मंगलवार, 30 अगस्त 2011

MEERA (1979) - Mere to Giridhar Gopal - Hema Malini - Eng/Subs

मेरे तो गिरिधर गोपाल

जीवन का अद्भुत रस आलोकिक अहसास मेरे कृष्णा !

की प्रीत ,ऊनकी चाकरी ये ही हैं जीवन

अनुभूति

MEERA (1979) - Mere to Giridhar Gopal - Hema Malini - Eng/Subs

मेरे तो गिरिधर गोपाल

जीवन का अद्भुत रस आलोकिक अहसास मेरे कृष्णा !

की प्रीत ,ऊनकी चाकरी ये ही हैं जीवन

अनुभूति

MEERA (1979) - Mere to Giridhar Gopal - Hema Malini - Eng/Subs

मेरे तो गिरिधर गोपाल

जीवन का अद्भुत रस आलोकिक अहसास मेरे कृष्णा !

की प्रीत ,ऊनकी चाकरी ये ही हैं जीवन

अनुभूति

मेरे तो गिरिधर गोपाल


मेरे तो गिरिधर गोपाल 
 जीवन का अद्भुत रस आलोकिक अहसास मेरे  कृष्णा !
 की प्रीत ,ऊनकी चाकरी ये ही हैं जीवन
अनुभूति

Meera (1979) - Shayam mane chakar rakhoj - Hema Malini - Eng/Subs

तुम्हरा ही अंश हूँ कोस्तुभ धारी !

मेरे कृष्णा !
तुम से ही मेरा जीवन , 
  बिन कुछ नहीं तन,मन शब्द ,प्राण 
   तुम ही तो जानो सब कुछ मेरे अंतस के स्वामी 
   विधि का हर लेख तुमने ही पडा हैं लिखा हैं मेरे लिए 
    दी जो तुमने मुझे अपना ली हँसते -हँसते ,
  अच्छा ,बुरा प्रेम ,घृणा सब बन्धनों से परे मुक्त हुयी हूँ हां तुम्हरा ही अंश हूँ

   अक्स तुम्हारा ही झलकता हैं मुझमे कोस्तुभ धारी !
    तेरी ही रूह ,
तेरा ही अक्स ,
तुझमे मिलता जा रहा प्रति क्षण मेरे राम !

      न दुःख ,न कोई शोक, न कोई ग्लानी ,अब मन में लाओं 
  मेरे कृष्णा!
     नियति मेरी ये ही ,बस हँस के श्री चरणों में
  स्वीकारो मेरे प्राण !
   श्री चरणों में अनुभूति

सोमवार, 29 अगस्त 2011

मेरी आत्मा की विदीर्ण पुकार

मेरे कृष्णा ! 
मेने देखा इतना साकार रूप तेरा 
पर फिर भी आत्मा करे न विशवास 
की ये तुम कह जाओं मुझे ,

        मेरी आत्मा की विदीर्ण पुकार
 तुम्हे अंतस से कर रही पुकार, 
तुम चाहों पर कुछ न मेरे लिए कर,
     पाओं कम से कम इतनी कटुता के भाव
इस रुदय के छलनी अस्तित्व पे मत लगाओ 
,मेरी आत्मा का रोम -रोम
 ऋणी तुम्हरा मेरे श्याम !
 सदा हैं सदा  रहेगा 
  इन चरणों में शीश झुकता ,
  समर्पित जीवन तुम्हे ये कब से पहुचा दो बस अब मोक्ष के धाम

अनुभूति
 

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अब अंत भी करो ,या खोल दो मेरी मुक्ति के द्वार

विदीर्ण ,विहल ह्रदय करता हैं घनश्याम तेरी पुकार
मेरे कृष्णा !
अब अंत भी करो ,या खोल दो मेरी मुक्ति के द्वार
में रोज गुहार लगाऊ
मेरे गिरिधर गोपाल !
इस स्नेह समंदर के करती हूँ तुझे पुकार
या चला मेरे द्वार
या मुझे ले चल अपने द्वार
दुःख,शोक ,चिंता कुछ नहीं मेरे पास
सुख की आस नहीं कृष्णा
बस अब भी जा मेरी आत्मा के धाम
कर दे अपनी चरण धूलि से
जीवन के इस क्षण -क्षण को
पावन मेरे श्याम !

