बिन कहे भी सब कुछ कह जाते हो तुम
मेरे आस पास आकर हर अहसास को केसे छु जाते हो तुम |
नहीं मालूम तुमसे रिश्ता क्या हैं मेरा ?
नीत अपने शब्दों से क्यों ?जीने को मजबूर कराते हो तुम |
तुम जानो ,मै जानू हर शब्द के अहसास को
फिर क्यों शब्दों मै उलझाकर रुलाते हो तुम ?
तुम जानो पल पल तुम्हारे शब्दों के अहसासों को समझू मै
क्यों दूर रह फिर छल जाते हो तुम ?
मै एक टूटी कश्ती जिसका नहीं कोई मंजिल अब ,
फिर क्यों एक बार फिर जीवन के ख्वाब दिखाते तुम ?
मिलो के फासले पर भी रूह मै समाया है तुम्हारा हर अहसास
ये समझ कर भी क्यों तडपाते हो तुम ?
मेरे पास नहीं तुम्हारी तरह जीवन के ज्ञान का सागर
मेरे पास तो हैं बस दर्द की सरिता
मेरे मन के मानस क़हा खोजू तुम को
तुम्हारी विशालता का कोई आदि हैं अंत
क्या कभी खोज पाउगी तुमको ?
पा सकुगी तुमको नहीं मालुम
फिर भी दिवानो की तरह हर शब्द मै खोजती हूँ तुमको
जानती हूँ ,कहो ना कहो मेरी तरह तुम भी हर पल खोज रहे हो मुझको तुम
केसे कहू ?
मेरे हर अहसास मै हो तुम हां तुम
शनिवार, 29 मई 2010
गुरुवार, 27 मई 2010
एक सपना और एक सच
बुनती ही आ रही थी आँखे एक सपना
हां ,एक सपना दुल्हन बनने का .
बनी भी दुल्हन ,पर जिन्दगी और समझोतों की दुल्हन
वो दिन ना मेरी आँखों मै ख़ुशी थी ,ना कोई उमंग
लगता था ,सरिता के प्रवाह मै ये भी एक टापू हैं |
सब कुछ तो जल गया था उसमे ,कही नहीं थी ,
मासूम सी चूडियो की खनक ,ना मेहंदी की खुशबु
सब कुछ होकर भी शून्य था |
बुनती ही आ रही थी आँखे एक सपना
हां ,एक सपना दुल्हन बनने का .
बनी भी दुल्हन ,पर जिन्दगी और समझोतों की दुल्हन
वो दिन ना मेरी आँखों मै ख़ुशी थी ,ना कोई उमंग
लगता था ,सरिता के प्रवाह मै ये भी एक टापू हैं |
सब कुछ तो जल गया था उसमे ,कही नहीं थी ,
मासूम सी चूडियो की खनक ,ना मेहंदी की खुशबु
सब कुछ होकर भी शून्य था |
शनिवार, 22 मई 2010
तलाश
मन ढूंढ़ रहा हैं कही तुम्हारे शब्दों को
अधूरे पड़े सवालो के जवाब देने वाले तुम क़हा हो ?
बैचेन हूँ मै , मेरी आत्मा
खामोशी से कही ना कही कुछ चल रहा है रूहों मै
मै भी हूँ इससे बाबस्ता और तुम भी
फिर क्यों छिपे बेठे हो यूं तुम पर्दों के पीछे ?
जहा भी हो जवाब दो
मेरे शब्द तुम्हारे शब्दों के अपनत्व को खोज रहे हैं
बिना किसी स्वार्थ के
बिना कुछ जाने ,पहचाने
इतना जानती हूँ रूह रूह को खोज रही हैं |
मन ढूंढ़ रहा हैं कही तुम्हारे शब्दों को
अधूरे पड़े सवालो के जवाब देने वाले तुम क़हा हो ?
बैचेन हूँ मै , मेरी आत्मा
खामोशी से कही ना कही कुछ चल रहा है रूहों मै
मै भी हूँ इससे बाबस्ता और तुम भी
फिर क्यों छिपे बेठे हो यूं तुम पर्दों के पीछे ?
