मंगलवार, 2 अगस्त 2011

में तो मान चुकी गिरधर तुझको अपने प्राण








मेरे
कोस्तुभ स्वामी

तुम मेरी इन उलझी सांसों की धडकन ।
मेरे जीवन का रास्ता

मेरे जीवन का चिराग

जब तुम ही नहीं रहोगे तो
में क्या करुँगी इस तन का
,इस मन का

तुम बिन जीना सोचा ही नहीं एक पल मेने

कभी जो तुमने तय किया वो आंसू वो मुस्कान
मेने तुम्हारा आदेश मान अपने होठो पे सजा ली

में नहीं जानती मेरे कृष्णा तुम कभो आओगे या नहीं

हां तुम साथ हो इसी आस और अक्ष्णु विशवास के साथ

ही तो जिन्दा हूँ में अपने प्रणय स्वप्नों में

तुम्हारे एह्साओ से ही आज भी खनकती हैं मेरी रूह

कभी हँसती हैं पागलो की तरह

तो कभी दूजे ही पल तुम्हारी कठोरता पे बहाती हैं नीर


मेर पास मेरा कुछ भी नहीं

सब कुछ तेरा दिया हैं सासों में

में तो मान चुकी गिरधर तुझको अपने प्राण

जिसदिन रूठी मुझसे तेरी मुरली ,
उस दिन बिन विधाता के तय किये ही निकलंगे मेरे प्राण

कोई वचन विशवास की रेखा नहीं होगी

कृष्णा

तब तेरे मेरे इस आत्मीय सम्वाद के बीच

मेरी आत्मा का रोम रोम तुम जानो मुरलीधर

फिर काहे मुझसे ही इतना

कठोर तप करवाओ

तुम न कहो तो में जानू

तुम्हरे अंतस का हर स्वप्न

में ज़िंदा हूँ

जन्मी हूँ

इसलिए की मेरे कृष्णा कर सकू तेरी विचलित आत्मा

के अंतस का हर स्वप्न

श्री चरण में अनुभूति

तुम्हारी मेरे गिरिधर





सोमवार, 1 अगस्त 2011

अनुराग


ओ मेरे कृष्णा !
तेरी मेरी प्रीत अनोखी

न देखा तुने मुझे मन भर

न मेरा ही मन भरे तुझे निहारे- निहारे

मन की प्यास बुझे न मेरी

जितना देखू ये मन तुझे ही खोजे चारो और


तेरे होठो पे धरी मुरली की सरगम मेरे कानो में जीवन का अमृत घोले ,
तेरे कदमो में मिटने की चाह

जीवन से लड़ने का रास्ता खोले

क्या मेरे कन्हाई तुम कभी इस पगली की पुकार पर चले अओगे बैकुंठ से

सोचती हूँ कृष्णा जितना में तुझे पल -पल चाहूँ

कभी सोचो भी तुम मुझको भी,
इतना ही चाहों इतना ही

समझो भी जानो भी

मेरे गिरिधारी

तुझे चाहे संसार ,
तुम तो अनंत ज्ञान के स्वामी

सोचती हूँ में भी एक घुट

उस ज्ञान का तुम्हारे चरणों से पा जाऊं

तो नव जीवन का अनुराग

में भी पा जाऊं


रविवार, 31 जुलाई 2011

स्नेह की चांदनी

मेरे चाँद !
यूँ न लुटा मुझपे अपने स्नेह की चांदनी

मुझे भी जिन्दगी से जीने की हसरत होने लगती हैं ,
में तो तेरे अक्स से ही किया करती हूँ स्नेह

और घंटों बाते हजार
मेरा आंचल छोटा हैं

तेरी इस धवल स्नेह चांदनी के आगे
केसे स्म्हालुंगी में इतना स्नेह सागर ,
इसीलिए में इतनी दूर से ही

