रविवार, 19 जून 2011

मेरी लाल परी

छोड़ आई हूँ छोटी सी परी को,
छोटी बहन को ,
अपने घर हां अपने ससुराल  ,
वक्त थम सा गया था ,
कुछ पलों के लिए ,
भीग गयी  हैं आँखे 
हां अब वो मेरी लाल परी बड़ी होगई हैं ,
मेरी तो आँखों में तुम वेसी बसी हो,
पी- पी की आवाज के साथ के जूतों ,
और अपनी हट के साथ ,
कही भी रुक जाने की अपनी आदत सी 
हां अस्त -व्यस्त हैं तुम्हारे कपडे 
और गोद में थामे हो अपना स्नेह 
तुम बड़ी होगयी हो मुझसे कई गुना ,
तुम्हारी बातो में अब सिर्फ संसार घूमता हैं ,
लेकिन में वही खड़ी हूँ 
तुमसे बहुत पीछे तन्हा ,
मेरे जीवन में तुम सब सा कुछ भी नहीं 
हां , खुश रहो अपने संसार में तुम 
ये ही दुआ हैं मेरी 
हां तुम अब बड़ी हो गयी हो मुझसे बहुत
मेरी लाल परी



पत्थर की मूरत

मेरे कान्हा जी !
में ठीक हूँ ,
इस जमीन का इंसान बन कर ही ,
मुझे खाहिश भी नहीं की, में सूरज बनू 
में किसी के दिल का दिया बनू ,
बनू किसीके  लिए स्नेह का समुद्र,
तो निभा सकू हर वचन अपना
ये ही मेरी आरजू रही ,
संसार भटकता हैं
धन -दोलत और न जाने क्या -क्या
पाने की चाह में ,
कान्हा!
तेरे स्नेह के आगे सब बेकार 
सब -झूटे हैं रिश्ते 
आत्मा से आत्मा का रिश्ता ,
ही सबसे अमूल्य हैं,
मेरे लिए 
इस संसार की वाणी मेरी समझ से दूर 
हर इन्सान तो  भाग रहा इस धन की चाह में , 
मान की चाह में ,नाम चाहियें 
एक बार अभिमान छोड़
मेरे कान्हा  की शरण में जो आये ,
वो सब कुछ पा जाएँ 
मेने त्याग दिया सारा ,संसार,
एक सपना
मातुत्व तुम्हारे चरणों में मेरे कान्हा 
में क्या चाहूँ !
बस बीत जाएँ जीवन यूँ ही
तेरे कदमो की छावं में 
मेरे जीवन के हर रूप में
तुम ही समायें को कन्हाई 
इसीलियें में ठीक हूँ
इस जमीन का इंसान बन कर ही
ओ कान्हा!
तुम तो इस संसार के हर ह्रदय के स्वामी 
पर में तो बस तेरे चरणों की दासी
मेरा संसार ,तेरी भक्ति 
बसे रहो मेरे लिए इस पत्थर की मूरत में आप
इस संसार में न जाने  कितने लोगो को
आपका स्नेह और आशीष चाहियें  
कोस्तुभ धारी

धनी हूँ में ,
आप को  अपनी आत्मा में पाकर ही
मेरे कान्हा !
आप के श्री चरणों में अनुभूति

शनिवार, 18 जून 2011

मेरे कोस्तुभ धारी के श्री चरणों में एक गीत

मेरे कोस्तुभ धारी के श्री चरणों में एक गीत ,
मेरे कृष्णा!
  पूजा में लगने वाला वो रक्त बिंदु
तुम्हारा मेरी आत्मा पे एक छत्र स्वामित्व का एहसास करता हैं 
और आत्मा से तन, मन के समर्पण को स्वीकार करता हैं |
             अनुभूति

शुक्रवार, 17 जून 2011

हे मुरलीधर!

