शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

पयो व्रत संकल्प


मेरे कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ धारी !
आत्मा को तेरा दर्शन आज हुआ हैं
आज हुआ हैं आदेश मुझे पयो व्रत का ,
दे प्रभु !मुझे आशीष
में कर सकू ले माँ भगवती का स्नेह ले सानिध्य
तेरे स्नेह आशीश के साथ
ये संकल्प पूरा
मेरे जगदीश्वर !
आज ही प्रार्थना हैं
आज आप के श्री चरणों में
अनुभूति






गुरुवार, 30 जून 2011

भगवान राम से भरत जी का अनन्य स्नेह

भगवान राम से भरत जी का अनन्य स्नेह 

हर मानव की सोच का अपना नजरिया होता हैं 
वो उसे जेसे देखे संसार का हर भाव वेसा ही दिखता हैं |
एक सम्वाद  भागवत जी से 
भगवान राम को सबसे अधिक स्नेह उनके भाई भरत किया करते थे |जब राम जी ने वनवास स्वीकार किया तो भरत जी ने भी अपने को भी उन्ही के समान मानकर अयोध्या नगरी का त्याग कर दिया औरनंदी ग्राम में रहने लगे | अपना जीवन अपने भाई की तरह वनवासी बनकर बिताया |उन्होंने सारे राज सुखो का त्याग किया और अपने राम जी की चरण पादुकाओं की पूजा कर ,गो मूत्र में बनाकर जो का  दलिया खाते थे वत्कल ही पहनते थे और पृथ्वी  पर डाभ{एक प्रकार की घास }बिछाकर ही सोते थे | 
जब भरत जी को ये पता लगा की राम जी वापस आ रहे हैं उन्होंने उनकी चरण पादुकाओं को अपने मस्तक पर रखा और सम्स्त पुरोहितो सहित भगवान राम की अगवानी के लिए गए |भगवान राम को देखते ही उनके आंसू छलक गए अपने अंतस की वो छिपा न सके और अनन्य स्नेह से भाव विभोर होकर वे अपने भगवान के चरणों पे गिर पड़े |उन्होंने अपने राम के चरणों के सामने उबकी चरण पादुकाएं रख दी और हाथ जोड़ कर खड़े हो गए भगवान  ने  अपने भरत को भाव विभोर होकर अपने गले लगा लिया और भरत जी ने अपने अश्रुओं से अपने राम जी का स्नेह अश्रुओं  अभिषेक किया | 
उनकी अपने राम के प्रति आस्था को देखकर आत्मा अनन्य भाव विभोरहो जाती हैं |

अपने ईश्वर से इसी अनन्य  भक्ति और स्नेह का आशीष मेरी आत्मा भी अपने आराध्य राम जी के चरणों के प्राप्त करना चाहती हैं |
हे जगदपति  !
मेरे कृष्णा !
मेरी ये प्रार्थना स्वीकार करना मुझे भी अपने जीवन में अपने वचनों ,सत्य और विशवास के लिए कठिन समय से लड़ने की शक्ति देना |

लम्हा -लम्हा

लम्हा -लम्हा 
रेत की तरह मेरे हाथों से फिसलता जा रहा हैं 
हर लम्हा  मुझे खिचता हैं तन्हाइयों में 
वादियों में ,पहाड़ों में 
एक एकांत से दुसरे  एकांत  की और 
एक सजा से दूसरी की और
सजा वही हैं बस रूप अलग हैं तन्हाइयों का 
लगता हैं लम्हा -लम्हा कुछ छुट रहा हैं 
कुछ नहीं हें अपना ,
सारे अपनों के भेष में पराएँ हैं 
सुख देने की चाह रखने वाले भी ,
अनजाने में दुःख दे जाते हैं उनको तो इसका इल्म भी नहीं
किसे कहू अपना किसे पराया !
दुनिया के फलसफे मेरी समझ से परे 
न रूप समझ आये जिन्दगी का न रंग 
इसीलिए ये संसार छोड़ रंग गयी हूँ 
तेर ही रंग 
कान्हा !
तुझमे अक्स ढूंढते हैं मेरे अपने 
काश तुझसे जो स्नेह किया होता किसी ने 
मेरे कृष्णा !
                                           तो कोई समझ पाता आत्मा की ये पीड
                                                  हां छुट रहा हैं मुझसे कुछ
                                                       लम्हा -लम्हा 

                                                      "   अनुभूति "

स्नेह सागर


ओ मेरे स्नेह सागर !
 
