शनिवार, 9 जुलाई 2011

मेरी पहली कविता तुम्हारे लिए

मेरी पहली कविता
तुम्हारे लिए हां सिर्फ तुम्हारे लिए
निगाहें खोजती हैं वो अनजाना सा अपना साया ,
धडकनों को तलाश हैं अपनी सी धडकन की
मेरे करीब तुम यंहा कही नहीं ,
मेरे करीब  तो हैं ये बनावटी लोग बनावटी दुनिया
तुम क्यों दूर चले गए इस अपनत्व और प्यार से ?
अनुभूति

संसार के न्यायाधीश !मेरे कृष्णा !




मेरे कोस्तुभ धारी
सोचता होगा तेरे कदमो में बैठ ,
रोती -रोती में
सदा ही तुझसे कुछ माँगना चाहूँ
ना कृष्णा ! ना
इतनी ओछी नई प्रीत मेरी
तोरी कसम
में दीवानी तुझे अपना जान
भुला बेठी ये झुटा संसार
भक्ति का रस ,ज्ञान का सागर बन
अपनत्व का अमृत बरसाने
वाले तुम हो तो हो मेरे श्याम !
चाहे में पुकार लू तुम्हे अपना मान
मेरे राम !
मेरे श्यामं !
तुने तो इस जीवन में ,
स्नेह का अर्थ बतलाया
नर्क से स्वर्ग का मार्ग दिखाने वाले तुम ही
मेरे राम !
मेरे अंतस के स्वामी बन फुट पड़े हो मेरे रोम-रोम से
जिसने अपने स्वप्नों में ही पा लिया हो
 पिया तेरे स्नेह पाश का मधु
बहती देखि हो अपने लिए
उन अखियन से अश्रु धार
वो क्या मांगे इस संसार की तुच्छ सोगात
मेरे कृष्णा !
तेरी बावरी !
झुकती हैं मिटती हैं एक नहीं लाखो बार
 स्नेह का अंदाजा भी नहीं होगा कभी तुझे
जितना उतना तो में एक पल में कर जाऊं
तुझे नहीं पता कृष्णा !
तेरे अधरों की मुरली सुन में कितनी मुस्काऊं
जी जाऊं ,
जब मेरे निकले प्राण
तो भी मेरी अखियन के सामने हो
तुहारी ये अप्रितम निश्छल धवल छबी तुहारी
जब में खोलूं अखियन सदा देखू
तुहे संसार के सामने हाथ दिखाते
सुदर्शन घुमाते ही पाऊं
मेरे बैकुंठ के स्वामी
संसार के न्यायाधीश !
तेरे आगे संसार झुके
में भी उन्ही चरण में बन धुल तुहारे चरण से लिपट जाऊं
हो सके इस जीवन का उद्धार
बस वो कर इस संसार के मुक्ति में पा जाऊं
अनुभूति

मत छल मोहे कान्हा !


मेरे कृष्णा !
कोनसा रूप मोहे दिखाएँ
तू मुझे छल जाएँ ,
मुझे समझ नहीं आये तेरी लीला
ओ कन्हाई !
क्या कहे मुझे कानो में आके !
तू रो मत में चला तो आया तेरे पास माई
क्यों पुकारे तू मुझे हर बार आंचल को ओट,
क्यों मुझे मेरे आंचल से झाँक -झाँक
तू तरसाए
में बावरी कृष्णा !
मुझे न अब ये अपना मोह दिखा
मत छल मुझे अपने इस आलोकिक स्नेह की माया से
मेने त्यागे सारे ये सुख
काहे तू मुझे इस निर्मोही संसार का मोह जगाये |
नहीं मालुम क्या लिखा लेख तुने कान्हा !
फिर भी अगर विधाता का लेख ,
तो इसे कोंन रोक पायेगा
जिस दिन तू आया इस माँ के आंचल की छाव
सारे संसार से में लड़कर  तुझे नाम अपना दूंगी ,
 हां इस संसार में तू मेरे नाम से पहचाना जाएगा
हां ,कान्हा में वात्सल्य का सागर
में तेरे नाम उंदेल दूंगी
मेरे पास सिर्फ ये ही असीम हें
तू जब आयेगा
जानेगा तेरी माँ सी बावरी दूजी कोई नहीं |
मत छल मोहे कान्हा !
मत छल

श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

मेरे कोस्तुभ धारी ! श्री चरणों में करो स्वीकार अनुभूति का ये चरण वंदन

मेरे माधव !
मेरे गोविन्द !
मेरे कोस्तुभ धारी !
 मेरे मुरली मनोहर !
मेरे राघव !
ये केसी हैं अद्भुत माया !
में नहीं समझ पाऊं ये ,
भोर का कोई स्वप्न या भ्रम !
यूँ बरसे स्नेह सागर तेरा ,
जेसे स्नेह का अमृत
इतना मीठा ,इतना सुखद ,इतना अद्भुत
रूप तुहारा कृष्णा !
रूठो तो जिस्म से जान ले जाओ
और बरसों स्नेह से एक पल में इस निर्धन को
अपने असीम स्नेह का अद्भुत सागर दे जाओ

