बुधवार, 1 जून 2011

ओ निर्मोही कोस्तुभ धारी !

कान्हा जी ,
सौ बार जिए ,सौ बार मर जाएँ ,
यमुना किनारे खड़ी राधा की ये पीड ,
श्याम अब तो सही ना जाएँ
तुहारी मुरली की धुन -सुन ये मुस्काय ,
ये जीवन पा जाएँ ,
जो शांत हो तेरे अधरों की धुन
बस दूजे ही पल बेजान शरीर हो जाएँ ,
कान्हा जी ,
स्नेह के सागर !
केसी भक्ति ये !
ये कैसा स्नेह सागर !
ये भक्ति जो ,
जो तिल -तिल जलकर की जाएँ ,
स्नेह सागर
जो बूंद -बूंद अखियन के नीर से भरा जाएँ ,
ये जीवन हैं कान्हा जी या कोई सजा ,
कान्हा जी !
राधा तेरे चरण के अगाध विशवास पे बलिहारी
हर पीड हँस-हँस ,
नीर बहाती सहती जाएँ ,
निर्मोही कोस्तुभ धारी
तुम तो भूल गए राज -पाठ में अपनी राधा
और ये बावरी हैं जो पल -पल
तेरे निष्ठुर !निर्मोही !कठोर
तेरे ही गुन गाती जाएँ
तेरे ही चरणों में शीश नवायें ,
कान्हा !
तेरी सत्ता ,
तेरा स्वामित्व ,
तेरे ज्ञान के आगे
तुच्छ पडा हैं असीम स्नेह
कोस्तुभ धारी !
तेरी राधा जाने
कोई कठिन शबदो की भाषा ,
वो जाने बस समर्पण ,नयन नीर और
तेरी खामोश धडकन की भाषा ,
कन्हाई !
"अपने शब्द निभाओ"
यमुना किनारे बाट
जोहती अपनी राधा को
गले लगाओ |
अनुभूति

तेरे कदमो की इबादत में ,

मेरे राम!
मेरी आत्मा ! 
मेरे प्रभु !
न जाने कितनी शिकायते करती हूँ 
तेरे कदमो की इबादत में ,
ढलते -ढलते ये अश्क 
आप के कदमो को पखार दे ,
मेरे लिए , 
तेरी आत्मा को वेदना देने की माफ़ी ये ही हैं|
 ये जीवन सजा हैं या दुआ नहीं मालुम ,
मेरी आत्मा को तेरी आत्मा की पनाह ही काफी हैं ,
इस जिन्दगी  को जीने के लिए |

अनुभूति

मंगलवार, 31 मई 2011

मीरा

मीरा अपने कन्हियाँ से इतना स्नेह करती थी 
की जीवन के अनन्य स्नेह के रूप अपने पति में भी 
वो अपने कृष्ण जी को ही देखती थी |
इस अद्भुत भाव को व्यक्त करते उनके ये शब्द .


"मेरे तो गिरिधर गोपाल दुसरो ना कोई ,
जाकें सिर मोर मुकुट मेरों पति सोई ,"
   मीरा  

कलयुग में तुम्हारी जरुरत हैं कान्हा !

स्नेह की
बड़ी -बड़ी परीभाषाएँ
बोलते सूना हैं पडा हैं ,देखा हैं,लोगो को
और अंत में सब को सत्य से मुँह मोड़ते ही देखा हैं |

क्या ये ही हैं स्नेह ?
या फिर किताबो के पन्नो से लिखना ही,
जीवन सत्य हैं
उसमे शब्दों के सच की आत्मा कँहा हैं
कँहा हैं स्नेह सागर |

मेरे कृष्णा !
तुम्हरा स्नेह सागर खाली होगया हैं अब ,
जिसकी जगह भरी हैं कठोरता ने ,
सहानुभूतियों ने , स्वार्थी होने के नामो ने ,

कँहा हो 
कान्हा जी आप 
इस संसार में , 
सब कुछ तो झूठा हैं यंहा 
एक नहीं सब रिश्ते झूटे हैं |
सब लुटने और मन को तीर चुभोने लगे हैं


कँहा हो कान्हा ?
स्नेह के सागर इस संसार के 
कलयुग में तुम्हारी जरुरत हैं कान्हा
अपने बैकुंठ से चले भी आओ ,
चले भी आओ ,

