रविवार, 10 जून 2012

मेरे भोले नाथ ! मैं तेरी ही क्षरण में मोक्ष पाऊं |

     मेरे शिव !
 मेरे भोले नाथ !
 या कहूँ,
 आप को नीलकंठ 
जहाँ देखूं में आप ही को पाऊं 
छोड दुनिया कि चिंता ,
आप ही के साये में सो जाऊं 
मैं   निर्भय हूँ !
पाकर तेरी छावं 
ओ प्रलयंकर !
कितने जन्मो तपी हैं तेरी सती
और कितनी ही बार तेरे सम्मान के लिए 
उसने स्वीकारी हैं यज्ञों में अपनी आहुति 
चाहे ,उसे तुम राम बन मिले हो 
चाहे, मिले हो बन के ,शिव 
अनवरत तुम लेते रहे हो ,उसकी परीक्षा 
और वो होती ही रही हैं स्वाहा 
प्रिय !
क्यों नहीं जान सका पुरुष 
स्त्री के लिए पुरुष के  सम्मान में ही ,
सेवा में ही संसार का सबसे बड़ा सुख बसा हैं 
तुमने मजबूर ना किया  होता ,
तो कंहा एक नारी ने 
घर कि दहलीज को लांघा होता |
उसने तो दे तुम्हे सम्मान,
 सदा तुम्हरे पुरुषत्व का मान किया हैं |
जिसका हाथ थामे वो बाबुल घर से आती हैं 
तुम्हे क्या पता ,तुम्हरे स्वाभिमान के लिए 
वो उसी घर कि यज्ञशाला में आहुति बन जाती हैं |
जिसने दी हैं स्नेह कि छावं वो सब कुछ पा जाता हैं 
वो प्रलयंकर भी हो तो स्त्री के वात्सल्य 
से अभीभुत बालक हो जाता हैं |
कंहा समझ सकते हो पुरुष तुम 
एक इस नारी देह कि वास्तविक सुंदरता 
इसलिए संसार में अतुप्त भटके फिरते हो |
हां इस आत्मा का, इस देह का भी अधिकारी वही 
जो दे इसे सम्मान ,स्नेह और सुरक्षा कि दे शीलत छावं 
अपना पुरुषत्व निभाता 
वही  सच्चा अधिकारी हैं जो जन्मो ,जन्मो 
अपनी सती को पाता हैं |
हर जन्म मुझे देनी पड़ी ऐसी कई परीक्षा 
तो प्रभु ! 
मेरे भोले नाथ !
में तेरी ही क्षरण में मोक्ष पाऊं 
जन्मो तेरी ही बंधिनी ,तेरी ही दासी 
तेरी ही बंधिनी हो 
अपने स्वामी का 
सम्मान अपने प्राण से भी चुकाऊं 
श्री चरणों में स्वीकारो आज 
अपनी सती का आत्मीय चरण वंदन
मुझे  यूँ ही जिवंत रखना देके अपने स्नेह कि शीतल छावं 
में हर विष प्याला पी जाउंगी 
मेरे  शिव में हर जन्म तेरी सती बनकर 
तेरी लाज निभाउंगी |
श्री चरणों में अनुभूति