गुरुवार, 30 जून 2011

भगवान राम से भरत जी का अनन्य स्नेह

भगवान राम से भरत जी का अनन्य स्नेह 

हर मानव की सोच का अपना नजरिया होता हैं 
वो उसे जेसे देखे संसार का हर भाव वेसा ही दिखता हैं |
एक सम्वाद  भागवत जी से 
भगवान राम को सबसे अधिक स्नेह उनके भाई भरत किया करते थे |जब राम जी ने वनवास स्वीकार किया तो भरत जी ने भी अपने को भी उन्ही के समान मानकर अयोध्या नगरी का त्याग कर दिया औरनंदी ग्राम में रहने लगे | अपना जीवन अपने भाई की तरह वनवासी बनकर बिताया |उन्होंने सारे राज सुखो का त्याग किया और अपने राम जी की चरण पादुकाओं की पूजा कर ,गो मूत्र में बनाकर जो का  दलिया खाते थे वत्कल ही पहनते थे और पृथ्वी  पर डाभ{एक प्रकार की घास }बिछाकर ही सोते थे | 
जब भरत जी को ये पता लगा की राम जी वापस आ रहे हैं उन्होंने उनकी चरण पादुकाओं को अपने मस्तक पर रखा और सम्स्त पुरोहितो सहित भगवान राम की अगवानी के लिए गए |भगवान राम को देखते ही उनके आंसू छलक गए अपने अंतस की वो छिपा न सके और अनन्य स्नेह से भाव विभोर होकर वे अपने भगवान के चरणों पे गिर पड़े |उन्होंने अपने राम के चरणों के सामने उबकी चरण पादुकाएं रख दी और हाथ जोड़ कर खड़े हो गए भगवान  ने  अपने भरत को भाव विभोर होकर अपने गले लगा लिया और भरत जी ने अपने अश्रुओं से अपने राम जी का स्नेह अश्रुओं  अभिषेक किया | 
उनकी अपने राम के प्रति आस्था को देखकर आत्मा अनन्य भाव विभोरहो जाती हैं |

अपने ईश्वर से इसी अनन्य  भक्ति और स्नेह का आशीष मेरी आत्मा भी अपने आराध्य राम जी के चरणों के प्राप्त करना चाहती हैं |
हे जगदपति  !
मेरे कृष्णा !
मेरी ये प्रार्थना स्वीकार करना मुझे भी अपने जीवन में अपने वचनों ,सत्य और विशवास के लिए कठिन समय से लड़ने की शक्ति देना |

लम्हा -लम्हा

लम्हा -लम्हा 
रेत की तरह मेरे हाथों से फिसलता जा रहा हैं 
हर लम्हा  मुझे खिचता हैं तन्हाइयों में 
वादियों में ,पहाड़ों में 
एक एकांत से दुसरे  एकांत  की और 
एक सजा से दूसरी की और
सजा वही हैं बस रूप अलग हैं तन्हाइयों का 
लगता हैं लम्हा -लम्हा कुछ छुट रहा हैं 
कुछ नहीं हें अपना ,
सारे अपनों के भेष में पराएँ हैं 
सुख देने की चाह रखने वाले भी ,
अनजाने में दुःख दे जाते हैं उनको तो इसका इल्म भी नहीं
किसे कहू अपना किसे पराया !
दुनिया के फलसफे मेरी समझ से परे 
न रूप समझ आये जिन्दगी का न रंग 
इसीलिए ये संसार छोड़ रंग गयी हूँ 
तेर ही रंग 
कान्हा !
तुझमे अक्स ढूंढते हैं मेरे अपने 
काश तुझसे जो स्नेह किया होता किसी ने 
मेरे कृष्णा !
                                           तो कोई समझ पाता आत्मा की ये पीड
                                                  हां छुट रहा हैं मुझसे कुछ
                                                       लम्हा -लम्हा 

                                                      "   अनुभूति "

स्नेह सागर


ओ मेरे स्नेह सागर !
 
