सोमवार, 11 जून 2012

आज लिखो एक लेख मेरे भी जीवन का

      हे नीलकंठ !
सारा विष अपने कंठ में समाये मुस्काते हो 
आँखों से अपनी 
सब कहके भी ऐसा क्या हैं जो मुझसे छिपाए हो ?
प्रिय !
में दासी हो तुम्हारी ,इन नैनों से पड़ती आई हूँ !
तुम्हारी मूक भाषा ,आज तक समझती आई हूँ !
कोई ऐसी तडप क्यों हैं ?
या  कोई ऐसी अभिलाषा ?
जो में चाहूँ ,आप चाहे 
प्रभु !
विष्णु चरण में बैठ  भक्ति में लीन हो जाए 
कुछ  देर प्रलयंकर भी 
वासुदेव के चरणों में ये रीत निभाए
में तो सदा निभाती आई हूँ तुम्हारी आज्ञा 
बनी हूँ प्रियं ,तुम्हे सुख देने को 
लेकिन अभी इन नशीले नैनों को 
थम जाने दो 
प्रभु !
आप के इस दिव्य रूप से मुझे इस भोतिक संसार की धरा पे भी आने 
जो संग हो सदा तो
मेरे साथ बसों इस भोतिक संसारकी लेखनी में 
आज  लिखो एक लेख मेरे भी जीवन का 
दिशा दो ,
अपनी अनुभूति को 
तुम्हारा  प्रत्यक्ष ये लेख मेरी भक्ति का ,स्नेह सत्य का विशवास का मान 
बढाएगा 
व्रती हूँ में भी आज तेरे ही नाम से 
ओ ,भोले शंकर
स्वीकार कर मेरी आराधना 
मुझे आज अपने स्नेह की प्रत्यक्ष छबी दिखाओ ।
विनती  ये ही श्री चरणों में आज अनुभूति की स्वीकारो 
मेरी पुकार पे 
प्रत्यक्ष पधारो ।

अनुभूति