रविवार, 8 मई 2011

करुणा के सागर

हे करुणा निधे !
करुणा के सागर कभी तो,
कोई बूंद अपने दुलार की ,
मेरे नाम भी लिख !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे !
केसी बंदगी ?
कन्हिया !
"तू ही तो कहता हैं,
कर्म करना ही तेरा अधिकार हैं 
फल में नहीं "!
मुझे आना ही होगा जीवन के  रणक्षेत्र में 
सारे मन के बन्धनों को तोड़ ,
में मुर्ख उनसे बांधू स्नेह की डोर
जो साथ रह के भी घोप रहे मेरे ही दिल में खंजर |
प्रभु !
बस क्या इमानदारी  की सजा ये  ही हैं |
कभी तो कर दो अपने दुलार की कोई बूंद 
मेरे  नाम |
ये कोनसी  नयी परीक्षा हैं तेरी दयानिधे  !
क्या चाहता हैं प्रभु मुझसे ?
में निकली तेरे रणक्षेत्र में तो दुनिया बहुत पीछे छुट जायेगी 
और इस दुनिया की भीड़ में भी बन जाउंगी 
सिर्फ अपने लिए जीने वाली 
स्वार्थी !

अनुभूति



शनिवार, 7 मई 2011

ओ साथिया

ओ साथिया कहूँ क्या ?
सुनलो इन आँखों से ज़रा
ये मोती हैं तुम्हारी दी खुशियों के 
जिन्दगी को एक राह दी हैं |
धडकनों को एक नया साज |
क्या हैं पूछ तो लो ?
बस तुम्हारी गुनगुनाती हुई वो मुस्कुराहट
जो सुने अब तो एक अरसा बीत गया |
फिर भी गूंजती हैं वो कानो में आज भी ,
आप का वो "तुम "
आज भी मेरी जान पे भारी हैं |
झूम जाऊ में ख़ुशी से आज भी जब कानो में मिश्री 
सपनो में ही घुल जाए |
साथ हैं बस आप की दिव्यानंद अनुभूति 
कुछ नहीं तो सपनो में मुस्काऊं 
अनुभूति



हे जगदीश्वर !


हे जगदीश्वर !
मेरे राम 
हजारो बार टूटी हूँ 
और बिखर के फिर जुडी हूँ
क्योकि मेरे कण-कण में सदा से तुम बसे हो ,
तुम्हारे निराकार रूप को देखा नहीं मेने 
प्रत्यक्ष देखने की चाह में जीवित  हूँ |

मेरे रोम -रोम के स्वामी , 
जगदीश्वर  मेरे पालनहार 
मेरे रक्षक भी तुम ही
और जो कामदेव बनके,
जीवन में आये वो भी तुम ही
हर साकार ,निराकार रूप में मेरे चारो और तुम ही हो 
मुझे नहीं चाहियें इस दुनिया के लोग 
झूठ औ र बनावट 
तेरी निस्वार्थ भक्ति और स्नेह 
और सहानुभूतियों में ही में जी सकती हूँ |
हे जगदीश्वर |
"अनुभूति "

शुक्रवार, 6 मई 2011

अंतिम कविता

अंतिम कविता 
में खोजती रही आत्मा की गलियों में 
करूणा और स्नेह से पुकारती रही |
ना कभी पहले मेरा साथ तू था 
न कभी आज खड़ा हैं मेरे ईश्वर
में लडती ही रही तुझसे 
अब नहीं लडूंगी 
न खोजूंगी किसी रामायण में 
न किसी भागवत में 
मेरा अंतस ही जब शून्य हैं 
तो क्या करुँगी इस दुनिया में जी के 
तुझे पाके 
 तू हमेशा ही पत्थर रहा मेरे लिए 
 और में फिर भी खोजती रही
तुझमे सत्य का साथ 
 ना अब कोई साथ ना दुहाई 
खतम करती हूँ ये खोखले शब्द 
और अंत हिन् जीवन का ये सफ़र 
कोई दुःख नहीं मुझे अब 
तेरे होने का 
में तो तेरी चाहत में,
जीवन की चाहत में भूल ही गयी थी 
 की तन्हा दुनिया में आई हूँ ,
और तन्हा ही जाना होता हैं |
सब स्वीकार करती हूँ ,
अब कोई सजा तू मुझे नहीं दे सकेगा  मेरे ईश्वर 
कुछ रहेगा नहीं बाकी तो क्या देगा तो मुझे कोई सजा |
अपने सारे शब्द ;अर्थ ;भाव , अनुभूतियाँ  
मोह , बंधन  ,वचन  सब कुछ यही छोडती हूँ 
सब कुछ अर्पित करती हूँ कुछ साथ नहीं जाएगा 
सिवा मेरी आत्मा के |


