बुधवार, 13 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा !न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण

मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
तुझसे मेरा मन प्रीत करे ,
के झुक जाए इन कदमो में
में बलिहारी इन कदमो पे
मेरे कृष्णा !
जो साकार रूप में पाऊं
तो में चूम लू ये चरण तोरे कान्हा !
मेरे प्राण !
न्योछावर तुझपे मेरे तन ,मन, प्राण
दीजो पग -पग मुझे अपने अंनत ज्ञान का वरदान
मेरे रास्तो में मुश्किलें हैं कितनी पर जो राह 'चुनी
तुमने कान्हा जी
वो अद्भुत हैं ,
मेरा मार्ग देने वाले मुझे यूँ ही राह दिखाए चलना
तेरे स्नेह आशीष से शुरू करू में
ये नव जीवन संग्राम
बस ये ही कामना हैं मेरी तुझसे आज .
"श्री चरणों में अनुभूति "

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

इस स्वार्थी की विनिती


मेरे कृष्णा !
मेरे विदीर्ण मन की वेदना तुम ही जानो ,
छुट रहा हैं मुझसे कुछ ,
कुछ जुड़ता ही जा रहा हैं .
नहीं मालुम कान्हा लेकिन लगता हैं
एक पन्ना पलट जीवन का
नया पन्ना लिखा जा रहा हैं |
में नहीं कर सकुंगी
तेरे चरणों में नित
अपनी शब्द अनुभूतियों से प्रणाम
हां लेकिन तेरा आदेश आत्मा में बसा हैं जँहा रहूँ
लिखती ही रहूंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे राम !
और करती ही रहूंगी मेरी आत्मा में बसी तुम्हारी
मनमोहक श्वेत पीताम्बर धारी ,
गले में बसी उस कोस्तुभ ,
और अधरों पे सजी मुरली को प्रणाम
मेरे वासुदेव !
जिसके ह्रदय में वास हैं
माँ लक्ष्मी जिन चरणों की दासी
में भी बस कर जाऊं उन चरणों की सेवा
मुझ पे कृपा करना इतनी आप
मेरे कृष्णा !
आज इस विदीर्ण मन की पीड़ा जानो तुम
केसे कहू पल -पल खीच रहा मुझे कोई
तुमसे दूर मेरे कान्हा !
में छोड़ जाऊं तेरी सेवा ,पूजा
फिर भी तुम मुझे मत छोड़ना कान्हा !
कभी मत छोड़ना !
सदा अपने कदमो में जगह देना
इस स्वार्थी की विनिती
सुनना आज |
"श्री चरणों में अनुभूति "

सोमवार, 11 जुलाई 2011

कान्हा जी ! तेरी भक्ति का रंग


न रूप , न रंग,
न संसार
में तो रंगी हूँ
कान्हा जी !
आप के ही रंग में सौ बार
तेरी भक्ति का रंग मुझपे ऐसा चड़ा
कोई और रंग अब न चद पाए
अनुभूति

मेरे कृष्णा !धन्य हूँ में !

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
कोटि -कोटि हर भोर में अपनी अखियन के जल से ,
धोती में तुहारे चरणों को करू प्रणाम |
  मेरी आत्मा
मेरे अंतस के स्वामी
आप का स्नेह सागर न होता तो ,
ये अद्भुत भक्ति न होती ,
ये अनोखी आत्मीय आत्म आनंद अनुभूति नहीं होती
ये शब्द न होते,
ये भाव न होते ,

न ही में इस झूठे
भवसागर को पार कर
तेरी आरधना और तपस्या की दुनिया में खो पाती
ये असीम स्नेह आनंद बरसता हैं मुझपे
प्रभु तेरा |
क्या मांगू में तुझसे और कुछ कृष्णा
बिन मांगे तो
ये स्नेह शीर सागर मेरे नाम किये बेठा हैं
में अज्ञानी फिर भी
मुझको तुच्छ जान ,
मेरी अनजानी भूल क्षमा करते रहना
मेरे नीलकंठ!
देना मुझे स्नेह आशीष
तेरे रस्ते की धुल न बन सकू ,
तो कम से कम जिस पथ तुम जाओ कृष्णा
उस पथ तुम्हारे चरणों से जो कुम्हला जाएँ में ऐसा फुल बन जाऊं
में धन्य हूँ! धन्य हूँ! कोटि-कोटि धन्य हूँ!
तुम्हे अपनी आत्मा में पाके |
तुमसा कोई आलौकिक स्नेह
नहीं कृष्णा ,धन्य हूँ में !
श्री चरणों में अनुभूति

