मंगलवार, 17 मई 2011

वचनों का विशवास ,

  मन खिला हैं बसंती फूलों से
  तेरा विशवास मिलाहैं प्रभु मुझे ,
  जिन्दगी की आहट से ,
  मेरा ईश्वर ,
  मेरे राम! मेरी साँसों में हैं|
  वचनों का विशवास ,
  जिवंत हैं मुझमे और वचनों को निभाने की अटूट आस्था भी,
  मेरे राम बिलकुल आप ही की तरह |
  वचनों की डोर ही तो अब
  तपस्या रह गयी हैं जीवन की
  जो कुछ भी दिया हैं 
  अद्भुत दिया हैं
  आत्मा को प्रभु !
  संसार की हर बात मिथ्या हो सकती हैं 
  लेकिन मेरे  राम का नाम,और मेरे मस्तक का ये रक्त बिंदु
  कभी नहीं हो सकता |
  मेरे राम के हर शब्द में  झलकता हैं
  आत्मा का सच!
  मेरा अक्ष्णु विशवास,
  तो टूटा ही नहीं कभी वो तो सदा बंधा हैं,
  मेरी सांसो के साथ |
वो टूट जाता तो ?
  क्या करना हैं मिथ्या भ्रमों में जीकर 
  सब कुछ तो निराकार होकर मुझमे बसा हैं |
   "  अनुभूति "

 अपने राम जी की चिड़ियाँ 

सोमवार, 16 मई 2011

चाँदनी


आज रात,
का वो चाँद,
घंटो खिड़की से,
मुझे झाकता ही रहा .
घंटो उससे बाते करने वाली 
राम जी की चिड़ियाँ 
आज खामोश थी | 
 खामोशा सा पंखा मुझे देखा ही रहा 
आज वो भी स्तब्ध था ,
आज चाँद की
चाँदनी बूंदें बन
टिप-टिप गिर  ,
तकिया भिगो रही थी| 
आज कोई झगड़ा ,
स्नेह ,शिकायत ,
कोई आत्मआनंद अनुभूति ,
मिलो तक नहीं थी |
सब कुछ खामोश  पडा था,
नीरव मन की तरह 
बस कही किसी कोने से,
टूटा हुआ विशवास
चाँदनी के साथ ,
आँखों सेबूंद -बूंद बहा  जा रहा था |
एक तीखी सी चुभन,
आत्मा को भेद रही थी 
आज राम जी चिड़ियाँ और चाँद 
एक दुसरे को घंटो देखते रहे |
आज सब कुछ स्तब्ध था ,
मिलो तक ख़ामोशी थी |
हमेशा की तरह 
सब कुछ सर झुकाकर ,
एक वचन के लिए ,
तुमने मान ही तो लिया था |
आज चाँद घंटो मुझे,
खिड़की से देखता ही रहा
और उसकी चांदनी एक तीखे से दर्द के साथ 
तकिया भिगोती रही |
घंटो बाते करने वाली राम जी की,
चिड़ियाँ आज खामोश थी |
राम जी केसा इन्साफ हैं तेरी दुनिया का !
अनुभूति

रविवार, 15 मई 2011

एक बार स्वार्थी बन जियो तुम !


