रविवार, 22 मई 2011

जिन्दगी के मालिक .

 मेरे कान्हा ,
मेरी जिन्दगी के मालिक . 

तेरी हर मुस्कुराहट से ज़िंदा हूँ में ,
तुम मुस्कराते रहो तो मुस्कुराती रहूंगी में भी 
बस ये ही दुआ हैं |
अनुभूति

शनिवार, 21 मई 2011

चाँद से मिलने की ख्वाहिश !

एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की ख्वाहिश  हैं बस | 
और में उस शांत सरोवर के किनारे बैठ ,
अपने चाँद को उस शांत नीर में देख कर लेती हूँ ,
घंटो तुमसे बाते ,
मेरे चाँद !
तुम उतने ही खामोश होकर मुझे सदा सुनते ही रहते हो ,
और ख़ामोशी से मेरी तरफ देख बस ,
एक मीठी सी मुस्कुराहट दे देते हो 
जेसे कह रहे हो" पागल "
तुम नहीं करते मुझसे कभी कोई शिकायत , मेरी तरह 
कितना बोलती हूँ ,सोचते होंगे न तुम भी मेरे चाँद !
जब शिकायत करते -करते झरने लगती हैं,
मेरी आँखों से तुम्हारी चांदनी 
वो मोती उसी शांत नीर में मिलकर ,
पहुँचा देते हैं मेरे मन की वेदना को ,
आत्मा की तड़प को तुम तक,
मेरे चाँद !
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की ख्वाहिश  हैं बस | 
वो नहीं जानना चाहता हैं किसी मज़बूरी को 
नहीं समझना चाहता हालात और कोई परिस्थिति ,
वो तो तुम्हे बस अपना मान 
इन आँखों से बहाता हैं तुम्हारे स्नेह की चांदनी ,
पूर्णिमा के दिन जब पूरा होता हैं चाँद 
तुम्हरा स्नेह" समन्दर " मेरे नाम लिखा होता है,
और तुम्हारे स्नेह से वशीभूत मेरी आँखे,
तुम्हे उस शांत नीर में एक टक देखती रहती हैं ,
अपने आप से लजाती हैं
वो तुम्हारी आत्म आनंद अनुभूतियों में ,
वो एक टक देखती हैं 
तुम्हारी उस स्नेहमयी  विशालता को ,
उस विशाल ह्रदय को जिसके तुम स्वामी हो,
मेरे चाँद !
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा  मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की खाहिश हैं बस | 
तुम्हारे उस स्नेह की चांदनी को अपना माने बैठी हूँ ,
वो तो सिर्फ सहानुभूति हैं न ,
स्नेह नहीं तुम्हरा 
मेरे चाँद!
तुम्हारी तरह विशाल ह्रदय की स्वामिनी  कँहा मैं,
जो लुटा सकूँ इतनी शीतल चांदनी ,
हर विदीर्ण मन के लिए ,
इसीलिए तो तुम सुमद्र हो स्नेह का .
अन्नत हो , विशाल हो ,हर किसी की श्रद्धा हो .
में तो तुमसे जीवन भर ,
यूँ ही शांत नीर किनारे करती रहूंगी  बाते 
और तुम्हारी  बंधिनी मान अपने को
लुटाती रहूंगी तुम्हारे स्नेह की चांदनी 
इन आँखों से .
मेरा विशवास जब तक जीवित हैं  ,
में करती रहूंगी तुमसे बाते यूँ ही |
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की खवाहिश हैं बस  | 
अनुभूति

कित हो अंतर ध्यान !

मेरे गिरिधर गोपाल ,

कित हो अंतर ध्यान ,
राधा ढूंढे तुम्हारे संग को , 
खोजती फिर रही घट -घट|
तुम्हरे अधरों की वो मधुर मुस्कान |
श्याम -सलोना सरल रूप तुम्हरा 
हो तीनों  लोको के नाथ फिर  भी खड़े रहो हो सदा
दुखी , अबला ,असाहायों के साथ ,
तुम्हारी ये सरल छबी देख ,
मीरा भी हो गयी दासी 
और हँसते - हँसते पी गयी , 
विष प्याला मनमानी ,
मीरा नहीं तोड़े अपनी सीमा 
तुम्ही चले आओ सीमाओं  को तोड़ कर प्रभु !
और कर दो जीवन को एक पल देकर 
चरण सेवा का अधिकार .
एक बार , एक पल में जीवन हो जाएगा 
धन्य ,कृतार्थ और सदा के ,
लिए आप के श्री चरणों से अंकित
अपने श्याम की
अनुभूति


शुक्रवार, 20 मई 2011

तेरा ही बसेरा मेरे राम !

