रविवार, 5 जून 2011

संसार का सबसे बड़ा सत्य , एक ही "राम "

संसार का सबसे बड़ा सत्य ,
एक ही "राम "
जनम ले शरीर तो भी राम  ,
छूटे तो भी राम !
मेरा अंतिम सत्य भी,
मेरे आराध्य राम!
जितनी अखंड स्रष्टि उतना,
अंखड मेरा विशवास ,
एक - एक शब्द हैं जो सत्य वो हैं मेरे राम !
समय , हालत कँहा डोला सके हैं
ये विशवास ,मेरे राम!
संसार झुटा हो सकता हैं
हो सकता हैं हर इंसान 
जो झुटा हो ,मेरा राम!
तो में त्याग दूँ ,ये प्राण !
कोई मोल नहीं ,इस शरीर का 
मिट के तो रूह मिलेगी राम से 
हां अपने आराध्य से ,
इस संसार में सब झूट ये आत्मा का ही रुप सच्चा एक मेरे राम !
संसार की कोई ऐसी यातना नहीं बनी,
जो तोड़ दे मेरा विशवास ,
कोई छीन तो ले मुझसे मेरी आत्मा ,
मेरे रोम -रोम में बसा मेरा राम !
शक्ति को तो अभी परखा नहीं तुमने संसार 
देखा नहीं रूप भक्ति का अभी इस जँहा में एक बार
जो शरण लगा एक बार मेरे राम 
वो ले छुटे प्राण ,
तो भी न निकल सके ,
इस रूह से राम !
मेने पुकारा हैं इस संसार में,
हर सांस से सिर्फ राम नाम
में तो अडीग धरा हूँ ,
कँहा समझ सका कोई ,
डोलने वाला सागर नहीं में 
ना जाने कितनी बार हुआहैं  प्रलय ,
कितनी  बार सागर तुमने इस धरती को लीला हैं 
फिर भी अंनत काल  से ये अडिग खड़ी हैं 
सामने तुम्हरा ही नाम आत्मा में बसाए ,मेरे राम !
मेरे नवसृजन का प्रारम्भ भी  राम !
अंत भी राम !
मेरे राम !

अनुभूति

शनिवार, 4 जून 2011

मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !

कोई कविता
या
गजल कहू केसे!
मेरे कोस्तुभ स्वामी!
मेरी आत्मा का हर छोर तो खुला पडा हैं आप के सामने ,
मेरे तो आंसुओं में भी आप हो और खिलती मुस्कराहट में भी आप हो 
मेरे तो मन का हर भाव भी आप और उससे बना शब्द भी आप .
मेरे कान्हा !
में तो कुछ लिख नहीं सकती
क्योकि मेरी याद भी आप ही हैं
कोस्तुभ धारी !
मेरी जिन्दगी भी आप ही हैं कन्हाई !
और कहू की आने वाला पल ,
और गुजरा हर लम्हा भी आप ही हैं
मुरलीधर !
मेरे तन मन , साँसों की खुशबु भी
आप ही के नाम से आती हैं
कान्हा !
दुनिया से कोई डर नहीं मुझे तेरी भक्ति में
मेने तो दुनिया ही त्याग दी हैं,
मेरे कृष्णा !
किसको कहू ,किसको बताऊ
की मेरे कोस्तुभ धारी!
में तुझे आपनी आत्मा से कितना चाहूँ .
आप मेरे स्वामी में
में आप की चरण दासी कान्हा जी !
फिर दूजा कोंन जो हमारे बीच सके |
मेरे कान्हा !
तेरे हाल पे में केसे हंसू !
आप भले ही मेरे हाल पे हँसते जाओं |
में तो हकीकत में हूँ
तेरी चरण दासी कान्हा !
तो काहे भुलाये बठे हो गिरिधर मुझे
में तो तुमसे कभी रूठू ,
तुम भी मुझे रूठे नहीं कभी
तो हम एक दुसरे को मनाये क्यों ?
हम तो हर पल -पल हर लम्हा साथ ही थे हैं और रहंगे
फिर मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !
नहीं लिख सकती इसीलिए कोई गजल
या कविता जो दर्द से भरी हो
जिसके रोंम -रोंम  मेंआप बसे हो ,
मेरे गिरिधर गोपाल!
उसके पास क्या खोना ,क्या तो पाना
क्या याद जाना
क्या हकीकत, क्या खाब
सब कुछ तेरा हैं मेरे कोस्तुभ धारी !
मुझे कभी नहीं लगा मेरा कान्हा मुझसे रूठा हैं
में रूठी हूँ कई बार दे दे ताना
तुम तो सरलता का सागर !
स्नेहाधिपति !
करुनाधर !
श्री हरी !
हर रूप हर रंग , हर सांस ,
कितना नशे में हूँ तेरे
कोस्तुभ के स्वामी
इन शबदो से केसे समझाऊ
इसीलिए नहीं लिख सकती
में कोई गजल या कविता
तुम्हारे असीम स्नेह पे
कोस्तुभ स्वामी !
मेरा स्नेह देखना हैं तो उड़ कर चले आओ ,
मेरा तो सपना अधूरा पडा हैं,
मेरे श्याम सलोने तेरे दर्शन का
 तेरे मेरे अंतहीन मिलन का
में प्रतीक्षारत हूँ सदा से
सदा रहूंगी |
सिर्फ अपने कान्हा की
कोस्तुभ स्वामी की
दासी