अनुभूति 





 

मेरा विशवास

 मेरे राम ,
पल -पल बढता ही जाए हैं मेरा विशवास 
और जग कहे तेरी बावरी मुझे 
ये अनुराग का कोनसा रूप हैं प्रभु !
कभी इस धरती पे आके मुझे तो बता दो ,
सांसो के मनको पे तुम्हारा नाम गिनने वाले को 
कभी तो अपना दर्शन करा दो | 
"अनुभूति  "

वचन से मुक्त एक बार , अब मिट जाने दो |ओ कान्हा !

ओ कान्हा !
केसा तेरा अद्भुत स्नेह!
जो झलके तेरे कण -कण से
तेरा दर्द तेरी पीड ,
तेरा पश्चाताप  सहा न जाए
बस सोचु ये ही की ,
जो सोचु में वो सोचे तेरी मूरत भी 
ओ कान्हा ,
सोचा नहीं था पभु किसी की पीड़ा ऐसे भी सह लेते हैं
देखा हैं साक्षात् तुझे जाना हैं ,
ओ कान्हा !
मेरे पास तेरे स्नेह  और विशवास के सिवा 
दूजा नहीं कोई  जीवन का आधार 
 पीड़ा दे एक बार ही इस देह को ख़ाक कर दो  
एक बार इन चरणों में मुझे स्वीकार कृतार्थ कर दो .
मुझसे सही नहीं जाती ये स्नेह पीड तुम्हारी 
या तो इस दासी की बाँध लो इन कदमो से 
या कर दो अपने वचन से मुक्त एक बार 
तिल -तिल की ये अग्नि ,
चिता से भी घनघोर प्रभु !
किसकी कहूँ , किसको लिखू ?
पाती ये , तुम्हारे सिवा ओ मेरे कन्हाई !
तुम तो सागर  स्नेह का 
में नन्ही सी बूंद नहीं समझ सकुंगी,
तेरा अद्भुत स्नेह
जेसा तुमने चाह में ढलती जाउंगी 
क्या कहूँगी ,क्या सहूंगी 
एक बार बिना मिले ही मर जाउंगी |
और कोई पश्चाताप तो प्रभु !
तुम ही बता ला दो
इससे बड़ी कोई और तड़प हो ,
तो वो दिला दो 
केसा मार्ग दियातुमने ?
मुझे ओ कन्हाई !
जिसने जीवन की हर दुविधा मिटाई ,
इतना तो सोभाग्य  मिला हैं |
बिन कहे भी प्रभु तेरी हर बात को समझने का 
एहसास  मिला हैं ,
कह देते  तो पीड़ा न होती ,कन्हाई 
ये केसी अजीब भक्ति मेरी  तुने बनाई ?
इस लोक से उस लोक खड़े हो ,
केसे समझाऊ फिर भी कितने रोम -रोम में बसे हो !
मेरा तन ,मन आत्मा जो तेरे चरणों के काम ना आये
क्या करू उस तन ,मन को लेकर ओ कन्हाई 
इसिलए तो सब ख़ाक किया हैं 
तेरी मूरत के आगे बैठ बस बहाऊ नीर 
जब जब देखू रूप सलोना घनश्याम 
अब मिट जाने दो बस 
अब मिट जाने दो
ओ मेरे कन्हाई !
"तुम्हारी बंधिनी अनुभूति "



मेरी भक्ति भी तुम ही !

