मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
तेरा दिया दर्द भी हम अपनाने लगे
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति
सोमवार, 5 दिसंबर 2011
माँ -पिता के श्री चरणों में
जड़े अपने फलो को दिया करती हैं
अपने ही गुण -अपने ही संस्कार
मेरी आत्मा आज धन्य हैं !
जो मेरे माँ- पिता आप से पाया हैं
मेने सत्य ,और ईश्वर के होने का संस्कार
मे दोषी हूँ आप की, जो करती ही रही ,
शुब्धता हजार
मेरी आँखों से बहते
इन अश्को ने आज जाना हैं
मुझे क्या मिला हैं अपनी जड़ो से
हां मेने पायी हैं अपने राम की ,
अपने सत्य की ,
स्नेह कृपा सौ बार
धन्य हूँ मेरे पिता ,
जो मिला हैं मुझे अपनी हर श्वास में
अपने रोम -रोम में
आप का ये ज्ञान .
सत्य की शक्ति
और आप दोनों के चरणों का स्नेह अपार
आज मे संसार की सबसे
बड़ी धनी बन गयी हूँ
जो जाना हैं मेने
अपनी जड़ो का ये गुण
मुझे हर जनम में
अपनी ही बिटिया कीजो
हे ईश्वर !
मुझे हर जनम
ये वर जरुर दीजो
अनुभूति का चरण वंदन अपने माँ -पिता के श्री चरणों में
पुकार
मेरे राम !
काहे टूटता नहीं,
मेरी आत्मा का विश्वास ,
क्यों मेरी आत्मा में
सत्य का अलख जगाएं हो !
देख चुकी इस
संसार में सत्य का मान
सिवा अपमान और तिरस्कार के कुछ भी नहीं
जानते हो !
इस कलयुग में इस सत्य का मोल
तो फिर क्यों मेरी आत्मा में
ये अलख जगाए हो !
मैं इस संसार की नहीं ,
या ये मेरा ये नहीं
फिर मुझे काहे इस भ्रम में फसायें हो
अगर कही ,
मेरे राम .इस संसार के साक्षी हैं
तो कँहा हैं !
में नहीं जानती ,
इतना सिखा हैं माँ से अपनी
पिता के अडिग सत्य से ,
तुम सत्य में बसा करते हो
निश्चलता में ,बस रहा करते हो
मेरी आत्मा की ये जिद हैं
तुम आना होगा ,
तुम आये थे
अहिल्या के उद्धार को भी .
करने स्वीकार शबरी के स्नेह को भी
मुझे मेरे यथार्थ सत्य का भान करना होगा ,
तुम्हे आना होगा
में जानती हूँ
तेरे ही कदमो की सेवा की प्यास ले आई हैं
मुझे इस दुनिया में दोबारा
संसार के स्वार्थ से परे में हूँ ! तुम्हारी
तुम्हे साक्षी मान छोड़ चुकी हूँ
मिथ्या भ्रमों का ये संसार
मैं जानती हूँ ,
मेरी तपस्या में कमी है
अभी कुछ बाकी ,
लेकिन तुम्हे ,
मेरी आत्मा में बसे
अक्ष्णु विशवास के लिए
अपनी धरती छोड ,
मेरे स्वर्ग में आना होगा
ना ये विनती हैं,
ना ये कोई जिद
ना स्नेह ,ना कोई समर्पण
ना स्वार्थ
ये मेरी आत्मा की अपने राम को
पुकार मात्र हैं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इस भोर का
ये अश्रु प्रणाम करो स्वीकार
अपने चरणों में .
अनुभूति
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की
मेरे माधव !
कभी मैं खिलखिला के मुस्कुरा उठूँ
तेरी बतियों पे ,
तो कभो कही तेरी खामोश
अहसासों की जुबा पे
लड़ती जाऊं
रोती जाऊं और
नीर भरी इन अखियन से
तुझे प्रेम -पाती लिखती जाऊं
जितने मेरे शब्द नहीं ,
उतने ही अंखियन में
सागर भरे
तेरा ही स्नेह सागर को इन अखियन
से बहाती ही जाऊं
तेरी ही तरह विशाल हैं
तेरा ये स्नेह सागर
पल-पल में जितना नीर बहाऊं
उतना ही ये उमडा जाएँ
ह्रदय की पीड को, दे विष प्याला
मैं तेरे क्षणिक स्नेह का
अमृत पाकर में जी जाऊं
तेरे हाथो में हैं
इस छोटी सी माटी कीगुडिया डोर
जो तू खीच ले तो में रो लूँ
और जो तू छोड दें ,मैं हंसती जाऊं ,
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की
जेसे तू चाहेँ ,
मैं जीती जाऊं
मैं तो तुझ संग बंधी हूँ प्रियतम
तुमसे अपने निस्वार्थ प्रीत
निभाती जाऊं
तुम ही कहो सारा संसार
सिर्फ स्वार्थ के लिए साथ करे मेरा
मैं निस्वार्थ ,मिट जाउंगी
मीरा की तरह हर
विष प्याला पी जाउंगी
.दे प्राण में ये प्रीत निभाऊँगी
तुम्हे भी ये अहसास जगा दूंगी
कोई मुझसा भी नहीं मिलेगा
तुझे इस संसार
मेरे माधव !
