गुरुवार, 24 नवंबर 2011

मेरे पालनहार !

मेरे कृष्णा ! 
तुने तोड़ दी ,
बिखेर दी हैं मेरी तपस्या के मोतियन की माला 
मेने जोड़ा एक -एक मनका 
अपनी आत्मा के असीम स्नेह विशवास से 
.और तुमने एक ही पल मे अपने आवेश मे बिखेर डाला |
सारा संसार एक तरफ तू मेरा कृष्णा एक तरफ 
दुनिया मुझपे तोहमत लगाये मेने सह ली 
तेरी तोहमत मुझे असीम वेदना दे जाएँ
ये क्या हैं मेरे माधव !
मुझे ना समझ आये ,
तेरी बाते तू ही जाने 
मेने कुछ नहीं कह पाऊं 
मेने सिर्फ मागी हैं तेरे चरणों की सेवा 
और कुछ मे नहीं चाहूँ 
मे जानू मेरी अखिया कभी ना तोहे भाये 
इसीलिए तू मोहे ये पीड दे जाएँ 
जो तू पड़े सके मेरे असुअन को बोली 
तो मेरी पीड समझ जाए 
धन्य हूँ मैं 
जीने को तुने कुछ तो मेरे नाम किया हैं
ऐसा कोन दूजा होगा 
जिसके क्षण-क्षण पे तुमने ये वेदना का सागर दान  किया हैं 
हां , मे अब इसी मे डूब जाउंगी 
हां अब तो करले दे म्रत्यु 
अपने श्री चरणों मे स्वीकार 
तेरी बड़ी कृपा होगी .!
मेरे पालनहार !

तेरे पगली अनुभूति




बुधवार, 23 नवंबर 2011

मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..




मेरे माधव ! 
मुस्कुराते हो ना सदा ही मुझे रोते देख ..
मेरी आंहो मे दर्द 
और आँखों मे देके रात भर का ये नीर 
देके मुझे मुस्काओ ,
तो हंस के स्वीकार हैं 
जीवन के सारे दर्द 
मेरे कृष्णा !
सदा मेरे अंतस को चीर तुम मुस्काओं 
ये प्रीत की रीत अनोखी तुम ही निभाओं 
जो तुम संग बाधी आत्मा की ये डोर 
तो केसे तुम्हारी बन्धनी तुम कुछ कह जाएँ 
मेरे माधव ! 
मुझे तेरी एक मुस्कुराहट को ये सब स्वीकार 
ये नीर भरे ,सजल नयन करते हैं 
सदा की तरह ही तुम्हारे चरणों मे 
आत्मीय प्रणाम
श्री चरणों मे तुम्हारी अनुभूति







सोमवार, 21 नवंबर 2011

एक दिन मैं तुझसे आ मिलूंगी ,मेरे कृष्णा !

मेरे कृष्णा !
तेरी आत्मा  की धवल चांदनी से सजी हैं
तनहा जिंदगी की राहे 
केसी रहमत हैं 
ये तेरे स्नेह  की जो एक बूंद मे ही मुझे भिगो देती हैं 
समन्दर की तरह 
हां समन्दर हो तुम मेरे स्नेह का 
बस नहीं हैं जिंदगी के हालातों  पे 
मुझे नहीं पाता तुझे मैं कंहा खोजू  ?
इतना जानती हूँ कृष्णा !
मेरी तडपती आत्मा एक दिन तेरे कदमो से 
लिपट के आंसू बहा रही होगी .................
बस ,इसीलिए जी रही हूँ 
मेरे कृष्णा !
श्री चरणों मे तुम्हारी अनु






गुरुवार, 17 नवंबर 2011




ताबीर


मेरी कोई फ़रियाद
उसके कानो तक जाती ही नहीं
मेरी रूह की बेबस सदाएं ,
पत्थरों से टकरा कर मुझ तक ही लौट आती हैं |
वो धड़कता हैं
मेरी रूह मे ,सांसो मे 
पर मेरी कोई धड़कन उस तक जाती ही नहीं |
हर घड़ी ,हर क्षण
वो मुझमे उतरता हैं इबादत की तरह ,
पर मेरी कोई इबादत उसके किसी क्षण तक जाती नहीं | 
मेरा हर खवाब ,हकीकत ,
चाहत ,इबादत और हर रिश्ता हैं वो ,
जानता हैं वो, 
पर उसकी कोई ताबीर 
मुझतक आती ही नहीं |
अनुभूति

वो जो मेरा कहने को अपना हैं !


वो जो मेरा कहने को अपना हैं !
वो सँवारना चाहता हैं ,उसके सपने .
देना चाहता हैं प्यार भरा आंगन ,
वो आँगन ,
जो मेने सींचा था
अपने स्नेह की एक –एक बूंद से ,
वो कहता हैं की उसे प्यार हो गया हैं !
शायद मुझे 
बहुत पहले ही अंदाजा हो गया था
         उसे मुझसे प्यार कभी था ही नहीं   ,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति

बुधवार, 16 नवंबर 2011

मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ


     मेरे कृष्णा ! 
                             
  हार गयी हैं तेरा इतंजार करती दर्द करती मेरी आँखे 
     हर आह का दर्द मेरी सांसो पे भारी 
                                                     मे नहीं जी पाऊं अब 
   कृष्णा !
            अब सह नहीं पाऊं दुनिया की बतिया सारी
      मुझे नहीं निभती कोई प्रीत न दुनिया की रीत  मुझे होके ख़ाक अब मिट जाने दे  
मेरे माधव !
क्षमा कर में नहीं लायक तेरी प्रीत के 
,न ही मेरी कोई भक्ति अपार ,मुझे स्वीकार अपने बैकुंठ 
अपने श्री चरणों की सेवा में 

अनुभूति

मुझे मुक्ति दो माधव !

मेरे कृष्णा ! 
रात करूँ में तुझसे बतियाँ हजार ,
जिनका कोई न अंत न कोई आधार ,
तुम हो मेरे चारों और पर हो नहीं कभी 
केसी हैं ये प्रीत की रतियाँ सारी !
हर भोर ले आँखों में पानी में फिर भी,
करती जाऊं
तुझसे ही लडती जाऊं ,,,,,,,,,,,,,
मरती जाऊं मिटती जाऊं 
अपना वचन निभाती में जीती जाऊं 
ओ निर्मोही !
हारने लगी हूँ में 
अब नहीं निभे कोई वचन 
कर लुंगी में किसी दुसरे जनम से सारे कर्म
मुझे मुक्ति दो माधव !
मुक्ति दो !
मुक्त कर, स्वीकार करों
मेरी आत्मा का नमन |
श्री चरणों में तुम्हारी अनु

 






मंगलवार, 15 नवंबर 2011

Hum Tere Pyar Main Sara Alam Kho Baithe-Dil Ek Mandir

मेरे ठाकुर !
मेरी प्रीत तुझसे ही .ये सांसे तुझसे ही
और कुछ ना जानू मे दुनिया की रीत
जो निभा ना सकू तुझसे अपनी प्रीत
तो मेरी इन सासों मे
मेरे राम नहीं
मेरे राम बसे हैं मुझमे मेरी आत्मा बनकर
श्री चरणों मे अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................