बुधवार, 2 नवंबर 2011

मेरी सजा




मेरे कृष्णा !
मेरा रोम -रोम तडपता हैं ,
मेरी आँहो में ही तू बसता हैं
केसे कहूँ !
मेरे माधव !
मेरे राम !
में मिट जाउंगी यूँ ही रोते -रोते
और तू अपनी शहंशाही को देखा करना
मेरी सजाओं में अगर यूँ ही मरना हैं
तो मुझे तेरे आदेश की तरह हंस के ये हर सजा कबूल हैं
हां मीटी हूँ तेरे ही आदेश पे मिट जाउंगी
हां एक दिन तो ये होगा कभी शायद तुझे सामने कभी साकार पाऊँगी
श्री चरणों में अनुभूति

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

रसात्मिका



रसात्मिका

तेरी पनाहों में जिंदगी दर्द भूल जाती हैं ,

दे जाती हैं कुछ पल अमिट स्मृतियों को

मैं आत्म विभोर हूं .....................

तेरी रहमतों से मेरे माधव !

तेरी इन सुकून भरी स्नेह की चांदनी में

में खिलती हूं जो चाँद खिला हो अमावस

तुम्हारा असीम स्नेह फूटता रहता हैं मेरी रूह से

इस आत्मा से निकले शब्दों से ......................

हां ,इसीलिए तो हूं

और तुम कहते हो मुझे रसात्मिका

मैं हूं !

तुम्हारी रसात्मिका ......................................

श्री चरणों में अनुभूति

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

में रूठी हूँ तुझसे ही आज


मेरे कृष्णा !
में रूठी हूँ तुझसे ही आज ....
सब कुछ एक ही पल में छीन लिया तुमने मुझसे
मेरी आत्मा ,मेरे शब्द ,मेरे अहसास ,
मेरा स्नेह सागर
मेरी आत्म आनंद अनुभूतियाँ ...............
फिर भी जाने क्यों लगता हैं मुझे
सुन रहे हो मुझे ,देख रहे हो
महसूस कर रहे हो मेरी हर पीड़ा को
और धडक रहे हो मुझमे ही .............
चीर दिया हैं तुमने मेरी आत्मा का अंतस
अब इन आखो से अश्क नहीं ,दर्द फूटता हैं
और पल -पल तुम्हारे कदमो पे गिरता हुआ
तुम्हे पुकारता हैं मेरे माधव ......................
जीवन का कोनसा रूप दिखा रहे हो तुम ,
कोनसी नयी सीख दे रहे हो
मुझे मेरे श्याम ......
मेरे कोस्तुभ धारी रूठी हैं तुमसे आज
तुम्हारी ये बावरी,पुकारती है तुम्हे
चले आओ मेरे माधव ............
अनुभूति




तुम याद आते हो !


ढलते हैं अश्क इन आँखों से,
जब तुम्हारे कदमो पे
मुझे तुम याद आते हो ,
इस दुनिया से जुदा हो तुम ,
जाने क्यों अहसास दिला जाते हो
तुम कहते थे
मुझे मेरे शब्दों में मेरी आत्मा फूटती हैं
नहीं इन से तुम फुट पड़ते हो
हां जब मेरा अंतस चीर जाता हैं
जब तुम याद आते हो
कँहा खोगये हो मेरे कृष्णा !
तुम मुझसे इस दुनिया की भीड़ में
किसे पुकारू
मेरे माधव !
तुम ही तो हो जो बसे हो मेरे रोम -रोम
हां फुट पड़ती हैं आँखे
आज भी जब तुम याद आते हो
श्री चरणों में अनुभूति

मेरी ये इबादत हैं ये मुझे पता हैं ,

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................