शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जीवन के हर मोड़ पे यूँ ही चले आना तुम मुझको थामने मेरे राम
कभी खुली हवा सी बहती हूँ मै ,तो कभी अपने को हजारो बेडियो मै बंधा पाती हूँ|
सोचती हूँ तोड़ सारी बेडियो को मै ,निकल जाउ  अनजान किसी डगर पे
पर अहसानों के तले दबा है जीवन ना जाने कितने तुम्हारे राम|
हर पल अंधड़ सा बह रहा है तन मन मै जीवन तुम्हारे नाम से
मोह ,प्यास ,बैर ,प्रीति सब कुछ दूर जारहा इस आत्मा से
भीड़ से शून्य की और क्यों बह रहा जीवन तुम ही बता दो राम
सोचती हूँ कही कायर तो नहीं ?
फिर क्यों आत्मा खीच रही विरानो को .]
जीवन के हर मोड़ पे मुक्ति का मार्ग बताने यु ही चले आना मेरे राम |

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मेरे राम

निशब्द निशा मै है मन विचलित ,दुंद रहा मन राम, राम

तन, मन सब कुछ राम राम ,

साकार ब्रह्म ,साकार रूप है राम

रग ,रग मै बसे राम ,घट घट मै बसे राम

चहु और बसे कण कण मै बसे राम

राम , राम ,राम

मन की आस बस राम तन का अंत बस राम

तुम ही हो मेरे उद्धार करता , मेरे राम

पाऊ जो जीवन मै दर्शन तुहार

तो धो डालू अशरुओ से चरण तुहार

कब मिलगा ,फल मेरी भक्ति का ,

इस आस मै जीवन रही गुजार

कभी तो इस धरती पे भी तुमको आना होगा एक बार फिर

साकार कर जाना होगा ,जीवन मै भक्तो का उद्धार

मेरे रोम रोम मै बसे भगवान मेरे राम

तुम्हरे दर्श बिन सूना जीवन ,सुनी पड़ी दुनिया मेरी

तोड़ निशब्द निशा को आजा एक बार

देजाओ जीवन मै आशीष ,एक बार फिर

जाओ मेरे राम

जाओ मेरे राम |

सोमवार, 25 जनवरी 2010

सरिता का मोक्ष


बह रही है सरिता अपनी ही धाराओ ,मै सब कुछ छोड़ कर
जीवन के सारे बन्धनों को तोड़ कर
हां सरिता का प्रवाह समय के साथ साथ बहुत तेज हो रहा है
उसे जल्दी है सागर मै अपना अस्तित्व खोने की
फिर भी उसे रास्ते मै आये कई पहाड़ो से सीखना है जीवन के जड़त्व को
और रोकना नहीं है अपना वेग
और जो समय से आगे चले वो सरिता अपने साथ उठा ना दे कोई बाद
हां डरती हूँ कही वो गंगा से कोसी ना बन जाए
और बहा ना ले जाए अपने साथ जुड़े कई सपने
हां ,आज भाग्य से तुम आमिले हो सागर की कही तुम्हारी ही आस मै भटक रही थी
अपनी विशाल धाराओ मै सरिता
तुमने सामने आकर आज थाम लिया उसकी प्रचंड लहरों को
की थमो तुम्हारी मंजिल ये नहीं ,
तुम रोहिणी हो तुमको तो अभी और उचाईयो पर जाना है
अपने वेग को शांत करो ,जीवन धारो को दो एक नया आयाम
हां शांत करो इस वेग को ,नहीं तो ये तुम्हारे साथ ना जाने कितनी बस्तियों को उजाड़ देगा
हां इस सागर के मिलन के बिना अधूरी है सरिता
सरिता को अपनी पहचान देने वाले सागर तुम मानो ना मानो सरिता तुम्हारा इस अंश अपने मै समेटे बह रही है जीवन की इन गहरी जल धाराओ मै ,इसी प्रतीक्षा मै कभी तो सागर से होगा उसका अंतिम मिलन
वही तो होगा सरिता का मोक्ष