तुम्हरे अधरों पे जब
ये मुरलिया साजी
हे मुरलीधर!
कोस्तुभ धारी !
गोकुल के वासी!
रख तुम्हारे काँधे पे सर
राधा ने ये दुनिया त्यागी
इस अमृत में खोयी राधे
भूल गयी सब काम जो साधे
होश नहीं तन मन का
जो स्नेह मिला हैं प्रियतम का
तेरी मुरली की धुन पे नाचे
गोपियाँ सारी
फिर क्यों हो जाऊं में बावरी
गिरिधारी !
रूठ जाओ जब तुम तो ,
सुनी पड़ी रहे दुनिया सारी
इसीलिए तो राधा मनाये तोहे
गिरिधारी !
मेरे कोस्तुभ के स्वामी
तुम जानो अपनी की मुरली की धुन का जादू
केसे कित समजाऊं तुम्हे कान्हा जब मन ही हो जाए बेकाबू
कान्हा अब रूठे रहो खुद से तुम
हां अपनी ही होठों की बसुरिया से गूम
मनाएं सो बार ,गोपियाँ
लाख -लाख हाथ जोडत
पैर पडत हैं राधिका तोरी
अब तो इन होठों पे सजालो मुरलिया प्यारी
काहे रूठे बेठे हो अब भी गिरधारी
सूना पडा हैं तुम्हारी मुरलिया बिन ये गोकुल सारा
फिर एक बार छोड़ हट ,
सजा दो जीवन की धुन से ये धाम
हां बनवारी राधा कह -कह के हारी
फिर खो जाने दो काँधे पे रख के सर
अबकी बार छेड़ो ऐसी सरगम
भूल जाएँ संसार जीवन के सब दुःख और भ्रम |
आप के श्री चरणों में
अनुभूति |


मेरी साधना के समय मेरा कान्हा मुझे जिस रूप में दिखता हैं वो बस शब्दों में फूटता चला जाता हैं , मन के भाव जेसे रुकते ही नहीं सरिता बन बस उमड़ आते हैं ,न तुक देखते हैं न छंद ,मेरा मन मेरी आत्मा बस अपने कृष्णा के स्नेह में डूबी रहती हैं |संसार ने न जाने कितने भावों से उनकी भक्ति की हैं लकिन मेने अपने कृष्ण से उनकी सखी बनके सिर्फ उनसे प्रीत की हैं अनन्य स्नेह किया हैं |

हे माँ शारदे !

माँ वीणा वादिनी ,
सहस्त्रो नमन तुम्हारे चरणों में 
माँ , ये बेटी तड़प रही ,
अंतर आत्मा से कर रही तुम्हे पुकार  .
हे माँ शारदे मुझे अब ले लो ,
अपनी अपनी आंचल की छावं ,
व्याकुल ,विचलित मन ,
बिखरी साँसे कही नहीं पा सकेंगी थाह 
सिवा आप की आंचल की छावं के ,
बंद हैं रास्ते सारे , भ्रम बने हैं इस संसार 
कुछ पल के साथी ,
कुछ क्षण दे खुशी ,
दे जाते जीवन भर की उदासी
हे माँ , तुम तो जगत जननी ,
दो मुझे सिर्फ अंत ज्ञान का आशीष 
ये ही चाहे मेरी आत्मा ,
दुनिया जाए भोतिकता की और ,
मुझे खिचे वन , कानन ,गंगा के घाट
ये केसा हैं विचित्र रूप हैं माँ जीवन का
समझ नहीं पाऊं .
मुझे दो ज्ञान का उजाला ,
दूर करो ये सब भ्रम मेरे
या भोतिक या सन्यासी 
एक रूप दिला दो मुझको 
हां माँ !
इस भोतिक संसार से दूर ,
कोई मार्ग तो दिखा दो मुझे .
हे माँ शारदे !
दो स्नेह आशीष 
मुझे दिखाओं मुझे ज्ञान की राह बस 
हे माँ!
अब मुझे मुक्ति दिलाओ इस भोतिक संसार से |