 मेरे कन्हियाँ !
 तुम से कभी न रुठुंगी कभी ,
 शीश झुकाएं इन श्री चरणों में मांगू माफ़ी ,
साथ कभी न तेरा छोडूंगी ,
मेरे श्याम कभी न कहना की तू तन्हा हैं 
तेरी तन्हाई को में अपने स्नेह से तो भर देती हूँ 
में मुर्ख ,अज्ञानी समझ न पायी तेरी वाणी 
जब समझी खोया सब कुछ कर नादानी ,
पाना नहीं अब तो सब कुछ खोना हैं 
तुम्हरे श्री चरणों में ,
मेरी तो तन्हाई का साथी भी तुम ही ,
लडाई का साथी भी तुम ही ,
जिससे संसार में,
सबसे बड़ी प्रीति
वो भी तुम से ही !
मेरा सवाल भी
तू जवाब भी तुम ही !
मेरी भक्ति भी तुम ही !
शक्ति भी तुम ही !
तुम तो वो हो जिससे घंटो में बतियाऊं ,
तुम से सवाल भी खुद ही करू और उत्तर भी खुद ही दिए जाऊं ,
ऐसी पगली , मुझसी कोई नहीं तेरी होगी दीवानी,
जिसने अपने रोम -रोम से प्रीत तुझसे जोड़ी होगी .
तू जो मुझ को कहले ,
सब स्वीकार 
करू पूरा तेरा हर आदेश 
कर शिरोधार्य
में जानती हूँ 
कभी नहीं इस जनम में तुझसे मिल पाउंगी 
फिर भी इस लोक से ,
तेरे आगे खड़े होके हर क्षण साथ निभाउंगी
मेरा हर दुःख तुने हरने की सोची तो सही 
में क्या कर सकू तेरे लिए अन्तर्यामी ,
में अबला , असाह्य , एक नारी
क्या कर पाउंगी तुम बिन मेरे कन्हाई
इसलिए सारे अधिकार सोप दिए तेरे चरणों में 
जो तेरा फेसला हो करता चल ,मेरे जीवन हित में
कर लिया तेरी हर आज्ञा  को स्वीकार 
करती रहूंगी में तेरा इन्तजार |
इस जीवन को तुम्हरे चरणों में अर्पित
           अनुभूति


गुरुवार, 5 मई 2011

मोक्ष |

ओ कान्हा ,
में जीवित हूँ 
क्योकि तुमने मुझे जीवंत बनाया हैं |
एक बेजान आत्मा को तुमने ,
अपनी अनुपम भक्ति का मार्ग दिखाया हैं |
इस बंजर पड़ी आत्मा की धरती को 
सुप्त पड़े स्नेह  और मातृत्व का बोध कराया हैं |
ये जीवन का नव -सृजन 
तुम्हारे ही श्री चरणों में अर्पित हैं |
मेरे कान्हा !
क्रोध .मोह , ये सब तो आवेश हैं पल भर के 
तेरी भागवत , और गीता न होती ,
तो ये समझ भी नहीं आती  |
तेरा प्रत्यक्ष दर्शन  करती हैं मेरी आत्मा |
इस  आत्मा के स्वामी बनकर सदा यूँही
मेरी कामनाओ का दमन करना 
बनने मत  देना मुझे स्वार्थी , 
सदा मेरी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना
उस  लोक से इस  लोक  में सदा 
मेरे जीवन की हर साँस पर
अपना ही अधिपत्य समझना |
इस चरण दासी को 
अपने श्री चरणों में यूँही स्थान देना |
मेरे कान्हा इस संसार की सबसे बड़ी धनी हूँ
क्योकि मेरी हर साँस ,मेरे रोम-रोम 
और मेरे मस्तक के रक्त बिंदु से 
मेरे कदमो की छाया पे भी तेरा नाम  लिखा हैं |
तेरी इस अनुपम भक्ति और स्नेह को पाकर a
कोई और कामना बाकी नहीं |
हे वासुदेव ,
मुझे अब बुला लो अपने क्षीर सागर 
में ,और कुछ पल ही सही दे दो ,
अपनी चरण सेवा का सोभाग्य
ताकि तुहारी चरण सेवा करते करते ,
में पा जाऊ मोक्ष |
कृतार्थ करना ,
मेरे कान्हा !
मेरे वासुदेव !
मेरे राम  !