जहा भी हो जवाब दो
मेरे शब्द तुम्हारे शब्दों के अपनत्व को खोज रहे हैं
बिना किसी स्वार्थ के
बिना कुछ जाने ,पहचाने
इतना जानती हूँ रूह रूह को खोज रही हैं |
गुरुवार, 20 मई 2010
जब होती हूँ तनहा मै तब अक्सर साथ होते हो तुमशांत बहती सरिता के साथ - साथ चल रही होती हूँ मै
और गुनगुना रही होती हूँ और तुम आकर अपने शब्दों से बाणों से
मुझको करदेते हो विचलित |
मै तुम्हारे साथ बैठ कर गुनगुना ना चाहती हूँ ,कभी ना हल होने वाली जीवन की पहेलियों को
मै जानती हूँ ,तुम मेरे हर अहसास को समझ सकते हो ,
और मेरी ही तरह बैचेन हो कही ,
मुझमे भी कही कुछ टूट रहा है पर सब कुछ समेट कर फिर भी सरिता के साथ बही जा रही हूँ मै
किस उलझन मै हो तुम ,नहीं मालुम
हां ,लेकिन बहुत करीब महसूस करती हूँ तुमको अपने जब तनहा होती हूँ
और जब भीड़ मै होती हूँ तो कही कुछ ढूंढ़ रही होती हूँ
झूठे लगते है रिश्ते सारे ,स्वार्थ से भरे पड़े हैं सब यंहा
और मै खो जाती हूँ उसी तन्हाई मै जहा मै कभी तनहा नहीं होती
उम्र का अनुभव नहीं मेरे पास ,बस अहसासों की रूह तक समझ है
इसीलिए रूह बैचेन हैं कही रूह के लिए |
मंगलवार, 18 मई 2010
एक शाम गंगा के किनारे बेठे मै ढूंढ़ रही थी
उसका अंत ?
क़हा है नहीं मालुम मुझको भी ,
हां लेकिन मै महसूस कर रही थी तुमको
ढूंढ़ रही थी उसके निर्मल जल मै तुम्हारा अस्तित्व
क़हा हो तुम मेरेमन ,मेरे अहसासों को रूह मै उतरकर
समझने वाले "...................."
कही नहीं हो मेरे पास यंहा इस निर्मल जल के किनारे तुम
इस पावन सरिता की तरह ही तो निर्मल है तुम्हरा मन
फिर भी क्यों नहीं दिख रहा इस पवन जल मै तुम्हरा अस्तित्व |
सोचती हूँ जीवन का कोन सा सवेरा होगा
जब इसी पावन गंगा के किनारे हम साथ होंगे और मै बड़ी शांत होकर
तुम्हारे काँधे पे रखकर सर इस प्रवाह को तुम्हारी आँखों से महसूस कर रही हुंगी !
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
बच्ची
एक भरे पुरे परिवार मै अपने एक बड़े भाई और छोटी बहन के साथ एक माध्यम वर्गीय परिवार मै रहने वाली लड़की रीन
पिता एक सरकारी कर्मचारी माँ एक साधरण घरेलू महिला|
.रीना अपनी उम्र के पच्चीस बसंत पार कर इन्तजार कर रही है अपने मन के सपनो के सोदागर का ,पर अभी जब भी कोई रिश्ता घर मै आता है माँ कहती है अभी तो रीना एम .बी ए करेगी अभी क़हा से शादी अभी तो हमारी बच्ची पद रही है साहब |
इसी तरह तेविस से पच्चीस सालगुजर गये ,अपने मन के आँगन मै वो सपने बुनती रही और माँ और पिता उसे पदाते रहे |
धीरे धीरे उसके सपने दम तोड़ते रहे और वो लोक लाज और मरियादा मै बंधी कभी अपने माँ और पिता को कह ही नहीं सकी की मुझको शादी करनी है |
साथ की सहेलियां सुसराल जाती रही ,क्योकि रीना पड़ने मै बहुत अच्छी थी उसकी भावनाओं को कभी समझा ही नहीं गया |घंटो अकेले मै वो रोती रही ,उदास गीतों मै अपने सपनो को सोचती रही |
किसी ने सोचा भी नहीं की अब बच्ची बड़ी हो गयी है और अब वो क्या चाहती हैं |उसकी हसरतो और अरमानो की कोई कीमत नही थीउसके माँ पिता के सामने |
आज एम .बी.ए का रिजल्ट आया और वो पास हो गयी |आज वो बेहद खुश थी क्योकि आज वो बड़ी होने वाली थी बेहद खुश
लहराते हुए अपने सपनो के सोदागर को बस अब अपने बेहद करीब ही महसूस कर रही थी ,आज सारी दुनिया उसके कदमो मै थी |घर आकर उसने अपना परिणाम दिखाया ,तो माँ ने क़हा अब तो रीना की जाओं किसी भी बड़ी जगहलग जायेगी एक पल को रीना को लगा ,क्या माँ कभी ये महसूस नहीं करेगी की मै बड़ी होगी हूँ और अब सत्ताविस साल की भी ?