अनुभूति

गुरुवार, 16 जून 2011

गिरधारी

कहना हैं किसे जाना हैं
प्रभु ! सब आप ने
ये जो कभी न तेरे चरणों को छु पाने की टीस हैं
वो केसे व्यक्त कर पाऊं तुझसे,
ओ कोस्तुभ धारी!
आप ने तो दे सहानुभूति नाम ,
अपनी आत्मा से  हटा दी छबी सारी, 
मुझे बता दे कान्हा तो में भी खीच के निकाल दू
इस तन से इसा आत्मा को , तेरी ही तरह ,
मेरा क्या दोष जो ,
में बना बेठी साँसों की डोर तुझे ओ कन्हाई !
में तो सह के भी मुस्काऊं .तेरी खामोशी , 
तेरी उदासी में सह भी ना पाऊं 
मुग्ध हु कन्हाई तेरी सरलता पे
छिपा न सके आत्मा,
तेरी मुझसे अपनी आत्मा की पीड़
हर सास से व्यक्त हो तेरी उलझनों की तस्वीर 
मेरा कुसूर तो मुझे आज भी नहीं पता मुझे
क्यों रूठा हैं कान्हा तू मुझसे?
नहीं मालुम पर ये जीवन की नयी सजा हैं 
वचन हैं मेरा में खुशी- ख़ुशी हर बात सहूंगी 
में जानू न रहंगी मेरी ये मुस्कुराहटें तो 
कान्हा कहोंगे भी नहीं मन ही मन
सहते रहोगें |
क्यों जुडी हैं तुझसे संसार छोड़ मेरी आत्मा ऐसी
नहीं जान सकी में गिरधारी 
अब जो सजा हो देते रहो गिरधारी !

अनुभूति


बुधवार, 15 जून 2011

कोस्तुभ छबी प्यारी

मेरे कृष्णा ,
मेरे कोस्तुभ धारी ,
इन खुली आँखों से भी देखू छबी तोरी प्यारी ,
और जो बंद करू इन अखियाँ को तुझमे ही खो जाऊ ,
सोच तेरी आत्मा आनंद अनुभूति में मुस्काऊं ,
वो पीला पीताम्बर ,
गले का कोस्तुभ और अधरों की बंसी देख लजाऊ
में जानू कितनी अमूल्य हैं वो कोस्तुभ छबी प्यारी
देख सोच में तुझे याद करू और शांत सो जाऊं ,
सोचु इन अधरों की बंसी में बन जाऊं
जो दिया हैं आप ने प्रभु!
मुझे वो स्वप्न लोक तो हकीकत से भी सुहाना
झूट नहीं छल नहीं दो आत्माएं
संग मिली हैं
ये ही सृष्टि की अनुपम कृति हैं |
ये ही दिव्यता हैं देर लगीजानने में कन्हाई !
नहीं आ सके आप प्रभु इसीलिए
ये सब अनुभूतियाँ मुझे जीने को पहले ही सिखाई
ये आनंद मेरी रूह में बिखरा पडा हैं
इसीलिए आप का चाँद कृष्णा
यूँ खिलता चला हैं |
कोन कहता हैं आज इस चाँद पे ग्रहण लगा हैं
एक बार देख जो लिया कान्हा जी आप ने
इस चाँद आप की निगाहों के अमृत से
टूट के भी सो बार
दुगनी खूबसूरती से जी पडा हैं |
ये चांदनी आप ही दी हैं हैं कन्हाई !
इसीलिए तो में दूर अम्बर से देख के भी आप ही से लजाई |
मिलना नहीं मुझे जाके उस अम्बर आप से,
ओ मेरे चाँद !
में दूर खड़ी यूँ इबादत में ही खिलती हूँ,
अपनी दिव्य आनंद अनुभूतियों के लोक में हर सांस
में सदा आप ही के साथ होती हूँ |
कितना खुबसूरत हैं ये समां
मेरे चाँद !
ये सिर्फ आप जानो
मेरी दिव्य आनंदअनुभूतियों का जँहा
अब यु मुस्काओ मत
छोड़ उदासी जीवन के मधुर गीत गुन्गुनाओं
मेरे चाँद !
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
में सदा ही दासी रहूंगी तुहारी .
अनुभूति