 
"तुम्हारे श्री चरणों अर्पित"
   प्रभु ! तुम्हारी अनुभूति


बुधवार, 4 मई 2011

Aaj Radha Ko Shyam Yaad Aa Gaya - Chaand Kaa Tukdaa (1994).flv


अपने कान्हा का इन्तजार करती राधा |
संसार का सबसे अनुपम समर्पण अगर कोई हैं तो राधा का अपने कान्हा के प्रति |
मेरी पसंद का एक गीत |
सुने जीवन में भी बहार ले आये वो हैं कृष्ण आत्म आनंद अनुभूति |
अपने श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित

चरण दासी

मेरे कान्हा बावरी हूँ  तुम्हारी 
तुम्हे देख के सोचती हूँ 
तुम्हारी कठोरता में भी पल -पग सच झलकता हैं |
तुम्हारे शब्दों में , 
तुम्हारे एहसासों  में भी .
तुम्हारे यथार्थ में भी,
तुम्हारी कल्पनाओं में भी ,
इतना सजीव ,इतना सरल ,
कितनी  निष्कपट आत्मा हैं तुम्हारी कान्हा !
तुम्हे देख के अद्भुत स्नेह से मदोहाश मेरी आँखे हो जाती हैं,
और सोचती हूँ मेरे गिरिधर तेरी भक्ति मेरे नाम लिखी हैं|
"जिसके पास कुछ नहीं होता उसी के पास सब कुछ होता हैं |"
ये ही कहो  हो न मेरे घनश्याम 
अब तक नहीं जानती थी 
जानने लगी हूँ तो आत्म विभोर हूँ 
तुम्हारे इस आलोकिक स्नेह से
आज पाया हैं अपनी वास्तविक ,
इतनी ख़ामोशी में ,
इतनी वेदना में भी मुस्कुराहट चली आई हैं इन होठो पे 
आत्म आनंद अनुभूति में जो पाया हैं तुम्हरा साथ 
सच संसार के उस लोक से इस लोक में ,
तुम मेरी साँसों में बस गए ओ कान्हा
मेरी हर आत्माअनुभूति  सिर्फ तुम जानो 
जी करता हैं अब बहार बन खिल जाऊ 
क्या करू ? क्या कहू ?
देख तुम्हे गिरिधर
कानो में गूंजे  मीठी मुस्कुराहट तोरी
अपने से लजाऊ ,
या तुम्हारे चरणों में ही गिर जाऊ 
भूल के आत्मा का हर द्वेष
तेरी खुशबु में बस जाऊ ,
तेरे चरणों की दासी सदा 
ऋणी रहगी तेरी
जो हर पल की दी हैं आत्म आन्नद अनुभूति
अब , मुझे यूँ देख मुस्काओ मत 
लाज आती हैं ,
तुम्हरा ये रूप सलोना देखकर
ओ कान्हा , 
तुम्हारी चरण पादुकाओं 
को पोछने का अधिकार मेरे नाम लिखा हैं |
इस तुच्छ  संसार में कितना अनुपम काम लिखा हैं ,
केसे समजाऊ इस दुनिया को ?
तेरी भक्ति मेरा कितना अनुपम  स्नेह मेरे नाम लिखा हैं |
में मिट जाऊ तन ,मन रोम - रोम  से होकर तुझे पे बलिहारी 
हो कभी कोई जो विपदा आ जाए मुझपे सारी|
इससे ज्यादा क्या मांगू में 
बन स्वार्थी मेने मांग लिया तेरी चरण सेवा का अधिकार |
ओ कान्हा 
इस चरण दासी को करना ,
सदा यूँही अपने 
चरणों की सेवा में  स्वीकार |






अनुभूति 

अब तो जागो कान्हा

ओ कान्हा 
जब से तुम गए ,
अपनी राधा के बृज से ,
सब कुछ सूना तुम बिन ,
दिन ,रात , भोजन,
सब त्याग तुम बिन 
क्या कहे राधा तुम्हे अपने मुख से 
तुम तो बिन बोले ही,
सब समझो अपने मन से
केसे समझाऊ इस राधा रानी को 
नहीं माने दिन भर ,
रात भर जागे 
तुम्हारे चरणों में ,
तुम्हारी अगवानी में
तुम जो दे गए आदेश 
भक्ति का ये मिट जायगी 
अब तो कन्हा जागो 
उठो स्वीकार करो भक्ति,
इस राधा रानी की |
क्यों दे गए तुम स्वार्थी होने का ये आरोप
इस दीवानी को , 
खुद ही समझाओ
में तो हारी तुम्हारी इस दीवानी से
अब तो जागो कान्हा  !

अनुभूति



तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................