शनिवार, 19 मार्च 2011

रात बन बेठी हैं चाँद का घूंघट



रात बन बैठी  है चाँद का घूंघट .
और इस चाँद केघूंघट  में ,
राधा को इन्तजार 
अपने कान्हा का , 

 कि कान्हा आयेंगे 
और उसके चाँद से मुख से घूंघट  उठायेंगे . 

इस आस में राधा करे इन्तजार 
 अपने कान्हा का ,
कर सोलह सिंगार |

वो कान्हा बड़ा निर्मोही ,
जब भी राह तके राधा ,
वो दे अंखियन को आंसू .

और जब आए सामने 
राधा दे मुस्काय
ओ कान्हा 
तेरी राधा बड़ी पगली ,दीवानी 
तू काहे सताए  करके मनमानी ,

ये रात नहीं आएगी दोबारा 
कि कान्हा आज सजी है घूंघट  में 
तेरी चांदनी राधा |

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

श्याम आज तो होरी

मन का मयूर नाचे छम - छम 
के आगये राधा - रानी तेरे प्रीतम.

आज वो तुझे छू जायेंगे |
मन की हर कसमसाहट  मिटा जायेंगे |

अरे पगली ,
कान्हा के आने से
पहले करले  सोलह सिंगार
पैरों  में पायल ,
सांसो में सरगम और 
दिल में कान्हा को बसाये ,
आज तो तू धड़का दे तन मन श्याम का ,
अपने घनश्याम का .

कान्हा  तो काला,
और तू राधा चाँद चकोरी 
कान्हा कँहा टिक पाएंगे ,
आज तेरे घनश्याम 
कि आज तो होरी है .
और कान्हा की राधिका कोरी हैं |

तो काहे लजाएँ अपने श्याम से 
आज तो रंग लगाने दे ,
अंग - अंग भीग जाने दे,
 रंग में रंग ,और मन से मन,
आज मिल जाने दे ,
राधिका गोरी 
अब खुल के बोल ,

हाथ गुलाल रंग बिरंगी ले कर बोल,
कि  श्याम आज तो होरी हैं |
ये राधिका तोरी हैं |

पट तो गै रानी

गोकुल के घनश्याम
मीरा के बनवारी

हर रूप में तुहारी छवि
अति प्यारी

मुरली बजाके 
रास -रचाए |
और कह ग्वालों से 
पट तो गै रानी

अरे कान्हा ,
मीरा तो प्रेम दीवानी 
और राधा दरस दीवानी 

दोनों ही तेरे अधीन ही
फिर तू काहे कहे
पट तो गै रानी|

वो महासागर

मेरा हर एक अश्क
 हर बार एक नया सवाल पैदा करता हैं|
क्या दुनिया वेसी हैं ?
सुनहरी जेसी हर तरफ दिखाई देती हैं 
या 
दो रंगों वाली ,
सुनहरे पलों वाली या ,
उसके पीछे छिपी  ,
बिलकुल काली और स्याह ,

एक  नन्ही सी बूंद
क्या समझ पायेगी इस दुनिया के महासागर को ?
नहीं इन्ही अनसुलझे सवालों में 
डूब जायेगी वो !
इस दुनियां के महासागर में ,
खो जायेगी कही ,
अपने अस्तित्व को सागर में डुबोये ,
और नन्ही - नन्ही बूंदों से
ही तो भरा होगा सागर,
और कहलायेगा 
वो महासागर|

बुधवार, 16 मार्च 2011

सपने



सपने
जब सत्य के धरातल पर ,
 सत्य का धरातल यानी दुनियां ,वास्तविकता }
आकर टकराते हैं,
और टूटते हैं ,
तो बहुत तकलीफ होती हैं |

ये जान कर भी,
मन देखना चाहता है सपनें !

लगता है कितनी कडवी हकीकत,
पर क्या करे?
दुनियां ही कुछ इसी तरह की हैं |
पर मन है कि 
सपनो के पीछे भागा फिरता है |

वो कुछ नहीं देखना चाहता,
सिर्फ अपने ही नजरियए से.
दुनियां को देखना चाहता हैं .
और, जब सपने टूटते हैं तो तड़प उठता है |

कैसा है ये बांवरा मन ?
हर बार दुनिया के,
पिंजरे से उड़ कर 
बस अपनी ही हांका करता है |
डरते डरते उड़ना तो चाहता है.

पर अनजाने भय से,
सहम -सहम कर 
बढता है |

और सपना पूरा हो,
इससे पहले ही सवेरे की आँख खुल जाती है ,
और जिन्दगी लौट आती है .
अपनी हकीकत में |
और वो सपना दम तोड़ देता है.

उन्ही उनींदीं आँखों के पीछे 
और सुबह,
चाय की प्याली और श्रीमान के साथ ,
मैं कह रही होती हूँ -

हे ईश्वर !
अच्छा हुआ 
ये एक सपना था 

धीरज !

