शनिवार, 20 अगस्त 2011

मेरे खुदा !अपने कदमो में इस धुल को कबूल कर

मेरे खुदा !
तेरी रहमतो का ये अमृत मुझपे यूँ बरसता हैं
इतनि दूर से भी
इस कायनात की हर फिजा से अपनी
चिंता को यूँ बया करता हैं
अल्लाह मुझपे यूँ मेहराबान
होगा अपनी किसमत पे ये भी यकीं था
जो देखा अहसास में फूटा ये दर्द
तो जाना हैं तेरी वफाओं
में बसी खुदाई को
तेरे कदमो में बैठ के इन आँखों से बरसती हैं
तेरी ही रूह की चांदनी
मेरे खुदा !
अपने कदमो में इस धुल को कबूल कर

अनुभूति


शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

में मुक्त पवन हूँ!

मेरे कृष्णा !
तुम भी हो हठी ,तो में भी हूँ हठी
सब कुछ सिखा मेने तुझसे ही कृष्णा !
तुझ से सिखा तुझे पुकारना
लड़ना ,झगड़ना
और स्नेह सागर इस जीवन का
तुम काहे विचलित हो मुझे ऐसे देख ,
काहे घबराओं अपनी ही आत्मा के सत्य से

तुमसे ही सिखा सत्य परेशान हो जाए पर पराजित नहीं ,
जो दिया तुमने दिया ,मेने हँस के इन होठो पे सजा लिया
फिर काहे की चिंता मेरे श्याम !
तुम ही कहो पुकारो मुझे ,जब तुम बसे इन अखियन में
तो फिर क्यों डर म्रत्यु का इस संसार का
में मुक्त ,तुम भी मुक्त फिर काहे की चिंता
एक दुसरे में समाये हैं हम दोनों
मेने किया हैं सब कुछ अर्पण से
मेरा हर दुःख, कष्ट, सुख, खुशी,
तुम ही हो मेरे कृष्णा !
इस संसार सी झूटे सारे बन्धनों से मुक्त हो पाया हैं मेने तुम्हे अंतस में
    मेरे श्याम !
      मुझे डर नहीं तनिक खोने,मिलने बिछड़ने का
        स्वार्थ नहीं रिश्तो का
          में मुक्त पवन हूँक्रमिक सूची
            जो बहे बन के जीवन की सुरभि
              इस अंत हीन संसार में
                में मुक्त हूँ मुझे मुक्त ही रहने दो बांधो किस बंधन में
                  रह जाने दो बन के खुशबु जीवन के आँगन में !





                    गुरुवार, 18 अगस्त 2011

                    रूठी हुयी जिन्दगीकी खूबसूरती


                    सोचा नहीं था रूठी हुयी जिन्दगी भी कभी इतनी खुबसूरत दिखाई देती हैं
                    मेने तुझे देखा तो ये जाना ,की तेरी कायनात की खूबसूरती यूँ बयानी होती हैं |

                    मिलो दूर के फासलों पे जब तुम्हारे लबो पे खिलती ये मुस्कराहट की सदा सुनाई देती हैं
                    तुम्हे क्या पता .बिना पायलो की भी इन कदमो में पायलो की आहट सुनाई देती हैं |


                    मेंजानती हूँ दूर बेठे कही तुम सोच के कही मुझे अपने अंतस से मुस्कुराते होगे
                    झनक हैं ये मेरी पायलो की फिर भी दुनिया की नजरो से इसे छिपाते होगे


                    अनुभूति

                    मै ज़िंदा हूँ

                    आज हर तरफ जिन्दगी की सदा सुनाई देती है
                    मै ज़िंदा हूँ हर तरफ ये आवाज अपने ही अंतस से सुनाई देती हैं
                    तेरी बेवफाई में कही -कही खुदाई दिखाई देती हैं
                    किसी को कह के खुदा कोई दिल खुदा नहीं माना करता
                    खुदाई तो रूह में साफ़ दिखाई देती हैं
                    फर्क इतना हैं देखने वाले को पत्थर में भी खुदा दिखा करता हैं
                    बात ये तेरी मेरी रूह हैं की हैं तो रोक सके,
                    तो रोक ले मुझे मेरी हर सास में अपना खुदा दिखाई देता हैं |
                    रुहों पे कँहा किसी की हुकूमत हुयी हैं
                    जिन्दगी ने जब से जीना सिखा तेरी हर बात में खुदाई बसी हुयी देखि हैं
                    तेरे कदमो की इबादत के सिवा कँहा कोई इबादत मेने सीखी
                    में तो वो हूँ जेसा तुझे देखा जाना ,तुझसे ही ये इबादत सीखी
                    मेरी जिन्दगी हैं तेरी इबादत में ही आबाद
                    मेने कँहा दूसरी कुरान की कोई आयत सीखी
                    तेरी
                    कड़वाहट भी शहद से मीठी फर्क इतना हैं
                    तुमने कभी इस मीठास को चखा ही नहीं
                    तुझे क्या पता इस कडवाहट में भी
                    तेरी पाकीजा रूह का अक्स मेरे नाम से झलकता हैं |
                    अनुभूति