बुधवार, 24 अगस्त 2011

यही कहती हैं जिन्दगी पुकार के


एक खुबसूरत गीत
में जिन्दगी का साथ निभाता चला गया
सत्य का सामना हँस में करू यही कहती हैं जिन्दगी पुकार के
कुछ मिला ,कुछ खोया
जेसे दिन जिए उधार के
अपना अंतस को ही साथ लिए ही तुमलिए ही जिए जाओं जिन्दगी कहे मुस्कुरा के
अनुभूति

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

आत्मीय आलोकिक आनंद


बादलो की इस घटा से ,
आत्मा का ये प्रतिनिधि उदित हो रहा ,
कह रहा मुझे,
चली आओ प्रिये
में तुम बिन कब से तन्हा रहा रहा
क्यों उलझी होधेर्य और जीवन की आस में शून्य में
सबकी अपनी सरिताए ,जीवन की अलग परिभाषाएं हैं ,
कब तुम समझोगी !
मेरा ही अंश हो प्रिये तुम काहे समझती नहीं
छोड़ चली आओ
मेरे इस साथ के स्वर्णिम
आत्मीय आलोकिक आनंद में
अनुभूति

सोमवार, 22 अगस्त 2011

काजल

मेरे श्याम !
में लगाऊं इन अखियन में काजल तो भी
आत्मा में बसी छबी,
मन की गागर से
झलक जाए इस दर्पण में
और तुम्झे देख अपने से ही लजाऊ

तुम मुझे रूठे भी हो तो कँहा
में तुमसे रूठना सोच भी पाऊं
पैर पकडू तोरे ,
इन काजल भरी अखियन से
नीर बहाती ,तुझे मनाऊ

सब कुछ हैं यंहा तुम बिन भी मेरे कृष्णा ! ,
फिर भी जीवन की एक आहट सुनी पड़ी हैं
तुझसे क्या छिपा हैं
मेरे अंतस के स्वामी
मेरा तो सब कुछ तेरे स्नेह के नाम गिरवी पडा हैं
ये साँसे चलती तो हैं कृष्णा !
पर पायलो की झंकार सुनी पड़ी हैं


अनुभूति

रविवार, 21 अगस्त 2011

ये ही हैं इस जीवन का कर्म योग

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे श्याम !
कहा तुम जन्मे हो!
कँहा तुम अस्त हुए हो !
तुम तो अनवरत मुझमे बहे हो
हां तुम मेरे साथ ही थे न जाने कितने जन्मो से 
अब मिले हो साकार स्वरुप ज्ञान बनकर 
और  
अंधरे से उजाले की और प्रति पल ,
अपने ही अस्तित्व में साथ लिए जा रहे हो तुम मुझे
में धन्य हूँ मेरे कृष्णा !
जो मिले हो ज्ञान और स्नेह सागर के रूप मुझे
नित इन चरणों मे,
अपनी अखियन के श्रद्धा जल से
तुम्हारे उन चरण कमलो में प्रणाम
ये ही हैं इस जीवन का कर्म योग
मिट जाऊं में यूँ ही ,
समा जाऊं में तुझ में ही मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे श्याम !

शनिवार, 20 अगस्त 2011

मेरे खुदा !अपने कदमो में इस धुल को कबूल कर

मेरे खुदा !
तेरी रहमतो का ये अमृत मुझपे यूँ बरसता हैं
इतनि दूर से भी
इस कायनात की हर फिजा से अपनी
चिंता को यूँ बया करता हैं
अल्लाह मुझपे यूँ मेहराबान
होगा अपनी किसमत पे ये भी यकीं था
जो देखा अहसास में फूटा ये दर्द
तो जाना हैं तेरी वफाओं
में बसी खुदाई को
तेरे कदमो में बैठ के इन आँखों से बरसती हैं
तेरी ही रूह की चांदनी
मेरे खुदा !
अपने कदमो में इस धुल को कबूल कर

अनुभूति


शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

में मुक्त पवन हूँ!