मेरे कान्हा !
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी
एक खुबसूरत अल्फाजों से सजा गीत
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी
कितना खुबसूरत हैं ........
जो स्वर्गमें होने की अनुभूति देता हैं
अनुभूति
गुरुवार, 1 दिसंबर 2011
तेरे कदमो पे जीवन हारी
मेरे राम !
जिस रूप में तुम आओ
मेरी इन अखियन के सामने
मैं मन्त्र मुग्ध सी देखती ही जाऊं
केवल तुम्हारे चरण के धाम को
सारा संसार होगा मुग्ध
तुम्हारे रूप .
रंग नाम
पे बलि हारी
मैं दीवानी,
एक पगली सी
तेरे कदमो पे जीवन हारी
कोई भोर न ऐसी जीवन की
जब न में, न पहनाऊं तोहे
चरण पादुका
अपने स्नेह नाम की
तुझसे ही सिखा हैं
सिखा "उसके सुख में सुखी रहना "
तुझसे ही पायी हैं
अपने राम के असीम स्नेह की कृपा अपार
मेरा जीवन महके पाके
तेरा ये स्नेह दुलार
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
काहे इतना स्नेह बरसाते हो
मेरे राम !
काहे इतना स्नेह बरसाते हो
इस अभागी पे
जो ना जाने इसका मोल
उसे काहे दिए जाते हो
में पगली जीवन दे भी न चुका सकूँ
तेरी प्रीत की कीमत अनमोल
ले चल मुझे संग अपने
बना ले मुझे भी अपने संग अपने सा
या मिटा दे इस जीवन
को ,दे अपना क्षणिक दे आवेश
तू ना जाने ,
मेरे मन की थाह
तेरे कदमो के सिवा कोई अब न रही चाह
श्री चरणों में तुम्हारी अनु
में हूँ दासी अपने राम की !
मोहे शपथ
करुणा निधान की
में हूँ दासी अपने राम की ,
में सदा ही पाऊं
इन अखियन में
सदा निश्छल धवल छबी
अपने राम की
रोक सके न संसार का कोई मोह
मेरी आत्मा का स्नेह बंधन
जो मिले मेरी आत्मा
अपने राम के चरणों से
तो मे पाऊं आत्मा का सुख अपार
मेरे राम !
करुणा निधान
मोहे शपथ अपने राम
में सदा करू हर भोर चरण प्रणाम
तोरे नाम
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति
रविवार, 27 नवंबर 2011
Rajnigandha Phool Tumhare (Rajnigandha - 1974) HQ
रजनीगन्धा फुल तुम्हारे इस जीवन
श्री चरणों में तुम्हारी अनु
शुक्रवार, 25 नवंबर 2011
नीर भरे नयन करूँ,
क्या में तुमसे क्या कहूँ सजन
मेरा मासूम मन कभी न समझ सका,
दुनिया की रीत
ओ सजन !
वो तो पत्थर की मूरत को भी मानअपना
करता रहा सदा ,
इन अश्रुओं से चरण वंदन
खोट कही मेरे साधना मे ही
भक्ति में ,तपस्या मैं ही
जो पा न सकी अपना प्रियतम
क्या में तुमसे क्या कहूँ सजन
मेरा मासूम मन कभी न समझ सका,
दुनिया की रीत
ओ सजन !
वो तो पत्थर की मूरत को भी मानअपना
करता रहा सदा ,
इन अश्रुओं से चरण वंदन
खोट कही मेरे साधना मे ही
भक्ति में ,तपस्या मैं ही
जो पा न सकी अपना प्रियतम
सब कुछ हैं ,पर कुछ भी नहीं
न पायल ,चूड़ी ,सिंदूर सजन
खनकती चूड़ियों ही में उसके पास
भटकती रही ले मन की प्यास
वो मुझे ठुकराता रहा ,
मासूम मन जान न सका ये बात
जान नहीं सकी अपने और उसके बीच के
बड़े धरती -आकाश के अंतर की बात
मेरा मासूम मन बस इन नीर भरे नैनों से उसे
पूजता ही रहा ,दुआए देता ही रहा
पर वो मुझे खोजता ही रहा
खोफ ,डर और मुसीबत और
न जाने किन -किन
लोगो के साथ होने की बात
न में इस दुनिया में थी, प्रियतम
न तेरी दुनिया, मुझे समझ आई
इसीलिए तो कहती हूँ कृष्णा !
मुझे भी दे इन सांसों से छुटकारा
ले चल अपने साथ !
ले चल अपने साथ ,हां अब तो ले चल,
सुन तो ले एक बार बस एक बार ,कुछ नहीं मांगूंगी में दोबार
अब तो सुन ले या कुछ और बचा हैं
तेरा मुझको देना इन आँखों के नाम
सुन ले न ,अब तो सुन ले हां अब तो सुन ले सुन तो ले एक बार
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तेरी तलाश
निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................