रविवार, 24 जनवरी 2010

एक सपना खुली आँखों का


मै भी देखती एक सपना खुली आँखों से,
की वो मोड़ एक बार फिर आजाये ,
हां उस रात की तरह सजी हु मै
नयी दुल्हन की तरह और तुम साथ हो मेरे
पास हो बहुत फिर भी अहसासों से दूर नजर आते हो ,
इसलिए देनी पड़ी है शब्दों को जुबा
उसी महकती रात की तरह मै बन जाना चाहती हूँ नयी दुल्हन
मेहँदी के खुशबु वाले महकते हाथ और महकते मोगरे मै
एक बार फिर महक जाना चाहती हूँ मै ,
सूर्ख रंग मै रंगी हुए
,अपने आप मै जीवन के सारे रंगों को समेटे हुए एक बार फिर ...............
आँखे बंद करती हूँ तो खो जाती हु
वही घंटो तुम्हारे काँधे पे सर रखे तुम्हे सुनते हुए
कितना ,खुबसूरत है था ना वो पल ,
सब कुछ मन की कही फिर भी उन अनकही सी
गुनागुना रही हूँ मै,
उन पलों को सुनहरी धुप मै नदी के किसी किनारे तुम्हारे साथ
हां मेहंदी लगे हाथो मै ,हां तुम्हारे हाथो मै हाथ ।
पहले कभी कह नहीं पायी ,हां घूँघट उठाने से पहले की मुह दिखाई मांगना चाहती हूँ आज तुमसे आज ,
सब कुछ है पर सुनी पड़ी है कदमो की आहटे
इसीलिए छम -छम करती पायलों केसाथसब कुछ खनकता हुआ महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
हां इसीलिए मांगना चाहती हूँ पायले,
एक बार फिर बन जान चाहती हूँ दुल्हन तुम्हारे साथ
तुम तो सब कुछ भुलाए बैठे हो ,तो फिर क्यों ?
ना गुन्गुनालू ये पल दोबारा तुम्हारे साथ
सरिता -सागर

सपना

मन को लागे नए पर ,दूर तक उड़ने को
जो चाहा वो मिल गया सनम
फिर क्यों दिल कहे तेरे काँधे पे बैठ जाने को
ऐसा लगे की बरस रहा प्यार तेरा ,अंखियों से
झगड़ रहा अधिकार तेरा फिर भी ,
किसको मानु अपना तुझको जो सोप गया जीवन
उसको जो आज जता रहा अधिकार अपना
कोई नहीं अपना जानती हूँ
सच हो नहीं सकता सपना .सपने पुरे करने के लिए जिगर चाहिए
और वो होसला जो सिर्फ तुम्हारे पास है हां जी ,जो सिर्फ मेरे साथ है

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सरस्वती और बसंती बाई

आज जनम दिन है मेरी दादी बंसतबाई का
हां ,और आज जनम दिन है सरस्वती का उस सरस्वती का जो कही पूरी नहीं हो सकी !
हर तरफ लोग पहन रहे बसंती रंग ,आज रंगा हर कोई इसी बसंत के रंग मै
फिर क्यों या याद रही है मुझको बसंती बाई{जीजा}
हां वो इतनी बुदी महिला ही थी जिसने स्वीकार किया था अपने पोते का ये प्रेम विवाह
हां बहुत अलग थी वो रुदिवादी विचारधाराओ से ,वो करवाना चाहती थी नोकरी मुझसे
बनवाना चाहती थी अपने पोते का घर ,आँगन
हां आज तुम्हारे ही रूप मै जनम हुआ था सरस्वती का |
हां ,सरस्वती कभी पूरी नहीं होती ,क्योकि वो इसीतरह जनम लेती रहती है कभी .माँ तो कभी दादी बनकर
तुम्हारे रूप मै ।
तुम युही अपने आशीर्वाद के साथ हम्रारे दिलो मै निवास करती रहोगी ,औरदेती रहोगी ज्ञान और सोभाग्य
आशीष सदा ,
हां तुम्हारा ही तो रूप है आज की सरस्वती
हां तुम अशिश्ती रहो युही सदा ,दादी बनकर तो कभी माँ बनकर



मंगलवार, 19 जनवरी 2010

GHUTAN: माँ

GHUTAN: माँ

माँ

क्या होती है माँ ?
नहीं पता मुझको ,क्योकि मै बन नहीं सकी कभी माँ
हां अपनी माँ के साकार रूप को देखा है मेने ,
इसीलिए ही शायद मन अपने स्त्री होने के अपने अस्तित्व को खोज रहा है
मुझको याद है उसका अलसुबह उठ जाना ,हमारे लिए तैयारी करना
कितना प्यार गुंधा होता था ,उन मैथी के पराठो मै ?
हां ,अब मुझको पल पल याद आता है जब मै नहीं बन सकी हु एक माँ
माँ के सपनो के आँगन से तो मै निकल आई हु यतार्थ जीवन मै
और हां बन नहीं सकी हु माँ
हां माँ कभी मै रो नहीं सकी तुम्हारी गोद मै सर रखे ,किस्मत से शिकायत किये की मै नहीं बन सकी हु माँ
जानती हु मै जब तुम देखती हो मुझको किसी खिलोने से खेलते हुए तो क्या सोच रही होती हो ?
और होले से एक आवाज लगाकर कहती हो ,अरे क्या बचपना है ये !
मै जानती हु ,तुम कभी मेरे असीम दर्द का कोई अहसास मुझको नहीं कराना चाहती |
इसीलिए मुझको एक हलकी सी आह्ट से ही खीच लेती हो ,अपने आँचल मै
सच कहू तुमको पाकर सारे दर्द भूल जाती हु और बन जाना चाहती हु एक बार फिर वही छोटी सी तुम्हारी बेटी
हां तुम्हारा ह्रदय बड़ा विशाल है की तुमहंस कर छिपा देती हो या कभी डांट कर
मुझको पता है एक किसान तभी खुश होता है जब उसकी बचाई बिजवारी भी उसको भरपुर फसल देती है |
पत्थर पूजते पूजते भी अब हार गयी हु माँ ,
इसीलिए भाग जाना चाहती हु ,इस दुनिया से दूर छीप जाना चाहती हूँ तुम्हारे आँचल मै
हां इसीलिए की कभी ना बन सकुगी माँ |