 मेरे राम ,

तेरी मुस्कुराहटें जिन्दगी हैं मेरी , 
में कही भी रहू ,
तेरे दम से आबाद हैं जिन्दगी मेरी ,
मेरा रोम -रोम खिलता हैं,
तेरी आत्म अनुभूतियों में ,
कोई क्या जाने तेरी हुकूमत हैं कितनी ,
तनके लिबास आत्मा के अंतिम छोर ,
तक बस तेरा ही बसेरा 
ये तुम जानो , ये में जानू 
ये बसेरा फिर भी हैं सुनसान अभी,
क्योकि इसमें नहीं तेरी हकीकत की
आत्मअनुभूतियों का ठोर
हां सजेगा एक दिन जरुर मेरे सपनो का अमलतास 
नहीं सजेगा तो मेरे साथ यूँ ही जल जाएगा,
किसी नदी किनारे अधूरा
में अधूरी हूँ तुम्हारे बिना मेरे राम !
अधूरी नहीं मरना चाहती बस .
पूरा करना प्रभु मुझे मेरे 
इन चरणों से लगाकर |

"श्री चरणों की दासी अनुभूति "

गुरुवार, 19 मई 2011

जिन्दगी बस यूँ ही मुस्कुराती रहो |

आज चुन लायी हूँ,
अमलतास के फुल ,
और भर लायी हूँ,
जिन्दगी से अपना आँचल ,
लौट आई हैं मेरे शबदों की आत्मा ,
जिन्दगी तेरी मुस्कुराहटों से ,
हर कदम पे कायनात यूँ ही सजी रहे ,
मेरे सपनों के अमलतास की तरह
और में जिन्दगी तेरी मुस्कुराहटों ,
से अपना आँचल भरती रहूँ |
बस इतनी ही गुजारिश हैं
जिन्दगी बस यूँ ही मुस्कुराती रहो |
तेरी मुस्कुराहटों से रोशन ,
मेरी जिन्दगी का हर लम्हा
अश्क नहीं अब इस चेहरे पे
खेलती हैं तुझे देख ,
महसूस करके
इन होठों पे तब्बसुम की बिजिलियाँ |

"अनुभूति "

पथरीले पथ ,

ओ कृष्ण कन्हाई!
मुरली वाले !
 नींद नहीं आखो में अब ,
निस दिन मांगे ,
ये जीवन आप से नवीन पथ ,
चेन कँहा से लाऊ,
जब बंद करू आँखे
देखे मन नदियाँ ,
पहाड़ , पथरीले पथ ,
स्वप्नों में भी क्यों सुकून हैं इन पथरीली राहो में 
ये कोनसा मार्ग हैं जीवन का ये सुलझा दे |
ये मेरी मुक्ति का मार्ग हैं या कोई भ्रम 
जो भी हैं प्रभु अब मेरा मार्ग सुलझा दे !+
दे आशीष मुझे इन कष्टों से 
  मुक्ति दिला दे |

"अनुभूति "

बुधवार, 18 मई 2011

सार्थक नव -सृजन

सार्थक नव -सृजन 


मेरे राम !
मेरी आत्मा
मेरी रूह के रोम -रोम में,
बसने वाले मेरा राम !
तेरी भक्ति , तेरे नाम और तेरे आशीष से ,
रोशन होने लगी हैं मेरी राहें |
तन्हा हूँ पर फिर भी कभी तन्हा नहीं ,
हर कदम जब भी देखा हैं मुड़ के मेरे राम !
आप ने दिया हैं अपनी आत्मा से मेरा साथ ,
में दम नहीं तोड़ने वाली इन घुटनों में ,
मेरे इस नव सृजन को ,
नहीं होने देने चाहती में नष्ट
हर कदम जुटी हूँ इन अंधेरों लड़ने में ,
रण में लड़ने वाले ही जीता करते हैं |
में तो डरते -डरते भूल ही गयी थी,
अपने आप का अर्थ |
जीने लगी हूँ अपने लिए
होने लगी हूँ स्वार्थी |
हर सपना मुझे याद हैं ,
मेरी आँखों में निरंतर
अनवरत बहता रहता हैं वो जीवन बनकर
राम नाम की ओषधी लेकर लड़ने लगी हूँ
इस जीवन की इस असुरक्षा के खिलाफ
ये राम नाम की चिड़ियाँ
डाली -डाली खोज रही
अपना रास्ता ,अपना लक्ष्य |
कोशिश करने वाले की हार नहीं होती |
रामायणऔर भागवत दूर पड़े हैं
बाकी हैं भागवत का अंतिम चरण अभी
वो चरण ही देगा मेरी आत्मा को नया मार्ग |
"अनुभूति " 