लेकिन रीना एक साधरण लड़की थी कभी कह ना सकी की वो क्या चाहती है ?माँ के आदेश के साथ हो जॉब के लिए आवेदन किया गया .और रीना को जॉब लग गयी |वही उसकी मुलाक़ात अपने साथ के सुनील से हुई ,दोनों नजदीक आनेलागे |
एक दिन दोनों ने एक दुसरे के सामने अपने मन की बातो का इजाहर किया |और तय हुआ की वो शादी करेगे एक दिन सुनील रीना के घर पहुचा और उसके माँ बाबा से बात की जवाब मिला अभी तो रीना बच्ची है वो शादी केसे करगी ,अभी तो उसकी छोटी बहन पद ही रही है ,भाई इंजिनयरिंग कर रहा है ......
.......................अभी तो रीना को नोकरी करना है |रीना सुनील के सामने बैठकर सब सुन रही थी ,बिना कुछ कहे वो अन्दर चली गयी और ऑफिस जाने के लिए तेयार होने लगी ...............................
जीवन चलता रहा रीना काम करती रही ,और अपने सपनो को सपनो मै ही देखतीही रही ..............क्योकि अभी तो रीना बच्ची है ,,,,,,,,,,,,,.?
एक भरे पुरे परिवार मै अपने एक बड़े भाई और छोटी बहन के साथ एक माध्यम वर्गीय परिवार मै रहने वाली लड़की रीन
पिता एक सरकारी कर्मचारी माँ एक साधरण घरेलू महिला|
.रीना अपनी उम्र के पच्चीस बसंत पार कर इन्तजार कर रही है अपने मन के सपनो के सोदागर का ,पर अभी जब भी कोई रिश्ता घर मै आता है माँ कहती है अभी तो रीना एम .बी ए करेगी अभी क़हा से शादी अभी तो हमारी बच्ची पद रही है साहब |
इसी तरह तेविस से पच्चीस सालगुजर गये ,अपने मन के आँगन मै वो सपने बुनती रही और माँ और पिता उसे पदाते रहे |
धीरे धीरे उसके सपने दम तोड़ते रहे और वो लोक लाज और मरियादा मै बंधी कभी अपने माँ और पिता को कह ही नहीं सकी की मुझको शादी करनी है |
साथ की सहेलियां सुसराल जाती रही ,क्योकि रीना पड़ने मै बहुत अच्छी थी उसकी भावनाओं को कभी समझा ही नहीं गया |घंटो अकेले मै वो रोती रही ,उदास गीतों मै अपने सपनो को सोचती रही |
किसी ने सोचा भी नहीं की अब बच्ची बड़ी हो गयी है और अब वो क्या चाहती हैं |उसकी हसरतो और अरमानो की कोई कीमत नही थीउसके माँ पिता के सामने |
आज एम .बी.ए का रिजल्ट आया और वो पास हो गयी |आज वो बेहद खुश थी क्योकि आज वो बड़ी होने वाली थी बेहद खुश
लहराते हुए अपने सपनो के सोदागर को बस अब अपने बेहद करीब ही महसूस कर रही थी ,आज सारी दुनिया उसके कदमो मै थी |घर आकर उसने अपना परिणाम दिखाया ,तो माँ ने क़हा अब तो रीना की जाओं किसी भी बड़ी जगहलग जायेगी एक पल को रीना को लगा ,क्या माँ कभी ये महसूस नहीं करेगी की मै बड़ी होगी हूँ और अब सत्ताविस साल की भी ?