शनिवार, 12 मार्च 2011

शिकायत

शिकायत हैं उनको  की,
में दर्द पे कविता नहीं कहती !
केसे कहे उन्हें के दर्द का
तो समन्दर  हम साथ  लेकर जीते हैं |
             जो नहीं हैं उसको तो हम ढूंढा करते हैं ,
कहते हैं खोजने से खुदा भी मिल जाया करता हैं |
 जानती हूँ,
स्नेह के अलावा भी,
बहुत कुछ हैं ऐसा हैं ,
जिसपे कविता लिखी जा सकती हैं |
पर क्या करू?
मेरे दोस्त, भूख और गरीबी पे सिर्फ,
कविता लिखने से वो खत्म होती तो बात ही क्या थी |,
ये सब तो हमारे पास हैं न जाने कब से !
इसीलिए 
तो में लिखती हूँ 
कविता स्नेह पर,
 जो हमारे पास कम होता जा रहा हैं |
जो अभी खत्म नहीं हुआ,
उसे रोका जा सकता हैं|
और जो खतम हो चुका हैं ,
उसे कविता लिखकर,
नहीं रोका जा सकता मेरे दोस्त!
क्योकि कविता लिखने से ,
भूखे को रोटी नहीं मिलेगी 
       हां लेकिन,
             एक मीठी कविता सुनने,
या,
       पड़ने से कुछ पल के लिए वो    
   अपनी भूख और गरीबी भूल कर, 
   कुछ देर ही सही मुस्कुरा तो लेगा |



बुधवार, 9 मार्च 2011

ओ पुरुष

महिला दिवस पर ख़ास
ओ पुरुष 
बहुत कुछ बदला हैं तुमने 
हां ,
कब तुमने ,
एक अल्हड लड़की को प्रेमिका बना दिया |
और एक पल में पत्नी भी|
 कितना कुछ बदला हैं तुमने  
 वो कभी शिकायत भी नहीं कर सकी ,
सुनती ही रही,
सहती ही रही ,
कभी एक अच्छी बहु बनने के  लिए ,
तो सहती ही रही,
एक अच्छी बेटी बनने के लिए |
 हसरतो को मन में लिए,
घंटो तकिये पे सर ओंधा किये 
.रोती ही रही |
कभी तुमने पूछा भी नहीं 
फिर भी हर सुबह उतने ही स्नेह से ,
उसने  तुम्हारे लिए खाना बनाया,
और मुस्कुराते हुए चाय की प्याली दी ,
सोचती रही की काश कभी तो होगा एक दिन मेरा भी ,
मार दिया तुमने अन्दर की हसरतो से भरी लड़की को एक अच्छे बेटे बनने के लिए .
कहा गया वो प्रेमी ?
ये दुद्ती हैं हर औरत !
 कितना कुछ बदलते  आये हो,
पुरुष तुम समर्पण के नाम पर ?
कितनी हसरतो का गला घोट दिया हैं,
तुमने रिवाजो के नाम पर?
फिर भी औरत  हर बार इसी आस में,
की एक दिन तो मेरा होगा 
वो मुस्कुरा के पी जाती हैं अपने आंसू 
और अलसुबह ही मुस्कुरा के देती हैं तुम्हारे हाथो में चाय की प्याली और नाश्ते की प्लेट  ,
ये सोच कर ही की तुम्हारा दिन खराब न हो 
वो सजाएँ रहती हैं 
अपने होठो पे 
एक मुस्कुराहट 
ओ ,
पुरुष तुम्हारे लिए

सोमवार, 7 मार्च 2011

मेरे मासूम फरिश्ते


नहीं देखा मेनें तुम्हे 
ओ मेरी मासूम सी चाहत ,
बस इन्तजार कर रही हूँ तुम्हारे आने का 

मेरे मासूम फरिश्ते ! 

इन्तजार कर रही हूँ अपनी पूर्णता का 
अपने कानों में तुम्हारे गुगुनाने के एहसास का 
हां , अपने माँ होने के एहसास का 
कब आओगे तुम ?

सालों से प्रतीक्षा करते करते पथरा गयी हैं मेरी आँखे 
ओ मेरे नन्हे फ़रिश्ते 
कि तुम आओ तो में लुटा दूँ ,
अपने वात्सल्य की बयार ,
और सालो से सूखा पडा दुलार,

मेरे नन्ने फ़रिश्ते अब चले आओ 
अब चले आओ 
सुनकर अपनी माँ की करुण पुकार |

रविवार, 6 मार्च 2011

केसे कहूं तुम पर कविता सागर ?


वो कहते हैं कि तुम मुझपर कविता क्यों नहीं कहती ?

 सोचती हूँ ,
क्या सागर पर भी कोई कविता लिखी जा सकती हैं ?
क्या कहेगी वो चट्टान
जो सदियों से सागर के किनारे आने की बाट जोहती आ  रही है ?

सागर हर दूसरे पल उसे आकर एक नया दिलासा दे जाता है
कि  में तुम्हारे करीब ही हूँ और अभी जाकर ,आता हूँ |

और सागर के एक बार फिर लोट आने की एक मासूम सी चाहत लिए ,
चट्टान फिर वही आ खडी होती है
 फिर एक नए इन्तजार के साथ | 

केसे  कहूं  तुम पर कविता सागर ?
तुम तो समझ ही नहीं  पाते एक मासूम सी चट्टान की भाषा ,

तो कैसे  समझ पाओगे मेरे  इन शब्दों को ?

वो कहते हैं मुझपर कविता ,

प्रिये ,
कितनी खूबसूरत हो तुम,
कितनी खूबसूरत हैं तुम्हारी मुस्कुराहटें
और
वो निस्वार्थ चाहत ,जो मेरी बंदगी करती हैं |

मेरी निगाहों से जो चाहत
तुम्हारे लबों पे मुस्कराहट बन कर बिखर जाती हैं |
क्यों छुपाना चाहती हो तुम ,
अपने ह्रदय की उस अप्रतिम मुस्कराहट को ?
केसे छुपा सकोगी तुम अपनी लहराती जुल्फों में ,
मेरी चाहत को
प्रिये ,
अपने लबों से कहो न कहो पर मुझे यकीन हैं ,
मैं मुस्कराहट बन
यूँ ही तुम्हारे लबों पे खिलता रहूँगा |

बुधवार, 2 मार्च 2011

इंतज़ार



आज थमी हैं धडकने ,
शर्म से झुकी हैं पलके 
क्योकि उनको हैं इंतज़ार 
           उनके  के आने का ..

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................