गुरुवार, 28 जुलाई 2011

मिथ्या आभास

जीवन और जगत के आधार ,
तुम बिन सुने हैं मेरे प्राण
सब स्वीकार जो तुम दो श्याम !
फिर भी में ये  ही मागु इस तुच्छ संसार
तेरे कदमो में ही इस पगली के छूटे प्राण

जीवन एक सरल सरिता मेरा
समझ न आया तेरा संसार
में तो अपने ही अंतस से दूर जाना चाहूँ
इसीलिए भयभीत तेरे कदमो में चली आऊं


इस संसार की कथनी करनी में  भेद ,
हर मन ,आत्मा में तुम ही बसे ,
 फिर भी अलग अलग हैं भेद
में तो जानू तुझको ही कृष्णा
इसीलिए समझ  ना पाऊं ये भेद
तुमको अपने सा ही पाया
मेरे कृष्णा !

पर भूल ही गयी तुझमे अपने को खोके
तेरा तुझको अर्पण आज किया प्रभु मेने
आज जाना अपना ही अंतस तो पहचाना
अपने को मेरे साथ तुम हो पग -पग
बाकी सब मिथ्या आभास शब्दों सहानुभूतियों का
इस आकाश से परे मुक्त हूँ में अपने ही मन
की दिव्य भक्ति अनुभूतियों में
तुम्हारे चरणों में

श्री चरणों में अनुभूति


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