बुधवार, 8 जून 2011

ये जीवन तुझको अर्पण ,मेरे कृष्णा !


मेरे कृष्णा !
मेरे मीत !
ये जीवन तुझको अर्पण
मुरलीवाले!
तुम चाहों तो,
मुरली बना के अधरों से लगा लो ,
चाहे तो आत्मा में बसा के,
गीता का ज्ञान बना दो ,
रही हैं इस संसार में ये काया ,
इसको तो जीना ही होगा न
आत्मा तो ना जाने कब से,
सत्य पे अर्पित पड़ी हैं
मेरे कोस्तुभ धारी !
तुम्हारे पवित्र स्नेह में इतनी क्षमता
जो धुल को भी , चन्दन बना दे |
में रस्ते का पत्त्थर प्रभु ,
मुझे बस दुनिया की ठोकरों से बचा ले |


अनुभूति



में प्रतीक्षा रत हूँ तुम्हारे लिए मेरे कोस्तुभ धारी !

कृष्णा!
मेरे प्रभु !
मेरे कोस्तुभधारी ,
मेरे राम !
सब कुछ तेरी शरण
चिंतित हैं मन कित जाऊं .
कोनसा पथ में पाऊं ,
कोई पथ नहीं. न कोई उजाला 
फिर भी निर्णय अडिग हैं मेरा ,
खोफ और डर समाया हैं मन में , 
प्रभु , तेरे सिवा किसे जानू ,
मेरी आत्मा के स्वामी तुम, 
तुम अन्तर्यामी , तुम सब जानो कान्हा !
और नहीं कोई बंधू , सखा ,भ्राता मेरा
इस दुनिया में क्षण-क्षण घूम रहे
कितने आदमखोर में किसे जानू ,
समझ नहीं दुनिया की फिर भी
कान्हा तेरे  विशवास पे ये सब त्यागु |
और कोई याचना नहीं मुझे ,
संघर्ष में करुँगी ,बस मार्ग तुम तय कर दो ,
जीवन का जब नव सृजन दिया हैं
तो पथ भी तुम तय कर दो बस , 
धन , संबध की चाह नहीं तुमसे कान्हा जी ,
मुझे खुद भी खबर नहीं क्या करूंगी ,कँहा बसुंगी ?
जो समय चाहेगा वो करुँगी ,
किसको पुकारू इन अंधेरो में ,
मेरा राम का अक्ष्णु विशवास 
भी कही घिरा पडा हैं मन के संदेह के घेरों से |
में ना जानू राम! आयेंगे या कोस्तुभ धारी मेरे !
में तो प्रतीक्षा ही कर सकती हूँ अब 
कह -कह के पुकार -पुकार के,
कान्हा में तो हार गयी तुझे भी पुकार के
आत्मा खड़ी हैं विशवास रख ,कहती हैं समझाती आई हूँ 
"जितना विशवास राम पे उतना अक्ष्णु विशवास तू रख "
विश्वास पे नहीं संदेह मुझे 
कही ये खोखले शब्द न हो मन यु डराए ,
आत्मा हैं की जीने की रट लगाये जाए |
कान्हा जी !
केसा नया रूप रोज दिखाओ मुझे 
कभी तो निकल इन छदम रूपों से
अपने पुराने वास्तिक स्नेह मयी रूप में आओ
आत्मा समझ न सके ये रूप बनावटी सारे 
वो तो मिटी जाए बस अपने सीधेश्याम सलोने पे |
जीवन भर डोली हूँ कभी न कोई निर्णय सकी हूँ 
ये अब बदलेगा नहीं |
कान्हा !,तुम्हे पुकारू 
मेरे कोस्तुभ धारी !
कित हो कँहा हो , अब मार्ग दिखाओ मुझे भी|
सारे संसार को गीता ज्ञान देने वाले कोस्तुभ्धारी !
संसार को मार्ग देने वाला मुझसे सी खफा बेठा क्यों हैं ?
पर मेरे मन प्रभु तेरे ही विशवास का दिया जलाएं क्यों बेठा हैं !
नहीं खफा हो तो छोड़ बैकुंठ कुछ देर ही
चले आओ , में प्रतीक्षा रत हूँ तुम्हारे लिए
मेरे कोस्तुभ धारी !
चले आओ


आप के श्री चरणों में एक पुकार मेरे कान्हा जी !

