गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ज्योतिष और ज्योतिषी
क्या है ज्योतिष ?सबकी अपनी परिभाषाये हैं | मै कोई बहुत बड़ी हस्ती हूँनहीं  की तर्क करने लगू|
लेकिन मेरी नजर मै आज का ज्योतिष सिर्फ बाजार और कमाई तक ही सिमित रह गया है ,आप कही भी चले जाओ आप ने जहा भी अपनी कोई बात रखी उसके समाधान मै आप को कोई जाप या कोई रत्न या फिर पूजा या किसी तरह का कोई विशेष दान बता दिया जाएगा |
सही है ना ,आप को बड़ा अजीब लगेगा लेकिन १९९० से लेकर आज तक मै जितने भी लोगो से मिली हूँ उसमे से मुजको आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जिसने ये क़हा हो की अमुक घटना, इस दिन, इस पल, इस षण तुम्हारे जीवन मै होगी |
और कई बड़े ज्ञानी भी मिले जिनके सामने दक्षिणा रखना चाहि तो क़हा गया ,की इस मदिर की दान पेटी मै डाल देना ,या किसी गरीब को भोजन करवा देना |
आज कल टीवी मै रोज सुबह तो ज्योतिषियों से ही होती है |मै ये समझ नहीं पा रही हम जितना पड़ते जारहे है हमारा दिमाग विकसित होता जा रहा है तो ,हम इतने ज्योतिषी गामी क्यों होते जारहे है ?
ज्योतिष एक मनोविज्ञान है की आप ऐसा करगे तो आप के साथ ये ठीक हो जाएगा | आप को कोई कहे तो आप करते है नहीं आप नहीं करते |
बाकायदा आप अपने दफ्तर से समय निकाल कर मदिर जायेगे |क्या ये ठीक है की कोई आप को कहे तो आप करेगे ?
नहीं ना ,तो फिर अपने जीवन को वेसा बिना ज्योतिषियों के बनाइये जिसा सुखद आप चाहते है |
जानना नहीं चाहेगे केसे ?
  1. सुबह कोशिश करे की आप जल्दी उठे |और सबसे पहले अपने दोनों हाथो की हथेलियों को आपस मै रगड़ कर अपने नेत्रों पर लगाए ,ऐसा आप तीन बार जरुर करे |<इससे आप अपने कर्मप्रधान हाथो मै बसे सभी देवताओं को नमन करेगे >
  2. आप के घर मै अगर कोई बड़ा,बुदा इंसान या माता ,पिता साथ हो तो उनका चरण स्पर्श करे ,और अपने बच्चो  कोभी सिखाये |
  3. आप जिस किसी धर्म  को मानते हो अपने गुरु का नाम सुबह मन से लेते रहे .साथ मै अपना काम भी चलते रहने दे |
  4. घर मै कम से कम किचन का सुबह सुबह झाड़ू जरुर लगाए ,बाकी आप बाई के लिए छोड़ दे |
  5. अगर आप सुबह की चाय बनाने के लिए गेस ओन करके चाय बना रही है तो दो छीटे अग्नि देव के नाम से जरुर अग्नि को समर्पित करे |
ऐसी कई छोटी बात है जिनसे ज्योतिषियों का खर्चा आप जरुर बचा सकेगे और स्वस्थ और सुखी रहेगे |

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

वो जो है मेरी जिन्दगी





वो जो है मेरी जिन्दगी
अपने अश्कों को छुपा कर मुस्कुरा लेती है ,
वो मुझको तसल्ली दे कर बहला लेती है |
बड़ जाता है दर्द जब हद से ज्यादा ,
वो अपने लबो पे नगमे सजा लेती है |
खो ना जाऊ मै कही दुनिया की भीड़ मै
वो मुझको अपनी जुल्फों मै छुपा लेती है |
यूँ सरे आम मिलने से हो ना जाये कही रुसवाई ,
वो चुपके से करके इशारा मुझे सपनो मै बुला लेती है |
दुनिया मै हर इंसान भगवान की दुहाई देता है पर क्या किसी ने देखा है उस भगवान को ?
 नहीं ना दर्द की अनुभति ही किसी के साथ होने का एहसास कराती है ,और हम कह उठते है ये हर बार मेरे साथ ही क्यों होता है भगवान ,याने हम हर पल किसी ना किसी शक्ति को अपने साथ होने पर भी सिर्फ दुःख मै उसकी सत्यता को स्वीकार करते है |
तो क्या आप ने नहीं देखा कभी भगवान को ?
एक दिन अचानक नेट पर कुछ पद ही रही थी किसी का कोई लेख ,एक कमेन्ट लिखा  था ,लाइफ का पहला नेट कमेन्ट जिसने जीवन की दशा ही बदल दी |
मुझको अचानक एक फरिश्ता आ मिला ,ये जान कर लगता है आज भी इस संसार मै राम का वास है ,हां भगवान हमारे साथ ही यही इसी दुनिया मै हर पल साथ रहते है ,बस हम पहचान नहीं पाते और राम हमसे मिलकर भी चले जाते है  |
मै धन्य हूँ की मेरे राम मेरी आत्मा मै मेरे साथ है |
इसीलिए कहती हूँ अपने गुरु अपने राम को आप भी ढूंड निकालिए .पहचानिए कही आप के राम आप के आस पास तो नहीं !
पूछे लोग गुरु बिना क्या मिले ज्ञान ?
कहू कैसे आप को श्रीमान पहले गुरु बना ले किसो को ,फिर मान अपना उद्धार .
ना होता ऐसा कुछ तो राम करते ना अहिल्या उद्धार ,ना होता एकलव्य महान|