मंगलवार, 14 जून 2011

सफर


आज मेरा चाँद घने मेघो में छिपा हैं ,
शायद  वो अपनी चांदनी से खफा हैं ,
मेरे चाँद !
तेरा अक्स तो,
मेरे रोम -रोम में बसा हैं ,
मेरे हर शब्द में बसा हैं
हर अनुभूति में रचा हैं ,
हर सांस में महका हैं 
फिर क्यों तू आज ,
मुझसे दूर इन बादलों में छिपा हैं
में जानती हूँ मेरे चाँद !
मुझसे दूर उस आसमा पे ही सही 
पर तेरी आत्मा का विशवास ,
तेरा स्नेह मुझसे असीम अनुराग
बन इन धवल वस्त्रो में मुझसे लिपटा हैं |
यूँ बादलो में ओझल होकर भी.
मेरा ही कुछ भला सोचता होगा ,
या  कही किसी खुदा के सामने ,
मेरे लिए इबादत में बेठा होगा ,
लेकिन  एक बार तो मुझसे पूछ  लिया होता 
की "कैसी हो मेरी चांदनी तुम "?
महफूज हो या नहीं ?
तुम ने तन्हा छोड़ दिया मुझे 
"अपना असीम अक्ष्णु विशवास दे"
इस दुनिया के अंधरे में |
फिर भी में खफा नहीं 
मेरे चाँद !
में जानती थी ये तो तय था .
इसीलिए तो में नहीं लडती नहीं सितारों से ,
 करती रही इनकार रोती रही ,
लाख होसलो पे तुम्हारे
फिर भी इस तन्हा सफ़र में ,
हवा का कोई झोका जब मुझे छूकर जाता हैं 
तुम्हारी मासूम सी बातो ,
गीतों को और अपनी कही, की
नासमझ बातो और बेवकूफियों को दोहराता हैं |
प्रत्यश प्रमाण  हैं मेरे पागलपन  का ये सफ़र
और क्या कहू मेरे चाँद !
मेरे पास बचा क्या हैं ?
अब तो आंसू भी नहीं आते ,
समन्दर सुख गया हैं जस्बातो का ,
बस ये ही मांगती हूँ तुझसे
अपनी रहमतो की चांदनी मुझ पर 
यूँ ही अपने अम्बर से लुटाया करना ,
तेरी रहमतो से आज भी रोशन हैं मेरी राहे
बस उन्ही रास्तो के अंधरे को 
अपने असीम ,अनंत ज्ञान से रोशन करते रहना |
ताकि चमकती रहे तेरी ये चांदनी 
और तू देखता रहे उस अम्बर से अपने चांदनी को
अपना असीम अनुराग इस संसार के दुखियों पे  लुटाते |
अनुभूति

कठोरता का आशीष

मेरे श्री हरी!
मेरे नारायण!
जगदीश्वर! ,जगत्पति !
मेरे नाम लिखी हो चाहें 
आप ने  संसार की सारी पीड़ा ,
मुझे कोई पीड़ा नहीं फिर भी 
इसमें भी मेरा सुख हैं राम जी !
संसार  को दने को चाहे आप ने सुख दिया ,
लेकिन मेरे लिए आप ने कुछ तो किया ,
फिर भी धनी हूँ संसार की सबसे बड़ी में 
क्योकि मेरी आँखों से गिरती ,
हर आंसू की बूंद में सदा आप की ही पुकार
होती हैं |
इस पुरे संसार में मुझसा कोई नहीं जो
जो हर -पल घड़ी में अपनी
हर आंसू की बूंद से अपने राम को भजता हो और
आप की साँसों के करीब रहता हो
जिसके रोम- रोम में बसे हो आप 
उसे संसार की किस पीड़ा का डर|