मंगलवार, 7 जून 2011

"आज कल पाँव जमीन पर नहीं पड़ते मेरे"

"आज कल पाँव जमीन पर नहीं पड़ते मेरे"
जो मुझे बचपन से बहुत पसंद हैं इस गीत के मधुर शब्द और लता जी की आवाज 
जब आत्मा बहुत सुकून में होती हैं
वो ये गीत गुगुनाती हैं |

ये सरिता अब बह चली हैं



मेरी सुबह और सुबह का सूरज ,तेरा अक्स
रोज नया उजाला देते हैं,
तेरा अक्स , तेरे शब्द 
तेरा अक्स कहता हैं चली आओ ,
थाम लूंगा में तुम्हे , 
एक बार निकल आओ इन अंधेरो से ,
हां तुम्हारे लिए,
मेरा गुनगुनाता हुया सपना इन्तजार करता हैं 
कल मिल आई हूँ अपनी पुरानी यादो से माँ के घर
सोचती रही रात भर
क्या हवा से बात करने वाली ,
लडको की तरह पतंग काट देने वाली ,
बाईक चला कर लडको से रेस लगाने वाली , 
कट मारने वाली अनु 
वो अनु जिससे बात करने का साहस ,
कोई लडका नहीं कर सकता था ,
वो जो कराते खेला करती थी
मुकाबला किया करती थी हर पल लडको से 
और सदा ही जीत जाया करती थी 
वो उन्मुक्त चिड़ियाँ कँहा हैं जो लड़ा करती थी 
अपने पड़ने के लिए , पल -पल जीने के लिए
वो कँहा हैं आज अपनी कविताओं में अपने शब्दों में
वो नहीं हैं क्या आज ?
क्यों तुम हार गयी हो ?
जीवन में स्नेह नहीं मिला तो 
क्या जीवन टूट जायेगा ?
हार जाओगी तुम ,
 नहीं, नहीं में नहीं हारी कभी
में नहीं मरूंगी ,मुझे तो अभी जीना हैं बहुत 
जरुरी नहीं हैं सबको सब कुछ मिले
प्यार के बिना भी तो जीवन हैं |
अनु की दुनिया नहीं हैं प्यार !
वो तो हमेशा लड़ी हैं उस पहले तमाचे से लेकर अब तक 
हां अब तक , इसीलिए तो तुम जिन्दा हो" अनु" आज भी
तुम साधरण नहीं हो ,इतना जान लो
वो तुम ही तो जो पहली बार अपने ही
टीचर का गलत बात पे पीटने पर हाथ पकड़ने वाली
और सदा ये कहने वाली ,
"की अन्याय करने से सहने वाला ज्यादा दोषी हैं |"
यूँ निराशा और मरने की बात करने वाली मेरी "अनु "नहीं हैं |
चूड़ियाँ,पायल और बिंदिया तेरे सपने नहीं रहे कभी ,
कँहा खो गयी मैदानों में दोड़नेवाली  और 
एक ऐ स आई  वाली बनने की चाहत रखने वाली "अनु "
मुझे लड़ना हैं जिन्दगी तुझसे
ये कवितायें मेरी दुनिया नहीं ,
ये घर मेरी दुनिया नहीं ,
आँखे खोलो दुनिया में सब कुछ बाकी हैं"अनु "
हां में नहीं अब सहूंगी ,
किसी का कोई तमाचा ,कोई गाली या 
साहनुभूति वाला प्यार
में खोजूंगी अपना रास्ता ,
ईशवर तुमने मुझे इसीलिए ज़िंदा रखा हैं
और सहने की शक्ति दी हैं शायद ,
अरे में तो बहुत किस्मत वाली हूँ 
जिसके लिए पूरी दुनिया परिवार हैं 
माँ , बेटी ,बहन सारे रिश्ते हैं |
खोलो अपनी आँखों को और देखो
एक नया जीवन तुम्हारा इंतजार कर रहा हैं |
सब कुछ होगा कोशिश करने वालो की होती नहीं हार |
हां निकल पड़ी हूँ में नयी जिन्दगी तेरी तलाश में ,
सारे बन्धनों को तोड़ बह चली हैं सरिता ,
अब नहीं जिन्दगीं  तुम्हारे कदमो में बैठ के लगानी होगी अपनी लाचारी पे गुहार
हां मुझे पूरा करने हैं अपने को खड़ा करने के सपने ,
ये सरिता अब बह चली हैं
नही रुकगी ये अब |
अनुभूति 