तुम जीवन्त हो मेरे रोम -रोम में
अपने झूले पे आँखे बंद किये में
इस सुहानी फिजा के साथ महसूस करती हूँ
तुम्हारी मिलो दूर से आती
तुम्हारे असीम स्नेह से उठती उन बूंदों को
और भीग जाती हूँ अपने अंतस तक
होकर आत्म आनंद विभोर
इस बदरी के साथ मेरी आँखों से बह उठता हैं ,
"तुम्हरा असीम स्नेह"
और मेरे लिए इबादत में खड़े जुड़े हुए तुम्हारे हाथो को देख
हो जाता हैं तुम्हारे चरणों के प्रति
समर्पित ,हां मेरी आँखों का ये नीर
में कृतार्थ हूँ अपने शिव को साक्षात् पाकर
हां आज सिमटी हूँ में ऐसे ही अपने अंतस में
जेसे प्रथम आलिंगन पे बेहद शर्म से धरती कठोरता से लिपटी हो
अपने स्नेह सागर से |
अनुभूति

बुधवार, 29 जून 2011

नेनो में बदरा छाये बिजली सी चमके हाय ,


नेनो में बदरा छाये बिजली सी चमके हाय ,
एक मीठा गीत 
 तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिले तो बने जीवन संगीत 
अनुभूति

आत्म आनंद अनुभूति



बेहद खुबसूरत हैं हर फिज़ा
और खुबसूरत हैं जिन्दगी मेरी हर पल यंहा ,
क्यों काट दू इसे में यूँ ही रोते -रोते  !

लम्हा- लम्हा खतम होता जा रहा हैं 
समेट लू तेरी ,
निश्चल मुस्कुराहटों और विशवास के पलों को ,
तेरे अश्रु पूरित स्नेह आलिंगन के  पारितोषिक  को ,
मेरे करीब आके कहे जाने वाले हर एक एहसास को ,
मेरे अमर स्वप्न को ,
मेरा स्वप्न जो तेरी रूह में बसा हैं ,
और में जो तेरे नाम से महकी हूँ
मेरी  रूह धडकती हैं तेरे नाम से
मेरे पास तो महका हैं जिन्दगी का ये जँहा,
तेरी मेरी रूह की
हर पल की आत्म आनंद अनुभूति  ,
सिमटी हैं मेरी साँसों में ,
अधरों में 
इन खुली जुल्फों में 
ये नीला आकाश तो बहुत छोटा पडा हैं
मेरे असीम स्नेह के आगे 
उस मदहोशी के आगे जिसमे
में और तुम खोये हैं दो आत्माओ के साथ 
कोई नहीं छीन सकता मेरी साँसों से 
हां तुम तो बसे हो मुझमे मेरे अंतस में 
इस भोतिकता से दूर एक जँहा और हैं 
जिसमे बसे हैं हम -तुम 
बनके एक असीम 
आत्म आनंद अनुभूति

"अनुभूति "
जीवन बेहद खुबसूरत  हें और कुछ लम्हें इतने प्यारे होते हैं
जो पुरे जीवन की मुस्कुराहटों के लिए काफी होते हैं
बस जीवन की छलनी से उन लम्हों को हम थाम ले | 
एक गीत हैं जिसके शब्द बड़े खुबसूरत हैं 
रहे न रहे हम ,महका करेंगे ,बनके कली ,
बनके सबा ,बागे ऐ  वफ़ा में महका करेंगे
क्या हैं मिलना ?क्या हैं बिछड़ना  याद नहीं हैं  हमको
कुचे में दिल के आये हो जब से  दिल की जमी हैं याद हमको |
जब न होंगे हम ,
तब हमारी जब ख़ाक पे तुम रुकोगे चलते -चलते ,
अश्को से भीगी चांदनी में ,
एक सदा सी सुनोगे चलते -चलते |
वही पे कही हम,
तुम से मिलंगे बनके कली ,बनके वफ़ा बागे ऐ वफ़ा में
रहे न रहे हम महका करंगे |
अंतस में  बसा ये गीत सुहाना गीत 


अनुभूति 

मंगलवार, 28 जून 2011

"अजी रूठ कर अब कँहा जाइयेगा ,

 
एक खुबसूरत शाम का जादू ,एक मासूम सी मुस्कुराती शाम ,
अपनी ही नादनी पे अटखेली करती एक शाम 
लता जी की आवाज के साथ
     "अजी रूठ कर अब कँहा जाइयेगा ,
       जँहा जाइयेगा हमें पाइयेगा "
         खुबसूरत एहसाओं के साथ 
    अनुभूति