तेरे कदमो में बैठ कर लेती हूँ

पांच वक्त की नमाज अदा

तेरे स्नेह की ये चांदनी ही क्या कम हैं

एक जनम के लिए

मुझे डर हैं अपनी किस्मत से

सोचती हूँ कभी क्या तुम उतर आओगें
मेरे लिए इस पगली के लिए इस जमीन पे भी

बस इसी आस में दिन ढलते हैं और रात होती हें
जिदगी यूँ ही दिन रात

उस दिन के इन्तजार में पूरी
होती हैं
के काश तुम एक दिन इस जमीन पे उतर आओ

अनुभूति




गुरुवार, 28 जुलाई 2011

रसात्मिका

एक जिन्दगी ,एक सच ,

एक एहसास खिलते मन का ,

एक खुशबु ,एक अधूरा ,स्वप्न

एक कठोर सत्य

एक यथार्थ सत्य से परे का एहसास

एक जिन्दगी जीने को मजबूर

एक खुला आकाश स्नेह का

एक अनसुलझी पहेली

एक कठपुतली

अनुभूति

मिथ्या आभास

जीवन और जगत के आधार ,
तुम बिन सुने हैं मेरे प्राण
सब स्वीकार जो तुम दो श्याम !
फिर भी में ये  ही मागु इस तुच्छ संसार
तेरे कदमो में ही इस पगली के छूटे प्राण

जीवन एक सरल सरिता मेरा
समझ न आया तेरा संसार
में तो अपने ही अंतस से दूर जाना चाहूँ
इसीलिए भयभीत तेरे कदमो में चली आऊं


इस संसार की कथनी करनी में  भेद ,
हर मन ,आत्मा में तुम ही बसे ,
 फिर भी अलग अलग हैं भेद
में तो जानू तुझको ही कृष्णा
इसीलिए समझ  ना पाऊं ये भेद
तुमको अपने सा ही पाया
मेरे कृष्णा !

पर भूल ही गयी तुझमे अपने को खोके
तेरा तुझको अर्पण आज किया प्रभु मेने
आज जाना अपना ही अंतस तो पहचाना
अपने को मेरे साथ तुम हो पग -पग
बाकी सब मिथ्या आभास शब्दों सहानुभूतियों का
इस आकाश से परे मुक्त हूँ में अपने ही मन
की दिव्य भक्ति अनुभूतियों में
तुम्हारे चरणों में

श्री चरणों में अनुभूति


शनिवार, 23 जुलाई 2011

तेरे विशवास के सहारे


मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
न जाने कितने तूफ़ान उठते हैं और
में उसकी तूफानी लहरों में ,
बेबस सी कभी किनारे से टकराती और
कभी उसकी मझधार
में झूलती यूँ ही तेरे विशवास के सहार लडती ही रहती हूँ हर सास
अपने ही अंतस से
मात्र एक स्वप्न को हकीकत समझती में
जी रही हूँ एक तूफ़ान में
बड़ी जाती हूँ में तुम्हारे आदेश के पथ पे
तुम्हे नहीं पाती जब कृष्णा तो विदीर्ण हो जाता हैं मेरा रुदय
क्या चाहते हो मुझसे मेरे कृष्णा ?
नहीं जानती में तुम्हारे लेख
मानती हूँ तुम्हारा आदेश
बाकी सब शून्य हैं जीवन ,
अपनत्व खोजती हैं मेरी रूह
लेकिन सब मिथ्या हैं इस जीवन
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

मेरे राम , मेरे तो गुरु भी आप ,,


मेरे राम ,
कोटि -कोटि इन चरण में
आप को प्रणाम
मेरे तो गुरु भी आप ,,
जीवन के सत्य और अक्ष्णु विशवास के साथी भी आप
कठिन हैं मेरा पल -पल जीवन भी आप के बिना
केसे लेलूं हर पर सांस भी राम के नाम के बिना |
कभी लगे समझ नहीं पाऊँ आप में आप का मार्ग
कभी लगे संसार से ज्यादा जानू में राम
नहीं जानू आप की लीला में जगदीश्वर !
मेरे जीवन के स्वामी
इस पावन दिन दीजो मुझे स्नेह आशीष
करू में तुम्हरे इस अश्रुं जल से इन चरण धोकर आप को प्रणाम
भयभीत हूँ में ,विचलित हूँ में
केसे समझाऊ इस दुनिया को मेरे राम
संसार रूठा हो तो बात थी
रूठे हैं राम
दया करो
दयानिधे
दया करो
मेरे नाथ मेरे राम !