तुम जीवन्त हो मेरे रोम -रोम में
अपने झूले पे आँखे बंद किये में
इस सुहानी फिजा के साथ महसूस करती हूँ
तुम्हारी मिलो दूर से आती
तुम्हारे असीम स्नेह से उठती उन बूंदों को
और भीग जाती हूँ अपने अंतस तक
होकर आत्म आनंद विभोर
इस बदरी के साथ मेरी आँखों से बह उठता हैं ,
"तुम्हरा असीम स्नेह"
और मेरे लिए इबादत में खड़े जुड़े हुए तुम्हारे हाथो को देख
हो जाता हैं तुम्हारे चरणों के प्रति
समर्पित ,हां मेरी आँखों का ये नीर
में कृतार्थ हूँ अपने शिव को साक्षात् पाकर
हां आज सिमटी हूँ में ऐसे ही अपने अंतस में
जेसे प्रथम आलिंगन पे बेहद शर्म से धरती कठोरता से लिपटी हो
अपने स्नेह सागर से |
अनुभूति

बुधवार, 29 जून 2011

नेनो में बदरा छाये बिजली सी चमके हाय ,


नेनो में बदरा छाये बिजली सी चमके हाय ,
एक मीठा गीत 
 तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिले तो बने जीवन संगीत 
अनुभूति

आत्म आनंद अनुभूति



बेहद खुबसूरत हैं हर फिज़ा
और खुबसूरत हैं जिन्दगी मेरी हर पल यंहा ,
क्यों काट दू इसे में यूँ ही रोते -रोते  !

लम्हा- लम्हा खतम होता जा रहा हैं 
समेट लू तेरी ,
निश्चल मुस्कुराहटों और विशवास के पलों को ,
तेरे अश्रु पूरित स्नेह आलिंगन के  पारितोषिक  को ,
मेरे करीब आके कहे जाने वाले हर एक एहसास को ,
मेरे अमर स्वप्न को ,
मेरा स्वप्न जो तेरी रूह में बसा हैं ,
और में जो तेरे नाम से महकी हूँ
मेरी  रूह धडकती हैं तेरे नाम से
मेरे पास तो महका हैं जिन्दगी का ये जँहा,
तेरी मेरी रूह की
हर पल की आत्म आनंद अनुभूति  ,
सिमटी हैं मेरी साँसों में ,
अधरों में 
इन खुली जुल्फों में 
ये नीला आकाश तो बहुत छोटा पडा हैं
मेरे असीम स्नेह के आगे 
उस मदहोशी के आगे जिसमे
में और तुम खोये हैं दो आत्माओ के साथ 
कोई नहीं छीन सकता मेरी साँसों से 
हां तुम तो बसे हो मुझमे मेरे अंतस में 
इस भोतिकता से दूर एक जँहा और हैं 
जिसमे बसे हैं हम -तुम 
बनके एक असीम 
आत्म आनंद अनुभूति

"अनुभूति "
जीवन बेहद खुबसूरत  हें और कुछ लम्हें इतने प्यारे होते हैं
जो पुरे जीवन की मुस्कुराहटों के लिए काफी होते हैं
बस जीवन की छलनी से उन लम्हों को हम थाम ले | 
एक गीत हैं जिसके शब्द बड़े खुबसूरत हैं 
रहे न रहे हम ,महका करेंगे ,बनके कली ,
बनके सबा ,बागे ऐ  वफ़ा में महका करेंगे
क्या हैं मिलना ?क्या हैं बिछड़ना  याद नहीं हैं  हमको
कुचे में दिल के आये हो जब से  दिल की जमी हैं याद हमको |
जब न होंगे हम ,
तब हमारी जब ख़ाक पे तुम रुकोगे चलते -चलते ,
अश्को से भीगी चांदनी में ,
एक सदा सी सुनोगे चलते -चलते |
वही पे कही हम,
तुम से मिलंगे बनके कली ,बनके वफ़ा बागे ऐ वफ़ा में
रहे न रहे हम महका करंगे |
अंतस में  बसा ये गीत सुहाना गीत 


अनुभूति 

मंगलवार, 28 जून 2011

"अजी रूठ कर अब कँहा जाइयेगा ,

 
एक खुबसूरत शाम का जादू ,एक मासूम सी मुस्कुराती शाम ,
अपनी ही नादनी पे अटखेली करती एक शाम 
लता जी की आवाज के साथ
     "अजी रूठ कर अब कँहा जाइयेगा ,
       जँहा जाइयेगा हमें पाइयेगा "
         खुबसूरत एहसाओं के साथ 
    अनुभूति

सुहानी शाम

सुहानी शाम छेड़ रही सरगम
खामोश सी हवा भी लहरा रही ,
जुल्फों का परचम
में खामोश , तुम खामोश
फिर भी ये दिलो के धडकने की सरगम
कँहा से आ रही प्रियतम
कही छू जा रही मुझे तुम्हारी
आतम आनंद अनुभूति
छोड़ हदों को में जी जाऊ
दिल करता हैं इसी मदहोशी में खो जाऊं
अनुभूति

