रविवार, 26 अगस्त 2012

हे प्रभु ! सत्य जगत के अक्ष्णु आधार

हे प्रभु ! 
मेरे राम ! राजीव नयन !
इस सत्य जगत के अक्ष्णु  आधार 
पल -पल पुकारे 
जीवन में तुम्हे आँखों से बहती ये अश्रु धार 
चरणों में स्वीकार करो मेरे प्रभु !
ये चरण प्रक्षालन स्वीकार ।

मुझे नहीं आये कोई पूजा न पाठ 
जीवन में आधार धरा हैं मेने सिर्फ आप का 
सत्य ,समर्पण और संसार स्नेह स्वीकार 
 ये  मेरा जीवन पूजन 
ये ही भक्ति की रीत 
मिट जाए ,मिटा अपना अहम् ,
दे दूजो को सुख देने को 
ये ही मेरे समर्पण की रीत 

मेरे रोम रोम बसे कभी नील नयन 
तो कभी मुस्काते माधव ।
हर रूप हर छबी में तुम ही बसे हो 
हर लीला में तुम ही दीखते  हो 
मुझे सम्हाले साथ 
आँखों से बहे अश्रु जब भी गिरे हैं 
तुम ही पोछते आये हो 
बनके इस अनाथ के नाथ 

तुम करुणा के सागर 
अपने को मिटा के सबको सुख देते हो 
में पगली हूँ तेरी राम 
कैसे आप के दुखो को ,अपना दुःख देके में बदाऊ 
इसिलए तो में बन मीरा 
ये जीवन विष प्याला 
आप की मुस्काती छबी आँखों में देख 
मधु समझ पीती जाऊ 

धन्य हूँ ! मैं 
मेरे नील सरोरुह राम ,
तुम जो आके बसे हो इस पगली की आत्मा के धाम 
रोम -रोम मेरा कृतार्थ हुआ हैं 
जीवन महका , पंक  से निकल अब पंकज बना हैं ।

पूर्ण हुआ हैं जीवन में "लक्ष्मी का लक्ष्य "
जो 
हे राजिवनयन !
जीवन की इस भोतिक माया में आपने 
इस पगली को दरस दिया हैं ।


यूँही मुझे थामे रखना 
मेरे नाथ !
 क्षमा करना मेरे करुणा निधान 
जो मोसे कोई हो भूल ।


श्री चरणों में अनुभूति