मंगलवार, 27 सितंबर 2011

मेरे खुदा! ! तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता अभी बाकी हैं


न जाने कितने इम्तिहान तुम्हारे बाकी हैं ,
लगता नहीं किसी और बंधन में अब कोई अहसास बाकी है |
में नहीं जानती तुम कोंन सा फ़रिश्ता हो या खुदा हो मेरा
हां लेकिन तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता ये ही अब जिन्दगी के नाम पे बाकी हैं |
देखा नहीं तुझे ,छुआ नहीं फिर भी तेरे सफ़ेद साए की

सरपरस्ती अभी बाकी हैं ,
तेरी रूह की चांदनी जब बरसती हैं

में अमावस में भी पूनम का तुम्हारा चाँद होती हूँ |
किसी मिलन ,किसी श्रंगार की

मुझे अब जरुरत नहीं ,मेरी रूह ,
तेरी रूह से मिलती हैं जब चांदनी रातो को ,
मुझपे आत्म आनंद अनुभूतियों की बरसात होती हैं |
तू जो एक निगाह उठाये उस आसमान को भी देख ले

में यंहा शर्म से सिहर जाती हूँ |
हां ज़िंदा हूँ में सिर्फ तेरे नाम से

ये ही सदा अब इबादत को अभी बाकी हैं |
अनुभूति

मेरा हर शब्द ,मेरे ईश्वर के लिए ,मेरे कृष्णा के लिए होता हैं जिसमे किसी इंसान के होने का कोईअस्तित्व ही नहीं ,
ये मेरा अनन्य स्नेह हैं जो सिर्फ अपने ईश्वर अपने आराध्य अपने राम ,अपने कृष्णा और जिस नाम से उसे पुकार लू मेरे खुदा या फ़रिश्ता के कदमो की इबादत है बस
अनुभूति

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

देख तेरे माधव सा कोई नहीं

मेरे माधव !
खोल दिए हैं तुमने अपनी आत्मा के कपाट
तुमसा कोई कँहा हो सकता हैं मेरे मुरलीवाले
सरोबार हूँ में तुम्हारे अनुराग से
धन्य हूँ !
और बस तुम्हारे चरणों में बैठ रो रही
और कह रही हूँ अपने ही अंतस के अक्ष्णु विशवास से
देख तेरे माधव सा कोई नहीं
मेरी आत्मा का अक्ष्णु विशवास
अपने ही मन के द्वंदों से जीत गया हैं
मेरे राम !
तुम्हारे सत्य और स्नेह की शक्ति
असीम हैं तुम्हारे खामोश अनुराग की तरह
श्री चरणों में अनुभूति

बुधवार, 21 सितंबर 2011

मेरे कृष्णा ! तुम तो मिले हो अपने सुदामा से

मेरे कृष्णा !
तुम तो मिले हो अपने सुदामा से बहाकर ,
अपनी इन अखियन से स्नेह नीर 
त्रिभुवन स्वामी !
धन्य हैं  आप ,जो लुटाते हैं अपने असीम स्नेह का अमृत 
अपने पुकारने वालो पे ,
पर मेरे कृष्णा !
वो दिन मेरे जीवन में कब आयेगा 
जब में धो सकुंगी ,पखार सकुंगी अपने कृष्णा के पग 
पल -पल फूटता हैं ये असीम स्नेह अमृत मेरी अखियन से
और तुम्हे हर क्षण पुकारती हूँ ,
और तुम मुझे कहते हो
पगली मुझे पुकारती क्यों हैं 
में कही भी रहूँ हूँ तेरी हर  सांस के संग 
मेरे कान्हा !मुझे नहीं भाता ये संसार 
मुझे तो अब ले चल अपने संग
श्री चरणों में अनुभूति
 