कृष्णा !
अगर ये स्वप्न कोई सुनहरा तो कभी टूटे ना
यूँ ही बिखरी रहे मोगरे और गुलाबो की भीनी खुशबु
और में तुहारे इन कदमो से

चरणों से लिपटी बहाती रहूँ
ये स्नेह नीर
मेरी आँखों में बसता रहे ,
तेरे चरणों की सेवा का स्नेह नीर 
में मर कर भी मिटा कर अपने को रख सकू
तेर्री इस अनुपम स्नेह आशीष के
वरदान का सम्मान .
जीवित हूँ जब तक तेरी बावरी बन ,
दुनिया यूँ ही भूली रहूँ
तेरी चरण धुली बना के अपने मस्तक का रक्त कुमकुम में

सजती रहूँ ,
हां कृष्णा !
में भी मीरा की तरह लुटा दूँ अपना संसार
तेरे असीम स्नेह में
इतनी अर्चना करना चरणों में स्वीकार
खुले आकाश सा बंधन मुक्त निराकार स्नेह मेरा
में एक सरिता स्नेह की
बह जाने ,
दे अपना अनुराग
जीने का इरादा नहीं
यूँ ही तेरी ही असीम भक्ति में डूब
मिट जाने दे .
हां खो जाने दे कृष्णा ,कोस्तुभ धारी मुझे
उस असीम स्नेह भक्ति सागर में
उन मीठी अनुभूतियों में |
श्री चरणों में करो स्वीकार
अनुभूति का ये चरण वंदन 



 

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

सुख का ये अमृत

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे गोविन्द !
मेरे रोम -रोम में बसे माधव !
ये बावरी तुहारी हैं भाव विभोर
नतमस्तक हूँ तुहारे चरणों में
जो सुख पाए मेरी आत्मा वो क्या कहू !
इतना जानू सदा
 में पाऊं अपने को रोते तेरे कदमो में
रोऊ नहीं में दुःख से
हे कृपा निधान !
जगदीश्वर !
ये तो मेरी आत्मा से गिरती मन की गंगा हैं
जो बूंद -बूंद गिरती जाए तुहारे चरणों पे ,
सुख का ये अमृत
कान्हा !
केसे कहूँ ?
जेसे पायस हो
तेरे अनन्य स्नेह का
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

बुधवार, 6 जुलाई 2011

कृष्णा बावरी अनुभूति

 भगवान श्री कृष्ण के साथ आत्मा से जोड़ी गयी प्रीत का सुख अनन्य हैं इसे समझना भोतिक लोगो के लिए थोड़ा मुश्किल |जिसने इस भक्ति और स्नेह की इस आलोकिक के संसार को समझा हें वो इस संसार से परे हो जाता हैं कृष्णा की इस बावरी अनुभूति की तरह !

 बरसती फिजा के साथ ,
बरस रहे हैं फुल मेरी राहों में 
में हूँ खोयी हूँ 
इन खुबसूरत पन्हाओ में 
खिली हैं  जिन्दगी जेसे  खिल गया हो 
ग्रहण के बाद का चाँद 
हां आज वो चाँद मेरे  चेहरे पे खिला हैं 
और उसकी असीम चांदनी ,
मेरी मुस्कुराहट बन सजी हैं दुल्हन की तरह
बसंती रंगों में झूल रहा हैं ये सावन 
इतना खुबसूरत नहीं था कभी ,
ये मतवाला योवन भी 
लगता हैं आज जेसे सारी परीक्षाओं
का अंत कर दिया हो तुमने,
मेरे कोस्तुभ धारी !
केसा अद्भुत आनंद हैं!
ये केसे शब्दों से में कह दू !
मेरे कान्हा ! 
तुम तो जानो  आत्मा का हर भाव 
,हर भाव में लिपटे पड़े हो ,
अंतस में छुते हुए हो
मेरे कृष्णा !
इन अखियन से देखे कोई तो समझे ,
आत्मा से महसूस करे तो जाने
तेरे चरणों का स्पर्श केसा अद्भुत होगा | 
जो सुख पाया मेरे राम !
के चरण धोकर
"केवट राज "
ने वो ही सुख में भी पा जाऊं !
डरती हूँ अपने ही कृष्णा और राम
की असीम प्रीत को में 
नजर न लगा दूँ में 
इसलिए कान्हा !
बन राधिका में 
आज तुम्हे अपनी  ही अखियन,
के काजल से ये काला टिका


