मेरे कृष्णा !
ये रोती अखियाँ तोहे पुकारे
तू छिपा हैं कँहा ,
में कँहा ?
किन चरणों में बैठ करू तुमसे बतियाँ
खोल दो ,
इस रसात्मिका पे लगे बंधन
में अरज करू !
तुझसे सिर्फ इतनि ही ब्रज- नंदन
मेरे जीने की वजह एक तुम
तुम्हारे चरणों का नित वंदन
ऐसी काहें कठोरता ओडे हो
मेरे कृष्णा !
तुम बिन सुनी पड़ी हैं रसात्मिका !
श्री चरणों में सुन लो कभी तो
मेरी एक पुकार
गुरुवार, 15 दिसंबर 2011
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011
मेरे पिता !
मेरे पिता !
कंहा खोये हो तुम
तुम्हारी ये बेटी ना जाने कब से तुम्हे पुकार रही
मुझे ले चलो ना एक बार फिर वंही
अपने स्नेह अपनत्व की छाँव
कैसे बैठा करते थे तुम मेरे पिता
सिरहाने मेरे
मेरे माथे पे घुमाते हुए वो
स्नेह भरा अपना हाथ
मुझे फिर लौटा दो ना ,
एक बार फिर वही सब
मेने बड़े होते -होते सब खो दिया हैं
मेरे पिता
मेरी अमूल्य निधि में
तुम्हे याद
करते इन आँखों से झलकते आंसू ही शेष हैं
मुझे काहे छोड दिया
इस दुनिया में तुमने तन्हा
दरिंदों ,जानवरों के साथ ,सवेदन हीन इंसानों के साथ
एक बार भी नहीं पलट के देखा तुमने
अपने कर्तव्य निभाने के बाद
में वही हूँ तुम्हारे साथ
ऊँगली पकडे और तुम अपने कंधो पे बस्ता टांगे
पूछती हुयी ना जाने कितनी बात
बड़े होने पे क्या ये सब बदल जाया करता हैं
इतना सब कुछ एक रिश्ते के जुड जाने के बाद खो जाया करता हैं
अगर मुझे पता होता तो में कभी बड़ी ना होती
यूँही चलती रहती
तुम्हारी ऊँगली पकड़े साथ
अनुभूति
मिथ्या जगत से परे
मेरे कृष्णा !
काहे दिया हैं इस आत्मा को ये घर
नाडीजाल से गुंथा ,मांस ,
हड्डी स्नायु और मज्जा से बना
ये भोग का घर ,
कब तक कैद रहेगा
ये आत्मा का पंछी
उड़ना चाहता हैं इस मिथ्या जगत से परे
तुम्हारे नीले आकाश में
मुझे ले चलो अब अपनी शरण
नहीं निभते खोखले रिश्ते
ले चलो मुझे दूर अपनी पनाहों में
अब नहीं करता अंतस स्वीकार
झूठे भावों को
मेरे श्री हरी सुनो इस विदिरण मन की पुकार
दया करो हे दयानिधे !
मेरे कृपा निधान !
श्री चरणों में अनुभूति
बुधवार, 7 दिसंबर 2011
अबोध मन का स्नेह
अबोध मन का स्नेह
विशवास ,सत्य और समर्पण करता हैं ,
समय की भट्टी में तपता
निखरता चलता हैं ,
प्रगाढ़ होता चलता हैं ह्रदय के आँगन में ,
आँखों से झरते अश्को में
अपने राम की स्नेहमयी मूरत देखा करता हैं
दूर बजती बंसी के सुरों में
अपने कृष्णा के मन की पुकार को वो पहचान लेता हैं
और अपने स्नेह -सागर की इस कृपा पे
अपने स्नेह- अश्रुओं से अपने कृष्णा के चरण पखारता हैं
वो नहीं जानता किसी को ,
अपने स्नेह को ही राम और कृष्णा माने,
वो इबादत किया करता हैं
उस अबोध स्नेह की पुकार पे
तो कृष्णा भी चला आता हैं अपना बैकुंठ छोड़ के
अपने कदमो में पड़े अपने स्नेह को
अपने गले से लगाने
हां अबोध स्नेह जब पल्लवित होता हैं
एक विशाल वट- वृक्ष ,
बनता हैं |
असीम स्नेह का वट -वृक्ष
श्री चरणों में अनुभूति
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
तेरा दिया दर्द भी हम अपनाने लगे
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति
सोमवार, 5 दिसंबर 2011
माँ -पिता के श्री चरणों में
जड़े अपने फलो को दिया करती हैं
अपने ही गुण -अपने ही संस्कार
मेरी आत्मा आज धन्य हैं !
जो मेरे माँ- पिता आप से पाया हैं
मेने सत्य ,और ईश्वर के होने का संस्कार
मे दोषी हूँ आप की, जो करती ही रही ,
शुब्धता हजार
मेरी आँखों से बहते
इन अश्को ने आज जाना हैं
मुझे क्या मिला हैं अपनी जड़ो से
हां मेने पायी हैं अपने राम की ,
अपने सत्य की ,
स्नेह कृपा सौ बार
धन्य हूँ मेरे पिता ,
जो मिला हैं मुझे अपनी हर श्वास में
अपने रोम -रोम में
आप का ये ज्ञान .
सत्य की शक्ति
और आप दोनों के चरणों का स्नेह अपार
आज मे संसार की सबसे
बड़ी धनी बन गयी हूँ
जो जाना हैं मेने
अपनी जड़ो का ये गुण
मुझे हर जनम में
अपनी ही बिटिया कीजो
हे ईश्वर !