मंगलवार, 20 सितंबर 2011

मेरे राम ! तुम्हारी "रसात्मिका " विदीर्ण हो तुम्हे बस तुम्हे पुकारती हैं

मेरे राम !
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
मेरे माधव !
आज ये विदीर्ण रुदय पुकारता हैं तुझे
ये आँखे आज फुट पड़ी हैं
तेरा स्नेह सागर मेरी आँखों से बरसता हैं
और बूंद -बूंद जब तेरे चरणों में गिरता हैं
अंतस थमता नहीं आज ,
एक तीक्ष्ण वेदना के साथ तुझे पुकारता हैं
मेरे राम !
तुम ही हो जो मेरी आत्मा का ज्ञानहो
तुम ही कहते हो अपनी मौन भाषा में
"तुम्हारे शब्द और आत्मा का सत्य ही घने अंधरे में प्रतीक्षा कर सकता हैं जीवन ने प्रकाश की "
और में मानती आई हूँ
हजारो बार मरी हूँ ,और ज़िंदा हुयी हूँ
अपनी आत्मा में बसे तुम्हारे सत्य के अक्ष्णु विशवास के साथ
में नहीं जानती !
कब ,केसे ,कँहा ?
तुम मेरे राम बनके ,गोविन्द बनके खड़े होगे
इतना जानती हूँ इस संसार में ये आत्मा तुम्हारी बावरी हैं
ये नहीं जानती रिश्ते नाते ,
नहीं मानती कोई बंधन ,
ये तो बस यूँ ही बरसती आँखों से ,
निस्वार्थ भावों से तुम्हे पुकारती हैं
बस तुम्हे पुकारती हैं ,
ये जानती हैं अपने वनवासी राम की आत्मा को
और कोस्तुभ स्वामी में बसी
आत्म आनंद अनुभूतियों की गहराइयों को भी
कृतार्थ किया हैं मेरा जीवन
मेरे राम !
तुमने जो चले आये हो इस पगली की आत्मा के धाम
बस यूँ ही आज फट पडा हैं आत्मा का
असीम स्नेह सागर
आज तुम्हे पुकारते -पुकारते
जी करता हैं पुकारो को
जोड़ दू और किसी घने वन में
तुम्हे पुकारते -पुकारते ही तुम्हारे चरणों में
तुम्हरा ही असीम स्नेह सागर
तुम्हारे ही पगों पे बूंद -बूंद गिराते -गिराते ही
तुम्हारी ही आत्मा में तुम्हारे ही अंश को कर दू विलीन !
इसी कामना के साथ इस भोर
में तुम्हारी "रसात्मिका "
तुम्हारे चरणों में होके नतमस्तक
करती हूँ इस जीवन के नव दिन तुम्हे प्रणाम !
सदा के लिए]
श्री चरणों अनुभूति



सोमवार, 19 सितंबर 2011

जीवन का नव दिन


मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे माधव !
जीवन का नव दिन तुहारे चरणों में,
बेठे बिन केसे कर लू में शरू
हरपल ,हर क्षण इस जीवन बस तुने ही दिया हैं
साहरा बन कर राम ,
बनकर कोस्तुभ धारी
बनकर श्याम
अपनी इस बावरी को यूँ ही इन चरणों में बसायें रखना
ताकि ये तन ,मन ये आत्मा
ये जीवन बन जाएँ
तुम्हरा धाम
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

मेरे गिरिधर , गोविन्द !तुम्हारे चरणों में स्नेह अश्रु प्रणाम



मेरे राम !
मेरे माधव !
मेरे गिरिधर , गोविन्द !
जिस दिन न करे ये आत्मा तुम्हारे चरणों में  स्नेह अश्रु प्रणाम 
इस आत्मा को चेन नहीं 
सुध नहीं ,तडपत हैं 
 मेरा रोम -रोम गिरिधर लेकर हरसांस तेरा नाम !
तेरी  साँसे छु जाएँ जब मुझे 
आत्मा हो गद -गद 
झुक जाएँ ,
ये आत्मा तेरे चरणों में 
मेरे राम ! 
कोई सांस नहीं ऐसी मेरी ,
कोई आस नहीं ऐसी मेरी 
जो बिन तुम्हारे चरण छुएं कर सके
इस संसार का कोई काम .
इस बावरी की आत्मा को बस
एक बार देना जीवन में 
तुम्हारे चरणों को अपने अश्रु जल से धोने का वरदान 

श्री चरणों में अनुभूति


मंगलवार, 13 सितंबर 2011

बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं मेरे राम !




