सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

तेरा चेहरा और मेरे अश्क


ऐ मेरे खुदा ,
उनको,
कभी तो, 
हम पे रहम आए ,
 
कभी तो , 
ऐसा हो कि ,
उनको मेरी आँखों से गिरते इन अश्को में 
अपना चेहरा नजर आए  | 

उनको यकीन हो न हो ,
मेरा हर अश्क 
आँखों से ढलते -ढलते भी 
उन्ही के चेहरे को
 अपने अश्कों में महसूस करता हैं |


-- अनुभूति 

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

अल्हड सरिता


हवा के साथ बह जाओ ,
घटा के साथ बरस जाओ,
ये भी जिन्दगी की है एक अदा ,
आँखे बंद करके भीगी मिटटी की खुशबू  ,
अपनी साँसों में बसा लो 
ये भी है बहती हुई हवा की एक अदा 

,खुदा की कायनात में
हर लम्हा
हर पल है
एक अदा,

जब में टूट के बिखर जाती हूँ ,
हर बार ये कायनात ही मुझे देती जीने की नयी अदा .

दिल कहता है की तोड़ के सारे बंधन ,
में बह जाऊं इस भीगी हवा के साथ 

ये है अल्हड सरिता की एक अदा .
यंहा सब कुछ बंधा - बंधा है .

लेकिन
सरिता की दुनिया में सब कुछ ,
हर सांस उस महकती हवा के करीब है 

हां जिन्दगी में तुझसे बेहद करीब हूँ ,
मैं मिटटी हूँ ,
और सब को छोड़ तेरी ही मिटटी में मिलना चाहती हूँ .

ऐ कायनात 
मुझे अपनी बाहों में थाम ले,
और ले चल इस बनावटी दुनिया से दूर ,

ग्लेशियर और  पठारों  की उस खामोश दुनिया में ,
जँहा कम से कम किसी के अपना ,
और किसी के पराया होने का गम तो न हो .

जँहा हो सिर्फ हवाओं की खुशबू  और सरिताओ का जल ,
और रिम - झिम  करती जिन्दगी |

-- अनुभूति 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

तेरी रहमतो का साया

आप की खामोशी , 
मेरे हर सवाल का जवाब होती है |

बिन मांगे भी  सब कुछ दे देने की आप की अदा ,
हर बार आप को जिन्दगी में नया मुकाम देती है .

क्या करूँ अल्फाजों से जिन्दगी को बयाँ ?

जब सोचती हूँ अपने को ,
हर सांस
हमको आप के कदमो पे झुका देती है..
  
अपनी  रहमतो का  साया 
यूँ ही जिन्दगी पे बनाए रखना ,

इस कदमो की धूल को ,
बस, अपने कदमो से लगाये रखना |

मांगू अब  क्या खुदा से और ,
बस कदमो की धूल को 
कदमो से लगाये रखना , 

मेरे खुदा !


-- अनुभूति 

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

तुम्हारा आलौकिक साथ !


स्नेह को कभी समझा ही नहीं जा सकता
बस उसकी उठती रश्मियों को 
आत्मा तक महसूस किया जा सकता हैं .

ये कैसा साथ है तुम्हारा !

जो हर पल, हर शब्द मेरा साथ देता भी है
 और किसी को महसूस नहीं होने देता हैं |

बावरी हूँ मैं तुम्हारी.

कितनी उमंगें उठा देते हैं तुमहारे ये शब्द ,

जीने की एक नयी अदा देते हैं ,
बेजान पड़ी इस जिन्दगीं में ,

ये ही मेरा सत्य हैं, आनंद है  |
तुम्हारा आलौकिक साथ !

-- अनुभूति 

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

तुम्हारा स्नेह -पाश



तुम्हारा हर शब्द मेरी आत्मा तक पहुँचता है . 
हर शब्द मुझे झकोर -झकोर के कहता है  कि

मैं तुम्हारे लिए ही मन के आंगन से निकला हूँ .
हर बार जवाब मिलता है  मुझे,
मेरा तुम्हारे शब्दों से ,

तुम्हारी वेदना,
और सब कुछ कह के भी चुप रह जाने की आदत से 

मैं  तुम्हारे इसी विश्वास के साथ बंधी हूँ 
और सदा बंधी रहूंगी|

तुम्हारे इस स्नेह पाश में सदा बंधी रहूंगी |

-- अनुभूति 

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हिना


ये कविता किसी बहुत बड़े दार्शनिक या विद्वान के लिए नही है |
ये कविता है घर-घर जाकर काम करने वाली एक साधरण सी लड़की हिना के लिए   |


तुम्हे सलाम करती हूँ हिना 
सलाम करती हूँ .

जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने की
तुम्हारी ताकत को . 

तुम मेरे लिए बहुत ख़ास हो 
तुम्हारी वे मासूम सी बातें 
और, 
अपने परिवार के पांच लोगो को पालने का बोझ ,
और,
उसमे दम भरती तुम्हारी सपने देखने की चाहतें .

कितने ख़ूबसूरत,सरल और सच्चे सपने हैं तुम्हारे .

वे कभी कानो के बूंदों की फरमाइश
और उन्हें पहनकर बहुत खुश होना,
और अपने को एक टक सा आईने में निहारना 

कितना सुन्दर और जीवंत होता है 
तुम्हारा हर एक सपना 

तो, कभी मुझसे दाल -चावल खाने की फरमाइश करना .
सोचती हूँ ,
तुमसे सीखना चाहिए उन लोगो को ,
जो हार कर घर बैठ जाते हैं ,
और अपने सपनो को आँखों में ही लिए,
 दम तोड़ देते हैं .

और किस्मत का दोष निकालकर रोते हैं |

अहले सुबह ,
जब दुनिया बिस्तर में ही होती है
 एक मासूम सी 

पद्रह साल की लड़की ,
सुबह छ बजे दरवाजा खटखटा रही होती है  |

सुबह के दस बजे मोहल्ले का काम निबटा कर .
तुम भूखे पेट ही चल देती हो स्कुल ,
अपने पढने की चाहतो को मन में समेटे ,

और , शाम को पूछने पर कह दिया करती है -
"दीदी भूख ही नहीं लगती "

मुझे अन्दर तक डरा देते हैं तुम्हारे ये शब्द !
हर रविवार को चाँद निकलता है,
  दिन में ,

सारी मुश्किलें , सारा दर्द , 
सब कुछ रविवार को कहीं नहीं होता 

क्योकि हर रविवार को 
 चाँद ,
हिना के चेहरे पर चमक रहा होता है |

उस चाँद के आगे हम दोनों भूल जाते हैं और 
उसके सपनो के सौदागर की बातो में कही खो जाते हैं |

कितनी आरजू हैं उसकी की,
 वो भी दुल्हन बने 
सोचती हूँ ,
कुछ सुलझाने की कोशिश करती हूँ .

क्या हिना अपने सारे लोगो को छोड़ कर 
कभी अपने हाथो में रचा पाएगी हिना ?

हर बार
ये पूछने पर कि तेरे बाद,
इन भाई -बहनों का ,
और बीमार माँ का क्या होगा ?

हिना कुछ नहीं कहती ,
खो जाती हैं 
अपनी कडाही और चाय की भगोनी में ,

और, में खो जाती हूँ
इसी सवाल में कि कब रचेगी 
हिना के हाथो में भी हिना ?

सलाम करती हूँ तुम्हे मै हिना ,

क्योकि ये समाज बड़ी बड़ी बाते ही करता रहेगा ,
तुम्हे ये नहीं दे सकेगा अपने सपनो का सौदागर .

तुम्हारा नाम नहीं होगा किसी पुरस्कार या सम्मान की सूची  में ,
इसी लिए कोशिश करुँगी की मिलवा सकूँ 
तुम्हे अपने सपनो के सौदागर से.
 
में कामयाब रहूँ दोस्तों,
 यही दुआ करना |

हां , 

हिना ,
 सलाम करती हूँ तुम्हे...

-- अनुभूति 

बुधवार, 28 जुलाई 2010

दोस्ती



जब भी कहीं सुनती हूँ 
आज कल की दोस्ती को ,

एक टीस सी उठती है,
हर तरफ दोस्ती की आड़ में दगा होता हैं | 

क्यों हर बार जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का सौदा हो रहा होता है ?