अर्थहीन हैं शब्द ,

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे नीलकंठ !
मेरे राम !
बिन मोल बिकी हैं रूह मेरी ,शब्द मेरे ,
भक्ति में तुहारी
जो बंसी अधरों पे धरे ,
कृष्णा!
मुझे देख मुस्काएं हो तो हंसी हूँ में,
मुझे स्नेह किया हैं तो जी हूँ आतम आन्नद अनुभूतियों में तुहारी
जो मुझे देख गुस्सा दिखाए हो तो डरी हूँ में
कृष्णा ये इतने  रूप क्यों ?
जो अंतस में हैं वो भाहर क्यों नहीं दिखता
तेरी में और में तुम जानो कान्हा
में डूबी तेरी भक्ति में
क्या जानू संसार,
मांगू तुझसे ये झूठा ये संसार
जानू मेरी रूह से तेरी आत्मा का निस्वार्थ साथ
अभिभूत हूँ पाकर तेरी भक्ति
छीन लेना मुझसे अपनी भक्ति की ये शक्ति
कान्हा !
पता नहीं क्यों अर्थहीन  हैं शब्द ,
अर्थ हीन हो गया हैं जीवन
बस चलती चली हूँ
तुम्हारी राहों पे
बिना किसी स्नेह ,साथ और विशवास के
बंधी पड़ी हूँ तुहारे कदमो के बंधन
सारे संसार के लिए तो तुम दया के सागर
मेरे लिए क्यों कठोरता ओडे हो ?
कभी तो बादलो की ओट
से ही मुझसे पूछ लो
कह दो डरो नहीं में
तुम्हारे साथ सदा स्नेह ,आशीष बन कर खड़ा हूँ
क्या मांगू में और ?
चाहियें तुम बिन कोई भोर कान्हा !
अनुभूति

सोमवार, 27 जून 2011

ए कायनात तेरी पनाहों में

कृष्णा ,
देख रही हूँ हिसाब तेरी रहमतो का
मागते हैं रिश्ते हिसाब सालो का ,
सालो से जिनके पास देने को कभी कोई,
सपना रहा
वो मागते हैं
आज मेरी इन से आँखों से
मेरे  सपनों का हिसाब
मेरी रूह का चेन और सारे एहसास तो

गिरवी
कान्हा तोरे पास ,
रूह का असल सूद मेरे पास, केसे कहूँ?
किसे कहू मेरा अंचल तो खाली ही पडा हैं ,
मिटने के बाद भी सहानुभूति और स्वार्थी का इल्जाम  धरा हैं  
कीमत में बंधा हैं हर बंधन
केसे कहू ये कभी
सात फेरो का बंधन
कभी सांसो का
दोनों का मोल अनमोल
बाँधना चाहे हर कोई अपने स्वार्थ से
कई हालत को मज़बूरी समझ खेल जाए ,
रिझा ले मन अपनी रहमतो से
और कोई हालत ही ऐसे कर दे की मजबूर हो जाएँ
मुझे जीना हैं लड़ना हे जिन्दगी तुझसे
अब नहीं कोई सौदा ,
मेरे कृष्णा
जो होना था हो गया
बस होगया तुम्हारे साथ
माटी की गुडिया से बना दो,
अब मुझे पत्थर का इंसान
खिलना हैं इस गुलशन में
चहकना हें मुझे अब डाल-डाल
मुझे ले चल कुदरत अपनी पनाहों में
एक बार नहीं लोटना हैं
मुझे इन झूटे सौदों में ,
में मिट जाना चाहती हूँ
कायनात तेरी पनाहों में
ले ईश्वर का साथ
स्वीकार अपनी चरणों में
रूह की ये प्रार्थना एक बार
अनुभूति

सब कुछ तुम्हारा तुम्हे अर्पण !