रविवार, 10 जुलाई 2011

अपने कृष्णा के चरणों में


 
एक बहुत सुन्दर गीत जिसकी हर रिदम मुझे बचपन से बेहद पसंद हैं
और जब आत्मा अपने कृष्णा के चरणों में डूबी होती हें
 तो इस गीत के सुरों पे नाच उठने का मन करता हैं |
अपने कृष्णा के चरणों में
अर्पित ये गीत
अनुभूति

नयी नवेली दुल्हन

मेरे कृष्णा ! 
 मेरे कोस्तुभ धारी !
 ना कोई सन्देश
 ना कोई उम्मीद ,
 फिर भी सत्य के विशवास के साथ ,
  ये गोरी तोरी  ,
नयी नवेली दुल्हन ,
  आस लगाएं बेठी हैं ,  
काहे छोड़ गए हो तुम ,
उसे तन्हा पल-पल तडपे ,  
अखियन से नीर बहायें ,
  बेसुध सी ये गोरी,
प्रियतम की अपने  आस लगाये बेठी हैं  
करती हैं नयी नवेली प्रियतम का इन्तजार  
 मेरे कन्हियाँ ! केसे समजाऊं उसे

हाथो की मेहँदी का सूर्ख रंग

खनकती चूडिया ,
  पेरो की पायल करती हैं 
तेरा इन्तजार कान्हा !
कहती हैं मुझसे लजाते मेरे कान्हा जी आयंगे ,

अपने असीम स्नेह की खनकती पायल
मुझे पहनाएंगे बना 
चरण की दासी
सदा के लिए करंगे चरणों में ,

ये जीवन अर्पण स्वीकार,
सुनी हैं आँखे तुम बिन उसकी
, सिमटी -सिमटी हैं कान्हा ! 
अपने ही घर में 
  मेरे प्रियतम मोहे लेने आयंगे 
  ये आस लगाये बेठी हैं ये नयी नवेली
हां करती वो अपने कृष्णा का इन्तजार  
ले आत्मा  में सत्य का अक्ष्णु विशवास |  
"श्री चरणों में अनुभूति"

शनिवार, 9 जुलाई 2011

मेरी पहली कविता तुम्हारे लिए

मेरी पहली कविता
तुम्हारे लिए हां सिर्फ तुम्हारे लिए
निगाहें खोजती हैं वो अनजाना सा अपना साया ,
धडकनों को तलाश हैं अपनी सी धडकन की
मेरे करीब तुम यंहा कही नहीं ,
मेरे करीब  तो हैं ये बनावटी लोग बनावटी दुनिया
तुम क्यों दूर चले गए इस अपनत्व और प्यार से ?
अनुभूति

संसार के न्यायाधीश !मेरे कृष्णा !




मेरे कोस्तुभ धारी
सोचता होगा तेरे कदमो में बैठ ,
रोती -रोती में
सदा ही तुझसे कुछ माँगना चाहूँ
ना कृष्णा ! ना
इतनी ओछी नई प्रीत मेरी
तोरी कसम
में दीवानी तुझे अपना जान
भुला बेठी ये झुटा संसार
भक्ति का रस ,ज्ञान का सागर बन
अपनत्व का अमृत बरसाने
वाले तुम हो तो हो मेरे श्याम !
चाहे में पुकार लू तुम्हे अपना मान
मेरे राम !
मेरे श्यामं !
तुने तो इस जीवन में ,
स्नेह का अर्थ बतलाया
नर्क से स्वर्ग का मार्ग दिखाने वाले तुम ही
मेरे राम !
मेरे अंतस के स्वामी बन फुट पड़े हो मेरे रोम-रोम से
जिसने अपने स्वप्नों में ही पा लिया हो
 पिया तेरे स्नेह पाश का मधु
बहती देखि हो अपने लिए
उन अखियन से अश्रु धार
वो क्या मांगे इस संसार की तुच्छ सोगात
मेरे कृष्णा !
तेरी बावरी !
झुकती हैं मिटती हैं एक नहीं लाखो बार
 स्नेह का अंदाजा भी नहीं होगा कभी तुझे
जितना उतना तो में एक पल में कर जाऊं
तुझे नहीं पता कृष्णा !
तेरे अधरों की मुरली सुन में कितनी मुस्काऊं
जी जाऊं ,
जब मेरे निकले प्राण
तो भी मेरी अखियन के सामने हो
तुहारी ये अप्रितम निश्छल धवल छबी तुहारी
जब में खोलूं अखियन सदा देखू
तुहे संसार के सामने हाथ दिखाते
सुदर्शन घुमाते ही पाऊं
मेरे बैकुंठ के स्वामी
संसार के न्यायाधीश !
तेरे आगे संसार झुके
में भी उन्ही चरण में बन धुल तुहारे चरण से लिपट जाऊं
हो सके इस जीवन का उद्धार
बस वो कर इस संसार के मुक्ति में पा जाऊं
अनुभूति

मत छल मोहे कान्हा !


