शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

मौसम


मेरे माधव !
घटा बन के बरसूं मैं ,
या राहों में तुम्हारी बिछ जाऊं
बोलो मेरे माधव !
किस तरह तुम्हारी भक्ति में निभाऊं
ना जानू ,
मैं कोई पूजा ना पाठ
मुझे सिर्फ तेरा नाम लेना याद
ये फिजा ये घटाएं आज मुझपे हैं मेहरबान
क्यों ना में आज अपने कृष्णा संग रास रचाऊ
श्री चरणों में अनुभूति

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

क्या ये ही मेरी नियति हैं ! कृष्णा


इन रोती अखियों में भी क्यों ,
किसी का मुख देखने की चाह नहीं होती 
लाख बुरा कहे तू मुझे ,
फिर भी मैं तुझे देख के ही क्यों मुस्काऊ
नियति हैं तुम्हारी सेवा ही या 
रूह का कोई भ्रम में पाले जाऊं 
सारा संसार कहे मोहे पागल
फिर  भी तेरी एक विशवास की चाह 
सारा जीवन अर्पण कर जाऊं 
ये कैसी  लगन हैं कृष्णा 
जो ना मुझसे छूटे 
नाम मिले रोज नया 
विशवास की बाटं
मुझसे फिर भी ना छूटे 
रोती जाऊं ,
तेरी श्याम छबी देख
फिर भी में तेरी बलाए लेती जाऊं 
तू ना जाने मेरे कृष्णा !
जो तुने छोड दिया मेरा हाथ 
सारा  संसार मारेगा
मुझे पत्थर ,
पुकारेगा मुझे पगली कहके
लाखो बार ,
शायद ये ही सत्य की गति हैं
हा तेरे नाम से मुझे कोई पगली कहके 
पुकारे ये ही मेरी नियति हैं 
श्री चरणों में अनुभूति पुकारे
अपने माधव को ,
श्याम को 
गिरधर को
गोपाल को
राम को
मेरे कृष्णा !
मुझे रोता छोड,
तू किस संसार में डूबा पड़ा हैं 
आज मेरी आत्मा का विदीर्ण सागर फटा पड़ा हैं 
आखिर कब तक और मेरी ये परीक्षा तू लेता रहेगा
ऐसा ना हो मेरे राम ! मेरे माधव ! मेरे श्याम !
तू रच रहा हो इम्तिहान का पन्ना कोई नया 
और में त्यज दूँ 
इन ये साँसे भी पुकारते -पुकारते नाम तेरा ..............
अनुभूति












गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मुझे क्षमा करो मेरे राम !




मेरे राम !
मेरी आत्मा हमेशा अपने आसुंओं से भीगी 
आँखों से ,अपने लबो से 
चूमा करती हैं हैं तुम्हारे कदमो को ,
हा ठीक उसी तरह 
जब मेडलिन ने चूमा होगा 
अपने इशु के कदमो को 
धोया होगा अपने आसुओं से 
  लगाया होगा अपने असीम अनुराग का मलहम 
पर मेरे राम ,मेरे पास 
तुम्हारे  इन चरणों की सेवा के अतिरिक्त 
कुछ भी ऐसा नहींबचा
जो पवित्र हो निर्मल हो ,
जो  में कर सकूँ तुम्हे भेट 
में अज्ञानी  तेरी भक्ति का 
तरिका भी समझ ना पाई 
में दुःख देती रही तोहे 
और मेरे राम 
अपनी पत्थर सी कठोरता ओडे 
सहते ही रहे ,बस सदा की तरह खामोश 
आज समझी हूँ क्या हैं 
उस कठोरता के पीछे छिपा सत्य 
मुझे क्षमा करो ,क्षमा करो,क्षमा करो 
में समझ नहीं पायी तुम्हारी विशालता को 
निश्चलता को ,अंत हीन स्नेह सागर को
फट गया हैं मेरा ह्रदय आज 
तुम्हारी सहनशीलता के आगे 
में हार गई हूँ अब तुमसे लड़ते -लड़ते 
और तुम सदा ही स्नेह से
मुझे कर देते हो सराबोर
अपने कदमो से उठा कर  ,
देते हो स्नेह पूर्ण आलिंगन 
कृतार्थ  किया तुमने मुझे 
धन्य हूँ  में जो पाया हैं ये असीम स्नेह सागर .......
श्री चरणों में अनुभूति













गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मेरे राम !