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जीवन के हर मोड़ पे यूँ ही चले आना तुम मुझको थामने मेरे राम
कभी खुली हवा सी बहती हूँ मै ,तो कभी अपने को हजारो बेडियो मै बंधा पाती हूँ|
सोचती हूँ तोड़ सारी बेडियो को मै ,निकल जाउ  अनजान किसी डगर पे
पर अहसानों के तले दबा है जीवन ना जाने कितने तुम्हारे राम|
हर पल अंधड़ सा बह रहा है तन मन मै जीवन तुम्हारे नाम से
मोह ,प्यास ,बैर ,प्रीति सब कुछ दूर जारहा इस आत्मा से
भीड़ से शून्य की और क्यों बह रहा जीवन तुम ही बता दो राम
सोचती हूँ कही कायर तो नहीं ?
फिर क्यों आत्मा खीच रही विरानो को .]
जीवन के हर मोड़ पे मुक्ति का मार्ग बताने यु ही चले आना मेरे राम |

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मेरे राम

निशब्द निशा मै है मन विचलित ,दुंद रहा मन राम, राम

तन, मन सब कुछ राम राम ,

साकार ब्रह्म ,साकार रूप है राम

रग ,रग मै बसे राम ,घट घट मै बसे राम

चहु और बसे कण कण मै बसे राम

राम , राम ,राम

मन की आस बस राम तन का अंत बस राम

तुम ही हो मेरे उद्धार करता , मेरे राम

पाऊ जो जीवन मै दर्शन तुहार

तो धो डालू अशरुओ से चरण तुहार

कब मिलगा ,फल मेरी भक्ति का ,

इस आस मै जीवन रही गुजार

कभी तो इस धरती पे भी तुमको आना होगा एक बार फिर

साकार कर जाना होगा ,जीवन मै भक्तो का उद्धार

मेरे रोम रोम मै बसे भगवान मेरे राम

तुम्हरे दर्श बिन सूना जीवन ,सुनी पड़ी दुनिया मेरी

तोड़ निशब्द निशा को आजा एक बार

देजाओ जीवन मै आशीष ,एक बार फिर

जाओ मेरे राम

जाओ मेरे राम |

सोमवार, 25 जनवरी 2010

सरिता का मोक्ष


बह रही है सरिता अपनी ही धाराओ ,मै सब कुछ छोड़ कर
जीवन के सारे बन्धनों को तोड़ कर
हां सरिता का प्रवाह समय के साथ साथ बहुत तेज हो रहा है
उसे जल्दी है सागर मै अपना अस्तित्व खोने की
फिर भी उसे रास्ते मै आये कई पहाड़ो से सीखना है जीवन के जड़त्व को
और रोकना नहीं है अपना वेग
और जो समय से आगे चले वो सरिता अपने साथ उठा ना दे कोई बाद
हां डरती हूँ कही वो गंगा से कोसी ना बन जाए
और बहा ना ले जाए अपने साथ जुड़े कई सपने
हां ,आज भाग्य से तुम आमिले हो सागर की कही तुम्हारी ही आस मै भटक रही थी
अपनी विशाल धाराओ मै सरिता
तुमने सामने आकर आज थाम लिया उसकी प्रचंड लहरों को
की थमो तुम्हारी मंजिल ये नहीं ,
तुम रोहिणी हो तुमको तो अभी और उचाईयो पर जाना है
अपने वेग को शांत करो ,जीवन धारो को दो एक नया आयाम
हां शांत करो इस वेग को ,नहीं तो ये तुम्हारे साथ ना जाने कितनी बस्तियों को उजाड़ देगा
हां इस सागर के मिलन के बिना अधूरी है सरिता
सरिता को अपनी पहचान देने वाले सागर तुम मानो ना मानो सरिता तुम्हारा इस अंश अपने मै समेटे बह रही है जीवन की इन गहरी जल धाराओ मै ,इसी प्रतीक्षा मै कभी तो सागर से होगा उसका अंतिम मिलन
वही तो होगा सरिता का मोक्ष

