रविवार, 9 अक्टूबर 2011

खाहिश

मुझे न  आसमान की उड़ान की खाहिश हैं ,
चाँद, तारों की
बेबसी में इन आँखों से झरते आसुओं को
बस तेरे कदमो की इबादत की खाहिश हैं
साँस बन कर जो रूह में उतर गया हैं
जिदगी को बस उस खुदा के कदमो में बिछ जाने की खाहिश हैं
तेरी आँहो के दर्द और आँखों से गिरते अश्को की बंदगी की हैं मेने
बस इसीलिए तेरे कदमो पे लुट जाने की खाहिश हैं


मेरी उम्मीदों का आसमान नहीं बहुत बड़ा
इसलिए तेरी कायनात से अपने लिए
प्यार के चंद बूदों की खाहिश हैं


में जानती हूँ मिटना ही मेरी नियति हैं
हां में मिट जाऊं में तेरी एक मुस्कराहट पे
लुटा दूँ सदके में अपनी जान
बस जिन्दगी की ये ही खाहिश हैं


मेरी जन्दगी .,मेरी सांसे
सब कुछ तुझसे ही हैं रोशन
हां बस तुझे ,हँसते गुलशन में मुस्कुराते देखने की खाहिश हैं !


अनुभूति

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

मेरे अंतस के ईशु तुम ही तो हो ,

"मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा। "
बाईबिल
में दीवानी हूँ गीता की ,भागवत की और बाईबिल की कुरान की ,मेरे लिए हर शब्द ईश्वर का असीम स्नेह अमृत हैं जो आत्म विभोर होने पे मेरी आँखों से बरसता हैं ,मेरा मालिक मुझे हमेशा अपना हाथ बड़ा थामे रहता हैं और असीम वेदना में भी ये कहता हैं अनु तुम बड़ी चलो में तुम्हे थामे हूँ |उसका ये अद्भुत अहसास जब मेरी आत्मा से फूटता हैं तो मेरी इबादत बन जाता हैं | बस ये ही हैं रसात्मिका |



मेरे कण -कण में ,
रोम -रोम में ,मेरी हर सांस में
तुम ही तो बसे हो ,
चाहें में तुम्हे राम कह के पुकारूं ,
या कहू मुरलीवाला
.या रब के कह के आवाज लगा लूँ
मेरे अंतस के ईशु तुम ही तो हो ,
पुकारती हु न, तुम्हे तो रोती हूँ दिवानो सी
लडती भी हूँ
और तेरा छिपा लाड -दुलार आँखों से बरसाती भी हूँ
कितने सरल हो न तुम ये सोचती हूँ
संसार क्यानहीं करता हैं तुम्हे पाने को,
मनाने को
और तुम इस पगली की एक पुकार पे चले आते हो,
देख नहीं पाते तुम मुझे किसी दुःख में
मेरे हाल पे लोगो को दुःख हुआ करता हैं
और में ख़ुशी से रोती हूँ
उसे क्या पता मेरे पास तो खुद तुम खड़े हो
मुझे थामे हो

क्या मांगू में!
मुझसे बड़ा कोई नहीं किस्मतवाला
जिसे तुने अपनेआप को दे निहाल कर दिया
मेरे रब !
मेरे मसीहा!
मेरे राम !

