बुधवार, 2 नवंबर 2011

विदीर्ण ह्रदय पुकारता हैं तुम्हे 
तुम्हारी कही हर बात पत्थर की लकीर क्यों लगती हैं !
संसार  चाहे कोई आरोप लगा ले 
मेरा  अंतस तो सिर्फ तुम जानो हो 
इन  आँखों से गिरते हर आंसू की पीड़ा
तुम्हे पता हैं ,
 







मेरी सजा




मेरे कृष्णा !
मेरा रोम -रोम तडपता हैं ,
मेरी आँहो में ही तू बसता हैं
केसे कहूँ !
मेरे माधव !
मेरे राम !
में मिट जाउंगी यूँ ही रोते -रोते
और तू अपनी शहंशाही को देखा करना
मेरी सजाओं में अगर यूँ ही मरना हैं
तो मुझे तेरे आदेश की तरह हंस के ये हर सजा कबूल हैं
हां मीटी हूँ तेरे ही आदेश पे मिट जाउंगी
हां एक दिन तो ये होगा कभी शायद तुझे सामने कभी साकार पाऊँगी
श्री चरणों में अनुभूति