अनुभूति














राधा का विश्वास


ओ कन्हियाँ
तेरी बावरी राधा ,
तुझे यमुना तट पुकारे ,
ओ श्याम ,
अपनी बंसी ले आओ ,
नदियाँ किनारे
तुम्हारी बंसी बिन सूना पडा ,
राधा का संसार ,
विशवास हैं राधा को ,
मेरे कान्हा जी आयेंगे ,
बाटनिहारती खड़ी हैं राधा रानी
बूंद - बूंद गिराती जाती हैं,
अखियाँ से पानी ,
कान्हा जी
अब तो आजाओं
तुम ही कहो हो राधे जब पुकारोगी
में चला आउंगा , यमुना किनारे
चले आओ ,
श्याम
!
राधा रानी का ये विशवास
पूरा कर जाओ ,
वो पगली कुछ नहीं मांगे ,
वो खो जाए ,बस सुन ,
तुम्हारी मुरली की धुन
युमना तट चले आओ एक बार
अपनी राधा का विश्वास पूरा कर जाओ !
मेरे मुरलीवाले!
मेरे कोस्तुभ धारी !
श्री चरणों में अनुभूति

रविवार, 29 मई 2011

हां मेरे प्रभु राम !

मेरे राम ,

ये संसार कहता रहा राम जी ने
सीता जी का त्याग किया |
सोचती हूँ !
कभी कोई समझ सका होगा राम,
आप के अंतर मन की वेदना को 
विरले ही समझ पाया होगा कोई
वो राम जिन्होंने एक काक {कोवे }
के सीता को परेशान करने पे ,
ब्रह्मा अस्त्र का उपयोग किया था |
संसार की सबसे बड़ी शक्ति का प्रयोग 
एक छोटी सी बात के लिए किया था ,
वो राम अपनी सीता का त्याग केसे कर सकते थे |

दुनिया कही न कही ये आरोप आप पे लगाती रही राम !
की राम जी ने सीता को त्याग दिया |
वो नहीं जाने ,
उन्ही जनक नंदिनी सीता के लिए ,
विशाल सागर को जीता था आप ने
केसे काटा होगा पल -पल कब कोन समझा हैं राम !

आप तो अपने होठों को बंद किये बस सहते ही रहे ,
कँहा कह सके अपनी पीड़ा को ,
बस त्याग और तपस्या की मूरत ही बने रहे .
तडपती रही आत्मा ,
दिखाएँ नहीं आप ने कभी अपने आसू 
बने रहे कठोर .


निभाते रहे पुरुष की मर्यादा
हां राम !
असीम स्नेह के सागर को छिपा जाना,
भी एक बहुत बड़ा त्याग था |

आप ने ही विशाल सागर को पार किया था ,
दशानन का वध|
हां , राम ये एक नारी का असीम स्नेह ही तो था
जिसके आगे आप अपने से भी विवश थे |
क्योकि अनन्य भाव और श्रद्धा से समर्पित थी वो नारी |
सीता तो अपने अश्रु बहाकर , 
व्यक्त कर देती थी अपनी पीड़ा को
और राम आप तो अपने अंतस से जलते ही रहे ,
कभी खोल न सके आप अपने होठो को , ,

सीता ने भी कितना सहा हैं राम ,
पवित्र होने के बाद भी , 
पराये पुरुष के घर में रहने की ,
अग्नि  परीक्षा से गुजरना पडा राम !

सामने होते हुए भी नहीं लगा सके ,
अपनी सीता को तो गले आप 
सोचती हूँ राम का ये रूप क्यों नहीं देखती दुनिया .
नारी की वेदना तो समझती हैं लेकिन 
वो जो रो नहीं सकता ,कह सकता
क्या वेदना नहीं उसकी?
स्नेह का अधिकारी वो नहीं !

कँहा चेन दिया दुनिया ने आप को !
पल -पल आप के नितांत
निजी विषयों के पीछे  ही पड़े रहते हैं  
दुनिया के लोगों ने तो उस सुख में भी लगा दी आग 
अपने प्राणों से प्यारी सीता को
छोड़ने का प्रश्न आप से किया ,
राम ,कितनी बड़ी संकट की घड़ी होगी ,
जब लगाया होगा ,
जब अपनी सीता को कहा होगा 
स्वार्थी , सहानुभूति का नाम दिया होगा |


न जाने कब तक भुगतते रहोगे उन शब्दों  की पीड़ा 
केसे किया होगा ?
अपनी आत्मा को शरीर से निकालने का ये काम 
हां राम ! 
केसे किया होगा अपनी सीते का त्याग ?