कब मिलेगी  मुक्ति ?
तुम्हे पुरुष की वासनाओ से!
कब बाहर आकर देख सकोगी तुम 
आखिर कब तक तुम सहती ही रहोगी ,
कब तक इन्तजार करती रहोगी 
कभी तो एक दिन करना होगा सामना तुम्हे 
इस दुनिया का ,इस भीड़ का 
एक दिन तो तुम्हे करनी होगी 
इस संघर्ष की शुरुवात न ,
न की तुमने वासनाएं पूरी ,
तो कोई नहीं ढोयेगा  ये तन 
समझती क्यों नहीं ?
इस दुनिया में बदले में ही,
कुछ मिलने का रिवाज हैं
तुम्हारी आत्मा का कोई पर्याय नहीं यंहा
तुम लाख छलनी हो ,
तुम्हारा जिस्म जरुरी हैं ,
तुम्हारी सेवा के बदले 
पाल तो रहा हैं वो पुरुष तुम्हे
अब जिस दिन मन भर गया तुमसे
वो ले आयेगा एक खुबसूरत जिस्म
और एक बच्चे पैदा करने की मशीन 
ढो सकोगी ,ये सब साथ -साथ 
ये तुम्हारी दुनिया नहीं 
तुम तो शक्ति हो , अपने अंतस में झांको 
और देखो कितना कुछ छिपा पडा हैं यंहा
सामना करो खुद का ,
एक बार स्वार्थी बन जियो तुम
हां अपने लिए !
"अनुभूति "



ये ही तो शक्ति हैं |

हमेशा की ये रीत रही हैं 
हर फैसला ,
पुरुष ही करता आया हैं ,
और एक नारी,
उसे सदा स्वीकारती ही आई हैं 
कभी कोई खिलाफत नहीं,
मौन सर को झुकाकर ,
सब सह लेना 
ये ही तो शक्ति हैं |
पुरुष कँहा कभी
स्वीकार कर सका हैं,
अपने स्नेह को भी खुल के
कितना भी बड़ा कोई पुरुष क्यों न हो
वो सदा भागता ही रहा हैं
अपनी स्नेह स्वीकारोक्ति से
फिर भी एक नारी नहीं छोड़ सकती हैं सदा 
अपनी आत्मा से उसका साथ 
क्योकि वो कायर नहीं
सदा शक्ति बन पुरुष के आगे खड़ी हो देती हैं
उसका साथ |
सदियों से ये ही परिभाषा सुनती आई हूँ 
चाहे सीता हो या राधा 
हँस के मिटने का नाम ही शक्ति हैं 
नारी  कमजोर नहीं तुम्हारी तरह पुरुष
जो एक वचन दे ,छोड़ जाएँ 
तुम्हरा साथ
 जब सात जन्मो के लिए ,
एक जनम में ही वचन दे सकती हैं
तो क्या एक वचन के लिए 
एक जनम भी नहीं निभा सकती
क्या समझते आये हो ?
पुरुष तुम उसे !
हाड - मांस का एक खिलोना 
जिसके मन के द्वार जब चाहे खुलवा लिए ,
जब चाहा तन खोल दिया 
जब चाह आत्मा बिंध दी 
मत समझो इतना भी कमजोर
जिस दिन शक्ति अपने रूप में आई 
तुम कर न सकोगे अपना सामना खुद
ये तुम्हारी आत्मा भी जानती हैं  ओ पुरुष !
इसीलिए ही शायद शिव को शक्ति का क्रोध शांत  करने
लेटना पडा था उसी शक्ति के कदमो में|