सपनों का अमलतास



 सपनों  का अमलतास
इतनी खुबसूरत भोर नहीं देखी मैने,
नहीं किया था ,कभी ऐसा प्रकृति दर्शन
सजी हुयी थी ,खिले अमलतासो से मेरी राहें ,
लगता हैं सारे ख्वाब ,मेरी राहों में सजे पड़े हैं|
कभी झाँका ही नहीं तुमने,
इस खुबसूरत कायनात को इतनी अल सवेरे ,
भागना नहीं चाहती जिन्दगी में तुझसे ,
तेरी हरख़ुशी ,हर गम को झूम के गले लगाना चाहती हूँ में |
आज मेने बरसो बाद सच में सजा देखा हैं अमलतास
मेरे जीवन के पहले अधूरे  ख्वाब की तरह ,
उतना ही मासूम और खुबसूरत , 
हर साल ,सजता रहेगा अमलतास
और साल दर साल यूँही
अपने रक्त बिंदु की तरह ,विशवास
और गहरा किये करती रहूंगी
अपने वचन के पुरे होने का इन्तजार |
हां , एक दिन मेरे मरने से पहले तो सजेगा,
मेरे अधूरे  सपनों का अमलतास  भी ,
जोड़ दिया हैंजीवन को मेने आज से योग से भी
प्रभु तुमारी भक्ति और योग
मेरे अमलतास के सजने का शुभ संकेत हैं |


"आप के श्री चरणों में आप की अनुभूति "

मंगलवार, 17 मई 2011

Tumse Ho Jori - Rishi Nitya Pragya

तुमसे ओ जोड़ी ,तुमसे ओ जोड़ी ,तुमसे ओ जोड़ी 
साँची  प्रीत तुमसे जोड़ी ,
तुमसे ओ जोड़ी ,और संग तोड़ी  !
एक अद्भुत भजन मेरे कन्हा  का 
मेरे जीवन का पसंदीदा भजन 
अनुभूति 


जिन्दगी तेरे लिए !





दुनिया की भीड़  में जब में आती हूँ
.देखती हूँ कितने सारे सपने हैं सबके ,
 शिकायते हैं और न जाने ,
कितने ही ऐसे ख्वाब हैं,
जिनके पुरे होने का इन्तजार हैं उन्हें |
मेरे पास कहने को कुछ नहीं ,
किसी से शिकायत नहीं ,
कोई सपना नहीं चाहत भी नहीं
क्यों खामोश हूँ इस भीड़ में भी में ?
सोचती हूँ ज़िंदा क्यों हूँ ?
कुछ भी तो ऐसा नहीं
जिसे देख पाने की
मिल पाने की कोई उम्मीद भी बाकी हो
,फिर क्यों ढोएँ जा रही हूँ
इस बेजान जिस्म को
हार तो चुकी हूँ तेरी कायनात के आगे राम जी
घुटने टेक चुकी हूँ सब के आगे
स्वीकार कर चुकी हूँ वो सब कुछ जिसके लिए में  दोषी हूँ
और वो भी जिसके लिए कभी दोषी नहीं थी |
मान चुकी हूँ
में कमजोर हूँ दुनिया तेरे आगे
अब नहीं और लड़ सकुंगी में
"अनुभूति "

गिरवी पड़ी हैं,यादे भी


केसी खमोशी है चारो तरफ !
नींदे सुनी हैं! बाते खामोश  हैं !
सब तरफ की ,
ये ख़ामोशी  मेरी जान लेती हैं ,
मेरी   मेरे वचनों की तरह ,
जीने के सारे साहरे ,
  एक पल में यूँ ही छुट जायंगे  मुझसे सोचा नहीं था ,
   मेरे राम  जी !
मेरे ही साथ इतने.
 कठोर  भी हो सकते हैं |
 किसी से कह नहीं सकती
 अपनी इस ख़ामोशी को
की मेरे सारे एहसास
कल्पनाएँ भी गिरवी  हैं |
सब कुछ शून्य पडा हैं|
 दिल करता हैं वीराने में जाऊ ,
और जोर से अपनी आत्मा के द्वार खोल के रो लू
एक बार ही सही इतना रो लू की सारे आंसू सुख जाएँ |
सुख जाएँ आँखे की ये कभीअब सपनों की  छाया से भी डरे |
बहुत तकलीफ  होतीथी हर बार जब कोई सपना टूटा करता था |
लेकिन सपने दिखाने वाला,
 जब सपना छीन  ले,
 तो दर्द नहीं सिर्फ एक तीखी पीड़बची रह जाती हैं,
 हमेशा के लिए बस जैसे  पल -पल कोई ज़िंदा मुझे काट रहा हो |
आज तक समझ ही पायी गुनाह  क्या था मेरा ?
"अनुभूति "

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................