आप के कदमो मेंयूँ ही बेठे रहूँ
अनुभूति






रविवार, 2 अक्टूबर 2011

मेरे माधव ! तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया


तेरी तस्वीर से बड़ा कोई दुसरा कोई भ्रम नहीं ,
तू तो एक छाया हैं जो बसी हैं रूह में बनके एक सांस
लाख जिदंगी को दूर करना चाहूँ में ,
तो भी तुम धर के अपने अधरों पे,
अपने मीठे शब्दों की मुरलिया
मुझे छल जाते हो ,
कृष्णा !
तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया
कब कीस घडी कोनसा रूप धर जाओं तुम ही जानो
मेरे माधव !
तुम्हारे ये रूप कभी -कभी बावरे मन को दे जाते हैं पीड़ा
जो कही जा सके ,
सही जा सके सांसो के उठते दर्द के साथ
बस हैं तब तक थामे बेठी हूँ अपने को इस झूठे संसार में
घुटती हूँ ,तड़पती हूँ ,अपने ही अंतस से तुम्हे खोजा करती हूँ
मेरी दुनिया में हर पल तुमसे ही बतियाती हूँ
जीती हूँ हर घडी ,फिर भी तुमसे कभी मिल पाने की आस में
हर लम्हा मरती जाती हूँ
ये केसा जीवन हैं मेरे गोविन्द !
समझ नहीं आये !
क्यों चाह नहीं मुझे संसार की अब
क्यों में जाना चाहूँ बैकुंठ तुम्हारे चरणों के धाम
क्या सच हैं क्या मिथ्या
ये तुम ही जानो
मुझे नहीं आये तुम्हारी तरह छलना
में तो सोप चुकी हु अपने हर अहसास में
ये जीवन अधिकार
जो गहरा हैं इस इस तन की परिभाषा से कोसों दूर
तुम संसार के स्वामी भूले हो
और में भूली हूँ तुममे में अपने को

अगर तुम ही भ्रम हो झूठ हो ,
तो इस संसार में कीस पे करू विशवास
मेरे राम !
मेरे माधव !

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

तुम्हारी परिणीता हूँ में

जो लिखा जा सके ,जो कहा का सके
जो महसूस किया जा सके
आत्मा  से आत्मा  तक
तुम मेरा वी अहसास हो
ही चाँद उगता हैं मेरे गीतों में ,
ही चांदनी बिखरी होती हैं मेरे शब्दों में
तुम्हारी कोई सदा नहीं आती मुझतक अब
तुम तन्हा नहीं ये जानती हूँ
लेकिन में तो इस संसार में भी रह कर हर पल तनहा हूँ
हां मेरे कृष्णा
यथार्थ नहीं ,
सही लेकिन
तेरी आत्मा की आत्मा से  परिणीता हूँ में
मेरे मस्तक रहने  वाला कुमकुम साक्षी हैं 
मेरे निस्वार्थ स्नेह का 
तुम्हारी निस्वाथ प्रीत  का 
सदा इन चरणों में बसों चरणों में बसी रहूंगी में 
बस 
ये ही कृष्णा मेरी अंतिम परिणीती हैं 
हां तुम्हारी परिणीता हूँ में
मेरे कृष्णा !

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

मेरे खुदा! ! तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता अभी बाकी हैं


न जाने कितने इम्तिहान तुम्हारे बाकी हैं ,
लगता नहीं किसी और बंधन में अब कोई अहसास बाकी है |
में नहीं जानती तुम कोंन सा फ़रिश्ता हो या खुदा हो मेरा
हां लेकिन तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता ये ही अब जिन्दगी के नाम पे बाकी हैं |
देखा नहीं तुझे ,छुआ नहीं फिर भी तेरे सफ़ेद साए की

सरपरस्ती अभी बाकी हैं ,
तेरी रूह की चांदनी जब बरसती हैं

में अमावस में भी पूनम का तुम्हारा चाँद होती हूँ |
किसी मिलन ,किसी श्रंगार की

मुझे अब जरुरत नहीं ,मेरी रूह ,
तेरी रूह से मिलती हैं जब चांदनी रातो को ,
मुझपे आत्म आनंद अनुभूतियों की बरसात होती हैं |
तू जो एक निगाह उठाये उस आसमान को भी देख ले

में यंहा शर्म से सिहर जाती हूँ |
हां ज़िंदा हूँ में सिर्फ तेरे नाम से

ये ही सदा अब इबादत को अभी बाकी हैं |
अनुभूति

मेरा हर शब्द ,मेरे ईश्वर के लिए ,मेरे कृष्णा के लिए होता हैं जिसमे किसी इंसान के होने का कोईअस्तित्व ही नहीं ,
ये मेरा अनन्य स्नेह हैं जो सिर्फ अपने ईश्वर अपने आराध्य अपने राम ,अपने कृष्णा और जिस नाम से उसे पुकार लू मेरे खुदा या फ़रिश्ता के कदमो की इबादत है बस
अनुभूति