लगा दूँ |
श्री चरणों में अनुभूति

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

प्रीत

क्या हैं तुहारी  प्रीत कोस्तुभ स्वामी !
पूजा ,साधना या तपस्या 
मिलो के फासले पे एक अनजान से 
अनजानी आत्मा का मिलन ,
आत्मा से निकले शब्दों की धडकन ,
आत्मा की पुकार 
स्नेह का सागर ,
ह्रदय की मुरली की सरगम की मिठास !
आत्मा के छत्ते से टपकता स्नेह मधु !
या 
कानो के करीब आके,
अपनी मिठास से सब कुछ कह जाने की अदा !
मेरा अमर स्वप्न !
प्रेम का पावस!
निश्छल सत्य!
आत्मा की कठोरता !
मिट जाने की चाह !
पल-पल तड़पने की हसरत !
अपनी प्यास को अपनी आत्मा को  
में छुपा जाने अद्भुत की शक्ति!
या 
 कोई मीठी दिव्य आनंद अनुभूति 
स्वयं संसार बनाने वाले के चरणों को नमन 
तुम्हारी ही तरह अद्भुत हैं 
आलोकिक हैं 
प्रियतम तुहारी प्रीत 
समर्पित हूँ में इसी अप्रितम प्रीत के प्रति 
प्रतीक्षा रत में हूँ में अपने
प्रियतम 
अपने कोस्तुभ स्वामी !
तुम्हारे लिए

"श्री चरणों में अनुभूति  "

सोमवार, 4 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा ! तेरे असीम स्नेह का मधु

मेरे राम !
मेरे कृष्णा !
मेरी आँखों से अब टपकता हैं
तेरे असीम स्नेह का मधु ,
कितना अद्भुत और आलोकिक सुख हैं कृष्णा !
कभी नहीं जाना था तेरे स्नेह भक्ति सागर में डूबे बिना
आज जाना हैं तो रोम -रोम में बह उठता हैं
तेरा असीम स्नेह विशवास ,
कितने मीठे हैं ये आंसू भी मेरे कृष्णा !
ये जाने सिर्फ मेरी आत्मा  और तुम
में तुच्छ कर भी न सकी कोई चाकरी
तेरी कृष्णा !
सामने एक बार ही आता हैं ईश्वर
अब जाना
मेरे कान्हा!
  में तो तुम्हे बसाए बेठी हूँ न जाने कब से
कभी राम में बसे हो मेरे कभी मेरे कोस्तुभ स्वामी में
सदा तेरी दासी थी में तो कृष्णा !
संसार की लीला में भूले हो तुम
में भूली बेठी हूँ संसार
फर्क इतना हैं ही कन्हाई ,
पर इस संसार को ज्यादा जरुरत हैं
तुम्हारी कृष्णा !
जब दुनिया हो जाए पूरी तो एक क्षण मुझे भी दे
अपना स्नेह मुझे स्वीकार करना अपने चरणों में
मेरी भक्ति को
अनुभूति

रविवार, 3 जुलाई 2011

एक सुहानी भोर

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी ! 
ये मनमोहक छबी तुम्हारी और
एक सुहानी भोर 
सजी हैं फूलो की महक से 
और में भीगी हूँ अपने अंतस तक 
उन मीठी आत्म अनुभूतियों में 
कभी नहीं लगता तुम नहीं हो ,
ऐसा लगता हैं यही सिमटे हो मुझमे 
ये सुकून से भरी भोर ,
मेरे कृष्णा !
ऐसी को भोर न हो ,
जिसमे तेरी मुरली की धुन 
और अनुभूति न हो  
तुम्हरा असीम स्नेह भी मुझे ,
आनन्दित करता हैं
और क्रोध भी कृष्णा ,
मुझमे नहीं लगता कोई भेद ,
तुझमे और मुझमे 
दोनों एक हैं अपने अंतस तक
बावरी हूँ में 
कान्हा तुहारी 
मेरे कृष्णा !
मेरी दुनिया सिमटी हैं तुझमे बस 
जेसे तेरी मुरली में बसी हो सरगम
मेरी भोर का सूरज भी तुम  और
शाम की रोती अखियन को पनाह ,
देता सुकून भी तुम
दिन का हर ख्याल ,हर शब्द 
हर बात भी तुम 
हां तुम ही तो बसे हो, 
इस माथे के सुर्ख  कुमकुम में के सूरज में
 मुझमे मेरे अंतस में ,
मेरे अगाध विशवास में ,
मेरे अडिग सत्य में 
मेरा स्वपन भी तुम ,
मेरा यथार्थ भी तुम,
इन लबो पे खेलती मीठी मुस्कुराहट भी तुम ,
इन अखियन से गिरता नीर भी तुम
मेरी दुनिया के चारों और
और में इस दुनिया में होकर भी नहीं हूँ 
में तो बस सोच के मुस्कुरा देती हूँ ,
अपनी राधा को कही
तुम्हारी मासूम सी बतिया 
वो अपना हक़ जताना , 
वो गुस्सा ,वो अपनत्व ,
वो असीम लाड वो आदेश की हुकूमत
मेरी दुनिया सिमटी हैं बस कुछ ही शब्दों में

कुछ ही खुबसूरत लम्हों में 
में हां सिर्फ एक शब्द में 
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे नील कंठ !
मेरे कृष्णा ! 
मेरे राम ! 

श्री चरणों में नमन 
अनुभूति


शनिवार, 2 जुलाई 2011

मेरे जीवन का सबसे ज्यादा पसंदीदा गीत ,

मेरे जीवन का सबसे ज्यादा पसंदीदा गीत ,
इस गीत की मिठास और एक -एक शब्द कानो में गूंजता हैं 
और बैचेन सी जिन्दगी को 
चेन की पनाहों में नीद आती हैं |
अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................