|

सोमवार, 6 जून 2011

तुम्हारी मुस्कुराहट

इंसान ,भगवान सभी कुछ हैं
लेकिन फिर भी  में तन्हा हूँ ,
क्योकि तुम भी तो वंहा तन्हा हो |
पल -पल जब बनावटी कठोरता खीच लेती हैं जिस्म से रूह को , 
बिंध देती हैं हैं कठोर शब्दों के अघात से आत्मा को ,
सब कुछ शून्य हो जाता हैं |
हर शब्द जब रूह से निकला सत्य हैं 
तो होठो तक आते -आते बनावट क्यों हो जाता हैं |
मुझतक कभी आने वाली महकती तेरी खुशबु ,
दुसरे ही पल जहरीली क्यों जाती हैं !
क्यों चला करते हैं  अंतर द्वन्द तुम्हारे मन में
मेरी ही तरह तुम्हारी कशमकश साफ़ झलकती हैं तुम्हारी रूह में , ,
में जब होती हूँ इबादत में ,
मेरा खुदा रो रहा होता हैं अपने हाल पे ,
अपनी भीगी अखियों से मुझे कह रहा होता हैं ,
मुझे माफ़ कर दो "अनु "
में तुझे कुछ न दे सकूंगा 
न दुआ, न प्यार ,न आदेश 
और में कह रही होती हूँ |
मेरे खुदा तेरी आँखों में अश्क नहीं मंजूर मुझे ,
न तेरे दिल में कोई दर्द ,
मुझे कुछ नहीं चाहियें 
सिवा तेरे लबों  की इस पाक  मुस्कुराहट के |
मुझे जिन्दगी से महोब्बत नहीं ये नहीं कह सकती
इसीलिए मेंज़िंदा हूँ ये देख कर भी 
तुम्हारी मुस्कुराहटों को अपने दिल में लिए |
ताकि मेरे खुदा तुम समायें रहो 
अपनी मुस्कुराहटों के साथ मेरी रूह में सदा के लिए |
मुझे कोई शिकायत नहीं 
सदा की तरह मुझे मेरे खुदा
क्योकि तुम मुझे मुस्कुराते हुए ही अच्छे लगते हो ,
इसीलिए मुस्कुराते रहो ताकि 
में भी मुस्कुराते -मुस्कुराते जीती रहूँ |

आप के श्री चरणों में मेरे कोस्तुभ धारी
अनुभूति



सच से प्यार हैं |

"सत्यम शिवम् सुन्दरम "
मैं अपनी ही सांसों से पल -पल,
तुम्हारे सच के लिए लड़ती ही जा रही हूँ ,
कैसे कह दू की ऐ जिन्दगीं,
में तुझे भूली जा रही हूँ|
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |

जिन्दगी  और मौत से अब कोई सरोकार नहीं मुझे ,
लेकिन तेरे सच पे ,कोई और तो ठीक हैं मेरा मन भी इल्जाम दे  ये भी गवारा नहीं मुझे ,
मे तो हूँ उनमे से   लड़ती रहूंगी ,तेरे सच के लिए ,
तेरे शबदो के सत्य के लिए , तेरे विशवास के लिए ,
क्योकि मेने अब जाना मेरी जिन्दगी भी बनी हैं ये तेरी इबादत के लिए |
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शबदो के सच से प्यार हैं |

मेरी सांसे और तुम्हारे स्मृति पटल पे अंकित शब्द एक दुसरे से लड़ते हैं यूँ
सांसे कहती हैं छोड़ मुझे , वो झुटा हैं यूँ
और शब्द कहते हैं कही तो मजबूर हैं वो यूँ 
अगर मेरे खुदा झुटा हैं तू ,
तो मेरा तडपना , तेरे लिए जिन्दगी से भी बड़ी सजा होगी ,
क्योकि अब न दे सकेगा तू किसी के स्नेह को स्वार्थ और सहानुभूति का नाम ,
इससे बड़ी और क्या सजा होगी  तेरे लिए होगी|
 हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |