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

देख तेरे माधव सा कोई नहीं

मेरे माधव !
खोल दिए हैं तुमने अपनी आत्मा के कपाट
तुमसा कोई कँहा हो सकता हैं मेरे मुरलीवाले
सरोबार हूँ में तुम्हारे अनुराग से
धन्य हूँ !
और बस तुम्हारे चरणों में बैठ रो रही
और कह रही हूँ अपने ही अंतस के अक्ष्णु विशवास से
देख तेरे माधव सा कोई नहीं
मेरी आत्मा का अक्ष्णु विशवास
अपने ही मन के द्वंदों से जीत गया हैं
मेरे राम !
तुम्हारे सत्य और स्नेह की शक्ति
असीम हैं तुम्हारे खामोश अनुराग की तरह
श्री चरणों में अनुभूति

बुधवार, 21 सितंबर 2011

मेरे कृष्णा ! तुम तो मिले हो अपने सुदामा से

मेरे कृष्णा !
तुम तो मिले हो अपने सुदामा से बहाकर ,
अपनी इन अखियन से स्नेह नीर 
त्रिभुवन स्वामी !
धन्य हैं  आप ,जो लुटाते हैं अपने असीम स्नेह का अमृत 
अपने पुकारने वालो पे ,
पर मेरे कृष्णा !
वो दिन मेरे जीवन में कब आयेगा 
जब में धो सकुंगी ,पखार सकुंगी अपने कृष्णा के पग 
पल -पल फूटता हैं ये असीम स्नेह अमृत मेरी अखियन से
और तुम्हे हर क्षण पुकारती हूँ ,
और तुम मुझे कहते हो
पगली मुझे पुकारती क्यों हैं 
में कही भी रहूँ हूँ तेरी हर  सांस के संग 
मेरे कान्हा !मुझे नहीं भाता ये संसार 
मुझे तो अब ले चल अपने संग
श्री चरणों में अनुभूति
 







मंगलवार, 20 सितंबर 2011

मेरे राम ! तुम्हारी "रसात्मिका " विदीर्ण हो तुम्हे बस तुम्हे पुकारती हैं

मेरे राम !
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
मेरे माधव !
आज ये विदीर्ण रुदय पुकारता हैं तुझे
ये आँखे आज फुट पड़ी हैं
तेरा स्नेह सागर मेरी आँखों से बरसता हैं
और बूंद -बूंद जब तेरे चरणों में गिरता हैं
अंतस थमता नहीं आज ,
एक तीक्ष्ण वेदना के साथ तुझे पुकारता हैं
मेरे राम !
तुम ही हो जो मेरी आत्मा का ज्ञानहो
तुम ही कहते हो अपनी मौन भाषा में
"तुम्हारे शब्द और आत्मा का सत्य ही घने अंधरे में प्रतीक्षा कर सकता हैं जीवन ने प्रकाश की "
और में मानती आई हूँ
हजारो बार मरी हूँ ,और ज़िंदा हुयी हूँ
अपनी आत्मा में बसे तुम्हारे सत्य के अक्ष्णु विशवास के साथ
में नहीं जानती !
कब ,केसे ,कँहा ?
तुम मेरे राम बनके ,गोविन्द बनके खड़े होगे
इतना जानती हूँ इस संसार में ये आत्मा तुम्हारी बावरी हैं
ये नहीं जानती रिश्ते नाते ,
नहीं मानती कोई बंधन ,
ये तो बस यूँ ही बरसती आँखों से ,
निस्वार्थ भावों से तुम्हे पुकारती हैं
बस तुम्हे पुकारती हैं ,
ये जानती हैं अपने वनवासी राम की आत्मा को
और कोस्तुभ स्वामी में बसी
आत्म आनंद अनुभूतियों की गहराइयों को भी
कृतार्थ किया हैं मेरा जीवन
मेरे राम !
तुमने जो चले आये हो इस पगली की आत्मा के धाम
बस यूँ ही आज फट पडा हैं आत्मा का
असीम स्नेह सागर
आज तुम्हे पुकारते -पुकारते
जी करता हैं पुकारो को
जोड़ दू और किसी घने वन में
तुम्हे पुकारते -पुकारते ही तुम्हारे चरणों में
तुम्हरा ही असीम स्नेह सागर
तुम्हारे ही पगों पे बूंद -बूंद गिराते -गिराते ही
तुम्हारी ही आत्मा में तुम्हारे ही अंश को कर दू विलीन !
इसी कामना के साथ इस भोर
में तुम्हारी "रसात्मिका "
तुम्हारे चरणों में होके नतमस्तक
करती हूँ इस जीवन के नव दिन तुम्हे प्रणाम !
सदा के लिए]
श्री चरणों अनुभूति



