बुधवार, 4 मई 2011
Aaj Radha Ko Shyam Yaad Aa Gaya - Chaand Kaa Tukdaa (1994).flv
अपने कान्हा का इन्तजार करती राधा |
संसार का सबसे अनुपम समर्पण अगर कोई हैं तो राधा का अपने कान्हा के प्रति |
मेरी पसंद का एक गीत |
सुने जीवन में भी बहार ले आये वो हैं कृष्ण आत्म आनंद अनुभूति |
अपने श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित
चरण दासी
तुम्हे देख के सोचती हूँ
तुम्हारी कठोरता में भी पल -पग सच झलकता हैं |
तुम्हारे शब्दों में ,
तुम्हारे एहसासों में भी .
तुम्हारे यथार्थ में भी,
तुम्हारी कल्पनाओं में भी ,
इतना सजीव ,इतना सरल ,
कितनी निष्कपट आत्मा हैं तुम्हारी कान्हा !
तुम्हे देख के अद्भुत स्नेह से मदोहाश मेरी आँखे हो जाती हैं,
और सोचती हूँ मेरे गिरिधर तेरी भक्ति मेरे नाम लिखी हैं|
"जिसके पास कुछ नहीं होता उसी के पास सब कुछ होता हैं |"
ये ही कहो हो न मेरे घनश्याम
अब तक नहीं जानती थी
जानने लगी हूँ तो आत्म विभोर हूँ
तुम्हारे इस आलोकिक स्नेह से
आज पाया हैं अपनी वास्तविक ,
इतनी ख़ामोशी में ,
इतनी वेदना में भी मुस्कुराहट चली आई हैं इन होठो पे
इतनी ख़ामोशी में ,
इतनी वेदना में भी मुस्कुराहट चली आई हैं इन होठो पे
आत्म आनंद अनुभूति में जो पाया हैं तुम्हरा साथ
सच संसार के उस लोक से इस लोक में ,
तुम मेरी साँसों में बस गए ओ कान्हा
मेरी हर आत्माअनुभूति सिर्फ तुम जानो
जी करता हैं अब बहार बन खिल जाऊ
क्या करू ? क्या कहू ?
देख तुम्हे गिरिधर
कानो में गूंजे मीठी मुस्कुराहट तोरी
अपने से लजाऊ ,
या तुम्हारे चरणों में ही गिर जाऊ
भूल के आत्मा का हर द्वेष
तेरी खुशबु में बस जाऊ ,
तेरे चरणों की दासी सदा
ऋणी रहगी तेरी
जो हर पल की दी हैं आत्म आन्नद अनुभूति
अब , मुझे यूँ देख मुस्काओ मत
लाज आती हैं ,
तुम्हरा ये रूप सलोना देखकर
ओ कान्हा ,
तुम्हारी चरण पादुकाओं
को पोछने का अधिकार मेरे नाम लिखा हैं |
इस तुच्छ संसार में कितना अनुपम काम लिखा हैं ,
केसे समजाऊ इस दुनिया को ?
तेरी भक्ति मेरा कितना अनुपम स्नेह मेरे नाम लिखा हैं |
में मिट जाऊ तन ,मन रोम - रोम से होकर तुझे पे बलिहारी
हो कभी कोई जो विपदा आ जाए मुझपे सारी|
इससे ज्यादा क्या मांगू में
बन स्वार्थी मेने मांग लिया तेरी चरण सेवा का अधिकार |
ओ कान्हा
इस चरण दासी को करना ,
सदा यूँही अपने
चरणों की सेवा में स्वीकार |
अनुभूति
अब तो जागो कान्हा
ओ कान्हा
जब से तुम गए ,
अपनी राधा के बृज से ,
सब कुछ सूना तुम बिन ,
दिन ,रात , भोजन,
सब त्याग तुम बिन
क्या कहे राधा तुम्हे अपने मुख से
तुम तो बिन बोले ही,
सब समझो अपने मन से
केसे समझाऊ इस राधा रानी को
नहीं माने दिन भर ,
रात भर जागे
तुम्हारे चरणों में ,
तुम्हारी अगवानी में
तुम जो दे गए आदेश
भक्ति का ये मिट जायगी
अब तो कन्हा जागो
उठो स्वीकार करो भक्ति,
इस राधा रानी की |
क्यों दे गए तुम स्वार्थी होने का ये आरोप
इस दीवानी को ,
खुद ही समझाओ
में तो हारी तुम्हारी इस दीवानी से
अब तो जागो कान्हा !