अनुभूति

तेरे नाम का विष प्याला

ओ कान्हा , 
कृतार्थ कर दिया आप ने ,
स्वीकार मेरी भक्ति की अपने चरणों में ,
मुझे आज ये विष प्याला,
तेरे नाम मिला हैं ,तेरे नाम का विष प्याला
मुस्कुरा के में पी जाऊं,
ये जो सम्मान मिला हैं ,
कभी कंहा इनकार किया हैं तेरी किसी बात से कान्हा !
तेरे चरणों में शीश झुका के सब स्वीकार किया हैं
तेरी मीरा  का निष्काशन भी इसके बाद  हुआ था 
जीवन में भक्ति का अब तो मार्ग खुला हैं,
जो सबसे प्यारा होए तो उसे छोड़ दीजो 
सबसे बड़ा त्याग ये कर दीजो
एक बंधन था मोह का जो आत्मा से बंधा  था
वो आज छुट गया अब तो उजाला ही उजाला हैं
कोई भ्रम नहीं सामने एक जीव से मोह था
वो अभी छुटा पडा हैं 
पर परायों ने अपना होकर ये काम किया हैं
वो तो जानते ही नहीं उन्होंने मेरे मार्ग आसान किया हैं
नतमस्तक हूँ उनके आगे जिन्होंने ये काम किया हैं
सच खुशियाँ देने आये थे , दे गए उन्हें पता भी नहीं हैं
मेरे आँचल को भर
उन्होंने अपनी सहानुभूति में जो काम किया हैं
अद्भुत ,अनुपम सौगात के लिए धन्य हूँ प्रभु !
ये भी जीवन  नया रूप दिया हैं
में जानू विष भी आप अमृत भी आप
आदि भी आप अनंत भी आप
कब कोनसा रूप धर मार्ग दिखोगे ?
कब आओगे ?कब  चले जाओगे ?
तेरी ही माया  हैं मेरी श्री हरी !
मेरे नारायण !
अभिभूत हूँ तेरी कृपा  पाके 
मेरे गिरिधर! 
मेरे गोपाल !
पग -पग थाम जटिल समय आप ने ही मृत्यु
से थाम जीवन का मार्ग दिया था
आज जीवन को नया सोभाग्य और पवित्रता
का सम्मान दिया हैं ,
मेने अपना जीवन कान्हा नाम अर्पण किया हैं 
जिसका हैं वो जाने अब
मेरे सोचने, कहने ,करने का
क्या काम लिखा हैं |
शब्द दिए आप ने मांगे भी आपने प्रभु !
तेरा तुझको अर्पण !
मेरे जगदीश्वर! आप ने इस तुच्छ पे,
ये कृपा कर इस जीवन को पवित्र धाम किया हैं |
इस लोक से उस लोक सदा आशिशोगे
इससे बड़ा क्या सुख सामान पाऊं में
बिन मांगे सब दिया हैं |
धन्य हूँ !
में जगदीश्वर !
मेरे कान्हा !
बस हर पग दे ठोकर , 
हर पग अन्दर से थाम मुझे बदाएं चलना
बाकी हैं अभी बहुत जीवन के काम ,
चुकाने रह गए हैं कितने अहसान
प्रभु ! 
मिटा के तेरी भक्ति में चुका सकू  सभी
अहसान , सहानुभूति ये और वरदान दीजो |
इस पगली की भक्ति मेरे कान्हा  सदा स्वीकार कीजो |
"तेरी बावरी अनुभूति कान्हा "
 मेने अपने जीवन में अपनी हर सांस से स्नेह अपने आराध्य श्रीराम,श्रीकृष्ण , श्रीहरी को किया हैं मेरी आत्मा का रोम -रोम मेरा हर शब्द किसी इंसान के नहीं उस जगदीश्वर के प्रति समर्पित हैं |




कृष्ण -प्रेम,



मेरे कान्हा 
प्रियतम का मन अधीर ,
तन - मन व्याकुल 
 प्रथम मिलन का
ये आलिंगन  केसा होगा? सोच
धड़क उठे राधा दीवानी मूंदे नयन
उत व्याकुल श्याम कहे न मन की पीड
स्नेह झलके आँखों से ,
कोई कहे न मन की पीर 
एक मन जाने दूजे मन की थाह 
केसे कह दे सब आके करीब ?
मर जायेगीं राधा , शर्म से
जो कान्हा तुमने उठा लिया ,
ये घुंघट इस चाँद से
रह  न सकोगे , 
सह न सकोगे
इस चांदनी की ये पीर ,
अधरों से अधरों को मिल 
मिट जाने दो अब ये जन्मो की पीड|
अनुभूति