मेरे राम !
दर्द को अब दर्द नहीं होता ,
बस कभी -कभी तुम्हारे असीम अनुराग की चांदनी
इस पत्थर से फुट पड़ती हैं अशार बन कर ,
और में खुश होती हूँ
ये जान कर की तुम मेरी आत्मा में
आज भी बसे हो उतनी ही खूबसूरती के साथ
अपनी धवल आत्मा के साथ ,
मेरे पास मेरे राम ,
तुम्हरा वो मेरे आसुओं से भीगा दामन ,
जिन्दगी से लड़ने की हिम्मत देती वो मुस्कराहट
और तुम्हारे असीम स्नेह से
फूटे मेरी आत्मा से निकलते ये
शब्द ही मेरी निधि हैं सबसे बड़ी
मेरे राम !
मेरे जेसे न जानेकितने तुझे अपना आराध्य माने बेठे हैं
हां विरले ही मुझसा कोई होगा
जो तुम्हे इन साँसों का मालिक माने बेठा होगा
स्वार्थ की दुनिया से परे
में खुश हूँ तुम्हारे साए के
कदमो पे ही अपने आसुओं से
तुम्हे सदा नमन करके |
मेरे राम !
सदा यूँही अपनी निश्चल मुस्कुराहटो के साथ बसे रहना
इस पगली की आत्मा में बस
ये ही विनती हैं तुम्हारे चरणों में
कई बार सोचती हूँ निगाहें उठाऊं
और तुम्हारी इस अनुपम छबी को निहार लूँ
पर में जानती हूँ
में इस अनुपम संसार के दिव्य लोगो के सामने
एक तुच्छ इंसान हूँ
इसलिए देख नहीं सकी आज भी
तुम्हारे चरणों से ऊपर निगाहें उठाके
मुझे बस इन चरणों की सेवा
सदा जन्मो -जन्मान्तर देना !
लाख विपदा और कष्ट दे देना
मगर अपनी आत्मा से अपना स्नेह आशीष
मुझ पगली पे यूँ ही लुटाते रहना !
तुम सब कुछ जानते हो ये संसार नहीं मेरे नाम पे
बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं
बस मुझे इस निधि से सदा सरोबार रखना
मेरे असीम स्नेह सागर ,
मेरे राम !
मेरे माधव भी तुम ही बने हो
और इस शरीर की अंतिम सांस भी
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

सोमवार, 12 सितंबर 2011

मेरे गिरिधर ! तुम्हारा ये चाँद,

मेरे कृष्णा !
इस रात की बाहों में ये खुबसूरत चाँद ,
और तुम्हारी  धवल आत्मा की  पनाहों मे
  तुम्हारा ये चाँद, 
 दोनों बेहद खुबसूरत हैं ,
अपने -अपने  मालिको की पनाहों मे
ये दिव्यआनंद अनुभूतियाँ और भी खुबसूरत बना देती हैं मुझे 
   तुम्हारी पनाहों मे,
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ये चाँद लजाता हैं बादलो  की ओट से 
        और मे लजाती हूँ तुम्हारी धवल आत्मा ओट से 
,मेरे रुखसार से हटता घुंघट और कृष्णा तुम्हारी छबी 
    से गिरता आलोक और भी दिव्यता दे देता हैं मुझे,
  और मे अश्रु पूरित अपने असीम अनुराग 
 को सामने देखकर  नतमस्तक पड़ी होती हूँ
  तुम्हारे श्री  चरणों मे 

          जानती हूँ दुनिया के सारे कडवे सत्य ,
 फिर भी तुम्हे साथ पाकर
  और भी मजबूत खड़ी हो जाती हूँ इस दुःख के सामने,
  और सच कहू तो कृष्णा ,
     अब तो तुम्हारे असीम अनुराग  के आगे 
   दुःख भी हार गया हैं,
    और मेने भी अब तुम्हारी ही तरह 
  चैन की बंसी बजाना सीख लिया हैं
            हां इस पूर्णिमा के चाँद की  धवल चांदनी की तरह ,
 बरसते असीम अनुराग मे .
में भी खिली हूँ आज 
   तुम्हारी आत्म आनंद अनुभूतियों मे
   पूनम का चाँद बनकर महीनों के
   बाद तुम्हारी  पनाहों  मे 
कोस्तुभ धारी !
  मेरे कृष्णा !
मेरे माधव !
 मेरे गिरिधर ! 
 मेरे गोविन्द !