अनुभूति
मंगलवार, 3 मई 2011
सहानुभूति
तुम्हारी सहानुभूति ,
जब भी याद आती हैं लगता हैं ,
मेरे तन से
मेरे ह्रदय को उसकी शिराओ समेत ,
किसी ने जड़ से खीच के उखाड दिया हैं|
फिर भी एक तरफ मासूम मन ,
कहता हैं लिख डालू मन की सारी बाते
और सोचता हैं हमेशा की तरह मुझे आकर तुम थाम लोगे
और कहोगे अब नहीं ,
में तुम्हारे साथ हूँ "अक्ष्णु विशवास रखो"
लेकिन वो मासूम मन नहीं जानता तुम्हारी सहानुभूति
वो तो निश्चल हैं ,निस्वार्थ हैं |
आत्मा तड़प उठी हैं और थाम लेती हैं मेरा हाथ
नहीं , अब कोई सहानुभूति नहीं ,
तुमने तो बेजान बंजर पड़ी जमीन में
आशाओ के अकुर बोयें ,
सुप्त पड़ी धरती को फोड़ कर उसमे से
सपनो का जल निकाल दिया ,
सब कुछ तो सुप्त था पहले
तुम तो मुझे खुश देखना चाहते थे
ये क्या दे गए तुम मुझे ?
खुद तुम्हे भी नहीं पता !
बिखेरदिया तुमने मुझे कण- कण
अपने अंतस का स्वामित्व नहीं देती
कोई यूँ ही किसी को
और में बिना सोचे चली ही गयी
तुम्हे अपनी आत्मा आन्नद अनुभूतियों में
तुम्हे अपने साथ लिए |
सोचा ही नहीं की सब सिर्फ सहानुभूति हैं
सोचा ही नहीं की सब सिर्फ सहानुभूति हैं
मेरे मस्तक का वो रक्त बिंदु मुझे क्यों करता हैं
तुम्हारे स्वामित्व का एहसास
मेरी श्रद्धा , स्नेह सहानुभूति हैं ?
स्त्ब्ध हूँ सुनकर अपने स्वार्थी होने की बात ,
मुझे नहीं पता था बड़े लोगो की तरह,
उनकी सहानुभूति भी बड़ी होती हैं
अच्छा हैं में बहुत छोटी हूँ
और में नहीं दे सकती ऐसी सहानुभूति
जब भी जमीन पे लेटे उस पंखे की और देखती हूँ
सोचती हूँ .बस ............
लेकिन दुसरे से ही क्षण में तुम्हे ,
अपने सामने तमाचे के लिए हाथ उठाये
खडा पाती हूँ , क्यों शायद ?
क्यों की ये भी सहानुभूति नहीं ,
मेरा वचन ,विशवास और
तुम्हारे प्रति मेरी अनन्य श्रद्धा हैं
तुम्हारा एक आदेश मेरे प्राणों पे भारी हैं
तुम हुकूमत के आदि हो ?
और में बंध गयी हूँ
अपने मस्तक के उस रक्त बिंदु की तरह
सदा तुम्हारे आदेश के पालन के लिए
जीवन भर |
क्या करू ये मेरी सहानुभूति नहीं ,
जो भी हो न सोचा था न आज सोचा हैं बस जानती हूँ
जो भी हो न सोचा था न आज सोचा हैं बस जानती हूँ
जीवन की अंतिम परिणिति हैं |
"अनुभूति "
स्वपन तरु
स्वपन तरु
मेरी ममता मुझे खीच ही लाती हैं
तुम्हारे मासूम स्नेह लोक में
तुम्हे देख अभिभूत होती,
एक टक देखती ही जाती हूँ,
तुम्हारी प्यासी सी मुस्कुराहट को
तुम्हारे हाथो के उस नर्म ,मासूम स्पर्श को
तुम्हारी उस भीनी खुशबु को
तुम्हारी नन्ही -नन्ही उँगलियों को
सब कुछ बेहद प्यारा होता हैं
और में तुमको अपनी बाहों में उठाकर
अपने सीने से लगा लेती हूँ
एक अजीब सी हुक उठती हैं
सुप्त पड़ा ममत्व जाग उठता हैं ,
लेकिन अगले ही पल,
मेरा एहसास पूर्ण हो ,
मेरी आँखे खुल जाती हैं ,
और में घबरा के उठ जाती हूँ
और रो पड़ती हूँ फुट -फुट के
और सोचती हूँ ये केसा स्वपन हैं
जो कभी पूरा नहीं हो सकता,
क्यों चला आता हैं ?
मेरे स्वपन -तरु के नीचे हर रात
सत्य स्वीकार
क्यों नहीं कर लेती में की में नहीं बन सकुंगी माँ ?
क्यों देखना चाहती हूँ
इस दुनिया से संसारी लोगो की तरह एक मधुर स्वपन
मेरी दुनिया में इन सब की कोई जगह नहीं
क्यों नहीं स्वीकार लेती आत्मा
क्यों चली आती हूँ में इस स्वपन तरु के नीचे हर रात ?