आज की सुबह एक बेहद खुबसूरत गीत सामने आया |
शब्द बहुत पसंद आये
मेरे कृष्णा !
शब्द तुहारे दिए , अर्थ तुहारे दिए ,नाम तुहारा दिया
सब कुछ तुम्हारा तुम्हे अर्पण
अगर कायम रहती हैं इसी से मुस्कुराहटें तुम्हारी तो ये भी अर्पित तुहारे चरणों में
आज तेरे चरणों में शब्दों की कमी सी महसूस हो रही हैं
इसीलिए गीत तुम्हारे श्री चरणों में अर्पित अनुभूति

रविवार, 26 जून 2011

संसार

मेरे राम ,
इस दुनिया में पल-पल जीना हैं,
सबसे मुश्किल काम .
कित लगाऊं ध्यान !
जँहा देखू अपने अंतस 
के रोम -रोम में हर अनुभूति 
तेरी में पा जाऊं 
सब कुछ शांत हैं पर मन में 
एक आह उठी हैं अपनी सी
केसे कहूँ ,
मेरे राम !
ये किस आह की ,
किस अंतस के दर्द की बैचेनी सी !
मेरे राम !
तुम ही हो मेरे भोले -भाले नील कंठ ,
सारे संसार का विष ,
अपने कंठ में समाने वाले
इस संसार को हर विपदा से बचाने वाले ,
मुझे भी अपनी ही तरह बनाओ
अब तुम कृष्ण बन छा जाओ
इन सुनी वादियों का मोसम 
अपनी बंसी की धुन से बदल जाओ 
हां अपनी राधा ,गोपियन संग रास रचा जाओ
ये सूना -सूना आँगन मन को नहीं सुहाता 
तुहारे अधरोंकी  मुस्कुराहट   देखे बिन 
दिन नहीं कट पाता,
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
छेड़ो  तुम आज कोई मधुर सरगम 
के देख तुम्हारे क्रोध , आवेश ,आदेश को ,सत्य को
मान  बीत जाएँ यूँ ही मेरा जीवन |
"आप के श्री चरणों में अनुभूति " संसार

शनिवार, 25 जून 2011

अंतस हर एक नारी का

तुम्ही हो जो सह सकती हो
तन की हर पीड़ा ,
मन की हर आह
हर ताना ,हर उपहास
तुम्हे ही बनाया गया हैं
असीम वेदनाओं कोसहने के लिए ,
इसीलिए तो संसार करता हैं
कभी माँ , कभी पत्नी ,,
कभी प्रेमिका के रूप में तुम्हारी पुकार
हां क्योकि तुम सहती ही रहोगी ,
कभी नहीं करोगी कोई प्रतिकार ,
में जानती हूँ इशु की तरह कोई तुम्हे सलीब पे ,
भी झुला दे तो तुम निभाती रहोगी धर्म
पुरुष को दे पौरुश्तव तुमने दे सम्मान किया हैं ,
चरणों में
अपने स्थान को स्वीकार
लेकिन उसी ने तुम्हारे अंतस को मारी हैं ठोकर
हर बार |
चरणों का स्थान तो तुम्हारी आत्मा के ,
अनन्य स्नेह का समर्पण का रूप हैं |
कँहा समझ सके प्रिये तुम कभी
इस स्नेह और समर्पण को |
अनुभूति

मेरे राम ,

मेरे राम ,
जब देखू में तुहारी ये अखियाँ 
खो जाऊं में संसार की भूल बतियाँ ,
मुझे प्यारा सबसे तेरा सच ,
तेरे वचन , तेरे शब्द , तेरी मुस्कान
आपसे ही जुडी हैं मेरी हर सास 
आप ही मेरे ठाकुर !
आप ही मेरे जागीरदार 
मेअधीन आप के ,
बिन दिए भी मानु 
आप का आदेश हर सांस 
बसे हो मुझे में अपनी ,
आदेश की खुबसूरत हुकूमत के साथ
जिसके एक आदेश के साथ  मिट जाएँ मेरा जीवन 
अद्भुत होगा ऐसे मेरे राम का दर्शन 
संजोये रखे ही नहीं अपनाए हैं
मेने जिन्दगी की लड़ियों में आप के आदर्श
सिखा हैं ,निभाती चलूंगी
बस मुझे यूँ ही राह दिखाते चलना 
तेरे सिवा दूजा कोई नहीं 
जो कभी मेरी सुरक्षा के लिए हाथ बदाये 
बस मुझे यूँ ही अपने स्नेह आशीष 
से महफूज बनाएं चलना |
अनुभूति