खेलता मैदान ऐ जंग में किसी दुश्मन से तो बात ही कुछ और होती ,
जो तुझे जान भी न पाया कभी उसके मासूम दिल से खेल जाना कँहा से बड़ी बात होगी  |
जिन्दगी भर ये  मेरी ये साँसे दुवाएं देंगी तुझे ,
ये ही मांगेगी वो अपने मालिक से की तुम जहा रहो बन के खुदा इस जँहा में जियों ,
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |


मेरी इस हाल  के जिम्मेदार तुम नहीं , 
वो हर लम्हा - लम्हा हैं जो इन सांसों ने साथ गुजरा हैं ,
वो हर आतम आनंद अनुभूति हैं जो आत्मा में बसी हैं ,
स्मृति पटल पे अंकित वो शब्दही हैं ,
हाँ जो मुझे आज भी ज़िंदा रखे हैं ,
हाँ क्योकि मुझे तुम्हारे शब्दों  के सच से प्यार हैं |



अनुभूति

रविवार, 5 जून 2011

संसार का सबसे बड़ा सत्य , एक ही "राम "

संसार का सबसे बड़ा सत्य ,
एक ही "राम "
जनम ले शरीर तो भी राम  ,
छूटे तो भी राम !
मेरा अंतिम सत्य भी,
मेरे आराध्य राम!
जितनी अखंड स्रष्टि उतना,
अंखड मेरा विशवास ,
एक - एक शब्द हैं जो सत्य वो हैं मेरे राम !
समय , हालत कँहा डोला सके हैं
ये विशवास ,मेरे राम!
संसार झुटा हो सकता हैं
हो सकता हैं हर इंसान 
जो झुटा हो ,मेरा राम!
तो में त्याग दूँ ,ये प्राण !
कोई मोल नहीं ,इस शरीर का 
मिट के तो रूह मिलेगी राम से 
हां अपने आराध्य से ,
इस संसार में सब झूट ये आत्मा का ही रुप सच्चा एक मेरे राम !
संसार की कोई ऐसी यातना नहीं बनी,
जो तोड़ दे मेरा विशवास ,
कोई छीन तो ले मुझसे मेरी आत्मा ,
मेरे रोम -रोम में बसा मेरा राम !
शक्ति को तो अभी परखा नहीं तुमने संसार 
देखा नहीं रूप भक्ति का अभी इस जँहा में एक बार
जो शरण लगा एक बार मेरे राम 
वो ले छुटे प्राण ,
तो भी न निकल सके ,
इस रूह से राम !
मेने पुकारा हैं इस संसार में,
हर सांस से सिर्फ राम नाम
में तो अडीग धरा हूँ ,
कँहा समझ सका कोई ,
डोलने वाला सागर नहीं में 
ना जाने कितनी बार हुआहैं  प्रलय ,
कितनी  बार सागर तुमने इस धरती को लीला हैं 
फिर भी अंनत काल  से ये अडिग खड़ी हैं 
सामने तुम्हरा ही नाम आत्मा में बसाए ,मेरे राम !
मेरे नवसृजन का प्रारम्भ भी  राम !
अंत भी राम !
मेरे राम !

अनुभूति

शनिवार, 4 जून 2011

मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !

