सोमवार, 7 मार्च 2011

मेरे मासूम फरिश्ते


नहीं देखा मेनें तुम्हे 
ओ मेरी मासूम सी चाहत ,
बस इन्तजार कर रही हूँ तुम्हारे आने का 

मेरे मासूम फरिश्ते ! 

इन्तजार कर रही हूँ अपनी पूर्णता का 
अपने कानों में तुम्हारे गुगुनाने के एहसास का 
हां , अपने माँ होने के एहसास का 
कब आओगे तुम ?

सालों से प्रतीक्षा करते करते पथरा गयी हैं मेरी आँखे 
ओ मेरे नन्हे फ़रिश्ते 
कि तुम आओ तो में लुटा दूँ ,
अपने वात्सल्य की बयार ,
और सालो से सूखा पडा दुलार,

मेरे नन्ने फ़रिश्ते अब चले आओ 
अब चले आओ 
सुनकर अपनी माँ की करुण पुकार |

रविवार, 6 मार्च 2011

केसे कहूं तुम पर कविता सागर ?


वो कहते हैं कि तुम मुझपर कविता क्यों नहीं कहती ?

 सोचती हूँ ,
क्या सागर पर भी कोई कविता लिखी जा सकती हैं ?
क्या कहेगी वो चट्टान
जो सदियों से सागर के किनारे आने की बाट जोहती आ  रही है ?

सागर हर दूसरे पल उसे आकर एक नया दिलासा दे जाता है
कि  में तुम्हारे करीब ही हूँ और अभी जाकर ,आता हूँ |

और सागर के एक बार फिर लोट आने की एक मासूम सी चाहत लिए ,
चट्टान फिर वही आ खडी होती है
 फिर एक नए इन्तजार के साथ | 

केसे  कहूं  तुम पर कविता सागर ?
तुम तो समझ ही नहीं  पाते एक मासूम सी चट्टान की भाषा ,

तो कैसे  समझ पाओगे मेरे  इन शब्दों को ?

वो कहते हैं मुझपर कविता ,

प्रिये ,
कितनी खूबसूरत हो तुम,
कितनी खूबसूरत हैं तुम्हारी मुस्कुराहटें
और
वो निस्वार्थ चाहत ,जो मेरी बंदगी करती हैं |

मेरी निगाहों से जो चाहत
तुम्हारे लबों पे मुस्कराहट बन कर बिखर जाती हैं |
क्यों छुपाना चाहती हो तुम ,
अपने ह्रदय की उस अप्रतिम मुस्कराहट को ?
केसे छुपा सकोगी तुम अपनी लहराती जुल्फों में ,
मेरी चाहत को
प्रिये ,
अपने लबों से कहो न कहो पर मुझे यकीन हैं ,
मैं मुस्कराहट बन
यूँ ही तुम्हारे लबों पे खिलता रहूँगा |

बुधवार, 2 मार्च 2011

इंतज़ार



आज थमी हैं धडकने ,
शर्म से झुकी हैं पलके 
क्योकि उनको हैं इंतज़ार 
           उनके  के आने का ..

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

जिन्दगी एक खुली किताब

वर्षो  से अपने आप को खुशियों की चाह में अपने ही शब्दों से दूर रख रही थी ,लेकिन आज दर्द जीत ही गया और मेने अपने शब्दों  को फिर थाम लिया |
मेरे शब्द
मेरी तन्हाई और मेरे अहसासों के ये ही निस्वार्थ साथी हैं ये कभी मुझे कोई अपेक्षा नहीं रखते में इन्हे केसे भी अपनी भावनाओं के साथ जोड़ दू ,चाहे वो ख़ुशी का गीत हो या दर्द की बांसुरी |

आज से एक नया ब्लॉग लिखना शुरू किया हैं  जिन्दगी एक खुली किताब   
दोस्तों ये मेरे लिए ब्लॉग नहीं जीवन की वो सारी सच्चाई हैं जिससे में कही भागना चाहती थी , लेकिन आज  में उससे सामना करने को तेयार हूँ| 


आज तक समझ नहीं पायी दुनिया की सच्चाई को |क्या सच हैं जो दिखाई  देता हैं ?या वो जो महसूस होता हैं |
सब कुछ इतना  शुगर- कोटेड  हैं की बस ,हाँ पर अब हजम नहीं होता |

http://jindgiekkulikitaab.blogspot.com/

नारी


(चित्र:साभार गूगल )
नारी
एक देह, एक-मन, एक आत्मा
एक स्वपन ,    
एक जिKkसा
तुम उसे मत कहो पहेली
वो जो एक उत्तर है
पहेलियों का
विश्वासों की नाज़ुक ढोर पर
सधी हुई समर्पित
नारी
जो
प्रेम की एक "बदली" की से भीग
बदली बदली
भूल जाती है बचपन की गलियां
मां-पिता की द्वार-देहरी सब
काश
तुम तुम और तुम भी…!!