अनुभूति

जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ओ मेरे कोस्तुभ धारी , कान्हा ,

ओ मेरे कोस्तुभ धारी ,
कान्हा ,
आज मोहित हूँ 
तेरा मासूम ह्रदय रूप देखकर ,
कितना सरल ,
निष्कपट तेरा रोम -रोम 
मेरे कान्हा!
मन हैं धवल आकाश ,
आत्मा हैं या,
स्वयं वासुदेव का गुण 
अनंत आकाश की उचाईयों के साथ ,
धरती का आलिंगन भी तुम्हारे ह्रदय में 
कान्हा जी |
मेरे रोम -रोम के स्वामी 
बलिहारी जाऊ इस मासूम रूप में तुहारे 
जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ,
बन जाऊ यशोदा 
लगा लू गले से अपने कान्हा को ,
मासुम सी बातोको  , 
सरलता को , 
आज बलि हारी हूँ 
कन्हियाँ  !
तेरी निष्कपट ,
सरल , स्नेह भरी 
वाणी पे , 
तेरी मुरली की तान पे |
नत मस्तक हूँ 
अपने राम के श्री चरणों में !
उन्होंने जो दिया हैं ,
मुझे कान्हा !
तेरा ये भक्ति संसार
ओ कान्हा , 
केसे कहू ?
केसे समझाऊ ?
तुझपे में बलिहारी जाऊ
मेरे कन्हाई !

अनुभूति


शुक्रवार, 3 जून 2011

एक अद्भुत गीत

 मेरे भगवान !
मेरे कान्हा! मेरे कोस्तुभ धारी !
के चरणों में एक अद्भुत गीत , 
एक पुकार अपने कन्हाई को ,
       वही पुकार जो राधा ने अपने कृष्ण से की ,
सीता ने अपने राम से ,
और एक भक्त अपने भगवान से करता हैं
की जीवन में एक बार उसका साक्षात दर्शन हो |
मेरे कान्हा जी!
इस" अनुभूति "की इस संसार में और कोई इच्छा नहीं |
आप का दर्शन मेरी भक्ति और मेरा मोक्ष दोनों हैं |
 में अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण जी से करती हूँ |  
कन्हाई मेरी पुकार भी इस जीवन में सुन लो
  जिस लोक में हो ये बावरी आप को कँहा खोजेगी | 
आप को कान्हा जी !
                                                     
श्री चरणों में अनुभूति

मेरे कोस्तुभ धारी !

मेरे लिए ये कोई कविता नहीं| 
मेरे कोस्तुभधारी भगवान श्री कृष्ण! के चरणों में अन्य भक्ति से समर्पित मेरी आत्मा का फूटता स्नेह हैं जिसको पूरी तरह व्यक्त करने में में अभी भी असमर्थ हूँ !
मेरे कान्हा का नाम मेरे स्नेह के रूप में मेरी आँखों से बरसता हैं |


हे करूणा निधे!
हे दयानिधे!
हे जगत्पति !
मेरे कान्हा!
मेरे कोस्तुभ धारी !
प्रभु क्या मांगू अब ?
जिसको बिन मांगे,
तेरा भक्ति संसार मिला हो ,
वो सबसे  बड़ी  धनवान प्रभु !में 
तुझे पाकर इस आत्मा में अभिभूतहूँ |
मेरे कन्हाई !

