मंगलवार, 21 जून 2011

ये सुहानी भोर

सुबह की भोर और इन घने मेघो के चाँद में और आज की भागवत में मेने ,ओ पीताम्बर धारी ! आप के सुनहरे रूप का जो अद्भुत दर्शन किया हैं  बस वही भाव फुट पड़े हैं | इसीलिए हे जगदीश्वर आप मेरी आत्मा में सदा वास करो ये ही आशीष मुझे दो |



 

ये सुहानी भोर ,
रूह को छूती इस पुरवाई में
और मेघो से चमकते चाँद में भी 
तुम ही बसे हो श्याम ,
में कितनी बार रूठू तुमसे
ओ कान्हा जी!
और एक मुस्कुराहट से ,
मना ही लो मुझे तुम
ओ गिरधारी!
जितने सरल तुम ,
उससे भी सरल हैं तुहारी ये सखी बावरी 
मुग्ध हूँ सरलता पे तुहारी ,
हँसती भी जाऊं रोती भी जाऊं 
स्वप्न में भी जो आके,
तुम मुस्काओ तो में खिल जाऊं 
केसे बताऊ कित -कित में तुम्हे ही पाऊ!

कृष्णा !
बह जाने दो आज स्नेह नीर,
इन अंखियन से
धुल जाने दो अपने चरणों  को 
बह जाने दो मन की सारी शिकायते 
ये आसू नहीं स्नेह टपकता हैं ,
तुम्हरा इन अखियों से
बह जाने दो ,
क्योकि ये तो अथाह हैं
इस ह्रदय में !

ओ कान्हा!
तेरी ही मुस्कुराहट हैं ,
मुझको इस अरबो के संसार में,
अपनी साँसों से प्यारी
तुम एक बार जो मुस्कुरा दो ,
में जी जाऊं ,
सह जाऊ न जाने,
कितने जन्मो की पीड सारी |

मांगू यही तुमसे बस ,
ये आत्मा जब तक हैं तुम ही 
ओ कोस्तुभ धारी !
बने रहो इस आत्मा के स्वामी 
बहाते -बहाते तुम्हारे चरणों पे,
मुझको भी हो जाने दो
इस आत्मा को भी निर्मल |
श्री चरणों में 
"अनुभूति "


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