पत्थर का मसीहा




श्रद्धा से पूजे कोई" पत्थर" तो वो भी बन जाए खुदा ,
हम तो पूजे पत्थर ,वो पत्थर जो बन बैठा है मसीहा

कहते रहे लोग विशवास नहीं करना 
और हम लगाये बैठे है आस एक पत्थर से

ये विशवास ही तो है मेरा राम के पूज रहा मन एक पत्थर
जानता है मन एक दिन तो पत्थर भी जाग उठेगा मेरी करुणपुकार से,

और भर देगा मेरा आँचल अपने दुलार से ,
हां सब कुछ श्रद्धा और विशवास का ही तो खेल है ये

कि मान बैठा है एक पत्थर को मसीहा
हां वो पत्थर का मसीहा कभी तो देखेगा 

,प्यार भरी निगाहों से मेरे खाली आँचल को भी ,
और देगा जीवन को नया नाम ,और नया रूप

हां कभी तो वो पत्थर भी बन जाएगा मेरे लिए" पत्थर का मसीहा "|

सोमवार, 18 जनवरी 2010

कुछ नहीं पता



हम तुमको चाहे या ना चाहे ये खुद हमको भी पता नहीं
ये सिलसिला क्यों है खुद नहीं पता
तुझमे दुन्दते है खुदा हमको मिलेगा या नहीं हमको नहीं पता
फिर भी बेबस से घूमते है हम तेरा नाम दिल से लगाए क्यों ?
ये खुद भी नहीं पता |
क्यों कर बैठा है दिल ये खता खुद हमको भी नहीं पता ?
तेरी बंदगी मै है जो मजा ,वो खुद तुझको भी नहीं पता ।
श्रद्धा का अर्थ जाना है जीवन से ,साकार रूप पाया तुममे ,
सब कुछ क़हा फिर भी बहुत कुछ क़हा अनकहा ,क्यों?
ये खुद मुझको भी नहीं पता ।
क्या,तलाशता है तुझमे दिल खुद मुझको भी नहीं पता ?
सोचा नहीं था ,ये मोड़ भी आयेगा ,की तुम साथ होंगे तो जी उठेगा फिर मन
खिल उठा है मन का रोम रोम खिली खिली धुप की तरह
तुम चाँद हो या सूरज खुद मुझको भी नहीं पता ?
हां सुनहली धुप हो या ठंडी चांदनी खुद खिल उठी जिन्दगी को भी नहीं पता ?
या सब कुछ सामने है फिर भी मुझको कुछ नहीं पता ?
की क्या है ये ?
सजा या खता ?







जीवन और तुम

तुम और ये जीवन दोनों एक दुसरे के पूरक हैं
तुम बिन जीवन नहीं ,तुम बिन मै नहीं
मेने पाया है तुममे वो पूरा इंसान जो मुझको कही पति नहीं नजर आया ,
मेरे शब्दों को तुमने ही दिया है साकार रूप ,
और जीवन जीवन को दिया है सार्थकता का साथ
हां तुम ,वो धीरज ही तो हो ,जिसके बिना जीवन का कोई मोल नहीं
कभी कह नहीं पाती वो हजारो बाते तुमको जो पग पग देती है मेरा साथ
और तुमको समझा नहीं पाती ,अपनी घुटन
मुझको तलाश है आध्यात्म की ।
और तुम्हारे स्नेह ने बना रखा है मुझको अपने काँधे की चिड़िया
तुमने ही दिया है जीवन को अनंत सोच का आकाश
फिर क्यों अपने काँधे पे ही बिठाये रखना चाहते हो अपनी इस चिड़िया को ?
तीसरी फ़ैल कहते कहते ,तुमने मुझको ला खड़ा किया है जीवनको पी एच डी के सामने
क्यों ,डरता है तुम्हारा असीम स्नेह की कही धारण ना करलू कोई भगवा ?
नहीं ,मेने तुम्हारे रंग का भगवा धारण किया है और अब मै शायद इस जन्म मै और किसी रंग मै ना रंग सकू|

कैसे समझाऊ तुमको ?
जीवन की ये धारा अब जिस और मुड़ चली है वो अब किसी बंधन मै बंधा नहीं है|
वो मुक्त है ,अनंत आकाश का राहू है ,जो पाना नहीं,देना चाहता हैं |
अपना जीवन समर्पित करना चाहता है दुखियों की सेवा के नाम

क्यों समझा नहीं पारही ये घुटन तुमको ?
शायद इसीलिए की तुम और जीवन एक दुसरे के पूरक हो !


तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................