सोमवार, 19 सितंबर 2011

जीवन का नव दिन


मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे माधव !
जीवन का नव दिन तुहारे चरणों में,
बेठे बिन केसे कर लू में शरू
हरपल ,हर क्षण इस जीवन बस तुने ही दिया हैं
साहरा बन कर राम ,
बनकर कोस्तुभ धारी
बनकर श्याम
अपनी इस बावरी को यूँ ही इन चरणों में बसायें रखना
ताकि ये तन ,मन ये आत्मा
ये जीवन बन जाएँ
तुम्हरा धाम
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

मेरे गिरिधर , गोविन्द !तुम्हारे चरणों में स्नेह अश्रु प्रणाम



मेरे राम !
मेरे माधव !
मेरे गिरिधर , गोविन्द !
जिस दिन न करे ये आत्मा तुम्हारे चरणों में  स्नेह अश्रु प्रणाम 
इस आत्मा को चेन नहीं 
सुध नहीं ,तडपत हैं 
 मेरा रोम -रोम गिरिधर लेकर हरसांस तेरा नाम !
तेरी  साँसे छु जाएँ जब मुझे 
आत्मा हो गद -गद 
झुक जाएँ ,
ये आत्मा तेरे चरणों में 
मेरे राम ! 
कोई सांस नहीं ऐसी मेरी ,
कोई आस नहीं ऐसी मेरी 
जो बिन तुम्हारे चरण छुएं कर सके
इस संसार का कोई काम .
इस बावरी की आत्मा को बस
एक बार देना जीवन में 
तुम्हारे चरणों को अपने अश्रु जल से धोने का वरदान 

श्री चरणों में अनुभूति


मंगलवार, 13 सितंबर 2011

बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं मेरे राम !




मेरे राम !
दर्द को अब दर्द नहीं होता ,
बस कभी -कभी तुम्हारे असीम अनुराग की चांदनी
इस पत्थर से फुट पड़ती हैं अशार बन कर ,
और में खुश होती हूँ
ये जान कर की तुम मेरी आत्मा में
आज भी बसे हो उतनी ही खूबसूरती के साथ
अपनी धवल आत्मा के साथ ,
मेरे पास मेरे राम ,
तुम्हरा वो मेरे आसुओं से भीगा दामन ,
जिन्दगी से लड़ने की हिम्मत देती वो मुस्कराहट
और तुम्हारे असीम स्नेह से
फूटे मेरी आत्मा से निकलते ये
शब्द ही मेरी निधि हैं सबसे बड़ी
मेरे राम !
मेरे जेसे न जानेकितने तुझे अपना आराध्य माने बेठे हैं
हां विरले ही मुझसा कोई होगा
जो तुम्हे इन साँसों का मालिक माने बेठा होगा
स्वार्थ की दुनिया से परे
में खुश हूँ तुम्हारे साए के
कदमो पे ही अपने आसुओं से
तुम्हे सदा नमन करके |
मेरे राम !
सदा यूँही अपनी निश्चल मुस्कुराहटो के साथ बसे रहना
इस पगली की आत्मा में बस
ये ही विनती हैं तुम्हारे चरणों में
कई बार सोचती हूँ निगाहें उठाऊं
और तुम्हारी इस अनुपम छबी को निहार लूँ
पर में जानती हूँ
में इस अनुपम संसार के दिव्य लोगो के सामने
एक तुच्छ इंसान हूँ
इसलिए देख नहीं सकी आज भी
तुम्हारे चरणों से ऊपर निगाहें उठाके
मुझे बस इन चरणों की सेवा
सदा जन्मो -जन्मान्तर देना !
लाख विपदा और कष्ट दे देना
मगर अपनी आत्मा से अपना स्नेह आशीष
मुझ पगली पे यूँ ही लुटाते रहना !
तुम सब कुछ जानते हो ये संसार नहीं मेरे नाम पे
बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं
बस मुझे इस निधि से सदा सरोबार रखना
मेरे असीम स्नेह सागर ,
मेरे राम !
मेरे माधव भी तुम ही बने हो
और इस शरीर की अंतिम सांस भी
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................