शुक्रवार, 6 मई 2011

अंतिम कविता

अंतिम कविता 
में खोजती रही आत्मा की गलियों में 
करूणा और स्नेह से पुकारती रही |
ना कभी पहले मेरा साथ तू था 
न कभी आज खड़ा हैं मेरे ईश्वर
में लडती ही रही तुझसे 
अब नहीं लडूंगी 
न खोजूंगी किसी रामायण में 
न किसी भागवत में 
मेरा अंतस ही जब शून्य हैं 
तो क्या करुँगी इस दुनिया में जी के 
तुझे पाके 
 तू हमेशा ही पत्थर रहा मेरे लिए 
 और में फिर भी खोजती रही
तुझमे सत्य का साथ 
 ना अब कोई साथ ना दुहाई 
खतम करती हूँ ये खोखले शब्द 
और अंत हिन् जीवन का ये सफ़र 
कोई दुःख नहीं मुझे अब 
तेरे होने का 
में तो तेरी चाहत में,
जीवन की चाहत में भूल ही गयी थी 
 की तन्हा दुनिया में आई हूँ ,
और तन्हा ही जाना होता हैं |
सब स्वीकार करती हूँ ,
अब कोई सजा तू मुझे नहीं दे सकेगा  मेरे ईश्वर 
कुछ रहेगा नहीं बाकी तो क्या देगा तो मुझे कोई सजा |
अपने सारे शब्द ;अर्थ ;भाव , अनुभूतियाँ  
मोह , बंधन  ,वचन  सब कुछ यही छोडती हूँ 
सब कुछ अर्पित करती हूँ कुछ साथ नहीं जाएगा 
सिवा मेरी आत्मा के |


अनुभूति 





 

मेरा विशवास

 मेरे राम ,
पल -पल बढता ही जाए हैं मेरा विशवास 
और जग कहे तेरी बावरी मुझे 
ये अनुराग का कोनसा रूप हैं प्रभु !
कभी इस धरती पे आके मुझे तो बता दो ,
सांसो के मनको पे तुम्हारा नाम गिनने वाले को 
कभी तो अपना दर्शन करा दो | 
"अनुभूति  "

वचन से मुक्त एक बार , अब मिट जाने दो |ओ कान्हा !

ओ कान्हा !
केसा तेरा अद्भुत स्नेह!
जो झलके तेरे कण -कण से
तेरा दर्द तेरी पीड ,
तेरा पश्चाताप  सहा न जाए
बस सोचु ये ही की ,
जो सोचु में वो सोचे तेरी मूरत भी 
ओ कान्हा ,
सोचा नहीं था पभु किसी की पीड़ा ऐसे भी सह लेते हैं
देखा हैं साक्षात् तुझे जाना हैं ,
ओ कान्हा !
मेरे पास तेरे स्नेह  और विशवास के सिवा 
दूजा नहीं कोई  जीवन का आधार 
 पीड़ा दे एक बार ही इस देह को ख़ाक कर दो  
एक बार इन चरणों में मुझे स्वीकार कृतार्थ कर दो .
मुझसे सही नहीं जाती ये स्नेह पीड तुम्हारी 
या तो इस दासी की बाँध लो इन कदमो से 
या कर दो अपने वचन से मुक्त एक बार 
तिल -तिल की ये अग्नि ,
चिता से भी घनघोर प्रभु !
किसकी कहूँ , किसको लिखू ?
पाती ये , तुम्हारे सिवा ओ मेरे कन्हाई !
तुम तो सागर  स्नेह का 
में नन्ही सी बूंद नहीं समझ सकुंगी,
तेरा अद्भुत स्नेह
जेसा तुमने चाह में ढलती जाउंगी 
क्या कहूँगी ,क्या सहूंगी 
एक बार बिना मिले ही मर जाउंगी |
और कोई पश्चाताप तो प्रभु !
तुम ही बता ला दो
इससे बड़ी कोई और तड़प हो ,
तो वो दिला दो 
केसा मार्ग दियातुमने ?
मुझे ओ कन्हाई !
जिसने जीवन की हर दुविधा मिटाई ,
इतना तो सोभाग्य  मिला हैं |
बिन कहे भी प्रभु तेरी हर बात को समझने का 
एहसास  मिला हैं ,
कह देते  तो पीड़ा न होती ,कन्हाई 
ये केसी अजीब भक्ति मेरी  तुने बनाई ?
इस लोक से उस लोक खड़े हो ,
केसे समझाऊ फिर भी कितने रोम -रोम में बसे हो !
मेरा तन ,मन आत्मा जो तेरे चरणों के काम ना आये
क्या करू उस तन ,मन को लेकर ओ कन्हाई 
इसिलए तो सब ख़ाक किया हैं 
तेरी मूरत के आगे बैठ बस बहाऊ नीर 
जब जब देखू रूप सलोना घनश्याम 
अब मिट जाने दो बस 
अब मिट जाने दो
ओ मेरे कन्हाई !
"तुम्हारी बंधिनी अनुभूति "



मेरी भक्ति भी तुम ही !

 मेरे कन्हियाँ !
 तुम से कभी न रुठुंगी कभी ,
 शीश झुकाएं इन श्री चरणों में मांगू माफ़ी ,
साथ कभी न तेरा छोडूंगी ,
मेरे श्याम कभी न कहना की तू तन्हा हैं 
तेरी तन्हाई को में अपने स्नेह से तो भर देती हूँ 
में मुर्ख ,अज्ञानी समझ न पायी तेरी वाणी 
जब समझी खोया सब कुछ कर नादानी ,
पाना नहीं अब तो सब कुछ खोना हैं 
तुम्हरे श्री चरणों में ,
मेरी तो तन्हाई का साथी भी तुम ही ,
लडाई का साथी भी तुम ही ,
जिससे संसार में,
सबसे बड़ी प्रीति
वो भी तुम से ही !
मेरा सवाल भी
तू जवाब भी तुम ही !
मेरी भक्ति भी तुम ही !
शक्ति भी तुम ही !
तुम तो वो हो जिससे घंटो में बतियाऊं ,
तुम से सवाल भी खुद ही करू और उत्तर भी खुद ही दिए जाऊं ,
ऐसी पगली , मुझसी कोई नहीं तेरी होगी दीवानी,
जिसने अपने रोम -रोम से प्रीत तुझसे जोड़ी होगी .
तू जो मुझ को कहले ,
सब स्वीकार 
करू पूरा तेरा हर आदेश 
कर शिरोधार्य
में जानती हूँ 
कभी नहीं इस जनम में तुझसे मिल पाउंगी 
फिर भी इस लोक से ,
तेरे आगे खड़े होके हर क्षण साथ निभाउंगी
मेरा हर दुःख तुने हरने की सोची तो सही 
में क्या कर सकू तेरे लिए अन्तर्यामी ,
में अबला , असाह्य , एक नारी
क्या कर पाउंगी तुम बिन मेरे कन्हाई
इसलिए सारे अधिकार सोप दिए तेरे चरणों में 
जो तेरा फेसला हो करता चल ,मेरे जीवन हित में
कर लिया तेरी हर आज्ञा  को स्वीकार 
करती रहूंगी में तेरा इन्तजार |
इस जीवन को तुम्हरे चरणों में अर्पित
           अनुभूति