन की प्यास बुझे न मेरी
जितना देखू ये मन तुझे ही खोजे चारो और
तेरे होठो पे धरी मुरली की सरगम मेरे कानो में जीवन का अमृत घोले ,
तेरे कदमो में मिटने की चाह
जीवन से लड़ने का रास्ता खोले
क्या मेरे कन्हाई तुम कभी इस पगली की पुकार पर चले अओगे बैकुंठ से
सोचती हूँ कृष्णा जितना में तुझे पल -पल चाहूँ
कभी सोचो भी तुम मुझको भी,
इतना ही चाहों इतना ही
समझो भी जानो भी
मेरे गिरिधारी
तुझे चाहे संसार ,
तुम तो अनंत ज्ञान के स्वामी
सोचती हूँ में भी एक घुट
उस ज्ञान का तुम्हारे चरणों से पा जाऊं
तो नव जीवन का अनुराग
में भी पा जाऊं
रविवार, 31 जुलाई 2011
स्नेह की चांदनी
मेरे चाँद !
यूँ न लुटा मुझपे अपने स्नेह की चांदनी
मुझे भी जिन्दगी से जीने की हसरत होने लगती हैं ,
में तो तेरे अक्स से ही किया करती हूँ स्नेह
और घंटों बाते हजार
मेरा आंचल छोटा हैं
तेरी इस धवल स्नेह चांदनी के आगे
केसे स्म्हालुंगी में इतना स्नेह सागर ,
इसीलिए में इतनी दूर से ही
तेरे कदमो में बैठ कर लेती हूँ
पांच वक्त की नमाज अदा
तेरे स्नेह की ये चांदनी ही क्या कम हैं
एक जनम के लिए
मुझे डर हैं अपनी किस्मत से
सोचती हूँ कभी क्या तुम उतर आओगें
मेरे लिए इस पगली के लिए इस जमीन पे भी
बस इसी आस में दिन ढलते हैं और रात होती हें
जिदगी यूँ ही दिन रात
उस दिन के इन्तजार में पूरी
होती हैं
के काश तुम एक दिन इस जमीन पे उतर आओ
अनुभूति
यूँ न लुटा मुझपे अपने स्नेह की चांदनी
मुझे भी जिन्दगी से जीने की हसरत होने लगती हैं ,
में तो तेरे अक्स से ही किया करती हूँ स्नेह
और घंटों बाते हजार
मेरा आंचल छोटा हैं
तेरी इस धवल स्नेह चांदनी के आगे
केसे स्म्हालुंगी में इतना स्नेह सागर ,
इसीलिए में इतनी दूर से ही
तेरे कदमो में बैठ कर लेती हूँ
पांच वक्त की नमाज अदा
तेरे स्नेह की ये चांदनी ही क्या कम हैं
एक जनम के लिए
मुझे डर हैं अपनी किस्मत से
सोचती हूँ कभी क्या तुम उतर आओगें
मेरे लिए इस पगली के लिए इस जमीन पे भी
बस इसी आस में दिन ढलते हैं और रात होती हें
जिदगी यूँ ही दिन रात
उस दिन के इन्तजार में पूरी
होती हैं
के काश तुम एक दिन इस जमीन पे उतर आओ
अनुभूति
गुरुवार, 28 जुलाई 2011
रसात्मिका
एक जिन्दगी ,एक सच ,
एक एहसास खिलते मन का ,
एक खुशबु ,एक अधूरा ,स्वप्न
एक कठोर सत्य
एक यथार्थ सत्य से परे का एहसास
एक जिन्दगी जीने को मजबूर
एक खुला आकाश स्नेह का
एक अनसुलझी पहेली
एक कठपुतली
अनुभूति
मिथ्या आभास
जीवन और जगत के आधार ,
तुम बिन सुने हैं मेरे प्राण
सब स्वीकार जो तुम दो श्याम !
फिर भी में ये ही मागु इस तुच्छ संसार
तेरे कदमो में ही इस पगली के छूटे प्राण
जीवन एक सरल सरिता मेरा
समझ न आया तेरा संसार
में तो अपने ही अंतस से दूर जाना चाहूँ
इसीलिए भयभीत तेरे कदमो में चली आऊं
इस संसार की कथनी करनी में भेद ,
हर मन ,आत्मा में तुम ही बसे ,
फिर भी अलग अलग हैं भेद
में तो जानू तुझको ही कृष्णा
इसीलिए समझ ना पाऊं ये भेद
तुमको अपने सा ही पाया
मेरे कृष्णा !
