गुरुवार, 17 नवंबर 2011




ताबीर


मेरी कोई फ़रियाद
उसके कानो तक जाती ही नहीं
मेरी रूह की बेबस सदाएं ,
पत्थरों से टकरा कर मुझ तक ही लौट आती हैं |
वो धड़कता हैं
मेरी रूह मे ,सांसो मे 
पर मेरी कोई धड़कन उस तक जाती ही नहीं |
हर घड़ी ,हर क्षण
वो मुझमे उतरता हैं इबादत की तरह ,
पर मेरी कोई इबादत उसके किसी क्षण तक जाती नहीं | 
मेरा हर खवाब ,हकीकत ,
चाहत ,इबादत और हर रिश्ता हैं वो ,
जानता हैं वो, 
पर उसकी कोई ताबीर 
मुझतक आती ही नहीं |
अनुभूति

वो जो मेरा कहने को अपना हैं !


वो जो मेरा कहने को अपना हैं !
वो सँवारना चाहता हैं ,उसके सपने .
देना चाहता हैं प्यार भरा आंगन ,
वो आँगन ,
जो मेने सींचा था
अपने स्नेह की एक –एक बूंद से ,
वो कहता हैं की उसे प्यार हो गया हैं !
शायद मुझे 
बहुत पहले ही अंदाजा हो गया था
         उसे मुझसे प्यार कभी था ही नहीं   ,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति

बुधवार, 16 नवंबर 2011

मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ


     मेरे कृष्णा ! 
                             
  हार गयी हैं तेरा इतंजार करती दर्द करती मेरी आँखे 
     हर आह का दर्द मेरी सांसो पे भारी 
                                                     मे नहीं जी पाऊं अब 
   कृष्णा !
            अब सह नहीं पाऊं दुनिया की बतिया सारी
      मुझे नहीं निभती कोई प्रीत न दुनिया की रीत  मुझे होके ख़ाक अब मिट जाने दे  
मेरे माधव !
क्षमा कर में नहीं लायक तेरी प्रीत के 
,न ही मेरी कोई भक्ति अपार ,मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ 
अपने श्री चरणों की सेवा में 

अनुभूति

मुझे मुक्ति दो माधव !

मेरे कृष्णा ! 
रात करूँ में तुझसे बतियाँ हजार ,
जिनका कोई न अंत न कोई आधार ,
तुम हो मेरे चारों और पर हो नहीं कभी 
केसी हैं ये प्रीत की रतियाँ सारी !
हर भोर ले आँखों में पानी में फिर भी,
करती जाऊं
तुझसे ही लडती जाऊं ,,,,,,,,,,,,,
मरती जाऊं मिटती जाऊं 
अपना वचन निभाती में जीती जाऊं 
ओ निर्मोही !
हारने लगी हूँ में 
अब नहीं निभे कोई वचन 
कर लुंगी में किसी दुसरे जनम से सारे कर्म
मुझे मुक्ति दो माधव !
मुक्ति दो !
मुक्त कर, स्वीकार करों
मेरी आत्मा का नमन |
श्री चरणों में तुम्हारी अनु

 






मंगलवार, 15 नवंबर 2011

Hum Tere Pyar Main Sara Alam Kho Baithe-Dil Ek Mandir

मेरे ठाकुर !
मेरी प्रीत तुझसे ही .ये सांसे तुझसे ही
और कुछ ना जानू मे दुनिया की रीत
जो निभा ना सकू तुझसे अपनी प्रीत
तो मेरी इन सासों मे
मेरे राम नहीं
मेरे राम बसे हैं मुझमे मेरी आत्मा बनकर
श्री चरणों मे अनुभूति

सोमवार, 14 नवंबर 2011

Kanha Kanha tum sang preet na todungi 18 sept 09


अंतस छूता ये भाव
मेरे कृष्णा !
मेरी सांसो मे बसा हैं सदा मे तुम्हारे ही चरणों मे रहूँ मेरे श्याम !

मैं तो तेरी ही चाकर हूँ श्याम !

मेरे कृष्णा!
कोई भोर नहीं ऐसी जो मैं,
तुझसे लड़ते -लड़ते ,
रोते -रोते न जागू...........
तेरा नाम लेते -लेते दुनिया मुस्काए और मैं  रोती ही जाऊं 
तुम  ही तो कहते थे सब कुछ तुम पे छोड दू ,,,,,
छोड दी थी हर सांस ,हर फेसला ,ये जीवन तुम्हारे चरणों मे ...
 और तुम मुझे यूँ रोता छोड गए हो ......
मेरी  प्रीत काहे तुम पहचान न सके !
एक ही सच्ची आत्मा ,परम पुरुष का भाव
 मेरी आत्मा मे मेने पाया था .........
 जो इन चार दीवारों मे रोते -रोते ही मिट जाना 
तुम्हरा फेसला तो मुझे हंस के स्वीकार ,
 मेने तो माँगा था सिर्फ 
एक बार तेरी चरण धूलि का अधिकार ...............
 मुझे ताना देते हैं दुनिया के लोग मीरा नाम बुलाते हैं 
उन्हें नहीं पता  मेरी आत्मा का कितना बड़ा उपहास वो कर जाते हैं
 न मैं  मीरा की तरह छोड पायी ये चोबारे ................
न  ही देख पायी एक झलक प्यारी
 जिस दिन मेरा श्याम !
मेरे  सामने आएगा 
उसकी पलकों के झुकने -गिरने से ,
मेरे मरने जीने का फेसला हो जाएगा...............
उसकी ही हुकूमत का अंदाजा उसे नहीं तो मे क्या करूँ ?
 मे बस जी रही हूँ ले कर तेरा नाम मेरे माधव !
 इस संसार से मुझे नहीं कोई काम ,
मुझे नहीं करना किसी की चाकरी
मैं तो तेरी ही चाकर हूँ श्याम !
तुम्हारे श्री चरणों मे करती हैं 
तुम्हारी अनु अपनी आत्मा के रोम -रोम से 
सदा अश्रु पूरित प्रणाम |





रविवार, 13 नवंबर 2011

Bhajans from Meerabai Serial Part 1


मेरी रूह तडपती हैं मेरे मनमोहना !
मेरी आँखों से गिरता ये पानी तुम्हारे चरण पखारता हैं
मेरे माधव !
तुम ही मेरे जीवन का यथार्थ सत्य ,
कुछ पल ही सही अमिट आलोकिक स्नेह अपनत्व देने वाले
तेरे ही चरणों मे करती हैं ये पगली
इन अश्रुओं से इस भोर का आत्मीय नमन ...........................
स्वीकार करो मेरे गिरधर ,,,,,,,,,
ये आहें आत्मा की तुम ही सुन सको सुन लो प्रियतम ...........
तेरे विरह मे यूँ ही तिल -तिल मिट जायेगी ये पगली .......
श्री चरणों मे तुम्हारी अनु .....

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................