केसे जीते होगे ?
बिना अपनी सीते के , बड़े थे|
किसको कहे होगे अपनी पीड़ा !
घुटते रहे होगे ,कितना राम !

फिर भी संसार की सेवा के काम में ,
अपने दर्द को छिपा दिया राम आप ने
कोन समझ सका हैं आप की वेदना को !
सीता ही समझ सकी ,
क्योकि वो नहीं चाहती थी |
राम का मस्तक कभी 
किसी नारी के लिए संसार के सामने झुके
वो नहीं देना चाहती थी 
आप को दुनिया के सामने कोई 
नया नाम , 
इतना बड़ा त्याग किसी साधरण इंसान 
के बस की बात नहीं राम ,
आप अवतार ही हो स्वयं शिव का , 
कृष्ण का ,
नारायण का
राम आप राम ही हैं इसिलए 
इस संसार में आज भी दुनिया जप्ती हैं 
आप का नाम
ओ मेरे राम ,
मेरा  जीवन यूँ ही निकल जाए,
लेते -लेते आप का नाम |
इतनी शक्ति मुझे भी सहने की दीजों
और अपनी ही तरह कठोर होने का वरदान मुझे भी दीजों |

हां मेरे प्रभु राम !
शीश झुकाके करती हूँ 
आप के उस अनन्य त्याग को नमन
इतनी ही सहने की शक्ति मुझे भी देना ,
बस मेरे राम !

अनुभूति

कर रही आत्मा मेरी वीदिरण पुकार


मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कान्हा !
कर रही आत्मा मेरी करुण पुकार
अब नहीं सहा जाता ,
चले आओ मेरे प्रभु !
बस एक बार
इस आत्मा की सुखी धरती पे
छा जाओ बन के घटा
बरस जाओ इस प्यासी आत्मा पे एक बार |
सुन लो ।
एक बार मेरी ये करुण पुकार !
अनुभूति

स्नेह का एक रूप ये भी !

मेरे कोस्तुभ धारी !
के चरणों में 
खुद को भी नहीं पता ,
पता हो तो भी स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती |
ऐसा भी होता हैं मेरे कन्हियाँ !

शनिवार, 28 मई 2011

हमें रास्तो की जरूरत नहीं !हमें तेरे पैरों के निशा मिल गये हैं |


मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे कान्हा !
के श्री चरणों में अर्पित एक अत्यंत भावमयी रचना ,
एक -एक शब्द आत्मा को छूकर जाता हुआ.|
हमें रास्तो की जरूरत नहीं ,हमें तेरे पैरों  के निशा मिल गये हैं |
जन -जन की सेवा यही मेरी पूजा ,
तुम ही तुम हो कोई न दूजा ,
तुमसे  हैं सब कुछ रोशन ,
कण -कण में तू हैं |
अनुभूति

तेरी भक्ति की शक्ति,


मेरे कोस्तुभ धारी!
मेरे
मुरली मनोहर !
तेरी
भक्ति की शक्ति,
तेरे विश्वास का उजाला ,मेरे चेहरे पे चमके ,
तेरे अनन्य अनुराग का तेज ,
मेरी रूह से झलके ,
कान्हा !तुझसे ये प्रीत जो जोड़ी ,
मेरा रोम -रोम कर दिया पावन ,
तेरी भक्ति की शक्ति ने
इन धवल वस्त्रो में ,मेरी आत्मा भी धवल हें|
प्रभु!मेरी आत्मा में बसे ,
तेरे अक्ष्णु विशवास की तरह , 
मेरे मस्तक के रक्त बिंदु की तरह
फैला जीवन में नव सृजन का ये उजाला
तेरे श्री चरणों में शीश नवा के |
ओ कोस्तुभ धारी!
पाकर आप को इस आत्मा में धन्य हुई |
आप के श्री चरणों में कान्हा जी


अनुभूति

फ़रिश्ता


इंसान के बुत की करू इबादत केसे ?
में तो करती हूँ फ़रिश्ते की बंदगी|
इंसान तो अक्सर दे दिया करते हैं,
धोखा जीवन के रास्तो पे ,
फ़रिश्ते तो साथ होकर भी दीखते नहीं ,
जीवन के रास्तों पे |
खुदा मिला मुझे अगर तो कहूँगी 
दे दे मुझे संसार का दुःख सारा ,
अगर बदले में
जो दुवाओं में फ़रिश्ता कोई तुम सा मुझको आ मिले |
मांगने को और कोई सोगात बाकी नहीं
जो जीने को इन सांसों में  नाम आप का मिले|

अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................