पर भूल ही गयी तुझमे अपने को खोके
तेरा तुझको अर्पण आज किया प्रभु मेने
आज जाना अपना ही अंतस तो पहचाना
अपने को मेरे साथ तुम हो पग -पग
बाकी सब मिथ्या आभास शब्दों सहानुभूतियों का
इस आकाश से परे मुक्त हूँ में अपने ही मन
की दिव्य भक्ति अनुभूतियों में
तुम्हारे चरणों में
श्री चरणों में अनुभूति
शनिवार, 23 जुलाई 2011
तेरे विशवास के सहारे

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
न जाने कितने तूफ़ान उठते हैं और
में उसकी तूफानी लहरों में ,
बेबस सी कभी किनारे से टकराती और
कभी उसकी मझधार
में झूलती यूँ ही तेरे विशवास के सहार लडती ही रहती हूँ हर सास
अपने ही अंतस से
मात्र एक स्वप्न को हकीकत समझती में
जी रही हूँ एक तूफ़ान में
बड़ी जाती हूँ में तुम्हारे आदेश के पथ पे
तुम्हे नहीं पाती जब कृष्णा तो विदीर्ण हो जाता हैं मेरा रुदय
क्या चाहते हो मुझसे मेरे कृष्णा ?
नहीं जानती में तुम्हारे लेख
मानती हूँ तुम्हारा आदेश
बाकी सब शून्य हैं जीवन ,
अपनत्व खोजती हैं मेरी रूह
लेकिन सब मिथ्या हैं इस जीवन
श्री चरणों में अनुभूति
मेरे कोस्तुभ धारी !
न जाने कितने तूफ़ान उठते हैं और
में उसकी तूफानी लहरों में ,
बेबस सी कभी किनारे से टकराती और
कभी उसकी मझधार
में झूलती यूँ ही तेरे विशवास के सहार लडती ही रहती हूँ हर सास
अपने ही अंतस से
मात्र एक स्वप्न को हकीकत समझती में
जी रही हूँ एक तूफ़ान में
बड़ी जाती हूँ में तुम्हारे आदेश के पथ पे
तुम्हे नहीं पाती जब कृष्णा तो विदीर्ण हो जाता हैं मेरा रुदय
क्या चाहते हो मुझसे मेरे कृष्णा ?
नहीं जानती में तुम्हारे लेख
मानती हूँ तुम्हारा आदेश
बाकी सब शून्य हैं जीवन ,
अपनत्व खोजती हैं मेरी रूह
लेकिन सब मिथ्या हैं इस जीवन
श्री चरणों में अनुभूति
शुक्रवार, 15 जुलाई 2011
मेरे राम , मेरे तो गुरु भी आप ,,

मेरे राम ,
कोटि -कोटि इन चरण में
आप को प्रणाम
मेरे तो गुरु भी आप ,,
जीवन के सत्य और अक्ष्णु विशवास के साथी भी आप
कठिन हैं मेरा पल -पल जीवन भी आप के बिना
केसे लेलूं हर पर सांस भी राम के नाम के बिना |
कभी लगे समझ नहीं पाऊँ आप में आप का मार्ग
कभी लगे संसार से ज्यादा जानू में राम
नहीं जानू आप की लीला में जगदीश्वर !
मेरे जीवन के स्वामी
इस पावन दिन दीजो मुझे स्नेह आशीष
करू में तुम्हरे इस अश्रुं जल से इन चरण धोकर आप को प्रणाम
भयभीत हूँ में ,विचलित हूँ में
केसे समझाऊ इस दुनिया को मेरे राम
संसार रूठा हो तो बात थी
रूठे हैं राम
दया करो
दयानिधे
दया करो
मेरे नाथ मेरे राम !
कोटि -कोटि इन चरण में
आप को प्रणाम
मेरे तो गुरु भी आप ,,
जीवन के सत्य और अक्ष्णु विशवास के साथी भी आप
कठिन हैं मेरा पल -पल जीवन भी आप के बिना
केसे लेलूं हर पर सांस भी राम के नाम के बिना |
कभी लगे समझ नहीं पाऊँ आप में आप का मार्ग
कभी लगे संसार से ज्यादा जानू में राम
नहीं जानू आप की लीला में जगदीश्वर !
मेरे जीवन के स्वामी
इस पावन दिन दीजो मुझे स्नेह आशीष
करू में तुम्हरे इस अश्रुं जल से इन चरण धोकर आप को प्रणाम
भयभीत हूँ में ,विचलित हूँ में
केसे समझाऊ इस दुनिया को मेरे राम
संसार रूठा हो तो बात थी
रूठे हैं राम
दया करो
दयानिधे
दया करो
मेरे नाथ मेरे राम !
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
तेरी तलाश
निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................