गुरुवार, 23 जून 2011

बेचैन रूह

मेरे कृष्णा,
विचलित मन था थाह पायें  तो कँहा,
चैन आयें तो कँहा ,
तेरे चरणों में ,
चाहूँ कह दू तुझसे बतियाँ सारी,
कान्हा !
तेरी सेवा के भी पहरे हैं जिन्दगी के 
बस तड़प -तडप ही रहूँ बस में 
तरसूं  बस तेरी हर आत्म आनंद अनुभूति में ही 
किसे समझाऊं ये मन की भाषा 
दुनिया की समझ से परे
मेरे आह का दर्द जाने तू ही 
कान्हा !
कहूँ केसे !
तुझे भी मुझे ले चलो अपनी पनाहों में 
कब तक पीती रहूंगी ये जहर में 
कान्हा !
आखिर कब तक सहती ही रहूंगी
तेरे दरबार में मेरा भी इन्साफ कर 
एक बार 
मेरी भी बेचैन रूह को चेन दे एक बार |
अनुभूति

एक अद्भुत भजन " मेरे राम का "


एक अद्भुत भजन
" मेरे राम का "
अनुभूति

श्याम !मेरे ये तो अधूरे स्वप्न हैं |

मेरे कृष्णा! 
मेरे कोस्तुभ स्वामी !
में इस संसार की सबसे बड़ी
पगली, तेरे नाम की दीवानी
जो में तितिली होती,
तुहारे चारो और ही मंडराती ,
जो में शब्द होती ,
तो तुम्हारे हाथो से ही लिखी जाती ,
जो में निनाद होती ,
तुम्हारे कंठ से छू कर जाती 
मुरलिया  होती तो ,
तुम्हरे अधरों पे ही धरी जाती
उन अधरों की मिठास में पा जाती ,
जो मुरलिया  होती तो
पल -पल तुम्हारे हाथो में ही थामी जाती
जो पीताम्बर होती ,
तुम्हरे से लिपटी होती
तुम्हरा रोम -रोम छू जाती 
जो में राधा होती ,
रख तुम्हारे काँधे पे सर,
मुरली के सुरों में ही खो जाती
जो में कोई गीत होती तो
तुम्हारे संग रास रचाते 
तुम से ही गुनगुनाती
जो में रंग होती , 
तुम्हारे हाथो में खिल रही होती
जो पुष्प होती
तुम्हारे इन कदमो से,
ही लिपटी पड़ी रह जाती 
हां कृष्णा !
मेरे कोस्तुभ  स्वामी !
तुम जो आ जाते ,
में इन पलकों से तुहारी राह बुहारती 
श्याम मेरे ये तो अधूरे स्वप्न हैं
में पुकारूं तुम्हे पर तुम न आओ
इसीलिए कहती हूँ ,
कभी तो दया करो 
मेरे दया निधे !
संसार के करूणा सागर !
तुम्हे पुकारते -पुकारते
हँसती- हँसती में जगती हूँ
रोती- रोती ही में सो जाऊं |
अनुभूति