मेरे कृष्णा !
कोनसा रूप मोहे दिखाएँ
तू मुझे छल जाएँ ,
मुझे समझ नहीं आये तेरी लीला
ओ कन्हाई !
क्या कहे मुझे कानो में आके !
तू रो मत में चला तो आया तेरे पास माई
क्यों पुकारे तू मुझे हर बार आंचल को ओट,
क्यों मुझे मेरे आंचल से झाँक -झाँक
तू तरसाए
में बावरी कृष्णा !
मुझे न अब ये अपना मोह दिखा
मत छल मुझे अपने इस आलोकिक स्नेह की माया से
मेने त्यागे सारे ये सुख
काहे तू मुझे इस निर्मोही संसार का मोह जगाये |
नहीं मालुम क्या लिखा लेख तुने कान्हा !
फिर भी अगर विधाता का लेख ,
तो इसे कोंन रोक पायेगा
जिस दिन तू आया इस माँ के आंचल की छाव
सारे संसार से में लड़कर  तुझे नाम अपना दूंगी ,
 हां इस संसार में तू मेरे नाम से पहचाना जाएगा
हां ,कान्हा में वात्सल्य का सागर
में तेरे नाम उंदेल दूंगी
मेरे पास सिर्फ ये ही असीम हें
तू जब आयेगा
जानेगा तेरी माँ सी बावरी दूजी कोई नहीं |
मत छल मोहे कान्हा !
मत छल

श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

मेरे कोस्तुभ धारी ! श्री चरणों में करो स्वीकार अनुभूति का ये चरण वंदन

मेरे माधव !
मेरे गोविन्द !
मेरे कोस्तुभ धारी !
 मेरे मुरली मनोहर !
मेरे राघव !
ये केसी हैं अद्भुत माया !
में नहीं समझ पाऊं ये ,
भोर का कोई स्वप्न या भ्रम !
यूँ बरसे स्नेह सागर तेरा ,
जेसे स्नेह का अमृत
इतना मीठा ,इतना सुखद ,इतना अद्भुत
रूप तुहारा कृष्णा !
रूठो तो जिस्म से जान ले जाओ
और बरसों स्नेह से एक पल में इस निर्धन को
अपने असीम स्नेह का अद्भुत सागर दे जाओ

कृष्णा !
अगर ये स्वप्न कोई सुनहरा तो कभी टूटे ना
यूँ ही बिखरी रहे मोगरे और गुलाबो की भीनी खुशबु
और में तुहारे इन कदमो से

चरणों से लिपटी बहाती रहूँ
ये स्नेह नीर
मेरी आँखों में बसता रहे ,
तेरे चरणों की सेवा का स्नेह नीर 
में मर कर भी मिटा कर अपने को रख सकू
तेर्री इस अनुपम स्नेह आशीष के
वरदान का सम्मान .
जीवित हूँ जब तक तेरी बावरी बन ,
दुनिया यूँ ही भूली रहूँ
तेरी चरण धुली बना के अपने मस्तक का रक्त कुमकुम में

सजती रहूँ ,
हां कृष्णा !
में भी मीरा की तरह लुटा दूँ अपना संसार
तेरे असीम स्नेह में
इतनी अर्चना करना चरणों में स्वीकार
खुले आकाश सा बंधन मुक्त निराकार स्नेह मेरा
में एक सरिता स्नेह की
बह जाने ,
दे अपना अनुराग
जीने का इरादा नहीं
यूँ ही तेरी ही असीम भक्ति में डूब
मिट जाने दे .
हां खो जाने दे कृष्णा ,कोस्तुभ धारी मुझे
उस असीम स्नेह भक्ति सागर में
उन मीठी अनुभूतियों में |
श्री चरणों में करो स्वीकार
अनुभूति का ये चरण वंदन 



 

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................