मेरे कृष्णा !
तुम भी हो हठी ,तो में भी हूँ हठी
सब कुछ सिखा मेने तुझसे ही कृष्णा !
तुझ से सिखा तुझे पुकारना
लड़ना ,झगड़ना
और स्नेह सागर इस जीवन का
तुम काहे विचलित हो मुझे ऐसे देख ,
काहे घबराओं अपनी ही आत्मा के सत्य से

तुमसे ही सिखा सत्य परेशान हो जाए पर पराजित नहीं ,
जो दिया तुमने दिया ,मेने हँस के इन होठो पे सजा लिया
फिर काहे की चिंता मेरे श्याम !
तुम ही कहो पुकारो मुझे ,जब तुम बसे इन अखियन में
तो फिर क्यों डर म्रत्यु का इस संसार का
में मुक्त ,तुम भी मुक्त फिर काहे की चिंता
एक दुसरे में समाये हैं हम दोनों
मेने किया हैं सब कुछ अर्पण से
मेरा हर दुःख, कष्ट, सुख, खुशी,
तुम ही हो मेरे कृष्णा !
इस संसार सी झूटे सारे बन्धनों से मुक्त हो पाया हैं मेने तुम्हे अंतस में
    मेरे श्याम !
      मुझे डर नहीं तनिक खोने,मिलने बिछड़ने का
        स्वार्थ नहीं रिश्तो का
          में मुक्त पवन हूँक्रमिक सूची
            जो बहे बन के जीवन की सुरभि
              इस अंत हीन संसार में
                में मुक्त हूँ मुझे मुक्त ही रहने दो बांधो किस बंधन में
                  रह जाने दो बन के खुशबु जीवन के आँगन में !





                    गुरुवार, 18 अगस्त 2011

                    रूठी हुयी जिन्दगीकी खूबसूरती


                    सोचा नहीं था रूठी हुयी जिन्दगी भी कभी इतनी खुबसूरत दिखाई देती हैं
                    मेने तुझे देखा तो ये जाना ,की तेरी कायनात की खूबसूरती यूँ बयानी होती हैं |

                    मिलो दूर के फासलों पे जब तुम्हारे लबो पे खिलती ये मुस्कराहट की सदा सुनाई देती हैं
                    तुम्हे क्या पता .बिना पायलो की भी इन कदमो में पायलो की आहट सुनाई देती हैं |


                    मेंजानती हूँ दूर बेठे कही तुम सोच के कही मुझे अपने अंतस से मुस्कुराते होगे
                    झनक हैं ये मेरी पायलो की फिर भी दुनिया की नजरो से इसे छिपाते होगे


                    अनुभूति

                    मै ज़िंदा हूँ

                    आज हर तरफ जिन्दगी की सदा सुनाई देती है
                    मै ज़िंदा हूँ हर तरफ ये आवाज अपने ही अंतस से सुनाई देती हैं
                    तेरी बेवफाई में कही -कही खुदाई दिखाई देती हैं
                    किसी को कह के खुदा कोई दिल खुदा नहीं माना करता
                    खुदाई तो रूह में साफ़ दिखाई देती हैं
                    फर्क इतना हैं देखने वाले को पत्थर में भी खुदा दिखा करता हैं
                    बात ये तेरी मेरी रूह हैं की हैं तो रोक सके,
                    तो रोक ले मुझे मेरी हर सास में अपना खुदा दिखाई देता हैं |
                    रुहों पे कँहा किसी की हुकूमत हुयी हैं
                    जिन्दगी ने जब से जीना सिखा तेरी हर बात में खुदाई बसी हुयी देखि हैं
                    तेरे कदमो की इबादत के सिवा कँहा कोई इबादत मेने सीखी
                    में तो वो हूँ जेसा तुझे देखा जाना ,तुझसे ही ये इबादत सीखी
                    मेरी जिन्दगी हैं तेरी इबादत में ही आबाद
                    मेने कँहा दूसरी कुरान की कोई आयत सीखी
                    तेरी
                    कड़वाहट भी शहद से मीठी फर्क इतना हैं
                    तुमने कभी इस मीठास को चखा ही नहीं
                    तुझे क्या पता इस कडवाहट में भी
                    तेरी पाकीजा रूह का अक्स मेरे नाम से झलकता हैं |
                    अनुभूति

                    रविवार, 14 अगस्त 2011

                    क्या करू तुझपे न्योछावर !मेरे कृष्णा !