श्री चरणों में अपने श्याम के 
अनुभूति


शनिवार, 10 सितंबर 2011

मेरे कृष्णा ! तुम्हारी कठोरता सुख मेरा ही ,

मेरे कृष्णा !
तुम बिन कोई नहीं मेरा इस संसार
तुम जानो मेरे मन की बतियाँ,
और दो खामोश सीख अपार ,
तुम्हारी कठोरता में भी छिपा हैं
मेरा ही अपार सुख मेरा ही ,
जानो तुम ही सब कुछ
इसीलिए में मानु अपने को धन्य
और करू जन्मो तुम्हारी चरण सेवा अपार
धन्य हूँ में जनम जो पाया तुम्हारा स्नेह अपार
जो तुम दोहर क्षण सब स्वीकार
पर जो तुमने तय किया वो ही मेरा भाग्य
तो फिर किस कठिन राह से इनकार
जो तुम संग बसे हो इस आत्मा के
फिर क्या डर इस तुच्छ संसार
सदा दूर से ही ,अपने बैकुंठ से ही बरसाते रहो
स्नेह आशीष अपार
में बदली थी बदली हूँ
मेरे कृष्णा !
में तो चल पड़ी हूँ
तेरी ही राह
मेरा मोक्ष तेरी चरण सेवा
ये ही जीवन लक्ष्य मेरा
श्री चरणों में
अनुभूति






रविवार, 4 सितंबर 2011

"प्रीत "

किसी का स्नेह जीवन में कितना कुछ बदल देता हैं ,सामने घटित  देखतीहूँ तो अपने अंतस को या कहूँ अन्दर के इंसान को रोक नहीं पाती ,स्नेह का आलोक कविता बन फुट पड़ता हैं |


वो जीने लगा हैं अब फिर ,
बुझा -बुझा सा एक दीप,
आज f उठा हैं हां ,
अब वो जीने लगा हैं |

लौट आई हैं इस
में "प्रीत " हँसती ,
मुस्कुराहटों की तरह
गुनगुनाती जिन्दगी की ,
अब
वो जीने लगा हैं |

सालो बाद आज उतार फेका
हैं
e खामोशी का चोगा
हां
,दिल के सारे दरवाजे खोल
हैं "प्रीत "तुम्हारा
स्वागत
हां
,अब वो जीने लगा हैं |

तुमने लौटा दी हैं

एक लाश में
जिन्दगी
 
खामोश लबो पे मुस्कराहट हां ,
 अब वो जीने लगा हैं |
  हां "प्रीत "अब वो जीने लगा हैं | 
अनुभूति

शनिवार, 3 सितंबर 2011

जिन्दगी की अदा



मेरे खुदा !
वो कहता हैं मुझसे अभी तेरे और भी इम्तिहान बाकी हैं
तू ज़रा ठहर जा ,
जख्मों के लिए अभी तेरे दिल में और भी जगह बाकी हैं |


वो रोज अहसास बन कर उतरता हैं मुझमे ,
कुरआन की आयतों की तरह
पर उसे पता भी नहीं
वो उतरता हैं मुझमे पल -पल मेरे मरने के बाद
जीने के आस लिए जिन्दगी की तरह |


वो चाँद का घुंघट ,खनकती पायल
आज भी तडपती हैं ,
जिन्दगी की अदा लिए
असीम आत्म आनंद अनुभूतियों की तरह |
अनुभूति

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

आज त्याग सारा संसार में हुयी तेरी



मेरे कृष्णा !
देखि तेरी दुनिया
तुझसा साँचाकोई नहीं
इतना जानू
आज त्याग सारा संसार में हुयी तेरी
मेरे श्याम !
मेरा सिंगार भी तुम
और अखियन से गिरती अश्रु धार भी
तुम ही हो
मेरा जीवन तुझको अर्पण
मेरे श्याम !
श्री चरणों में अनुभूति