रविवार, 24 जनवरी 2010

एक सपना खुली आँखों का


मै भी देखती एक सपना खुली आँखों से,
की वो मोड़ एक बार फिर आजाये ,
हां उस रात की तरह सजी हु मै
नयी दुल्हन की तरह और तुम साथ हो मेरे
पास हो बहुत फिर भी अहसासों से दूर नजर आते हो ,
इसलिए देनी पड़ी है शब्दों को जुबा
उसी महकती रात की तरह मै बन जाना चाहती हूँ नयी दुल्हन
मेहँदी के खुशबु वाले महकते हाथ और महकते मोगरे मै
एक बार फिर महक जाना चाहती हूँ मै ,
सूर्ख रंग मै रंगी हुए
,अपने आप मै जीवन के सारे रंगों को समेटे हुए एक बार फिर ...............
आँखे बंद करती हूँ तो खो जाती हु
वही घंटो तुम्हारे काँधे पे सर रखे तुम्हे सुनते हुए
कितना ,खुबसूरत है था ना वो पल ,
सब कुछ मन की कही फिर भी उन अनकही सी
गुनागुना रही हूँ मै,
उन पलों को सुनहरी धुप मै नदी के किसी किनारे तुम्हारे साथ
हां मेहंदी लगे हाथो मै ,हां तुम्हारे हाथो मै हाथ ।
पहले कभी कह नहीं पायी ,हां घूँघट उठाने से पहले की मुह दिखाई मांगना चाहती हूँ आज तुमसे आज ,
सब कुछ है पर सुनी पड़ी है कदमो की आहटे
इसीलिए छम -छम करती पायलों केसाथसब कुछ खनकता हुआ महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
हां इसीलिए मांगना चाहती हूँ पायले,
एक बार फिर बन जान चाहती हूँ दुल्हन तुम्हारे साथ
तुम तो सब कुछ भुलाए बैठे हो ,तो फिर क्यों ?
ना गुन्गुनालू ये पल दोबारा तुम्हारे साथ
सरिता -सागर

सपना

मन को लागे नए पर ,दूर तक उड़ने को
जो चाहा वो मिल गया सनम
फिर क्यों दिल कहे तेरे काँधे पे बैठ जाने को
ऐसा लगे की बरस रहा प्यार तेरा ,अंखियों से
झगड़ रहा अधिकार तेरा फिर भी ,
किसको मानु अपना तुझको जो सोप गया जीवन
उसको जो आज जता रहा अधिकार अपना
कोई नहीं अपना जानती हूँ
सच हो नहीं सकता सपना .सपने पुरे करने के लिए जिगर चाहिए
और वो होसला जो सिर्फ तुम्हारे पास है हां जी ,जो सिर्फ मेरे साथ है

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सरस्वती और बसंती बाई

आज जनम दिन है मेरी दादी बंसतबाई का
हां ,और आज जनम दिन है सरस्वती का उस सरस्वती का जो कही पूरी नहीं हो सकी !
हर तरफ लोग पहन रहे बसंती रंग ,आज रंगा हर कोई इसी बसंत के रंग मै
फिर क्यों या याद रही है मुझको बसंती बाई{जीजा}
हां वो इतनी बुदी महिला ही थी जिसने स्वीकार किया था अपने पोते का ये प्रेम विवाह
हां बहुत अलग थी वो रुदिवादी विचारधाराओ से ,वो करवाना चाहती थी नोकरी मुझसे
बनवाना चाहती थी अपने पोते का घर ,आँगन
हां आज तुम्हारे ही रूप मै जनम हुआ था सरस्वती का |
हां ,सरस्वती कभी पूरी नहीं होती ,क्योकि वो इसीतरह जनम लेती रहती है कभी .माँ तो कभी दादी बनकर
तुम्हारे रूप मै ।
तुम युही अपने आशीर्वाद के साथ हम्रारे दिलो मै निवास करती रहोगी ,औरदेती रहोगी ज्ञान और सोभाग्य
आशीष सदा ,
हां तुम्हारा ही तो रूप है आज की सरस्वती
हां तुम अशिश्ती रहो युही सदा ,दादी बनकर तो कभी माँ बनकर



तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................