                    मेरे कृष्णा !
                    जब से समाई हैं इस आत्मा में वो धवल मूरत तुहारी
                    में खोयी सलोने तेरी मीठी मुरली में
                    सोचती हूँ, देखती हूँ तो इन आँखों से बहती हैं तेरी प्रीत अनोखी
                    कही मेरी ही नजर न लग जाए
                    मेरे कान्हा तोहे
                    ये सोच के जी भर भी देख नहीं पाती में श्याम
                    क्या दू तोरी स्नेहिल आत्मा के सदके में
                    मेरी साँसों पे, जीवन के हर एहसास, पे तोरी तो हुकूमत हैं
                    फिर क्या करू तुझपे न्योछावर !
                    ये सोच -सोच के ही में मरी जाऊं
                    मेरे कृष्णा !
                    सब कुछ तेरा तुझको अर्पण किया इस बावरी ने
                    कुछ नहीं मेरा ,
                    जानती हूँ दुनिया मुझे कहे पगली
                    पर श्याम मेरे तुम न कहो मुझे
                    पगली ,
                    हां मेरे श्याम तुम आये थे
                    भीष्म के संद्शे पे भी आओगे एक दिन
                    जब में भी हो जाउंगी भीष्म की तरह अपने रोम -रोम से छलनी
                    और ले जाओगे अपने साथ
                    अपनी इस बावरी चरण दासी को
                    अपने बैकुंठ
                    कर दोगे मुझे इस संसार के मिथ्या भ्रमो से मुक्त
                    दोगे मेरी प्रीत को नया नाम
                    इसीलिए तो में बलिहारी कान्हा तुझपे
                    मेरे श्याम !
                    मेरे मुरलीधर !
                    श्री चरणों में अनुभूति


                    Guru-Tere Bina




                    only for my loard ramaa
                    anubhuti

                    शनिवार, 13 अगस्त 2011

                    मेरे कान्हा जी ! प्यारी बहन सुभद्रा की स्नेह डोर

                    मेरे कान्हा जी !
                    आज तो तुम्हारी कलाई पर भी बाँधी जायेगी
                    प्यारी बहन सुभद्रा की स्नेह डोर
                    मेरे कृष्णा!
                    जीवन के सारे रूपों में
                    में बन्धनों में
                    में कितने सरल स्नेह सागर हो तुम
                    तुम्हारी आँखों से बरसती हैं
                    बहन सुभद्रा और जाने कितनी बहनों के लिए
                    भी अनन्य स्नेह ,वात्सल्य और स्नेहिल प्रीत ,
                    एक ही पल में ले लेते हो तुम सारी बलाएँ
                    अपने सर और दे देते हो
                    जीवन भर का वात्सल्य और स्नेह आशीष !


                    मेरे कृष्णा ! मेरे कोस्तुभ धारी !
                    में धन्य हूँ जिसने पायी हैं
                    तेरी चरण सेवा
                    तेरी हुकूमत और तेरे दासत्व की तक़दीर
                    बस ,इन अखियन से ,
                    इस आत्मा के नैनों से में महसूस करती रहूँ
                    सदा तेरी अनमोल प्रीत
                    हां संसार को बँटती वो तेरी वात्सल्य प्रीत !
                    अनुभूति

                    मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,मेरे कृष्णा !

                    अंधरे के बाद इस उदित होते इस
                    स्वर्णिम सूर्य की छटा हो तुम ,
                    मेरे कृष्णा !
                    मैं खोज रही थी ,
                    मिथ्या माटी के बुतों में तुम्हारा साकार रूप ,
                    पर तुम तो अनंत हो ,
                    दे जाते हो अपनी ही छाया तुम कभी -कभी दूसरों को
                    जगत की इस मिथ्या से दूर में पा जाती हूँ
                    एक मासूम बच्चे की निश्चल मुस्कराहट में
                    मुस्कुराते हुए तुम्हे कान्हा !
                    कितना अनुपम ,सरल रूप सलोना
                    तुम्हारा मेरे कृष्णा !
                    तुम्हारी छबी में खोजा करती थी ,
                    छायाओं में .परछाइयों में
                    पर तुम मुझे मिले हो मुझे हो साकार
                    इस उदित स्वर्णिम सूर्य की गहराइयों में
                    अंधरे के बाद का ये उजाला
                    मुझे एक दिन ले आयेगा तुम्हारे ही अंनत आकाश में ,
                    मेरा प्रणव ,
                    अंतिम सत्य
                    मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,
                    में खुश हूँ प्रति पल ,
                    तुम तक जो बदती चलती हूँ
                    तुम्हारा ही अस्तित्व हूँ
                    और पल-पल तुममे ही खोती चलती हूँ
                    तुममे मेरे कृष्णा !
                    श्री चरणों में अनुभूति