Ø  अनुभूति

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

शशि किरण का प्रणय गीत !




मैं शशि से बिखरी अंजोरी तम पे उजास बन छाती हूं! 
जो गीत शशि पर तुम लिखते मैं उन गीतों को गाती हूं...!!

तुम रात भरो अंधियारों से, मैं रश्मि,किरन, मैं अंजोरी
आईं हूं तुमको कुछ समझाने - देखूं क्या समझा पाती हूं !!


तुम मेरी मेरी करुणा क्या जानो, मेरी पीडा को पहचानों
मैं तुममे बसी सदा से हूं, मेरा होना तुम अनुमानो ....!!

जब गहन तिमिर छा जाता है, घुप्प अंधेरा छाता है-
जब जब उदास मन होता है -मै ही तो राह .सुझाती हूं !!


तुम मन का सागर साफ़ रखो, स्वच्छ नीर मेरी चाहत
किंचित भी मलिन नहीं होना मिल जाएगी मेरी आहट 

मैं स्वच्छ नीर में जब उतरूं, तुम शशि-बिम्ब बन आना
उस जल-क्रीड़ा मुझको तुम संग- मिल पाएगी अदभुत राहत .


अंजोरी....शशि किरण 

-- अनुभूति

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

तुम्हारा एहसास


समझी थी तुमको मैं
अपनी ही तरह
सीधा सादा  ,
तुम जो  ज्ञान और अनुभव
समंदर
और मैं उसी सागर से बने 
बादलों से टपकती 
एक नन्ही सी  बूंद !!

कितनी आसानी से
तुमने समझा दिया
अपना व्यक्तित्व
अपने आप मै ,
अपनी आत्मा में
तुम्हे बिना तुम्हारी
विशालता जाने ही

अपने आप में बसा लिया था मैंने..

और, जाना है अचानक आज -
रूप ,रंग ,अस्तित्व
तुम्हारा व्यक्तित्व ...!

सोचती   हूँ
कैसे करूँ
अपने आप का  सामना .

ये अनजाने में  ही
क्या मुझको मिल गया ..

बहुत छोटी हूँ
तुम्हारे इस अन्त-हीन ज्ञान के आगे मैं,
नहीं समझ पा रही क्या करूँ   ,
क्या कहूँ अपने आप से ?

-- अनुभूति 

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

इन्तजार

इन्तजार !! 

सोलह बरस की उमर से ,
पच्चीसवें बसंत का इन्तजार ,
ना जाने किन -किन हसरतो,
को मन के किसी कोने में छुपाए रखता हैं |

भीगी मेहंदी से रची 
हथेलियों की खुशबू का इन्तजार ,

या मन ही मन 
उनसे मिलने का इन्तजार |

हां , 
 जीवन का हर पल 
किसी न किसी ख़ुशी का इन्तजार ही तो है  |


-- अनुभूति 

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

फ़रिश्ते



खुद पे नहीं यकीं जितना ,
उतना हम तुमपे यकीं रखते हैं |

तुम समझ सको या न समझ सको 
हम तुम्हारे ही कदमो पे अपनी जिन्दगी को रखते हैं |

बहुत मुश्किल हैं ,हालत-ए-दौर में जिन्दगी को समझना ,
इसे ही अपना नसीब मान कर हम ,तेरी बंदगी करते हैं |

खुदा ढूढने निकली थी मैं  इस दुनिया में 
कोई एक खुदा मिला हो तो बात भी हो|


यंहा तो,
खुदा यूँ मेहरबां, 
हम पे ,
के हर कदम ,
एक
नए फ़रिश्ते से मुलाकात होती हैं |


-- अनुभूति 

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

तेरा चेहरा और मेरे अश्क


ऐ मेरे खुदा ,
उनको,
कभी तो, 
हम पे रहम आए ,
 
कभी तो , 
ऐसा हो कि ,
उनको मेरी आँखों से गिरते इन अश्को में 
अपना चेहरा नजर आए  | 

उनको यकीन हो न हो ,
मेरा हर अश्क 
आँखों से ढलते -ढलते भी 
उन्ही के चेहरे को
 अपने अश्कों में महसूस करता हैं |


-- अनुभूति 

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................