क्या कहू कान्हा !
जिस और देखू तेरे स्नेह का उजाला 
सारे अँधेरे मिटा गया जीवन के !
जो लेती रही में रोम -रोम तेरा नाम |
कान्हा  जी!
न देते आप मुझे ये उजाले तो भी 
मेरी आत्मा तेरी ही दासी रहती |
जिसे मिला हो आप का दासत्व वो और क्या मांगे ?


तेरा स्नेह टपके इन,
अखियों से बनके सुखकर नीर ,
मेरी आखो में मदहोशी तेरी भक्ति की ,
तेरे अपार स्नेह की ,मेरे कृष्ण कन्हाई 
तेरा दर्शन नहीं किया मेने आज तक 
फिर भी तेरा स्नेह ,भक्ति संसार पाया मेने 
इस लोक से उस लोक तक 
तीनो लोको की स्वामिनी  बनी हूँ में आज ,
मेरे कोस्तुभ धारी !
क्या मांगू प्रभु ! 
 बिन मांगे भी भर दी 
आप ने स्नेह , भक्ति 
और संसार की ख़ुशियों से मेरी झोली खाली |


वाह रे बनवारी ! मेरे गिरधारी !
श्याम सलोने
तेरी माया अपरम्पार ,
न दे तो जिस्म से जान चुरा ले प्रभु !
और दे तो एक पल में दे त्याग ,सारी हुकूमत प्यारी 
मेरे कान्हा तेरी सरलता ,
पे में जाऊ बलिहारी !
यु ही बस मिटती जाऊं
हर जनम मुझे कान्हा नाम की भक्ति दीजो प्रभु !
मेरे कोस्तुभ धारी को ही मेरा आराध्य कीजो

हाजारो जनम भी पाउंगी ,
तो नहीं चुका सकुंगी , 
तेरे स्नेह की कीमत सारी ,

ओ मेरे कान्हा !
ओ मेरे गिरिधारी !


अब जाना क्या सुख था |मीरा के पास ,
क्यों राधा भी इतनी दीवानी थी ?

जिस स्नेह मधु को उन्होंने चखा 
कितना अद्भुत मीठा हैं वो !
वो मिठास बन बसे मेरे शबदो में सदा ये वर दीजो |
और कुछ दीजो न दीजो ,
अपनी चरनन धूलि मस्तक पे लगाने का दासत्व दीजो |
तेरी मधुर मुरली में जब में खो जाऊ होश नहीं दुनिया का ,
कही जब हाथ जले तो में सुध पाऊ!
त्याग दिया संसार मेने 
तेरे नाम में 
मेरे कान्हा !

बस ऐसा ही मुझे स्वच्छ निर्मल बनाए राखियों मेरे कान्हा !
तेरी ही लीला हैं ,
तेरा ही आदेश ,आत्मा जो  मिटीहैं |
पल -पल इन साँसों में ले तेरा नाम |
चाहे कह दूँ  ,
में कृष्ण!
, चाहे कह दूँ ,
में राम !
आप के श्री चरणों में मेरे कन्हाई 
अनुभूति







गुरुवार, 2 जून 2011

गीत गाती हैं आज मन की नगरिया

     ओ कोस्तुभ धारी 
            गीत गाती हैं आज मन की नगरिया 
            जब प्रीत मिल जाती हैं बन के सावरियां .
         मेरी भक्ति , शक्ति , सभी आप 
 मेरे कृष्णा   श्री चरणों में अनुभूति

बुधवार, 1 जून 2011

ओ निर्मोही कोस्तुभ धारी !

कान्हा जी ,
सौ बार जिए ,सौ बार मर जाएँ ,
यमुना किनारे खड़ी राधा की ये पीड ,
श्याम अब तो सही ना जाएँ
तुहारी मुरली की धुन -सुन ये मुस्काय ,
ये जीवन पा जाएँ ,
जो शांत हो तेरे अधरों की धुन
बस दूजे ही पल बेजान शरीर हो जाएँ ,
कान्हा जी ,
स्नेह के सागर !
केसी भक्ति ये !
ये कैसा स्नेह सागर !
ये भक्ति जो ,
जो तिल -तिल जलकर की जाएँ ,
स्नेह सागर
जो बूंद -बूंद अखियन के नीर से भरा जाएँ ,
ये जीवन हैं कान्हा जी या कोई सजा ,
कान्हा जी !
राधा तेरे चरण के अगाध विशवास पे बलिहारी
हर पीड हँस-हँस ,
नीर बहाती सहती जाएँ ,
निर्मोही कोस्तुभ धारी
तुम तो भूल गए राज -पाठ में अपनी राधा
और ये बावरी हैं जो पल -पल
तेरे निष्ठुर !निर्मोही !कठोर
तेरे ही गुन गाती जाएँ
तेरे ही चरणों में शीश नवायें ,
कान्हा !
तेरी सत्ता ,
तेरा स्वामित्व ,
तेरे ज्ञान के आगे
तुच्छ पडा हैं असीम स्नेह
कोस्तुभ धारी !
तेरी राधा जाने
कोई कठिन शबदो की भाषा ,
वो जाने बस समर्पण ,नयन नीर और
तेरी खामोश धडकन की भाषा ,
कन्हाई !
"अपने शब्द निभाओ"
यमुना किनारे बाट
जोहती अपनी राधा को
गले लगाओ |
अनुभूति