लेकिन रीना एक साधरण लड़की थी कभी कह ना सकी की वो क्या चाहती है ?माँ के आदेश के साथ हो जॉब के लिए आवेदन किया गया .और रीना को जॉब लग गयी |वही उसकी मुलाक़ात अपने साथ के सुनील से हुई ,दोनों नजदीक आनेलागे |
एक दिन दोनों ने एक दुसरे के सामने अपने मन की बातो का इजाहर किया |और तय हुआ की वो शादी करेगे एक दिन सुनील रीना के घर पहुचा और उसके माँ बाबा से बात की जवाब मिला अभी तो रीना बच्ची है वो शादी केसे करगी ,अभी तो उसकी छोटी बहन पद ही रही है ,भाई इंजिनयरिंग कर रहा है ......
.......................अभी तो रीना को नोकरी करना है |रीना सुनील के सामने बैठकर सब सुन रही थी ,बिना कुछ कहे वो अन्दर चली गयी और ऑफिस जाने के लिए तेयार होने लगी ...............................
जीवन चलता रहा रीना काम करती रही ,और अपने सपनो को सपनो मै ही देखतीही रही ..............क्योकि अभी तो रीना बच्ची है ,,,,,,,,,,,,,.?
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
सोचती हूँ कब तक जीती ही रहेगी दुसरो के लिए औरत ,
कब अंत होगा उसके समर्पण का ?
कब लह लहा उठंगे उसके सपने, आँखों से बाहर आकर ?
अपनी आँखों को बंद किये क्यों इन्तजार करती हूँ सपनो के लह लहाने का ?
और सोचती हूँ
इसी सब्र और इन्तजार का दुसरा नाम ईश्वर ने औरत रखा होगा
हां ,बचपन से उम्र के आंखरी पल तक वो सपनो के साथ ही दम तोड़ देती है ,
क्यों ?
हर बार ये सवाल मन को भेद जाता हैं ?
इतनी वेदनाये क्यों उसी के जीवन का हिस्सा है?
इन ही सवालों से द्वंदों से लड़ते हुए आँख लग जाती है और फिर मै देखने लगती हूँ कभी ना पुरे होने वाला एक सपना |
एक आदत सी हो गयी है अपने सपनो से लड़ने की ,
हर बार टूटने के लिए ही मेरे सपने बने होते है
जानती हूँ ,पर फिर भी जीने की एक आस संजो लेती हूँ |
सोचरही हूँ कितना मुश्किल हो गया है न जीना
फिर भी इन के बहाने एक रास्ता निकाल लेती हूँ |
हर बार कोई न कोई कदमो मे आकर मांग ही लेता है कुर्बानी
मुझसे अपने सपनो की ,
माँ ,बेटी ,बहु या पत्नी बनकर भूलना ही होता होता है अपने सपनो को
कब तक चलती ही रहेगी ये अग्नि परिक्षाए |
सोमवार, 29 मार्च 2010
एक ख्याल ही बन कर रहगए, तुम
मेरे सपनो के सोदागर
आज भी तेरता है एक सपना मेरी आँखों मै
तुम नहीं मिले मुझको ,इसलिए मेरे आँखों की नमी ने ज़िंदा रखा है उस सपनो से सोदागर को
मेरी तेरती आँखों मै
कहाँ हो तुम ?
आज भी इन्तजार है मेरी रूह मै बसने वाली सोलह साल की दीवानी को तुम्हारा
की तुम हर उसके हर अहसास को पद लोगे ,
समझ लोगे उसकी हर मुश्किल को
तुम नहीं खेलोगे उसके अहसासों से ,
क्योकि मेरे सपनो के सोदागर तुम तो पुरे इंसान होंगे ,
कब आओगे तुम?
और मुझको मुक्त करोगे जीवन की इन विडम्बनाओ से
अब तो आँखों की नमी भी कम होने लगी है
और उसकी जगह आंसुओ ने ले ली हैं
अब तो तुम बूंद बूंद बन कर इन आंखो से बहे जा रहे हो !