किसे कहे?
किसे समझाएं ?

हर पल ,हर कदम 
कहीं न कहीं 
ये दगा हो रहा होता हैं|

क्यों हर बार 
मासूम सी जिन्दगी की आड़ में ,
मौत का भला होता हैं ?

फरिश्तों पे भी विश्वास करने से डरता है,
एक मासूम इंसान का दिल .


क्योकि , कही न कही ,

दोस्त की आड़ में भी ,
कोई दुश्मन छिपा होता है |


-- अनुभूति 

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

जिन्दगी

एक कविता मेरे पिता आदरणीय श्री रतन चौहान के कविता संग्रह
 '' टहनियों से झांकती किरणें ''

 से 

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हवा में लिपटा धुंआ
हांडी में पकते टमाटर की खुशबू ,
और कुछ बारिश ,
बारिश का भीगापन

बाहर आई काली मिटटी को जी छूना चाहता हैं
नए मकान  की नींव खुद रही है.

लोग ताप रहे हैं,
और कांच के टुकड़े में 
अक्स देखती लड़कियां 
कंघी कर रही हैं

काम पर जाने से पहले
टहनियों से झाँक रही हैं किरणे.

कही ढोल बज रहा है
उठ रहा है स्वर,
गूंजता हुआ,

-- अनुभूति  

द्वारा 

 सादर साधिकार प्रस्तुत .

रविवार, 25 जुलाई 2010

पथ -प्रदर्शक



पथ -प्रदर्शक ! 

मै नहीं जानती थी ,
सब कुछ इतने कम समय में बदल जाएगा |

एक अल्हड लड़की,
या, मै यूँ काहूँ कि बहती नदी ,
यूँ ठहराव को पा लेगी .

सुकून उसकी सांसो में  होगा ,
और जिंदगी उसकी राहों मै .

अगर तुम ना मिलते यूँ  मुझे
तो ऐसा नहीं होता .

इतना ही कहूँगी बस,
अपना स्नेह ,ज्ञान और आशीष,
मुझ पर यूँ ही बरसाते रहना ,

मेरे मालिक
मेरे पथ -प्रदर्शक

मै आप को गुरु नहीं कहती ,
क्योकि आप तो साथी भी हो जिन्दगी के
इतना कहूँगी बस 
गोविन्द का रास्ता दिखाने वाले भी आप ही हो ,

इसलिए
लाखो बार नमन करती है  मेरी आत्मा
आप को 

मेरे मालिक

मेरे पथ -प्रदर्शक.

-- अनुभूति 

शनिवार, 24 जुलाई 2010

तुम्हारे वादे ,

तुम्हारे वादे , 

एक आस जिन्दगी की ,और
तुम्हारे वादे ,

जिन्दगी का फलसफा यही है,
तुम्हारे वादे .

तुम्हारे स्वप्न सुकून देते हैं
 और , तुम्हारा साथ वेदना .

एक डर , 
हाँ एक डर 
मुझे हर पल सताता हैं ,
कि कही तुम, मुझसे बिछड़ ना जाओ |

तुम्हारे इन वादों पे यकीन करना,
तो जिन्दगी चाहती हैं .

पर हर आने वाले पल की आहट
फिर भी मुझे डराती हैं |

तुम्हारी साँसे मुझे 
हर पल विश्वास दिलाती हैं, 
फिर भी हमनशीं  मेरे ,
ये दुनिया मुझे पल -पल डरती हैं|

क्या सत्य हैं ? 
तुम्हारी सांसे या 
तुम्हारे वादे ?

इसी  ख़ुशी और गम 
में  जिन्दगी बिताती हूँ |

हाँ 
फिर भी एक आस जिन्दगी की और तुम्हारे वादे !


-- अनुभूति 

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

जीवन -संगीत




एक झोंका हवा का और ,
और ,तुम्हारी आहटें .

एक पल और ,
और , तुम्हारी चाहतें .

तुम्हारी आहटें ,
और 
जिन्दगी के गीत .
अब तो दोनों बन गए हैं 
मन -मीत .

मेरी खनकती पायल ,
और 
तुम्हारे गीत ,
यही तो है  मेरा 
जीवन -संगीत.

-- अनुभूति 

तेरी तलाश

निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................