प्रिये ,
कितनी खूबसूरत हो तुम,
कितनी खूबसूरत हैं तुम्हारी मुस्कुराहटें
और
वो निस्वार्थ चाहत ,जो मेरी बंदगी करती हैं |
मेरी निगाहों से जो चाहत
तुम्हारे लबों पे मुस्कराहट बन कर बिखर जाती हैं |
क्यों छुपाना चाहती हो तुम ,
अपने ह्रदय की उस अप्रतिम मुस्कराहट को ?
केसे छुपा सकोगी तुम अपनी लहराती जुल्फों में ,
मेरी चाहत को
प्रिये ,
अपने लबों से कहो न कहो पर मुझे यकीन हैं ,
मैं मुस्कराहट बन
यूँ ही तुम्हारे लबों पे खिलता रहूँगा |
यूँ ही तुम्हारे लबों पे खिलता रहूँगा |