अब तो चले आओ
कही ऐसा ना हो की ये नमी भी सुख जाए
सुखी सरिता की तरह
चले आओ अब तो मेरे सपनो के सोदागर
चले आओ |
तुम और तुम्हारी आहटे,
मन के सारे दरवाजे खोल देती है
और
जी उठती हूँ मै एक बार फिर ,
खिलखिलाकर मुस्कुरा देता है जीवन
तुम्हारी आहटोको करीब पाकर .
मिलो के फासलों पे भी तुम्हारी खुशबू
मुझको विचलित कर देती है
अच्छा ,बुरा साथ और दुरी इन सब से दूर आ चुकी हूँ मै ,
तुम्हारे साथ चलते चलते इस अनजान डगर पे
और
अब कोई डर नहीं मुझको ,
क्योकि अब साथ हो तुम मेरे
याने खुद खुदा चला आया है मुझको थामने
और
मै बे खोफ बड़ चली हूँ तुम्हारी आहटो के करीब
क्योकि मै जानती हूँ
मेरे मन के मानस तुम ही दोगे मुझको अस्तित्व
तुम्हारी पत्नी .प्रेमिका ,या मीरा का स्नेह नहीं मेरे मन मै
मै तो एक खुली और साफ़ हवा के झोके की तरह
तुम्हे अपनी मुस्कुराहट
देना चाहती हूँ ,सदा की तरह ही |
सोमवार, 22 मार्च 2010
मेरे मन के मानस
ख्वाब हो तुम
मेरे मन के मानस
हकीकत की दुनिया से दूर तुम बसे हो ख्वाबो के गलियारों मै
हर पल महसूस करती हूँ मै तुम्हे अपने आँगन मै
चहल कदमी करते हुए ,अपने गमलो मै लगे पोधो के करीब |
हां मै सिमट जाना चाहती हूँ ,धरती की हरियाली मै
और रेगिस्तान के कांटो की चुभन मै
क्योकि मेरे लिए वो काटे भी तुम्हारे कोमल स्पर्श की तरह ही है|
मेरे मन के मानस ,तुम बहुत ही सरल हो
बिलकुल इस धरती की तरह ही ,
तुम्हारे शब्दों मै वही ठंडी बयार की शीतलता है ,
जो जलते जीवन को शीतल कर देती है |
बहत करीब पाती हूँ तुमको मेरे मन के मानस
तुम्हारा हर शब्द ,सुबह की ताजगी और साँसों से भरा होता है |
जब मै बेठी होती हूँ अपने झूले पर
,तुम्हारा साया मेरे आँचल को छूकर मेरी साँसों मै कई तूफ़ान जगा देता है ,
और तुम खमोशी से अपनी ही दुनिया मै डूबे ,बाते करते हो इन हवाओ से ,
फूलो से और डालो पर बेठे पंछियों से |
मेरे मन का पंछी
दूर से ही तुम्हारे कदमो की आह्ट पाकर चहकता रहता हैं |
क्योकि जानती हूँ मै एक ख्वाब हो तुम
मेरे मन के मानस |
मेरे मन के मानस
हकीकत की दुनिया से दूर तुम बसे हो ख्वाबो के गलियारों मै
हर पल महसूस करती हूँ मै तुम्हे अपने आँगन मै
चहल कदमी करते हुए ,अपने गमलो मै लगे पोधो के करीब |
हां मै सिमट जाना चाहती हूँ ,धरती की हरियाली मै
और रेगिस्तान के कांटो की चुभन मै
क्योकि मेरे लिए वो काटे भी तुम्हारे कोमल स्पर्श की तरह ही है|
मेरे मन के मानस ,तुम बहुत ही सरल हो
बिलकुल इस धरती की तरह ही ,
तुम्हारे शब्दों मै वही ठंडी बयार की शीतलता है ,
जो जलते जीवन को शीतल कर देती है |
बहत करीब पाती हूँ तुमको मेरे मन के मानस
तुम्हारा हर शब्द ,सुबह की ताजगी और साँसों से भरा होता है |
जब मै बेठी होती हूँ अपने झूले पर
,तुम्हारा साया मेरे आँचल को छूकर मेरी साँसों मै कई तूफ़ान जगा देता है ,
और तुम खमोशी से अपनी ही दुनिया मै डूबे ,बाते करते हो इन हवाओ से ,
फूलो से और डालो पर बेठे पंछियों से |
मेरे मन का पंछी
दूर से ही तुम्हारे कदमो की आह्ट पाकर चहकता रहता हैं |
क्योकि जानती हूँ मै एक ख्वाब हो तुम
मेरे मन के मानस |
शनिवार, 6 मार्च 2010
एक कविता तुम्हारे नाम
वो कहते है मुझसे की मुझ पर भी तुम एक कविता लिखो
हां ,कविता हसी आती है मुझको उनकी इसी बात पर
कविता केसे कहू तुमपर ?,
तुम तो वो जलता दिया हो जिसकी रौशनी हु मै
जानती हूँ मै तुम्हारी ही रौशनी हूँ
और तुम ही तो हूँ वो जिसने खुद जलकर दिया है मुझको जीवन
क्या लिखू कविता अपने अस्तित्व पर ?
