शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अनुभूतियों का अपना ही आकाश




अनुभूतियों का अपना ही आकाश होता हैं और अपनी ही दुनिया ..इस दुनिया में बुरा कोई होता ही नहीं सिर्फ प्यार और ख़ुशी का एहसास होता हैं .लेकिन जीवन में कभी ऐसे भी मोड़ आजाते हैं जो मुस्कुराहटों   के साथ इन आँखों को नमी दे कर जाते हैं |

एक  लम्हा जिन्दगी ,
कितनी  खुबसूरत थी ,
तुम्हारे साथ ,
आँखे अब सपने देखती लगी थी |
मुस्करा गया था ,
तुम्हे देखकर फिर सोल्व्हा वसंत 
और में शर्म से लाल थी ,
अपने आप से भी न मिला सकी नजर में .

पहली बार अपने आप से लजाई थी ,
एक सोलह साल की लड़की ,
तुम्हारी इन आँखों की मदहोशी से ,
जी उठी थी|

खिल गयी थी मन की हर कली 
और मन के आँगन में बौरा गया था गुलाबी बसंत |
हां  वो लम्हा जिन्दगी 

हर पल याद आती हैं अब भी
कितनी मासूम सी पाक चाहत थी
हां ,वो लम्हा जिन्दगी |


तेरा इन्साफ



शमा जलती रही ,
और
बूंद -बूंद अश्क 
ढलता ही रहा .
मैं  तेरे इन्साफ की ,
दुहाई देती रही ,
सोचती थी ,
सबका इन्साफ,
करने वाला
मेरे लिए
क्या सजा मुक़र्रर करता  है ?

उसकी सजा का
कोई अंत ही नहीं था ,
क्योकि में हँस के,
ये सजा सहती रही ,
वो मुस्कुराता रहा ,
और में खामोश शमा सी,
जलती ही रही |
शमा जलती ही रही ,

और बूंद - बूंद अश्क,
ढलता ही रहा,
और वो यूँ ही हँसता रहा |