                    रविवार, 14 अगस्त 2011

                    क्या करू तुझपे न्योछावर !मेरे कृष्णा !




                    मेरे कृष्णा !
                    जब से समाई हैं इस आत्मा में वो धवल मूरत तुहारी
                    में खोयी सलोने तेरी मीठी मुरली में
                    सोचती हूँ, देखती हूँ तो इन आँखों से बहती हैं तेरी प्रीत अनोखी
                    कही मेरी ही नजर न लग जाए
                    मेरे कान्हा तोहे
                    ये सोच के जी भर भी देख नहीं पाती में श्याम
                    क्या दू तोरी स्नेहिल आत्मा के सदके में
                    मेरी साँसों पे, जीवन के हर एहसास, पे तोरी तो हुकूमत हैं
                    फिर क्या करू तुझपे न्योछावर !
                    ये सोच -सोच के ही में मरी जाऊं
                    मेरे कृष्णा !
                    सब कुछ तेरा तुझको अर्पण किया इस बावरी ने
                    कुछ नहीं मेरा ,
                    जानती हूँ दुनिया मुझे कहे पगली
                    पर श्याम मेरे तुम न कहो मुझे
                    पगली ,
                    हां मेरे श्याम तुम आये थे
                    भीष्म के संद्शे पे भी आओगे एक दिन
                    जब में भी हो जाउंगी भीष्म की तरह अपने रोम -रोम से छलनी
                    और ले जाओगे अपने साथ
                    अपनी इस बावरी चरण दासी को
                    अपने बैकुंठ
                    कर दोगे मुझे इस संसार के मिथ्या भ्रमो से मुक्त
                    दोगे मेरी प्रीत को नया नाम
                    इसीलिए तो में बलिहारी कान्हा तुझपे
                    मेरे श्याम !
                    मेरे मुरलीधर !
                    श्री चरणों में अनुभूति


                    Guru-Tere Bina




                    only for my loard ramaa
                    anubhuti

                    शनिवार, 13 अगस्त 2011

                    मेरे कान्हा जी ! प्यारी बहन सुभद्रा की स्नेह डोर

                    मेरे कान्हा जी !
                    आज तो तुम्हारी कलाई पर भी बाँधी जायेगी
                    प्यारी बहन सुभद्रा की स्नेह डोर
                    मेरे कृष्णा!
                    जीवन के सारे रूपों में
                    में बन्धनों में
                    में कितने सरल स्नेह सागर हो तुम
                    तुम्हारी आँखों से बरसती हैं
                    बहन सुभद्रा और जाने कितनी बहनों के लिए
                    भी अनन्य स्नेह ,वात्सल्य और स्नेहिल प्रीत ,
                    एक ही पल में ले लेते हो तुम सारी बलाएँ
                    अपने सर और दे देते हो
                    जीवन भर का वात्सल्य और स्नेह आशीष !


                    मेरे कृष्णा ! मेरे कोस्तुभ धारी !
                    में धन्य हूँ जिसने पायी हैं
                    तेरी चरण सेवा
                    तेरी हुकूमत और तेरे दासत्व की तक़दीर
                    बस ,इन अखियन से ,
                    इस आत्मा के नैनों से में महसूस करती रहूँ
                    सदा तेरी अनमोल प्रीत
                    हां संसार को बँटती वो तेरी वात्सल्य प्रीत !
                    अनुभूति

                    मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,मेरे कृष्णा !

