शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

विदीर्ण मन ,

विदीर्ण मन , 
अपने लिए ढूंढ़ता हैं ,
उम्मीदों का आकाश ,
नहीं !
ढूंढ़ता  हैं अपने लिए स्नेह की छाँव |
कतरा -कतरा,
जुड़ -जुड़ के बन सका हैं विदीर्ण मन
निसंकोच कहती चली गयी  में,
तुमसे जीवन सत्य संगीन .
सोचा न भाला बस कह डाला ,
आगे सोच भी न पाई 
तुम्हारे मन की वेदना .
जब सोचा तो तार -तार हो गयी  हूँ में ,
अपने ही दिल के कोने से दागदार हो गयी  हूँ में 
क्या कहू ?
केसे करू ,शिकायत भी अपने आप से ,
उलटा कह के भी ,
दर्द का खंजर मेरे सीने में चुभ रहा होता हैं |
विदीर्ण मन सिने के लिए,
में तुम्हारे स्नेह का सुई धागा ढूंड रही  होती  हूँ |
अनुभूति

सीता -राम के अनन्य प्रेम, समर्पणसंवाद

               भागवत का एक सीता -राम के अनन्य  प्रेम, समर्पण  का संवाद
 
  राम ने बड़े दुखी होते हुए सीता से कहा
                               प्रिये ,
                        तुम संग सीते ,
                  प्रीत जन्मो की मेरी ,
                     पर मिथला नंदिनी ,
            ये दुनिया हैं निष्टुर ,कठोर ,कोरी 
              कहती मुझसे सीता अपवित्र हैं 
               ,इसे निष्कासन दो 
                    केसे कहू प्रिये तुमसे 
                 ,ये घोर वेदना मन की 
सीता जी ने अपने प्रभु राम जी के मुख मंडल पे चिंता और आत्मा को दुखी देख कहा 

               प्रभु
में तो जन्म -जनम की बंधिनी तुहारी 
फिर क्यों कहे हैं आप  ,इस दुनिया को निष्टुर सारी
प्राणनाथ मेरे , 
आप इस जगत के भी तो हैं नाथ 
मुझे ज्यादा अबला तो ये प्रजा तुहारी 
ये क्या समझ सकेगी नियति हमारी ?
आप वो निभाइए जो धर्म - रीती हैं राजा की न्यारी |

में नहीं देख सकुंगी अपकीर्ति तुहारी नाथ
दुःख - सुख सदा साथ रही ,रहूंगी सदा 

केसे अलग हो सकेंगी आत्मा नाथ 
ये केसे समझाउंगी इस दुनिया को रघुनाथ
सहर्ष स्वीकार कर अपने प्राणनाथ की आज्ञा 
सीता चली वनवास चुपचाप
अपने प्राणनाथ की आज्ञा कर शिरोधार्य  |

भगवान राम अपनी पत्नी सीता से बहुत स्नेह करते थे ,और सीता जी अपने राम के प्रति जो समर्पण रखती थी उसे समझ पाना आसान नहीं और इस दुनिया के साधारण  इंसानों के संभव भी नहीं |उनका स्नेह बड़ा आलौकिक था |भगवान राम का जीवन प्रेम की इस सुन्दर पराकाष्ठा को समझने का सुन्दर उदाहरण हैं |
और जो लोग कहते हैं की सीता को राम ने निष्काशन दिया उनका लिखना दोष पूर्ण हैं यानी स्नेह में समर्पण के उच्च भाव को वो समझ ही नहीं सके |

 अनुभूति






हे देवादि देव !सूर्य देव

कभी - कभी ऐसा समय भी होता हैं की जब हम हमारे गुरु के दर्शन करना चाहे ,कोई मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहे तो किसी भोतिक स्थ्ती के कारन नहीं कर पाते ,मेरे साथ ये हमेशा होता आया था | एक दिन इश्वर के सामने बेठे - बेठे न जाने केसी दिव्यानुभूति हुयी मेरे मन में एक वाणी का अविर्भाव हुआ की मेरे राम का आदेश हुआ मुझे की तुम प्रत्यश देव भगवान सूर्य देव को अपना गुरु बनाने के लिए प्रार्थना करो |इसके बाद मेने जीवन की हर मुश्किल में अपनी आत्मा में जब भी उनका स्मरण किया उन्होंने सारे अंधरे हटा कर मुझे जीवन का ये नव सृजन दिया |
आज की ये कविता या यूँ कहे प्रार्थना मेने अपनेआराध्य  श्री राम के चरणों में प्रणाम करते हुए अपने गुरु सूर्य देव को अर्पित की हैं |
हे देवादि देव !सूर्य देव      
जग के पालन हार
राम ,कृष्ण और रहीम के कर्मो के साक्षी 
स्वयम नारायण , सवयम भू ,रूद्र 
भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप का तेज
तेरे श्री चरणों में नमन .

कितने ही अंत कालो से तुमने इन अंधेरो को मिटाया हैं
हर इंसान को समानता से अपना स्नेह दिखाया हैं ,
कितने  ही कर्मो के साक्षी बने हो तुम
प्रभु श्री राम जेसे महाज्ञानी को भी 
असह्य हो जाने पर ,
लंका विजय का मार्ग बताया हैं |
तुम ही तो हो प्रत्यक्ष ब्रहम 
साक्षात् ईश्वर ,
इस संसार के हर जीव  में तुम्हरा ही तो अंश पल्व्वित हैं |

संसार में तुमसे बड़ा ह्रदय किसी के पास नहीं गुरु देव ,
और तुमसे ज्यादा कोई दे नहीं सकता ,
तुम तो बूंद बूंद जल सोख कर 
हजार गुना करके उसे धरती की प्यास बुझादेते हो |
मेरे जीवन में भी असीम  ज्ञान ,
आध्यात्म  और ईश्वर की सत्ता का 
मार्ग दिखाओ , 
इस नव - सृजन के मार्ग पे आगे बदने का 
आशीष दो |
और पल्लवित करो मेरे अंतस की शिराओं को  ,
मेरे ज्ञान को भी पोषित करो सम्रद्ध करो
और मुझे ले चलो अंत प्रकाश की दुनिया में ,
जन्हा तुमने ही ,
अपने विराट रूप का दर्शन दिया था अर्जुन को

हां में देखना चाहती हूँ अपने 
हर अंश में रोम रोम में तुम्हारे तेज का ये विराट रूप |
अशिशो मुझे की साधना के मार्ग का में अडीग पत्थर बनू ,
सूर्य न सही तुम्हरा एक अंश बनू 
हां एक अंश बनू ,
सार्थक हो जाएगी साधना मेरे जीवन की 
जो तुम अशिशो ,
हमेशा की तरह मेरा मार्ग प्रशस्त करो ,
और दो इस नव -सृजन की सार्थकता .|
"अनुभूति "