कोई कविता
या
गजल कहू केसे!
मेरे कोस्तुभ स्वामी!
मेरी आत्मा का हर छोर तो खुला पडा हैं आप के सामने ,
मेरे तो आंसुओं में भी आप हो और खिलती मुस्कराहट में भी आप हो 
मेरे तो मन का हर भाव भी आप और उससे बना शब्द भी आप .
मेरे कान्हा !
में तो कुछ लिख नहीं सकती
क्योकि मेरी याद भी आप ही हैं
कोस्तुभ धारी !
मेरी जिन्दगी भी आप ही हैं कन्हाई !
और कहू की आने वाला पल ,
और गुजरा हर लम्हा भी आप ही हैं
मुरलीधर !
मेरे तन मन , साँसों की खुशबु भी
आप ही के नाम से आती हैं
कान्हा !
दुनिया से कोई डर नहीं मुझे तेरी भक्ति में
मेने तो दुनिया ही त्याग दी हैं,
मेरे कृष्णा !
किसको कहू ,किसको बताऊ
की मेरे कोस्तुभ धारी!
में तुझे आपनी आत्मा से कितना चाहूँ .
आप मेरे स्वामी में
में आप की चरण दासी कान्हा जी !
फिर दूजा कोंन जो हमारे बीच सके |
मेरे कान्हा !
तेरे हाल पे में केसे हंसू !
आप भले ही मेरे हाल पे हँसते जाओं |
में तो हकीकत में हूँ
तेरी चरण दासी कान्हा !
तो काहे भुलाये बठे हो गिरिधर मुझे
में तो तुमसे कभी रूठू ,
तुम भी मुझे रूठे नहीं कभी
तो हम एक दुसरे को मनाये क्यों ?
हम तो हर पल -पल हर लम्हा साथ ही थे हैं और रहंगे
फिर मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !
नहीं लिख सकती इसीलिए कोई गजल
या कविता जो दर्द से भरी हो
जिसके रोंम -रोंम  मेंआप बसे हो ,
मेरे गिरिधर गोपाल!
उसके पास क्या खोना ,क्या तो पाना
क्या याद जाना
क्या हकीकत, क्या खाब
सब कुछ तेरा हैं मेरे कोस्तुभ धारी !
मुझे कभी नहीं लगा मेरा कान्हा मुझसे रूठा हैं
में रूठी हूँ कई बार दे दे ताना
तुम तो सरलता का सागर !
स्नेहाधिपति !
करुनाधर !
श्री हरी !
हर रूप हर रंग , हर सांस ,
कितना नशे में हूँ तेरे
कोस्तुभ के स्वामी
इन शबदो से केसे समझाऊ
इसीलिए नहीं लिख सकती
में कोई गजल या कविता
तुम्हारे असीम स्नेह पे
कोस्तुभ स्वामी !
मेरा स्नेह देखना हैं तो उड़ कर चले आओ ,
मेरा तो सपना अधूरा पडा हैं,
मेरे श्याम सलोने तेरे दर्शन का
 तेरे मेरे अंतहीन मिलन का
में प्रतीक्षारत हूँ सदा से
सदा रहूंगी |
सिर्फ अपने कान्हा की
कोस्तुभ स्वामी की
दासी


अनुभूति

जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ओ मेरे कोस्तुभ धारी , कान्हा ,

ओ मेरे कोस्तुभ धारी ,
कान्हा ,
आज मोहित हूँ 
तेरा मासूम ह्रदय रूप देखकर ,
कितना सरल ,
निष्कपट तेरा रोम -रोम 
मेरे कान्हा!
मन हैं धवल आकाश ,
आत्मा हैं या,
स्वयं वासुदेव का गुण 
अनंत आकाश की उचाईयों के साथ ,
धरती का आलिंगन भी तुम्हारे ह्रदय में 
कान्हा जी |
मेरे रोम -रोम के स्वामी 
बलिहारी जाऊ इस मासूम रूप में तुहारे 
जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ,
बन जाऊ यशोदा 
लगा लू गले से अपने कान्हा को ,
मासुम सी बातोको  , 
सरलता को , 
आज बलि हारी हूँ 
कन्हियाँ  !
तेरी निष्कपट ,
सरल , स्नेह भरी 
वाणी पे , 
तेरी मुरली की तान पे |
नत मस्तक हूँ 
अपने राम के श्री चरणों में !
उन्होंने जो दिया हैं ,
मुझे कान्हा !
तेरा ये भक्ति संसार
ओ कान्हा , 
केसे कहू ?
केसे समझाऊ ?
तुझपे में बलिहारी जाऊ
मेरे कन्हाई !

अनुभूति


शुक्रवार, 3 जून 2011

एक अद्भुत गीत

 मेरे भगवान !
मेरे कान्हा! मेरे कोस्तुभ धारी !
के चरणों में एक अद्भुत गीत , 
एक पुकार अपने कन्हाई को ,
       वही पुकार जो राधा ने अपने कृष्ण से की ,
सीता ने अपने राम से ,
और एक भक्त अपने भगवान से करता हैं
की जीवन में एक बार उसका साक्षात दर्शन हो |
मेरे कान्हा जी!
इस" अनुभूति "की इस संसार में और कोई इच्छा नहीं |
आप का दर्शन मेरी भक्ति और मेरा मोक्ष दोनों हैं |
 में अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण जी से करती हूँ |  
कन्हाई मेरी पुकार भी इस जीवन में सुन लो
  जिस लोक में हो ये बावरी आप को कँहा खोजेगी | 
आप को कान्हा जी !
                                                     
श्री चरणों में अनुभूति

मेरे कोस्तुभ धारी !

