शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

छोटी सी चिड़ियाँ रानी


ओ मेरे राम जी !
ये छोटी सी चिड़ियाँ रानी ,
दीवानी ,
तुम्हारे नाम की |

कभी तुम्हारे स्नेह से,
अभिभूत ,
नैनों से नीर बहाई  ,

तो कभी तुम्हे साथ पाकर 
घंटो इस डाली से उस डाली ,
फुदक -फुदक चहचहाई  ,

कैसी अजब प्रीत तुहारी ,
ओ मेरे राम जी !

कभी फुदक के तुहारे ,
इस काँधे बैठी  ,
तो कभी उस काँधे बैठी 

मेरे राम जी,
समझाओ इस पगली ,
दीवानी को ,

तुम्हारी इस छोटी सी,
राम नाम की दीवानी को ,
इस छोटी सी,
चिड़ियाँ रानी को ,

दिन भर बस चहके  
ले तुम्हारा  नाम ,
बस ,

राम -राम-राम |

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

दर्द उठता हैं मेरे राम !

हर पल एक तीखा सा
दर्द उठता हैं .
लगता हैं कही कुछ चीर रहा हैं |


हां
ये तो मेरे ही दिल के टुकड़े हो रहे हैं ,
बट रहा हैं कुछ दो टुकडो में ,
ये केसी पीर हैं ?

में ज़िंदा हूँ
और कुछ चीर रहा हैं
ये तो मेरे ही दिल के टुकड़े हो रहे हैं

इतनी ख़ामोशी से ,
अन्दर ही अन्दर
तक तुमने मुझे चीर दिया
और में मुस्कुराती ही रही |

शायद इसी का नाम जिन्दगी हैं ,
ख़ामोशी से तुमने मुझे चीर दिया
और फिर भी में तुम्हे ही मुस्कुराते हुए देख कर खुश हूँ |


इतनी तकलीफ में भी में खुश हूँ
शायद इसीलिए ,
क्योकि इस दर्द की आह में भी तुम्हारा नाम हैं |
मेरे राम !

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

खुद तुम्हे नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए


कई बार ऐसा मोड जीवन में आता हैं की जिसके लिए हम जी रहे होते हैं उसे भी कोई अंदाजा नहीं होता की उसकी हमारी जिंदगी में क्या अनमोल जगह हैं ,इसीलिए कई बार ये लिख कर भी जताना पद जाता हैं
की पति देव आप की क्या जगह हैं जीवन में सिर्फ महसूस कर लीजिए बस ..............................................

एक कविता सिर्फ उनके लिए ..
खुद तुम्हे नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
खुद तुम्हे नहीं पता,
क्या हो तुम मेरे लिए ?
मेरी आँखों से तुम्हारे स्नेह की मदहोशी ,
और बैचेनी में आँखों से टपकती ,
पवित्र आंसू की बूंद हो तुम |
क्या हो तुम मेरे लिए ?
ये बताने के लिए मेरे पास ,
तुम्हारी तरह कठीन शब्दों का महसागर नहीं ,
मेरे पास हैं ,
सिर्फ नैनो की खामोश भाषा 
मेरा मौन समर्पण ,
और मेरी श्रद्धा ही हैं |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
तुम्हारी किसी बात पे शर्म से झुक जाती हैं
वो शर्म से झुकती नजर हो तुम 
क्या हो तुम मेरे लिए खुद तुम्हे भी नहीं पता ?
कभी प्यार से एक बार जो" पागल "कह देते हो ,
कई दिनों तक ,
उसका छाया रहने वाला नशा हो तुम |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
तुम्हारी ख़ामोशी कत्ल करती हैं ,
और तुम्हारी निगाहें फिर धडकने दे देती हैं |
एक बार मर कर फिर जी उठने वाली जिंदगी हो तुम |
खुद तुम्हे भी नहीं पता ,क्या हो तुम मेरे लिए ?
मुझे नहीं पता क्यों करते हो इतना प्यार इस पागल से ?
जी करता हैं तुम्हे झकोर -झकोर के पूछ ही लू 
और तुम्हारे कदमो से लिपट के रो ही लू ,
क्यों इतना प्यार हैं इस पागल से ?
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?
मन ,तन ,आत्मा और अपना सर्वस्व
न्योछावर करने के बाद भी लगता हैं ,
कही कोई कमी तो नहीं मेरे स्नेह और समर्पण में 
इसीलिए पल -पल सोचती हूँ,
कही मेरी श्रद्धा और समर्पण में कोई कमी न रह जाए |
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?
ये सोच कर ही कॉप उठती हूँ ,
की कभी अपने को माफ नहीं कर सकुंगी ,
जो कर न पायी कोई वचन पूरा |
इसीलिए जिसके प्रति मेरी आत्मा समर्पित हैं 
ऐसा भगवान के प्रति विशवास हो तुम ,
हां ऐसा अगाध "अनुराग " हो तुम ,
खुद तुम्हे नहीं पता क्या हो तुम मेरे लिए ?