                    अंधरे के बाद इस उदित होते इस
                    स्वर्णिम सूर्य की छटा हो तुम ,
                    मेरे कृष्णा !
                    मैं खोज रही थी ,
                    मिथ्या माटी के बुतों में तुम्हारा साकार रूप ,
                    पर तुम तो अनंत हो ,
                    दे जाते हो अपनी ही छाया तुम कभी -कभी दूसरों को
                    जगत की इस मिथ्या से दूर में पा जाती हूँ
                    एक मासूम बच्चे की निश्चल मुस्कराहट में
                    मुस्कुराते हुए तुम्हे कान्हा !
                    कितना अनुपम ,सरल रूप सलोना
                    तुम्हारा मेरे कृष्णा !
                    तुम्हारी छबी में खोजा करती थी ,
                    छायाओं में .परछाइयों में
                    पर तुम मुझे मिले हो मुझे हो साकार
                    इस उदित स्वर्णिम सूर्य की गहराइयों में
                    अंधरे के बाद का ये उजाला
                    मुझे एक दिन ले आयेगा तुम्हारे ही अंनत आकाश में ,
                    मेरा प्रणव ,
                    अंतिम सत्य
                    मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,
                    में खुश हूँ प्रति पल ,
                    तुम तक जो बदती चलती हूँ
                    तुम्हारा ही अस्तित्व हूँ
                    और पल-पल तुममे ही खोती चलती हूँ
                    तुममे मेरे कृष्णा !
                    श्री चरणों में अनुभूति

                    बुधवार, 10 अगस्त 2011

                    या वफ़ा हो तुम


                    मेरी हर सुबह इन आँखों सेटपकती नूर की बूंद ,
                    से रिमझिम गिरती बरखा हो तुम '
                    तुम्हे खुद नहीं पता मेरे लिये
                    एक सजा हो
                    या
                    वफ़ा हो तुम
                    जिस मोड़ पे लायी हैं जिन्दगी
                    अपने आप से ही भागा फिरता हूँ में
                    अपने ही अंतस से अपने ही सत्य के लिए लड़ा किया करता हूँ में
                    इस झूठी दुनिया में फरेबी पत्थरों केसाथ ,
                    रहते -रहते तुम भी दो रंगी रंगों में ढल ही गए ,
                    में लड़ता ही रहा अपने सत्य के लिए और तुम
                    इस दुनिया के रंगों में ढल गए ।
                    काश में tumजेसा ही
                    अपने लिए ये दुआ करता रहूंगा
                    मरता हूँ में पल -पल फिर भी तेरे नाम से
                    फिर भी कही तो जिया करूंगा |
                    हैं तुमने इन आँखों को ,
                    इस रूह को कुछ सोगाते
                    इसीलिए तेरे ही गुरुर के लिये जीता रहूंगा मै
                    अनुभूति

                    सोमवार, 8 अगस्त 2011

                    बरसता स्नेह तुम्हारे नाम

                       बरसता स्नेह तुम्हारे नाम

                       ये तेरे नाम की तिशनगी रहे रोशन मेरी सासों में,

                      तेरी मोहब्बत बहती हैं बन के आफ़ताब इन सांसो में |



                      बरसता हैं तेरा असीम स्नेह मुझपे ,जेसे खुदा लुटा रहा हो हुस्न 

                      मुझपे बनाके कोई शमशीर ,मेरे लबो की सिहरन पे |

                    मेरी दुआ



                    मेरे खुदा !तेरी रहमतो का साया मुझपे हूँ ही बरसता रहे
                    में मरती रहूतेरे नाम से और तू मुझे ज़िंदा रखने की दुआ करता रहे।

                    मुझे नहीं पता मेरी अगली सुबह मेरा क्या होगा !
                    सब कुछ तेरे हवाले मेरे मसीहा, तो अब मुझ जेसा कोई क्या करे ?



                    मेने किया हैं इस रूह से गुजरता हर लम्हा तेरे नाम!
                    काश तू इस धरती पे उतर कर एक इंसान बने तो,
                    इस गुजरते लम्हे की कोई बात बने |

                    काश समझा सकती में अपनी इबादत को
                    तेरी पन्हाओ में आके
                    ऐसी मेरी दुआ करो कभी कबूल तो कोई बात बने |

                    मेरी रूह ने तो की तेरे पाक साए पे पांच वक्त की नमाज अदा
                    काश कभी मेरी रूह की इबादत को ,
                    अपनी रूह से कबूल फरमाएं तो कोई बात बने |


                    अनुभूति

                    तेरी तलाश

                    निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................