बुधवार, 13 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा !न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
तुझसे मेरा मन प्रीत करे ,
के झुक जाए इन कदमो में
में बलिहारी इन कदमो पे
मेरे कृष्णा !
जो साकार रूप में पाऊं
तो में चूम लू ये चरण तोरे कान्हा !
मेरे प्राण !
न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण
दीजो पग -पग मुझे अपने अंनत ज्ञान का वरदान
मेरे रास्तो में मुश्किलें हैं कितनी पर जो राह 'चुनी
तुमने कान्हा जी
वो अद्भुत हैं ,
मेरा मार्ग देने वाले मुझे यूँ ही राह दिखाए चलना
तेरे स्नेह आशीष से शुरू करू में
ये नव जीवन संग्राम
बस ये ही कामना हैं मेरी तुझसे आज .
"श्री चरणों में अनुभूति "

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

इस स्वार्थी की विनिती


मेरे कृष्णा !
मेरे विदीर्ण मन की वेदना तुम ही जानो ,
छुट रहा हैं मुझसे कुछ ,
कुछ जुड़ता ही जा रहा हैं .
नहीं मालुम कान्हा लेकिन लगता हैं
एक पन्ना पलट जीवन का
नया पन्ना लिखा जा रहा हैं |
में नहीं कर सकुंगी
तेरे चरणों में नित
अपनी शब्द अनुभूतियों से प्रणाम
हां लेकिन तेरा आदेश आत्मा में बसा हैं जँहा रहूँ
लिखती ही रहूंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे राम !
और करती ही रहूंगी मेरी आत्मा में बसी तुम्हारी
मनमोहक श्वेत पीताम्बर धारी ,
गले में बसी उस कोस्तुभ ,
और अधरों पे सजी मुरली को प्रणाम
मेरे वासुदेव !
जिसके ह्रदय में वास हैं
माँ लक्ष्मी जिन चरणों की दासी
में भी बस कर जाऊं उन चरणों की सेवा
मुझ पे कृपा करना इतनी आप
मेरे कृष्णा !
आज इस विदीर्ण मन की पीड़ा जानो तुम
केसे कहू पल -पल खीच रहा मुझे कोई
तुमसे दूर मेरे कान्हा !
में छोड़ जाऊं तेरी सेवा ,पूजा
फिर भी तुम मुझे मत छोड़ना कान्हा !
कभी मत छोड़ना !
सदा अपने कदमो में जगह देना
इस स्वार्थी की विनिती
सुनना आज |
"श्री चरणों में अनुभूति "

सोमवार, 11 जुलाई 2011

कान्हा जी ! तेरी भक्ति का रंग


न रूप , न रंग,
न संसार
में तो रंगी हूँ
कान्हा जी !
आप के ही रंग में सौ बार
तेरी भक्ति का रंग मुझपे ऐसा चड़ा
कोई और रंग अब न चद पाए
अनुभूति

मेरे कृष्णा !धन्य हूँ में !

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
कोटि -कोटि हर भोर में अपनी अखियन के जल से ,
धोती में तुहारे चरणों को करू प्रणाम |
  मेरी आत्मा
मेरे अंतस के स्वामी
आप का स्नेह सागर न होता तो ,
ये अद्भुत भक्ति न होती ,
ये अनोखी आत्मीय आत्म आनंद अनुभूति नहीं होती
ये शब्द न होते,
ये भाव न होते ,

न ही में इस झूठे
भवसागर को पार कर
तेरी आरधना और तपस्या की दुनिया में खो पाती
ये असीम स्नेह आनंद बरसता हैं मुझपे
प्रभु तेरा |
क्या मांगू में तुझसे और कुछ कृष्णा
बिन मांगे तो
ये स्नेह शीर सागर मेरे नाम किये बेठा हैं
में अज्ञानी फिर भी
मुझको तुच्छ जान ,
मेरी अनजानी भूल क्षमा करते रहना
मेरे नीलकंठ!
देना मुझे स्नेह आशीष
तेरे रस्ते की धुल न बन सकू ,
तो कम से कम जिस पथ तुम जाओ कृष्णा
उस पथ तुम्हारे चरणों से जो कुम्हला जाएँ में ऐसा फुल बन जाऊं
में धन्य हूँ! धन्य हूँ! कोटि-कोटि धन्य हूँ!
तुम्हे अपनी आत्मा में पाके |
तुमसा कोई आलौकिक स्नेह
नहीं कृष्णा ,धन्य हूँ में !
श्री चरणों में अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................