हां तुम्ही ने तो दिया है सरिता को अस्तित्व
तुम्ही ने तो दिया है एक सपना
सरिता को अपने सागर से मिलने का
हां तुम ही तो हो वो ज्ञान का सागर
जिसकी तलाश मै भटक रही है सरिता
हां तुम ही तो हो मेरी इच्छाओ का अनंत आकाश ,
मेरे ख्यालो की ताबीर
क्या लिखू कविता अपने ही अस्तित्व पर ?
फिर भी तुम कहते हो की मै तुम पर भी एक कविता लिखू !
क्या कहू तुमसे ?जब सामने होती हूँ तो शब्द को कमी हो जाती है
मेरे शब्द कोष मै ,और मै पागलो सी भटक जाती हूँ
अनजान डगर पर ,
और तुम अचानक ही , मुझको खीच लाते हो मजाक ही मजाक मै
एक हनी खाब की ताबीर की और.
वो सरिता के किनारे को तुम्हारा साथ
बड़ा अच्छा लगता है |
इस झूटी दुनिया से कही दूर सच का सामना करने की ताकत
देते है मुझको तुम्हारे ये शब्द
और तुम कहते हो की मै एक कविता तुम पर भी लिखू ?
वो कहते है मुझसे की मुझ पर भी तुम एक कविता लिखो
हां ,कविता हसी आती है मुझको उनकी इसी बात पर
कविता केसे कहू तुमपर ?,
तुम तो वो जलता दिया हो जिसकी रौशनी हु मै
जानती हूँ मै तुम्हारी ही रौशनी हूँ
और तुम ही तो हूँ वो जिसने खुद जलकर दिया है मुझको जीवन
क्या लिखू कविता अपने अस्तित्व पर ?
हां तुम्ही ने तो दिया है सरिता को अस्तित्व
तुम्ही ने तो दिया है एक सपना
सरिता को अपने सागर से मिलने का
हां तुम ही तो हो वो ज्ञान का सागर
जिसकी तलाश मै भटक रही है सरिता
हां तुम ही तो हो मेरी इच्छाओ का अनंत आकाश ,
मेरे ख्यालो की ताबीर
क्या लिखू कविता अपने ही अस्तित्व पर ?
फिर भी तुम कहते हो की मै तुम पर भी एक कविता लिखू !
क्या कहू तुमसे ?जब सामने होती हूँ तो शब्द को कमी हो जाती है
मेरे शब्द कोष मै ,और मै पागलो सी भटक जाती हूँ
अनजान डगर पर ,
और तुम अचानक ही , मुझको खीच लाते हो मजाक ही मजाक मै
एक हनी खाब की ताबीर की और.
वो सरिता के किनारे को तुम्हारा साथ
बड़ा अच्छा लगता है |
इस झूटी दुनिया से कही दूर सच का सामना करने की ताकत
देते है मुझको तुम्हारे ये शब्द
और तुम कहते हो की मै एक कविता तुम पर भी लिखू ?
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तेरी तलाश
निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................