मेरे  राम !
अजब विडंबना जीवन की
सारे दुनिया के लिए खुले तेरे रोम -रोम के द्वार
जो पल -पल इन अखियन से बस
तेरे चरण पखारे
उसके कंहा की तुमने कभी कोई सेवा स्वीकार
हर सांस ,एक आह बनके गुजर रही
जो रोते -रोते भी बस तुझे ही पुकार रही
राम -राम ,ओ मेरे राम
तुम कंहा सूना करते हो
मेरे रोम -रोम की पुकार
काहे मोहे लगना नहीं आता
इस संसार सा स्निग्ध भोग तुझे
क्यों नहीं सीख सकी में स्वार्थ की विद्या अपार
तुझ  बिनमुझसे छूटे पड़े हैं
 अन्न -जल  ,सिंगार
रूठे  हैं मुझसे निंद्रा और बयार
रोते -रोते दिन बिता हैं
,ये रात भी तकिया भीगोते बीती जायेगी
लेकिन तेरे कदमो में ना बैठ पाने की
मेरे आत्मा की प्यास
केसे बुझ पाएगी ?
केसे  तेरे कदमो की ये दासी
जी पाएगी ,
तुझे ना अहसास
तेरी बावरी मर जायगी
यूँ ही अपनी साँसों पे पुकारते -पुकारते
मेरे राम ,मेरे राम मेरे राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम


























तेरे चरणों की सोगंध

मेरे कृष्णा !
माना में तुझसे झगडू लाखो बार
केसे जियूं तुझ बिन ये बता मोहे
में रोते -रोते दे दू प्राण
तेरे चरणों में मेरे माधव !
संसार छोड़ कभी तो सुन ले मेरी आह
में क्या करू ?
इतना न जानू
सुन तो ले मेरी पुकार
किसे कहूँगी मे मन की ये आह
तुझ बिन ज़िंदा हूँ
पर कहे बिना न रह पाउंगी
मेरे कृष्णा !
मेरे राम !
मोहे राह दिखा ,नहीं तो में
तेरे चरणों की सोगंध
मर जाउंगी ,में ये घुटन नहीं सह पाउंगी
न निभाउंगी कोई वचन
तेरी अनुभूति तेरे बिन न रह पाएगी
मुझे राह दिखा !
मेरे कृष्णा !

मेरे कृष्णा !तू छिपा हैं कँहा ,

मेरे कृष्णा !
ये रोती अखियाँ तोहे पुकारे
तू छिपा हैं कँहा ,
में कँहा ?
किन चरणों में बैठ करू तुमसे बतियाँ
खोल दो ,
इस रसात्मिका पे लगे बंधन
में अरज करू !
तुझसे सिर्फ इतनि ही ब्रज- नंदन
मेरे जीने की वजह एक तुम
तुम्हारे चरणों का नित वंदन
ऐसी काहें कठोरता ओडे हो
मेरे कृष्णा !
तुम बिन सुनी पड़ी हैं रसात्मिका !
श्री चरणों में सुन लो कभी तो
मेरी एक पुकार

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

मेरे पिता !

मेरे पिता !
कंहा खोये हो तुम 
तुम्हारी ये बेटी ना जाने कब से तुम्हे पुकार रही 
मुझे ले चलो ना एक बार फिर वंही
अपने स्नेह अपनत्व की छाँव 
कैसे बैठा करते थे तुम मेरे पिता 
सिरहाने मेरे 
मेरे माथे पे घुमाते हुए वो
स्नेह भरा अपना हाथ 
मुझे फिर लौटा दो ना ,
एक बार फिर वही सब
मेने बड़े होते -होते सब खो दिया हैं
मेरे पिता 
मेरी अमूल्य निधि में
तुम्हे याद
करते इन आँखों से झलकते आंसू ही शेष हैं
मुझे काहे छोड दिया 
इस दुनिया में तुमने तन्हा
दरिंदों ,जानवरों के साथ ,सवेदन हीन इंसानों के साथ
एक बार भी नहीं पलट के देखा तुमने
अपने कर्तव्य निभाने के बाद 
में वही हूँ तुम्हारे साथ
ऊँगली पकडे और तुम अपने कंधो पे बस्ता टांगे
पूछती हुयी ना जाने कितनी बात 
बड़े होने पे क्या ये सब बदल जाया करता हैं
इतना सब कुछ एक रिश्ते के जुड जाने के बाद खो जाया करता हैं
अगर मुझे पता होता तो में कभी बड़ी ना होती
यूँही चलती रहती 
तुम्हारी ऊँगली पकड़े साथ
अनुभूति