मेरी किस्मत में नहीं लिखा प्रभु तुने ये अधिकार
क्या करू कोई शिकायत तुझसे?
इसीलिए इस स्वप्न तरु के नीचे स्वपन में ही जी लेती हूँ
"अनुभूति "
क्या करू कोई शिकायत तुझसे?
इसीलिए इस स्वप्न तरु के नीचे स्वपन में ही जी लेती हूँ
"अनुभूति "
हें पवन सूत!
मेरे राम
जब भी होती हूँ तुम्हारे श्री चरणों के करीब
देखती हूँ तुमसे अनन्य प्रीत ,
श्रद्धा तुम्हारे हनुमान के पास .
सोचती हूँ तुम्हारे श्री चरणो ने मुझे सब कुछ दे रखा हैं
फिर भी इंसान हूँ मांगने का आदि होता हैं ईश्वर से
हाथ जोड़ मांग बैठती हूँ प्रभु मुझे कुछ देना हैं तो
देना मेरी आत्मा के रोम रोम में तुम्हारा वास
तुम्हारी अनन्य भक्ति ,
मेरे शरीर के इस रक्त के कण- कण में तुम्हारा ही नाम |
मुझे चाहे भीष्म की तरह हजारो तीरों की मत्यु शैया की वेदनादेना
पर मेरे शरीर से गिरने वाली हर रक्त बूंद में सिर्फ तुम्हारा नाम देना
मुझे प्रीत नहीं किसी से
भोग की कामना भी नहीं बस तेरे श्री चरणों में मिटने का साहस देना |
और मेरे राम के दास हनुमान
मेरी आत्मा को सदा आप सी अपने राम की भक्ति देना
मेरी आत्मा को सदा आप सी अपने राम की भक्ति देना
क्योकि आप और में दोनों ही अपने राम के दास हैं
हमारे जीवन का हर क्षण उन्ही के नाम हैं |
अनुभूति
ओ मेरे घनश्याम ये हठ भी तुम से ,स्नेह भी तुम से ,
मेरे मुरली मनोहर,
इस वेदना में भी असीम शान्ति हैं ,
मन की अग्नि को शांत करता ये अश्रु जल हैं
क्योकि इन सब की अंतरंगता में कान्हा
तुम्हारे स्नेह का बहता निरंतर अमृत हैं |
बावरी हूँ तुम्हारी
गिरधारी !
ये स्नेह भी तुम से ,
ये हठ भी तुम से ,
ये भक्ति भी तुम से ,
ये क्रोध भी तुम से
इस माटी की गुडिया के प्राण भी तुम से ,
मस्तक के रक्त बिंदु सा चमकता,
मेरा भक्ति संसार भी तुम से |
मेरा क्या हैं सब कुछ तो तुम से ही हैं,
कान्हा मेरे !
तुम हठी हो तो में भी हठी हूँ !
हम एक से ही क्यों हैं प्रभु !
इसीलिए तो शायद भेद नहीं रोम -रोम का
मेरी तू जाने साँसे ,
तेरी साँसे में जानू
जान के भी अनजान
प्रीत अनोखी हमारी
केसी अजीब वेदना हैं हमारी |
एक आत्मा . एक प्राण
फिर भी पल -पल ले रहे,
एक दुसरे का इम्तिहान
वाह रे गिरधारी!
ये बावली मीरा तो तुझपे हारी
अब दे तू विष प्याला भी तो हँस के पी जाऊं
स्वार्थी नहीं , समर्पित हैं
ये मेरे जीवन की प्रीत हैं न्यारी
ये ही हैं अनमोल खजाना जीवन की पूंजी का !
सब कुछ छोड़ के पाया हैं नाम तुम्हारा
ओ मेरे श्याम , ओ मेरे घनश्याम
ओ मेरे चित चोर , ओ मेरे रक्षक
ओ मेरे मुरलीवाले !
