
मेरे कान्हा
प्रियतम का मन अधीर ,
तन - मन व्याकुल
प्रथम मिलन का
ये आलिंगन केसा होगा? सोच
धड़क उठे राधा दीवानी मूंदे नयन
उत व्याकुल श्याम कहे न मन की पीड
स्नेह झलके आँखों से ,
कोई कहे न मन की पीर
एक मन जाने दूजे मन की थाह
केसे कह दे सब आके करीब ?
मर जायेगीं राधा , शर्म से
जो कान्हा तुमने उठा लिया ,
ये घुंघट इस चाँद से
रह न सकोगे ,
सह न सकोगे
इस चांदनी की ये पीर ,
अधरों से अधरों को मिल
मिट जाने दो अब ये जन्मो की पीड|
अनुभूति
मेरी हर कविता मेरे भगवान श्री कृष्ण और और उनकी राधिका के चरणों में समर्पित हैं |
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