गुरुवार, 31 मार्च 2011

प्रभु मेरे


प्रभु मेरे ,
कैसा एहसास है ,
की इन खामोशियों में भी ,
आप साथ हो मेरे ,
न भूख ,
न प्यास हैं,
मेरे मन को ,

क्यों हमेशा आप का ही विशवास 
जीवन का कोन सा नया मोड हैं ,
अन्तर्यामी तू ही बता दे ,
मुक्ति का ये कोनसा मार्ग हैं,
मेरी अराधना का कोनसा विशवास हैं ,

प्रभु !

बुधवार, 30 मार्च 2011

इतना तो रहम करो


सपने 
देखने की
आदी नहीं 
ये आँखे 

तुम इन्हें 
आसुओ से ही
भीगा रहने दो ,

क्या करोगे?
इस खाली दामन
में खुशियाँ भरकर ,
ये खुशियाँ भी 
मेरी ही तरह
तिल -तिल
जलकर ख़ाक
हो जायंगी |

क्यों
मेरे साथ 
अपने दिल के
गुलशन को 
ख़ाक किये 
जाते हो ,

जाओ
खुश रहो ,
आबाद रहो ,
इस दर्द को ,
मेरे नाम
ही रहने दो,

इतना तो 
रहम करो |

रविवार, 27 मार्च 2011

कि ये खूबसूरत ख्वाब तुम्हारा ही है

प्रिये

हमेशा 
ये खुबसूरत ख्वाब,
पूरा होने से पहले ही,
क्यों अपनी आँखे खोल लेती हो तुम ,

मुझे हकीकत बनकर,
दिल की दहलीज़  तक आने से,
पहले ही 
क्यों रोक देती हो तुम ?.

क्यों तुम्हे यकीन  नहीं 
कि ये खूबसूरत ख्वाब तुम्हारा ही है ,
इस ख्वाब को तुम्हारा होने के लिए.
क्या - क्या परीक्षाएं देनी होगी |

प्रिये 
कभी तो अपनी किस्मत पे भी यकीन  करो,
ये हंसी ख्वाब तुम्हारा है ,
और सदा तुम्हरा ही रहेगा,

बस तुम्हारा |

शनिवार, 26 मार्च 2011

आलौकिक स्नेह


मित्रों ! पिछले कई दिनों से बड़ी अध्यात्मिक पुस्तकों से जुड़ गयी हूँ और गीता के बाद अब भागवत , संकल्प ले कर पद रही हूँ, और सच कहू तो मुझे जितना अनुराग ईश्वर से कभी नहीं था अब होगया है और उसी अनुराग से ओत -प्रोत ये कवितायेँ सिर्फ शब्द नहीं मेरी आत्मा में बसा उनके प्रति अनुराग है ,समर्पण हैं , श्रद्धा और विशवास हैं | मेरा उनके श्री चरणों के प्रति अनुराग है | जीवन में कई बार हमें बड़ी अलग अनुभूतियाँ होती हैं और मुझे कई बार अपने राम के यथार्थ दर्शन किसी न किसी रूप में हुए हैं |इसलिए मेरा आत्मीय सपर्पण अपने राम के नाम |

नहीं खोज रही किसी वन में ,
नहीं खोज रही किसी तन में 
मेरे राजीव लोचन तुम्हे तो पाया है
सदा अपनी आत्मा में ,
बनाकर  उसे पावन धाम .

ये तन तेरा मंदिर ,
ये आत्मा तेरे चरणो की गुलाम .
प्रभो ,
कैसे चले आए हो ?
इस बावरी के ध्यान |

अभिभूत हूँ तुम्हे अपनी आत्मा में पाकर .
मेरे श्री राम 
सब कुछ तुम ही हो ,
मेरी भावना ,
समर्पण ,
पूजा ,
विश्वास 
अंतस का उजाला और 
मुक्ति का अंतिम धाम |

मेरे राम !
क्या मांगू ?
तन की इच्छा नहीं 
ये काया तेरी दासी ,
ये रूप चितवन तेरा गुलाम ,
धन,पुत्र ,सम्मान 
ये सब तो अब मेरी सोच से परे हैं |

बस सदा रखना 
अपने चरणों का 
गुलाम 
यही विनती करती हूँ |
मेरे 
श्री राम !

सीता - राम सहित सदा बसना 
और बनाना मेरी आत्मा को भी अपना धाम |
ओ मेरे राम ,
बस राम !

राम !