मुझे हर जनम
ये वर जरुर दीजो
अनुभूति का चरण वंदन अपने माँ -पिता के श्री चरणों में
पुकार
मेरे राम !
काहे टूटता नहीं,
मेरी आत्मा का विश्वास ,
क्यों मेरी आत्मा में
सत्य का अलख जगाएं हो !
देख चुकी इस
संसार में सत्य का मान
सिवा अपमान और तिरस्कार के कुछ भी नहीं
जानते हो !
इस कलयुग में इस सत्य का मोल
तो फिर क्यों मेरी आत्मा में
ये अलख जगाए हो !
मैं इस संसार की नहीं ,
या ये मेरा ये नहीं
फिर मुझे काहे इस भ्रम में फसायें हो
अगर कही ,
मेरे राम .इस संसार के साक्षी हैं
तो कँहा हैं !
में नहीं जानती ,
इतना सिखा हैं माँ से अपनी
पिता के अडिग सत्य से ,
तुम सत्य में बसा करते हो
निश्चलता में ,बस रहा करते हो
मेरी आत्मा की ये जिद हैं
तुम आना होगा ,
तुम आये थे
अहिल्या के उद्धार को भी .
करने स्वीकार शबरी के स्नेह को भी
मुझे मेरे यथार्थ सत्य का भान करना होगा ,
तुम्हे आना होगा
में जानती हूँ
तेरे ही कदमो की सेवा की प्यास ले आई हैं
मुझे इस दुनिया में दोबारा
संसार के स्वार्थ से परे में हूँ ! तुम्हारी
तुम्हे साक्षी मान छोड़ चुकी हूँ
मिथ्या भ्रमों का ये संसार
मैं जानती हूँ ,
मेरी तपस्या में कमी है
अभी कुछ बाकी ,
लेकिन तुम्हे ,
मेरी आत्मा में बसे
अक्ष्णु विशवास के लिए
अपनी धरती छोड ,
मेरे स्वर्ग में आना होगा
ना ये विनती हैं,
ना ये कोई जिद
ना स्नेह ,ना कोई समर्पण
ना स्वार्थ
ये मेरी आत्मा की अपने राम को
पुकार मात्र हैं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इस भोर का
ये अश्रु प्रणाम करो स्वीकार
अपने चरणों में .
अनुभूति
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की
मेरे माधव !
कभी मैं खिलखिला के मुस्कुरा उठूँ
तेरी बतियों पे ,
तो कभो कही तेरी खामोश
अहसासों की जुबा पे
लड़ती जाऊं
रोती जाऊं और
नीर भरी इन अखियन से
तुझे प्रेम -पाती लिखती जाऊं
जितने मेरे शब्द नहीं ,
उतने ही अंखियन में
सागर भरे
तेरा ही स्नेह सागर को इन अखियन
से बहाती ही जाऊं
तेरी ही तरह विशाल हैं
तेरा ये स्नेह सागर
पल-पल में जितना नीर बहाऊं
उतना ही ये उमडा जाएँ
ह्रदय की पीड को, दे विष प्याला
मैं तेरे क्षणिक स्नेह का
अमृत पाकर में जी जाऊं
तेरे हाथो में हैं
इस छोटी सी माटी कीगुडिया डोर
जो तू खीच ले तो में रो लूँ
और जो तू छोड दें ,मैं हंसती जाऊं ,
मैं एक कठपुतली तेरे हाथों की
जेसे तू चाहेँ ,
मैं जीती जाऊं
मैं तो तुझ संग बंधी हूँ प्रियतम
तुमसे अपने निस्वार्थ प्रीत
निभाती जाऊं
तुम ही कहो सारा संसार
सिर्फ स्वार्थ के लिए साथ करे मेरा
मैं निस्वार्थ ,मिट जाउंगी
मीरा की तरह हर
विष प्याला पी जाउंगी
.दे प्राण में ये प्रीत निभाऊँगी
तुम्हे भी ये अहसास जगा दूंगी
कोई मुझसा भी नहीं मिलेगा
तुझे इस संसार
मेरे माधव !
मेरे कान्हा !
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी
एक खुबसूरत अल्फाजों से सजा गीत
किसी की तारीफ़ का ये अंदाज भी
कितना खुबसूरत हैं ........
जो स्वर्गमें होने की अनुभूति देता हैं
अनुभूति
गुरुवार, 1 दिसंबर 2011
तेरे कदमो पे जीवन हारी
मेरे राम !
जिस रूप में तुम आओ
मेरी इन अखियन के सामने
मैं मन्त्र मुग्ध सी देखती ही जाऊं
केवल तुम्हारे चरण के धाम को
सारा संसार होगा मुग्ध
तुम्हारे रूप .
रंग नाम
पे बलि हारी
मैं दीवानी,
एक पगली सी
तेरे कदमो पे जीवन हारी
कोई भोर न ऐसी जीवन की
जब न में, न पहनाऊं तोहे
चरण पादुका
अपने स्नेह नाम की
तुझसे ही सिखा हैं
सिखा "उसके सुख में सुखी रहना "
तुझसे ही पायी हैं
अपने राम के असीम स्नेह की कृपा अपार
मेरा जीवन महके पाके
तेरा ये स्नेह दुलार
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति
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तेरी तलाश
निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................