मेरी हर कविता मेरे भगवान श्री कृष्ण और और उनकी राधिका के चरणों में समर्पित हैं |



शनिवार, 14 मई 2011

जीवन सत्य की देहलीज

वो पूनम का चाँद और तेरा ये रूप ,
ख़ामोशी में गूँजता गोरी तेरी आँखों  का गीत ,
तेरा लहराता आँचल और मतवाले काजल का जादू
  ये मौन  निमंत्रण स्नेह का  ,प्रिय को 
     खामोश रहके भी दीवाना करते हैं 
       हाथों का चुड़ा , और पेरों की जंजीर
       तेरे माथे लगी वो कुमकुम की टिप
होठों की मुस्कुराहट ,
वो शर्माने की अदा
वो घुंघट !
ये सब तेरा उनकी होने का दावा करते हैं |
सब कुछ सूना हैं जो रूठे बेठे हैं ठाकुर  तुझसे गोरी
ये चांदनी भी अधूरी हैं ,
और तेरा चाँद चेहरा भी सूना हैं प्रियतम के 
अधरों के बिन .
वो कभी न तुझसे मानेंगे ,
ये रूप योवन कुछ नहीं कुछ देरमें  मिट जाना हैं 
साथ कुछ नहीं 
आत्मा को जाना हैं ,
गोरी छोड़ योवन अब आजा जीवन सत्य की देहलीज 
इस आत्मा से उस आत्मा का साथ हैं साचा बस |
छोड़ सोलह सिंगार ,
तेरे ठाकुर तुझको चाहे तेरी आत्मा से
ओ दीवानी !
अब तो समझ , 
समझा रहा मन 
माने क्यों न आत्मा अब तेरी !

अनुभूति



एक झूठ जी के देखो

  एक झूठ जी के देखो

जीवन से शिकायत ही करती हैं जिन्दगी
नहीं मिला स्नेह  नहीं मिला अपनत्व ,
अब तो छोड़ दो ये सब 
कभी तो स्वार्थी बन सब को भुला के जी लो
बन जाओ उस दुनिया की ही तरह ,
जो कुछ पल ही सही झूठे  सपने ,
दिखा देती हैं तुम्हारी आँखों को 
कुछ देर के लिए ही सही तुम जिए तो,
सही सपनो के आंगन में
किसी ने तुम्हारे नाम किया तो सही ,
स्नेह का समन्दर
लिखे तो ख़त किसी को प्रेम भरे ,
कल्पनाओ में किया तुमने प्यार 
इस झूठ  में भी तो पल भर की ख़ुशी ही हैं न .
क्यों रोते हो ?
वो मुस्कुराते लम्हे याद करो झूठे ही थे 
पर थे तो तुम्हारे अपने न
कब तक अपने आप से लड़ते  ही रहोगे
और करते ही रहोगे शिकायत अपने भाग्य से?
लड़ते रहोगे तो थाम लेगी मौत तुम्हे करीब आकर 
और इस झूठी दुनिया का हिस्सा बन जाओगे तो 
पा जाओगे  स्नेह समन्दर |
पसंद तुम्हारी हैं या 
तो मिल जाओ इस दुनिया में
या मिट जाओ इस झूठ के साथ |