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

ओ निर्मोही


मेरे रोम रोम बसे श्याम ,
वो निर्मोही जाने न तड़प मोरी ,
पल -पल तडपे ये बावरी .

केसे कहू कान्हा  ,
तुमसे ओ निर्मोही ,

मेरे मन के आँगन में गूंजे तेरी सी बंसी 
काहे दीवाना करे ,तू बजाके बसुरिया 
फिर  मन की बात समझे न ,
दिन में उंनीदी ,
जगाए रात -रात भर तुम्हरी बतियाँ |

बुधवार, 23 मार्च 2011

आलौकिक स्नेह



प्रभु मेरे !
तेरे एहसासों के साए में,
पल रहा प्यार मेरा ,

तेरी खोमोशी में,
पल रहा एक अनुराग मेरा.

सोचती हूँ कभी कहते नहीं ,
कोई इजहार नहीं 
फिर तुम्हारी आँखे क्यों मुझसे बात करती हैं ? 

बिना कहे भी ,
ये दिल से दिल के बीच कौन सा यकीन पल रहा है , 
ये यकीन क्यों है !
ये जान कर जी रही पल -पल सिर्फ मैं तेरे लिए |
तुम्हारे दिए हर परिवर्तन को महसूस करती हूँ ,
और सोचती हूँ क्यों बदल गए भगवान मेरे 
इतना लाड क्यों बरसाने लगे प्रभु मेरे !
इस बावली पर


अभिभूत हूँ तुम्हारे इस आलौकिक स्नेह से ,
कृतार्थ कर दिया ,प्रभु !
इस पागल का स्नेह 
अपने चरणों में स्वीकार करके |

अब मुझे डर नहीं, मेरा मोक्ष होगा कि नहीं ,
वह मोक्ष होकर मुझे तेरे कदमो की सेवा ही मिलेगी 

प्रभु मेरे !

कृतार्थ कर दिया तूने मुझे 
धन्य हूँ मैं तेरे नाम से .
मेरे प्रभु,! मेरे राम !

बस यूँ ही मेरी आत्मा में वास करना ,
मुझे अपने लिए यूँ ही बौराए रखना ,
अपने चरणों यूँ ही स्थान देना ,
इतनी ही विनती है |

मेरा रोम -रोम ऋणी रहेगा तेरा 
तेरे इस संसार में अब कोई ख्वाहिश नहीं ,
मेरे प्रभु , मेरे राम 

मंगलवार, 22 मार्च 2011

मेरे राम


मेरे राम , मेरे आराध्य ,

जब भी ये आत्मा कराह उठती है ,
मैं चली आती हूँ तुम्हारे कदमो में ,


और हर बार तुम,
एक विशाल आत्मा के ,
अधिपति बनकर मुझे ,
और मजबूती से खड़ा कर देते हो|

और खीच लेते हो अपने चरणों में ,
 बह उठती है इन आँखों से अश्रु धार,
तुम्हारे चरणों को,
अपने अश्रुओं से धोने के लिए .

मेरे राम 
मेरा सारा दर्द ,सारी वेदना 
तुम्हारे मेरे मस्तक पर हाथ रखते ही 
चली जाती है .

और सिर्फ रह जाती है ये अश्रु धार, 
तुम्हारे कदमो को अपनी निष्पाप भक्ति से धोने के लिए |
कभी लगता है आज भी मेरी भक्ति में ,
श्रद्धा में कोई कमी तो नहीं ,
जो तुम देते हो ये अश्रुधार 
इन आँखों को ,

मेरे राम , मेरे आराध्य 
मेरे पास तेरी भक्ति के खजाने के सिवा
कुछ भी नहीं 
इसलिए मुझे सदा तुच्छ जान 
आशीष देता रह |

मेरे भगवान , मेरे राम 
इन आँखों में ये अश्रु न रहें तो कैसे 
धो सकूंगी तेरे चरणों को ,
मेरे राम ,

इसलिए मुझे दर्द दे ताकि निकलती रहे आह
और में सदा बनी रहूँ , 
तेरे करीब , इन चरणों में 

मेरे राम , 
मेरे आराध्य

सोमवार, 21 मार्च 2011

इन खुली आँखों से सपना



इस नीले आकाश को ,
देखते- देखते ही ,
में खोजती  हूँ अपने ही अंतस में 
तुम्हारे साथ को,
और देखने लगती हूँ 
इन खुली आँखों से सपना |

हां ,एक खुबसूरत सपना ,
तुम्हारे काँधे पर सर रखकर 
भूल जाती हूँ सारी दुनियां 
और तुम मेरे हाथो को थामे 
गुनगुना रहे होते हो ये गीत .

तेरा मेरा साथ रहे ,
तेरा मेरा साथ रहे धूप या छाया ...

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................