मिथ्या जगत से परे

मेरे कृष्णा !
काहे दिया हैं इस आत्मा को ये घर 
नाडीजाल से गुंथा ,मांस ,
हड्डी स्नायु और मज्जा से बना
ये भोग का घर ,
कब तक  कैद रहेगा 
ये आत्मा का पंछी 
उड़ना चाहता हैं इस मिथ्या जगत से परे
 तुम्हारे नीले आकाश में 
मुझे ले चलो अब अपनी शरण 
नहीं निभते खोखले रिश्ते 
ले चलो मुझे दूर अपनी पनाहों में
अब नहीं करता अंतस स्वीकार
झूठे भावों को 
मेरे श्री हरी सुनो इस विदिरण मन की पुकार 
दया करो हे दयानिधे !
मेरे कृपा निधान !
श्री चरणों में अनुभूति










बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अबोध मन का स्नेह

अबोध मन का स्नेह 
विशवास ,सत्य और समर्पण करता हैं ,
समय की भट्टी में तपता 
निखरता चलता हैं ,
प्रगाढ़ होता चलता हैं ह्रदय के आँगन में ,
आँखों से झरते अश्को में 
अपने राम की स्नेहमयी मूरत देखा करता हैं 
दूर बजती  बंसी के सुरों में 
अपने कृष्णा के मन की पुकार को वो पहचान लेता हैं
और अपने स्नेह -सागर की इस कृपा पे 
अपने स्नेह- अश्रुओं से अपने कृष्णा के चरण पखारता हैं
वो नहीं जानता किसी को ,
अपने स्नेह को ही राम और कृष्णा  माने,
वो इबादत किया करता हैं 
उस  अबोध स्नेह की पुकार पे 
तो कृष्णा भी चला आता हैं अपना बैकुंठ छोड़ के 
अपने कदमो में पड़े अपने स्नेह को 
अपने गले से लगाने 
हां अबोध  स्नेह जब पल्लवित होता हैं 
एक विशाल वट- वृक्ष ,
बनता हैं |
असीम  स्नेह का वट -वृक्ष 

श्री चरणों में अनुभूति


मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जख्म




छलकते नहीं अश्क अब इन आँखों से 
अब इन आँखों से सुकून बहा करता हैं|
अपने तन-मन पे जख्म खाने के बाद
           इस रूह पे उभरता तेरा हर जख्म  मजा देता हैं|
इस जहान  मे तू जंहा भी हैं मेरे हर जख्म के दर्द में 
मुझमे ज़िंदा होके ,मुझे अपनी सजा का अहसास देता हैं |



anubhuti 
तेरा दिया दर्द भी हम अपनाने लगे
,तुमने चाहा था किसी मदिर की मूरत बनाना
जो ना तेरी साँसों में चाहत ही नहीं मेरी
हम जिंदगी  को आवारा गलियों में डुबोने चले ,
एक आस में ज़िंदा था मे तेरी
अब बुझा के खुद अपने ही आस को
इस रूह को ,इस तन  को तेरे नाम से हर घडी जलाने तो लगे
मेरे राम और खुदा के नाम से हर सांस जीने वाले
अब झूम के नशे में गानेलगे
जो ना कोई बन सके किस मंदिर का दिया
तो ये तन दुनिया की महफ़िल में रोशन
चमकते जिस्म का सूरज तो बन सके
जिन रास्तोसे हम मुह मोड़ा किया करते थे
जिंदगी  को समझ के तेरी आमानत
आज हम उसे अपने को लुटा के सरे
बाजार नीलाम करने लगे
अनुभूति



तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................