शुक्रवार, 24 जून 2011

पायल

बूंद- बूंद बन उमड़ रहा हैं समुद्र 
आज इस प्यासी धरती को भिगोने
भीगा हैं आज धरती का रोम -रोम ,
अंतस तक भीगी हैं धरती आज तेरे असीम स्नेह से
हर डाल पे स्नेह की घटा बरस रही
पर मेरे कृष्णा!
में  तो तेरे दर्शन मात्र को ही तरस रही 
जी करता हैं गिरिधर कहूँ तुमसे आज .
इन अधरों पे रख छेड़ दो 
आज स्नेह भरी मुरलिया 
में भी कुछ पल को जी जाऊं
और में पग बाँध पायल झूम जाऊं होके बावरी 
डूब जाऊं तुझमे 
मेरे कन्हाई !
मन नहीं बस में आज 
देख घटा कान्हा !
तेरा ये पैगाम मुझे देता  हैं 
कहता हैं" ये आदेश हैं मेरा
राधे बांधों पग में पायल आज "
तुम्हरा कान्हा धर लेगा आज अपने अधरों पे
सुरमई मुरली की सरगम 
हां कान्हा में महसूस करना चाहती हूँ 
बैकुंठ से आती तुम्हारी खुशबु को 
 में खो जाना चाहती हूँ 
तुम्हारी मुरली की धुनों में 
बसा लेना चाहती हूँ 
अपने अंतस के रोम -रोम में 
तुम्हारी खुशबु 
छेड़ो आज इस सावन की घटा के साथ 
अपनी मुरलिया 
की तुहारी राधा आज 
इस सावन की बूंदों के पीछे छिपा अपने आंसू 
झूम ले आज बाँध पग में पायल |
अनुभूति

मेरी प्रीत बस तुझसे मेरे कान्हा !

मेरे कोस्तुभ स्वामी !
तेरी पत्थर की मूक मूरत से ही में स्नेह करू
तेरे अधरों पे धरी मुरलिया की धुन में ही सुनु ,
भागवत के हर रूप से भी में तुझे ही पाऊं
तेरी कही हर बात से सीखना ,
तुझे निहारना यूं एक टक,
और तेरी अधरों की मुरलिया में खो जाना ,
और तुझे पुकारते -पुकारते
रोते -रोते सो जाना ही जिन्दगी हैं मेरी
मुझे नहीं आया
कोई पाखंड ,कोई विधि
मुझे तो भायी वो पहले धवल रूप,
निश्चल सादगी तेरी
मेरी आत्मा में बसा हैं
तेरे होठो के ज्ञान की
भागवत और गीता का हर संवाद
पग -पग पाया ज्ञान, 
सबसे बड़ा हैं मेरे लिए तेरा सत्य
तेरी ही संग धवल रंगों में ,
रंगी हैं मेरी दुनिया
मुरली धर !
तेरे लिए दुनिया
और मेरे लिए सिर्फ तुम ही हो,
लेकिन उतना ही बड़ा कडवा सच
तुम मेरे लिए नहीं संसार के लिए बने हो
कन्हाई !
मेरे लिए तुमने शब्द बनाएं
कोई गीत
सुनी पड़ी हैं तुम बिन मेरी प्रीत
कान्हा !
मेरे तप का कब अंत होगा
ये तो जानो तुम ही अन्तर्यामी
कब तक सहूंगी
कब तक यूं ही पगलाती
तेरी इस पत्थर की मूरत से में बतियाती रहूंगी
हां ,कान्हा !
इतनी देर कर देना
इतनी देर कर देना की दुनिया ,
मुझे पागलों के बीच छोड़ दे
या में जल -जल के ख़ाक ही क्यों ना हो जाऊं
हां तड़पते -तडपते ही ,
तेरी मूरत के क़दमों में ही रख के सर
ये प्राण त्यज जाऊं !
मेरे सत्य की अब ,
मेरी भक्ति की
कोई परिक्षाअब लो
कन्हाई !
कर चुकी हूँ अर्पण
तुम्हारे श्री चरणों में
एक बार दर्शन दे मुझे उठा इन चरण से
अपने भी गले ला लो
हां राधा की तरह कोस्तुभ स्वामी
मेरी भी प्रीत अमर बना दो
मेरी यही विनती चाहें पुकारूँ
इस आत्मा से में "इशु "
" कोस्तुभ स्वामी "
"चाहें राम "
मेरी प्रीत बस तुझसे मेरे कान्हा !
इस संसार के किसी इंसान की तरफ ,
निगाह नहीं उठत
मेरे श्याम !
"आप के श्री चरणों में आप की अनुभूति,
करती रहे म्रत्यु पर्यंत यूं ही प्रणाम
मेरे कोस्तुभ धारी !
स्वीकार करों अपने चरणन में आत्मीय प्रणाम