मानव तन के साथ परमात्मा ने अपने ही अंश के स्वरूप सबको एक पवित्र आत्मा से अलंकृत किया है ,
उन्ही अलंकारों की जीवन अनुभूति है रसात्मिका |
सबकुछ समाप्त होता हैं पर प्रेम यात्रा करता है
अपनी दिव्य चेतना के साथ
इस लोक से परलोक
वही यात्रा है रसात्मिका
बुधवार, 2 नवंबर 2011
विदीर्ण ह्रदय पुकारता हैं तुम्हे
तुम्हारी कही हर बात पत्थर की लकीर क्यों लगती हैं !
संसार चाहे कोई आरोप लगा ले
मेरा अंतस तो सिर्फ तुम जानो हो
इन आँखों से गिरते हर आंसू की पीड़ा
तुम्हे पता हैं ,
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