मेरे वासुदेव!
इतनी विनती मेरी सदा तुम्हारे श्री चरणों में
मेरे राम को दीजो इतनी  शक्ति ,
इतनी कठोरता दीजो ,
की मुझे वो हजारो तीरों की नोक से बिंध दे तो भी
उनकी आत्मा विचलित न हो ,
दुखी न हो , 
कही कोई ग्लानी न अपने मन में रख पाए
वो सदा मुस्कुराएँ 
और सदा अपने एक छत्र आधिपत्य को बढ़ाते जाएँ |
बस जीवन में इतनी भक्ति मेरी तुझसे मेरे राम !
जिसे संसार में मिला हो तेरी ही साँसों में हर नाम 
उसके लिए व्यर्थ हैं रंग सारे 
निरर्थक हैं मातृत्व संस्कार 
सब कुछ तुझको अर्पण 
साँसे वचन बद्ध हैं मेरी 
नहीं तो ये भी में छोड़ देती |
ये बाकी हैं मुझमे क्योकि मुझे लड़ना हैं
ता उम्र अपनी रूह  सच के लिए
इस तुच्छ की भक्ति को स्वीकार  करो अपने चरणों में 
मेरे राम! , मेरे कोस्तुभ धारी!
में नहीं मांगू कुछ और आप से
इस संसार  में छोडू जब प्राण 
मेरे होठो से निकले तेरा ही नाम 
मेरे राम! राम! राम !
अनुभूति

शुक्रवार, 10 जून 2011

भयभीत मन

ओ कान्हा जी !
ये केसी हैं!
अँधेरी रात ,
बिजलियाँ कोंध रहीं ,
घनघोर घटा बरस रही
मन को भयभीत कर रही 
न जाने कितनी ही आशंकाएं मन में उठा रही 
आत्मा राम नाम के अक्ष्णु विशवास पे अड़ी हैं 
 क्यों लगे मुझे आज इतनी रात
मेरा कान्हा !
किसी कारगर में जनम ले रहा ,
क्यों ये अद्भुत रूप कान्हा ,
आज मुझे दिखा हैं तेरा 
आज मेरी भागवत  पूरी हुयी हैं
कान्हा जी !
मेने देखा हैं स्वप्न
में जो तुम्हरा ये बाल रूप तुम्हरा 
पता नहीं आत्मा कहती हैं 
तेरे श्री हरी तुझपे आज प्रसन्न हुए
नहीं समझ इस तुच्छ बुद्दी को 
क्या सच हैं ?क्या होगा ?
 मेरे कान्हा मुझे शक्ति दो लड़ सकू में 
भी अपनी आत्मा के सत्य के लिए अपने ही मन से 
मन तोड़ रहा ,पर संकल्प मुझे मजबूत कर रहा मुझे 
हां बड़ी शक्ति हैं तेरे नाम में मेरे आराध्य! मेरे राम !
तेरा भक्त कभी झुटा न हो इस संसार में 
इतनी सभी को शक्ति  देना
और मुझे जीवन की नयी दिशा देना |
हां मुझे कभी अपने साकार रूप के दर्शन भी देना !
मुझे नहीं मालुम में लिख सकुंगी अब कभी 
आप के  श्री चरणों में कान्हा जी !
आगे ,पिच्छे की कोई गति में नहीं जानू 
जो जाने कान्हा आप जानो ,
सब कुछ तेरी शरण 
मेरे कोस्तुभ धारी !

गुरुवार, 9 जून 2011

सपने

कितने सपने देखने लगी हैं जागती आँखे ,
स्वच्छ, साफ़ ,सफ़ेद रंगों में ढली हैं ये आँखे ,
दिन में सपने ,हां दिन में सपने 
रोती हुयी आँखे भी,
उम्मीद से सपने पिरोती हैं दिन में ,
कितने खुबसूरत मासूम से सपने ,
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरा हर स्वप्न तुम जानो इसीलिए 
तो किसी कोने से खड़े देख मुझे मुस्काओ
न , कन्हाई !
ऐसे मुस्काते हो तो लाज आती हैं 
तुम्हे देख मन की हर कली खिल जाती हैं |
क्या कहू केसे कहू तुम्हे आज 
बस इतना कहू श्याम
छेड़ दो आज अपनी मुरली का कोई मधुर राग 
सुन बंसी की धुन में खो जाऊं 
हां श्याम आज तो मन तडपत हैं 
कहत हैं में तुम्हरी ही हो जाऊं |

अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................