मेरे लिए ये कोई कविता नहीं| 
मेरे कोस्तुभधारी भगवान श्री कृष्ण! के चरणों में अन्य भक्ति से समर्पित मेरी आत्मा का फूटता स्नेह हैं जिसको पूरी तरह व्यक्त करने में में अभी भी असमर्थ हूँ !
मेरे कान्हा का नाम मेरे स्नेह के रूप में मेरी आँखों से बरसता हैं |


हे करूणा निधे!
हे दयानिधे!
हे जगत्पति !
मेरे कान्हा!
मेरे कोस्तुभ धारी !
प्रभु क्या मांगू अब ?
जिसको बिन मांगे,
तेरा भक्ति संसार मिला हो ,
वो सबसे  बड़ी  धनवान प्रभु !में 
तुझे पाकर इस आत्मा में अभिभूतहूँ |
मेरे कन्हाई !

क्या कहू कान्हा !
जिस और देखू तेरे स्नेह का उजाला 
सारे अँधेरे मिटा गया जीवन के !
जो लेती रही में रोम -रोम तेरा नाम |
कान्हा  जी!
न देते आप मुझे ये उजाले तो भी 
मेरी आत्मा तेरी ही दासी रहती |
जिसे मिला हो आप का दासत्व वो और क्या मांगे ?


तेरा स्नेह टपके इन,
अखियों से बनके सुखकर नीर ,
मेरी आखो में मदहोशी तेरी भक्ति की ,
तेरे अपार स्नेह की ,मेरे कृष्ण कन्हाई 
तेरा दर्शन नहीं किया मेने आज तक 
फिर भी तेरा स्नेह ,भक्ति संसार पाया मेने 
इस लोक से उस लोक तक 
तीनो लोको की स्वामिनी  बनी हूँ में आज ,
मेरे कोस्तुभ धारी !
क्या मांगू प्रभु ! 
 बिन मांगे भी भर दी 
आप ने स्नेह , भक्ति 
और संसार की ख़ुशियों से मेरी झोली खाली |


वाह रे बनवारी ! मेरे गिरधारी !
श्याम सलोने
तेरी माया अपरम्पार ,
न दे तो जिस्म से जान चुरा ले प्रभु !
और दे तो एक पल में दे त्याग ,सारी हुकूमत प्यारी 
मेरे कान्हा तेरी सरलता ,
पे में जाऊ बलिहारी !
यु ही बस मिटती जाऊं
हर जनम मुझे कान्हा नाम की भक्ति दीजो प्रभु !
मेरे कोस्तुभ धारी को ही मेरा आराध्य कीजो

हाजारो जनम भी पाउंगी ,
तो नहीं चुका सकुंगी , 
तेरे स्नेह की कीमत सारी ,

ओ मेरे कान्हा !
ओ मेरे गिरिधारी !


अब जाना क्या सुख था |मीरा के पास ,
क्यों राधा भी इतनी दीवानी थी ?

जिस स्नेह मधु को उन्होंने चखा 
कितना अद्भुत मीठा हैं वो !
वो मिठास बन बसे मेरे शबदो में सदा ये वर दीजो |
और कुछ दीजो न दीजो ,
अपनी चरनन धूलि मस्तक पे लगाने का दासत्व दीजो |
तेरी मधुर मुरली में जब में खो जाऊ होश नहीं दुनिया का ,
कही जब हाथ जले तो में सुध पाऊ!
त्याग दिया संसार मेने 
तेरे नाम में 
मेरे कान्हा !

बस ऐसा ही मुझे स्वच्छ निर्मल बनाए राखियों मेरे कान्हा !
तेरी ही लीला हैं ,
तेरा ही आदेश ,आत्मा जो  मिटीहैं |
पल -पल इन साँसों में ले तेरा नाम |
चाहे कह दूँ  ,
में कृष्ण!
, चाहे कह दूँ ,
में राम !
आप के श्री चरणों में मेरे कन्हाई 
अनुभूति







तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................