तेरे कदमो की इबादत में ,

मेरे राम!
मेरी आत्मा ! 
मेरे प्रभु !
न जाने कितनी शिकायते करती हूँ 
तेरे कदमो की इबादत में ,
ढलते -ढलते ये अश्क 
आप के कदमो को पखार दे ,
मेरे लिए , 
तेरी आत्मा को वेदना देने की माफ़ी ये ही हैं|
 ये जीवन सजा हैं या दुआ नहीं मालुम ,
मेरी आत्मा को तेरी आत्मा की पनाह ही काफी हैं ,
इस जिन्दगी  को जीने के लिए |

अनुभूति

मंगलवार, 31 मई 2011

मीरा

मीरा अपने कन्हियाँ से इतना स्नेह करती थी 
की जीवन के अनन्य स्नेह के रूप अपने पति में भी 
वो अपने कृष्ण जी को ही देखती थी |
इस अद्भुत भाव को व्यक्त करते उनके ये शब्द .


"मेरे तो गिरिधर गोपाल दुसरो ना कोई ,
जाकें सिर मोर मुकुट मेरों पति सोई ,"
   मीरा  

कलयुग में तुम्हारी जरुरत हैं कान्हा !

स्नेह की
बड़ी -बड़ी परीभाषाएँ
बोलते सूना हैं पडा हैं ,देखा हैं,लोगो को
और अंत में सब को सत्य से मुँह मोड़ते ही देखा हैं |

क्या ये ही हैं स्नेह ?
या फिर किताबो के पन्नो से लिखना ही,
जीवन सत्य हैं
उसमे शब्दों के सच की आत्मा कँहा हैं
कँहा हैं स्नेह सागर |

मेरे कृष्णा !
तुम्हरा स्नेह सागर खाली होगया हैं अब ,
जिसकी जगह भरी हैं कठोरता ने ,
सहानुभूतियों ने , स्वार्थी होने के नामो ने ,

कँहा हो 
कान्हा जी आप 
इस संसार में , 
सब कुछ तो झूठा हैं यंहा 
एक नहीं सब रिश्ते झूटे हैं |
सब लुटने और मन को तीर चुभोने लगे हैं


कँहा हो कान्हा ?
स्नेह के सागर इस संसार के 
कलयुग में तुम्हारी जरुरत हैं कान्हा
अपने बैकुंठ से चले भी आओ ,
चले भी आओ ,

अनुभूति














राधा का विश्वास


ओ कन्हियाँ
तेरी बावरी राधा ,
तुझे यमुना तट पुकारे ,
ओ श्याम ,
अपनी बंसी ले आओ ,
नदियाँ किनारे
तुम्हारी बंसी बिन सूना पडा ,
राधा का संसार ,
विशवास हैं राधा को ,
मेरे कान्हा जी आयेंगे ,
बाटनिहारती खड़ी हैं राधा रानी
बूंद - बूंद गिराती जाती हैं,
अखियाँ से पानी ,
कान्हा जी
अब तो आजाओं
तुम ही कहो हो राधे जब पुकारोगी
में चला आउंगा , यमुना किनारे
चले आओ ,
श्याम
!
राधा रानी का ये विशवास
पूरा कर जाओ ,
वो पगली कुछ नहीं मांगे ,
वो खो जाए ,बस सुन ,
तुम्हारी मुरली की धुन
युमना तट चले आओ एक बार
अपनी राधा का विश्वास पूरा कर जाओ !
मेरे मुरलीवाले!
मेरे कोस्तुभ धारी !
श्री चरणों में अनुभूति

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................