सुहानी शाम

सुहानी शाम छेड़ रही सरगम
खामोश सी हवा भी लहरा रही ,
जुल्फों का परचम
में खामोश , तुम खामोश
फिर भी ये दिलो के धडकने की सरगम
कँहा से आ रही प्रियतम
कही छू जा रही मुझे तुम्हारी
आतम आनंद अनुभूति
छोड़ हदों को में जी जाऊ
दिल करता हैं इसी मदहोशी में खो जाऊं
अनुभूति

अर्थहीन हैं शब्द ,

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे नीलकंठ !
मेरे राम !
बिन मोल बिकी हैं रूह मेरी ,शब्द मेरे ,
भक्ति में तुहारी
जो बंसी अधरों पे धरे ,
कृष्णा!
मुझे देख मुस्काएं हो तो हंसी हूँ में,
मुझे स्नेह किया हैं तो जी हूँ आतम आन्नद अनुभूतियों में तुहारी
जो मुझे देख गुस्सा दिखाए हो तो डरी हूँ में
कृष्णा ये इतने  रूप क्यों ?
जो अंतस में हैं वो भाहर क्यों नहीं दिखता
तेरी में और में तुम जानो कान्हा
में डूबी तेरी भक्ति में
क्या जानू संसार,
मांगू तुझसे ये झूठा ये संसार
जानू मेरी रूह से तेरी आत्मा का निस्वार्थ साथ
अभिभूत हूँ पाकर तेरी भक्ति
छीन लेना मुझसे अपनी भक्ति की ये शक्ति
कान्हा !
पता नहीं क्यों अर्थहीन  हैं शब्द ,
अर्थ हीन हो गया हैं जीवन
बस चलती चली हूँ
तुम्हारी राहों पे
बिना किसी स्नेह ,साथ और विशवास के
बंधी पड़ी हूँ तुहारे कदमो के बंधन
सारे संसार के लिए तो तुम दया के सागर
मेरे लिए क्यों कठोरता ओडे हो ?
कभी तो बादलो की ओट
से ही मुझसे पूछ लो
कह दो डरो नहीं में
तुम्हारे साथ सदा स्नेह ,आशीष बन कर खड़ा हूँ
क्या मांगू में और ?
चाहियें तुम बिन कोई भोर कान्हा !
अनुभूति

सोमवार, 27 जून 2011

ए कायनात तेरी पनाहों में

कृष्णा ,
देख रही हूँ हिसाब तेरी रहमतो का
मागते हैं रिश्ते हिसाब सालो का ,
सालो से जिनके पास देने को कभी कोई,
सपना रहा
वो मागते हैं
आज मेरी इन से आँखों से
मेरे  सपनों का हिसाब
मेरी रूह का चेन और सारे एहसास तो

गिरवी
कान्हा तोरे पास ,
रूह का असल सूद मेरे पास, केसे कहूँ?
किसे कहू मेरा अंचल तो खाली ही पडा हैं ,
मिटने के बाद भी सहानुभूति और स्वार्थी का इल्जाम  धरा हैं  
कीमत में बंधा हैं हर बंधन
केसे कहू ये कभी
सात फेरो का बंधन
कभी सांसो का
दोनों का मोल अनमोल
बाँधना चाहे हर कोई अपने स्वार्थ से
कई हालत को मज़बूरी समझ खेल जाए ,
रिझा ले मन अपनी रहमतो से
और कोई हालत ही ऐसे कर दे की मजबूर हो जाएँ
मुझे जीना हैं लड़ना हे जिन्दगी तुझसे
अब नहीं कोई सौदा ,
मेरे कृष्णा
जो होना था हो गया
बस होगया तुम्हारे साथ
माटी की गुडिया से बना दो,
अब मुझे पत्थर का इंसान
खिलना हैं इस गुलशन में
चहकना हें मुझे अब डाल-डाल
मुझे ले चल कुदरत अपनी पनाहों में
एक बार नहीं लोटना हैं
मुझे इन झूटे सौदों में ,
में मिट जाना चाहती हूँ
कायनात तेरी पनाहों में
ले ईश्वर का साथ
स्वीकार अपनी चरणों में
रूह की ये प्रार्थना एक बार
अनुभूति

सब कुछ तुम्हारा तुम्हे अर्पण !


आज की सुबह एक बेहद खुबसूरत गीत सामने आया |
शब्द बहुत पसंद आये
मेरे कृष्णा !
शब्द तुहारे दिए , अर्थ तुहारे दिए ,नाम तुहारा दिया
सब कुछ तुम्हारा तुम्हे अर्पण
अगर कायम रहती हैं इसी से मुस्कुराहटें तुम्हारी तो ये भी अर्पित तुहारे चरणों में
आज तेरे चरणों में शब्दों की कमी सी महसूस हो रही हैं
इसीलिए गीत तुम्हारे श्री चरणों में अर्पित अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................