तुम्हारे श्री चरणों में
"अनुभूति "
सोमवार, 2 मई 2011
ओ कान्हा की मैया ,
ओ कान्हा की मैया ,
तेरे आँचल में हैं कितनी प्यारी छइयां,
कितना आलौकिक स्नेह तुम्हारा माँ |
देख तुम्हारा लाड बरसे मोरी अँखियाँ
जितना चाहूँ मैं अपने अधूरे स्वप्न को ,
जितना चाहूँ मैं अपने अधूरे स्वप्न को ,
उतना तुम चाहो अपने कान्हा को
एक बार में भी अपने आंचल में लेना चाहूँ ,
तुम्हरे कान्हा को,
इतनी सी बिनती मेरी भी सुन लो मैयां
मेरा तो सूना पड़ा वात्सल्य संसार
तुम ही दे दो जीवन के कुछ ममता भरे पल उधार
मेरे स्वप्न कभी न होंगेपुरे मेरी तरह
मुझे दे दो कुछ पल कान्हा का लाड दुलार
मेरा जीवन भी करो ममता से सरोबार
ये ही विनती हैं तुमसे ओ कान्हा की मैयां
ओ माँ तुम तो माँ हो समझ सकोगी ,
मेरा लाड, मेरी वेदना
तुमसे तो कह भी सकू हूँ मन की अधूरी तड़प
किसको कहूँगी नहीं तो अपना वात्सल्य संसार
मुझको कुछ पल के लिए ही सही,
दे दो कान्हा को मेरे आंचल में,
मुझे भी माँ बना दो
हाँ माँ,हाँ अधूरी स्त्री होने का ये कलंक मिटा दो
मुझे भी कुछ पल के लिए अपने कान्हा की माँ बना दो |
अनुभूति
तेरा आदेश
राम ,राम ,राम लेते लेते ही निकले प्राण
प्रभु तुम्हारी ये ही तो इच्छा हैं |
तेरी इच्छा ,
तेरे आदेश के साथ ,तेरा आदेश
सदा सब स्वीकार |
इसमें कभी मुझको नहीं इनकार ,
राम तो साथ खड़े मेरे जीवन की हर झंकार
तेरा तुझको अर्पण प्रभु मेरे
के कर अब स्वीकार
कर दो इस आत्मा का उद्धार
तिल - तिल तुझको पाना ही मेरा जीवन
सब कुछ कर दिया न जाने कब से समर्पण
पाने की नहीं तेरे चरणों में मिट जाने की इच्छा हैं
बस मिट जाने दो , इस देह को भी अब ख़ाक हो जाने दो |
तुमसे मेरे राम ये ही आशीष ये ही तम्मना हैं |
करो स्वीकार मेरा भक्ति संसार
मेरे राम !
मेरे राम !
"तुम्हारे श्री चरणों में अनुभूति को कर लो स्वीकार मेरे राम !"
श्री कृष्णं शरणं ममः |
श्री कृष्णं शरणं ममः |
अब सौप दिया जीवन सुख,
हर बार नया कोई आक्षेप ,
सब तुम्हारे इन चरणों में |
हर बार लेते आये हो नित नयी परीक्षा ,
एक बार जो जीना चाहा पल भर अपने ,
को भूल ये संसार,
तो स्वार्थी होने का ये आक्षेप तुमने मुझेपे मड डाला
आत्मग्लानि से मन छलनी हैं
क्या मेरी आत्मा में परभी तेरा ऐसा वास !
जो सहना पड़े मुझे आज स्वार्थी होने का आक्षेप
क्या कमी हैं मेरे प्रभु मेरी भक्ति में ,
मेरे समर्पण में
सब कुछ तो हाथ बड़ा छीन लिया,
तुमने बनवारी ,
तेरी मुस्कराहट में,
खोयी में भी तो ,करती गयी
अपना स्नेह ,समर्पण ,
पल -पल न्योछावर
तुमने दुनिया के लिए बनायी सारी खुशियाँ
और मुझसे एक पल में ,
छीन लिया मातृत्व के स्वप्न का भी अधिकार
संसार मांगे तुझसे कान्हा!
वात्सल्य ,प्रणय अनुराग
में मागु तुझसे अपने तिल -तिल ,
मिटने का अधिकार
आज त्यजति हूँ,
भोजन ,बिछोना
तेरे सपनों का संसार
अब तुझे ही आना होगा ,
सुनकर मेरी करुण पुकार
सुदामा को दे त्रास ,
तुमने खुद ही अपना आरोप हटाया था
अब तुम्हे आना होगा
और मुझे खुद मुक्त करना होगा
जीवन के इस आक्षेप से
,कहूँगी नहीं सिर्फ पुकारू
हर सांस लेकर तेरा नाम |
दूंगी प्राण तुम्हारे ही चरणों में ,
करते करते तुम्हारा स्मरण,
श्री कृष्णं शरणं ममः |
श्री कृष्णं शरणं ममः |
श्री कृष्णं शरणं ममः |
"तुम्हारी अनुभूति "
रविवार, 1 मई 2011
रूठी जो राधा
ओ कान्हा !
हर बार रूठ जाओ तो मनाये राधा ,
इस बार रूठी जो राधा मना न सकोगे ,
हर बार तुमने गिराई हैं पगली की आँखों से
अश्रु धार , अबके माने नहीं राधा
तू बजाये मुरली कितनी ही,
न माने अब तो राधा
न माने अब तो राधा
तुम्हे श्याम अब तो साकार
रूप दिखाना ही होगा अपनी,
पगली राधा को मनाना ही होगा ,
न आये श्याम ,बनवारी तो इन ही चरणों में
पड़ी पड़ी दम तोड़ देगी तुम्हरी राधा रानी |
अनुभूति
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तेरी तलाश
निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................