अनुभूति

मेरे जस्बातो का घर

वो अमलतास ,
कोई पेड़ नहीं मेरे जस्बातो का घर हैं |
जिसके नीचे किया था ,
कभी दुष्यंत ने शकुन्तला से प्रणय निवेदन |
क्या हैं प्रेम अभी तक नहीं पूर्ण हुआ हैं ये अद्भुत विषय ?
सुनती रही  कहानियाँ , 
पड़ती रही और कुछ आँखों से देखी,
लेकिन सबका अंतिम सत्य एक ही परिणिति होती हैं |
या तो जीवन भर का साथ ,
या जीवन भर की तपस्या ,
क्या ज्यादा अद्भुत हैं शायद !
राधा का विरह !
या उर्मिला का त्याग!
हमेशा से नारी त्याग और समर्पण करती ही रही,
दुष्यंत ने भुला दिया था अपनी शकुन्तला को ,
राधा के श्याम मथुरा के वासी हो गए ,
और लक्ष्मण चले गए अपना भातृतव स्नेह निभाने .
हमेशा से पुरुष कठोर ही रहा हैं नारी के मन के प्रति ,
हमेशा आसानी से मना लेना ,
मुस्कुरा के जीत लेना .
मिठास  से दिल के दरवाजे खुलवा लेना |
और नारी हमेशा से करती आई हैं समर्पण
हमेशा साथ और स्नेह की अपेक्षा  |
नहीं माँगा किसी समवेदन  शील नारी ने
कोई खजाना .
वो तो सदा खुश ही रही प्रियतम की मुस्कुराहटों में
वो उर्मिला लाखो मिल दूर करती ही रही अपने लक्ष्मण की प्रतीक्षा ,
शकुन्तला ने दिया अपने स्नेह को जनम गुफाओं में ,
और राधा जीवन भर विरह की अग्नि  में अश्रु बहाती रही ,
चाहे हो वो नागमती , चाहे कोई और उर्मिला .
सहने का वरदान शायद भगवती नारी को ही दिया हैं |
पुरुष तो स्नेह में भी जताता रहा अपने पुरुष होने का अधिकार |

हां मेरा वो अमलतास कोई पेड़ नहीं जस्बातो का घर हैं मेरे |
जँहा न जाने कब से मेरी आत्मा में तड़प रही हैं कितनी ही उर्मिलायें ,
नागमती और शकुन्तला |
हां ये वही देश हैं जँहा |
अपने आप को अंतिम अवस्था  तक मिटा बनता हैं स्नेह
किसी नारी की किसी देवी के रूप में परिणिति |
हां मेरा वो अमलतास कोई पेड़ नहीं जस्बातो का घर हैं मेरे |

"अनुभूति "

श्रद्धा के फुल ,

 प्रभु , 
मेरे राम
       मेरी भक्ति , मेरी श्रद्धा के फुल ,
       में नहीं जानू स्नेह की और कोई रीत,
       न मांगू तुझसे कुछ 
       मांगू तो मांगू तेरी मुस्कुराहटो,
      और संसार में तेरे नाम का उजाला .

        मेरे राम ,
     मन में तेरे  प्रति कोई भाव नहीं  स्वार्थ का ,
        मोह का , तो उसे अपनी आत्मा से निकाल
        देना मुझे इस लोक से उस लोक बस 
        अपने चरणों में ही प्रणाम करने की कृपा
        स्नेह होता तो मांग लेती चरण सेवा का अधिकार ,
        पर सब कुछ सहानुभूतियों में बदल गया तो क्या कहू ?
        जो जेसा तेरा आदेश , मुझे सब स्वीकार |



    अनुभूति

गुरुवार, 12 मई 2011

"प्राण जाएँ पर वचन न जाएँ ."

"रघु कुल रीत सदा चली आई,
प्राण जाएँ पर वचन न जाएँ ."
मेरे राम 
सत्य तो जीवन में हैं |
साकार आप से सिखा हैं राम 
जो कुछ सिखा आप से मेरे राम ,
वो सदा अक्ष्णु रहेगा ,,
बन के आत्मा का विशवास .
इन कठिन  तपस्या में भी ये अहसास हैं
साथ खड़े हो आप ,
बन के सदा स्नेह आशीष
जो में गिर  जाऊ ,
मुझे थाम हो लोगे पग -पग
कितने कठोरता से सवारना चाहो
प्रभु मुझे निस दिन ,
में करुँगी हर तपस्या तुम्हरी भक्ति की नाथ |
मेरी शक्ति , मेरा विशवास अडिग हैं|
इस मस्तक के रक्त बिंदु की तरह |
हे जगदीश्वर!
देना निस दिन कठिन तपस्या का वरदान |
इस ज्यादा आस नहीं तेरी भक्ति में मिट जाना भी हैं मेरे लिए वरदान !
  
    "अनुभूति "


तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................